वट सावित्री पूजन और व्रत कथा | Vat Savitri Vrat Katha in Hindi

वट सावित्री पूजन और व्रत कथा Vat Savitri Vrat Katha in Hindi:- ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री पूजन व्रत मनाया जाता हैं. इस दिन सत्यवान सावित्री तथा यमराज की पूजा की जाती हैं. तत्पश्चात फल का भक्षण करना चाहिए. वट सावित्री पूजन व्रत रखने वाली स्त्रियों का सुहाग अचला होता हैं. सावित्री ने वट पूजन व्रत के प्रभाव से अपने मृतक पति सत्यवान को धर्मराज से भी जीत लिया था.

वट सावित्री पूजन और व्रत कथा Vat Savitri Vrat Katha in Hindi

वट सावित्री पूजन और व्रत कथा Vat Savitri Vrat Katha in Hindi

सुवर्ण या मिटटी से सत्यवान सावित्री तथा भैंसे पर सवार यमराज की प्रतिमा बनाकर धूप, चन्दन, दीपक, फल, रोली, केसर से पूजन करना चाहिए तथा सावित्री सत्यवान की कथा/कहानी सुनानी चाहिए.

मद्र देश के राजा अश्वपति के पुत्री के रूप में सर्वगुण सम्पन्न सावित्री का जन्म हुआ. राजकन्या ने घुम्त्सेन के पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें पतिरूप में वरन कर लिया.

इधर जब यह बात ऋषिराज नारद को पता चली तो वे अश्वपति के पास गये एवं कहने लगे- आपकी कन्या ने वर ढूंढने में निसंदेह भारी भूल की हैं.

सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा भी हैं, परन्तु वह अल्पायु हैं और एक वर्ष के बाद उसकी म्रत्यु भी हो जाएगी. नारद की यह बात सुनते ही राजा अश्वपति का चेहरा विवर्ण हो गया.

वृथा ने होंहि देव ऋषि बानी ऐसी विचार करके उन्होंने अपनी पुत्री को समझाया कि ऐसे अल्पायु व्यक्ति के साथ विवाह करना उचित नहीं हैं, इसलिए दूसरा वर ढूढ लो.

इस पर सावित्री बोली- पिताजी ! आर्य कन्याएं अपना पति एक बार ही वरण करती हैं. राजा एक बार आज्ञा देता हैं, पंडित एक ही बार प्रतिज्ञा करते हैं तथा कन्यादान भी एक ही बार किया जाता हैं.

अब चाहे जो हो मैं सत्यवान को ही वर के रूप में स्वीकार करूगी. सावित्री ने नारद से सत्यवान की मृत्यु का समय भी पता कर लिया था.

आखिर वे दोनों विवाह के बंधन में बंध गये. वह ससुराल में रहकर दिन रात सास ससुर की सेवा में लगी रहने लगी. समय व्यतीत होता गया, ससुर का बल क्षीण होता देख शत्रुओं ने उसका राज्य छीन लिया.

नारद का वचन सावित्री को दिन प्रतिदिन अधीर करता जा रहा था. उसने जब जाना कि पति के मृत्यु का समय नजदीक आ गया हैं. अब तीन दिन पूर्व से ही उपवास शुरू कर दिया.

नारद द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया. नित्य की भांति उस समय भी सत्यवान लकड़ी काटने के लिए वन में चला गया तो सावित्री भी सास ससुर से आज्ञा लेकर साथ जाने के लिए तैयार हो गईं.

सत्यवान लकड़ी काटने के लिए वन में जाकर पेड़ पर चढ़ गया. वृक्ष पर चढ़ते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी. वह परेशान हो गया तथा व्याकुल होकर धीरे धीरे पेड़ से नीचे आ गया.

सावित्री अपना भविष्य समझ गयी तथा अपनी जांघ पर सत्यवान को लिटा दिया. उसी समय दक्षिण दिशा से यमराज को आते देखा. धर्मराज सत्यवान के जीव को जब लेकर चल दिए तो सावित्री भी यमराज के पीछे चल दी. पहले तो यमराज ने उन्हें दैवी विधान सुनाया परन्तु उनकी निष्ठां को देखकर वर मांगने को कहा.

सावित्री बोली- मेरे सास ससुर वनवासी हैं तथा अंधे हैं आप उन्हें दिव्य ज्योति प्रदान करे. यमराज ने कहा ऐसा ही होगा, अब लौट जाओं. यमराज की बात सुनकर सावित्री ने कहा-भगवान मुझे मेरे पतिदेव के पीछे पीछे चलने में कोई परेशानी नही हैं.

पति अनुगमन मेरा कर्तव्य हैं. यह सुनकर उन्होंने फिर वर मांगने को कहा. सावित्री बोली- हमारे ससुर का राज्य छीन गया हैं वे उन्हें फिर प्राप्त कर ले तथा धर्मपरायण हो.

यमराज ने वर दे दिया तथा लौट जाने को कहा, परन्तु उसने पीछा न छोड़ा तथा अंत में यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े तथा सौभाग्यवती को सौ पुत्र होने का वरदान देना पड़ा.

सावित्री को यह वरदान देकर धर्मराज अन्तर्धान हो गये. इस प्रकार सावित्री उसी वटवृक्ष के नीचे आई जहाँ पति का मृत शरीर पड़ा था.

ईश्वर की अनुकम्पा से उनमें जीवन का संचार हुआ तथा सत्यवान उठकर बैठ गयें. दोनों हर्ष से गले मिले तथा अपनी राजधानी की ओर चल दिए.

इस प्रकार सावित्री सत्यवान लम्बे समय तक राज्य का सुख भोगते रहे. Vat Savitri Vrat सुहागन स्त्रियों को करना चाहिए.

वट सावित्री पूजन की मान्यताएं (Vat Savitri Vrat Katha, Story, History)

गुरूवार के दिन वट वृक्ष के सुहागन स्त्रियों द्वारा 108 परिक्रमा के साथ सावित्री पूजन का बड़ा धार्मिक महत्व हैं. ऐसा करने से साधक की सभी मनोइच्छाएँ पूरी हो जाती हैं.

वट वृक्ष की पूजा सुहागन स्त्रियों द्वारा ही की जाती हैं, इन्हें पूजन के बाद ही जल ग्रहण करना चाहिए. सुबह उठने के पश्चात नहाकार सभी सोलह श्रृंगार कर पूजा में बैठना चाहिए.

इसे वट सावित्री पूजन इसलिए कहा जाता हैं, कि वट यानि बरगद के वृक्ष के नीचे ही सत्यवान की म्रत्यु हुई थी, तथा यही पर सावित्री ने यमराज को पराजित कर अपने पति को पुनः जीवित करवाया था.

वट सावित्री पूजन का महत्व (Vat Savitri Vrat ka Mahatva)

वट यानि बरगद का पेड़. इस दिन इसी बरगद के पेड़ के नीचे पूजा व परिक्रमा की जाती हैं. इस पेड़ का धार्मिक ग्रंथो में भी बड़ा महत्व माना गया हैं.

वट वृक्ष घना फैला हुआ होता है, जिसकी लम्बी लम्बी शाखाएं शिवजी की जटाओं की भांति चारो ओर फैली रहती हैं. बरगद के पेड़ में हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) निवास करते हैं. सावित्री ने इसी वृक्ष के नीचे अपने तपोबल तथा हठ से अपने मृतक पति को जीवित करवाया था.

वट सावित्री पूजा का तरीका (Vat Savitri Vrat Pooja Vidhi)

जिस तरह अलग अलग तिथि व्रत की अलग अलग परम्पराए व धारणाएं हैं, ठीक वैसे ही वट सावित्री पूजन की विशिष्ट विधि व तरीका हैं, जिनके अनुसार पूजा करने पर मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं.

हिन्दू पुराणों की मान्यता के अनुसार इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ वट वृक्ष में जल का अर्पण करती हैं. हल्दी, सिंदूर, मौली तथा चन्दन का लेप लगाकर 108 परिक्रमा करती हैं.

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