विषाणु या वायरस के बारे में Virus In Hindi

विषाणु या वायरस के बारे में Virus In Hindi: नमस्कार मित्रों आज के अध्याय में हम वायरस के बारे में विस्तार से पढेगे. इस लेख में हम जानेगे कि वायरस क्या हैं विषाणु की खोज, प्रकृति, जैविक व निर्जीव गुण अंतर, संरचना, वर्गीकरण, नामकरण , जनन, संचरण, आर्थिक महत्व और जीवाणुभोजी आदि. चलिए वायरस इन हिंदी को पढ़ना शुरू करते हैं.

विषाणु या वायरस के बारे में Virus In Hindi

विषाणु शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द वाइरस से हुई हैं जिसका शाब्दिक अर्थ विष- अणु हैं. ये जीवाणुओं से सूक्ष्म आमाप के कण हैं तथा इन्हें जीवाणुज फिल्टर द्वारा पृथक नहीं किया जा सकता हैं. इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी से देखने पर यह ज्यामितीय आकृति के क्रिस्टलीय पिंड के रूप में दिखाई देते हैं. रासायनिक दृष्टि से विषाणु प्रोटीन के आवरण से घिरे न्यूक्लिक अम्ल के खंड हैं.

विषाणु या वायरस की खोज Discovery the virus in Hindi

इवैनोविस्की नामक रुसी वैज्ञानिक ने देखा कि संक्रमित पौधे के रस को स्वस्थ पौधे की पती से रगड़ कर तम्बाकू के मोजैक रोग के लक्षण उत्पन्न किये जा सकते हैं. वायरस की खोज का श्रेय इवैनोविस्की को ही जाता हैं. यद्यपि ये इनको पहचान नहीं सके थे.

इवैनोविस्की के अनुसार विषाणु रोग उत्पन्न करने वाले अतिसूक्ष्मदर्शी परजीवी हैं. बेडन के अनुसार विषाणु ऐसे रोगजनक अविक्ल्पी परजीवी हैं जिनका आकार 200 मिलीमाइक्रान से कम होता हैं. लुरिया के अनुसार विषाणु उन अतिसूक्षम इकाइयों को कहते हैं जिनकी पुनरावृत्ति केवल विशिष्ट पोषक कोशिकाओं में ही होती हैं. मैथ्यूस के अनुसार विषाणु किसी एक न्यूक्लिक अम्ल के एक अथवा अधिक टेम्पलेट को लहते हैं जो जैविक लक्षण दर्शाता हैं.

ये विषाणु जो जीवाणु कोशिका में परजीवी होते है, जीवाणुभोजी या बैक्टीरियोफाज कहलाते हैं. इनका आविष्कार वार्ट एवं डी हैरेली द्वारा अलग अलग किया गया.

वायरस की प्रकृति (Nature Of Virus)

वायरस की प्रकृति के सम्बन्ध में कवकद्रव्य वाद, जीवाणुवाद, ओक्सीकरण एंजाइम वाद तथा विषाणु वाद आदि मत बताये गये हैं, परन्तु विषाणुवाद सबसे मान्य और प्रचलित मत हैं. इस वाद के अनुसार

  1. विषाणु, अतिसूक्ष्म, अकोशिकीय, कणिकामय सरंचनाएं है जिन्हें सूक्ष्मदर्शी से देखा नहीं जा सकता, किन्तु इनका अध्ययन केवल इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही किया जा सकता हैं.
  2. इन्हें जीवाणु फिल्टर से पृथक नहीं किया जा सकता और कृत्रिम संवर्धन माध्यम में नहीं उगाया जा सकता.
  3. इनमें जीवद्रव्य नहीं होता है.
  4. विषाणु केवल परपोषी ऊतक में ही सजीवता के लक्षण उत्पन्न करते हैं तथा ये जीवित कोशिका में ही गुणन कर सकते हैं.
  5. इनमें प्रकार्यक स्वायत्ता का अभाव होता हैं.
  6. विषाणुओं का क्रिस्टलीकरण करके क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया जा सकता है.
  7. विषाणु सदैव अविक्ल्पी अंतरकोशिक परजीवी होते है तथा सुगमता से एक परपोषी से अन्य परपोषी में स्थान्तरित हो जाते हैं.
  8. इन पर प्रतिजैविक का प्रभाव नहीं होता परन्तु विषाणुओं को रसायन तथा ताप उपचार द्वारा निष्क्रिय किया जा सकता हैं.
  9. विषाणु ताप व आर्द्रता के प्रति अनुक्रिया दर्शाते है.
  10. इनकी संरचना में बाहर प्रोटीन का आवरण होता हैं तथा अंदर दोनों न्यूक्लिक अम्ल में से केवल एक ही अम्ल होता हैं.
  11. इनके अंदर जैविक क्रियाएं जैसे श्वसन, प्रकाश संश्लेषण व वृद्धि नहीं होती.

विषाणुओं के सम्बन्ध में अभी भी निर्जीव व सजीव लक्षणों के आधार पर विवाद है क्योंकि विषाणु सजीव परपोषी के बाहर निर्जीव या निष्क्रिय रहते हैं किन्तु सजीव परपोषी के अंदर जीवित जीव की तरह व्यवहार करते हैं. अतः इनमें सजीव व निर्जीव दोनों प्रकार के गुण विद्यमान होते है. अतः विषाणु सजीवों व निर्जीवों के बीच की योजक कड़ी हैं.

विषाणुओं के जैविक गुण (Living Or animate Characters Of viruses In Hindi)

  • विषाणुओं का गुणन मात्र जीवित कोशिकाओं में ही हो सकता हैं.
  • विषाणु, परपोषी के प्रति विशिष्टता दर्शाते है.
  • ये जीवाणु व कवक की जैसे किसी भी स्वस्थ पौधे को संक्रमित कर सकते हैं.
  • इनमें न्यूक्लिक अम्ल होता है और प्रतिजनी गुण होते है.
  • ये विकरण प्रकाश, रासायनिक पदार्थों, अम्ल, क्षार तथा तापक्रम जैसे उद्दीपकों के प्रति अनुक्रिया दर्शाते हैं.
  • विषाणुओं में अनुवांशिक पदार्थों की पुनरावृत्ति होती है, जो सजीवों का एक लक्षण हैं.
  • इनके उत्परिवर्ती प्रारूप मिलते है, उत्परिवर्तन जीवों का प्रमुख लक्षण हैं.

विषाणुओं के निर्जीव गुण (Non Living Or Inanimate Characters Of Viruses In Hindi)

  • इनमें कोशिका भित्ति, प्लाज्मा झिल्ली तथा कोशिकांगों का अभाव होता हैं.
  • इनमें श्वसन वृद्धि इत्यादि जैविक क्रियाएं नहीं होती हैं.
  • विषाणुओं को क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया जा सकता हैं, यह केवल निर्जीव में ही सम्भव हैं.
  • ये विशिष्ट परपोषी की ऊतक के बाहर अक्रिय रहते हैं.
  • ये स्वउत्प्रेरक होते हैं तथा इनमें कार्यशीलता स्वायतता नहीं होती हैं.
  • इनमें एंजाइम का अभाव होता हैं. इनका प्रोटीन की जैसे अवसादन किया जाता हैं.
  • विभिन्न रासायनिक पदार्थों की सहायता से इनका अवक्षेपण भी किया जा सकता हैं.
पादप व जन्तुओं में अंतर (Differences Between Plant And Animal Viruses)

पादप व जन्तुओं में रोग फैलाने वाले विषाणु अलग अलग होते हैं, इनमें दो मुख्य अंतर होते हैं.

  1. सभी प्रकार के पादप विषाणुओं में आवरण का अभाव होता हैं, किन्तु सभी जन्तु विषाणुओं में यह उपलब्ध विषाणु अथवा अनुपस्थित होता हैं.
  2. सभी पादप विषाणुओं में अनुवांशिक पदार्थ RNA होता हैं, जबकि जन्तु विषाणुओं में यह RNA अथवा DNA होता हैं.

विषाणुओं की संरचना (Structure Of Viruses)

आमाप (Size): विषाणु विभिन्न आमाप व आकार के होते हैं. इसके संक्रमित पादपों के रस से विषाणुओं को पृथक कर इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी यंत्र में विषाणु कण अर्थात विरिआन का अध्ययन किया जाता हैं. विरिआन इतने सूक्ष्म होते है कि इन्हें नेनोमीटर में मापा जाता हैं. इनका आमाप लगभग 10 Nm से लेकर 300 Nm तक होता हैं. प्रायः पादप विषाणु आमाप में जन्तु विषाणु से छोटे होते है. विषाणुओं का आकार कुंडलित दंडिका धनाभ अथवा जटिल होते हैं.

रासायनिक संगठन: सभी प्रकार के विषाणुओं का रासायनिक संगठन समान प्रकार का होता हैं, प्रत्येक विषाणु में न्यूक्लिक अम्ल का एक केंद्रीय कोड होता हैं. जो कि एक प्रोटीन आवरण से ढका होता है जिसे पेटिका कहते हैं. पेटिका अनेक छोटी छोटी उपइकाइयों पेटीकांशक से बनी होती हैं. केन्द्रीय क्रोड़ अथवा पेटिका संयुक्त रूप से न्यूक्लिओकैपिस्ड कहलाती हैं. न्यूक्ली ओकैस्पिड पर भी एक आच्छद होती हैं किन्तु यह आवश्यक नहीं हैं कि यह आवरण सभी प्रकार के विषाणुओं पर पाया जाए.

प्रायः पादप विषाणुओं में इस आच्छद का अभाव होता हैं. किन्तु जन्तु विषाणुओं पर यह आच्छद उपस्थित या अनुपस्थित हो सकता हैं. स्तनधारियों में पाए जाने वाले अनेक विषाणुओं में पेटिका के बाहर लिपिड अथवा लिपोप्रोटीन से बना एक आवरण होता हैं. ऐसे विषाणुओं को लिपोविषाणु कहते हैं. जैसा पूर्व में बताया जा चूका हैं कि पादप विषाणुओं में केवल RNA पाया जाता हैं. किन्तु जन्तु विषाणुओं में RNA अथवा DNA में से एक न्यूक्लिक अम्ल होता हैं.

प्रत्येक विषाणु में आनुवांशिक पदार्थ का केवल एक अणु होता हैं. इसमें न्यूक्लिओटाइड युग्मों की संख्या एक हजार से ढाई लाख तक होती हैं. परन्तु किसी एक प्रकार के विषाणु में इनकी संख्या निश्चित होती हैं. अतः न्यूक्लिओटाइडों की संख्या विषाणु का एक विशिष्ट लक्षण है. विषाणुओं का एक महत्वपूर्ण लक्षण यह हैं कि उनका प्रोटीन घटक हानिकारक नहीं होता हैं. विषाणु के संक्रामक लक्षण उसके न्यूक्लिक अम्ल में विद्यमान होते हैं. अतः संक्रमण के लिए परपोषी कोशिका में विषाणु के न्यूक्लिक अम्ल का प्रवेश आवश्यक हैं.

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