कश्मीर विवाद क्या है इसका इतिहास व विशेष दर्जा | What Is Kashmir conflict in Hindi

कश्मीर विवाद क्या है इसका इतिहास व विशेष दर्जा | What Is Kashmir conflict in Hindiभारत का मुकुट कहे जाने वाले जम्मू कश्मीर राज्य का विवाद काफी प्राचीन हैं. वर्ष 1947 से भारत विभाजन के साथ ही कश्मीर विवाद को लेकर भारत पाक के मध्य तीन युद्ध भी हो चुके हैं. मगर समस्या खत्म होने की बजाय दोनों देशों के बीच के विवादों का मूल कारण यह क्षेत्र ही हैं. What Is Kashmir conflict in Hindi में आज हम जानेगे कि कश्मीर विवाद या समस्या क्या है.

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कश्मीर विवाद क्या है संक्षिप्त परिचय (What Is Kashmir conflict in Hindi)

भारत पाकिस्तान के मध्य अन्य सभी समस्याओं में उज्ज्वल और स्थाई हैं कश्मीर की समस्या. दोनों देशों किए बीच यह एक ऐसे ज्वालामुखी की तरह हैं. जो समय समय पर लावा उगलती रहती हैं. अलाप माइकल के शब्दों में कश्मीर समस्या अनिवार्यतः भूमि या पानी की समस्या नहीं यह दोनों देशों के लोगों और प्रतिष्ठा का प्रश्न हैं.

कश्मीर की समस्या भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे उलझी हुई समस्या हैं. स्वतंत्रता के बाद जहाँ भारत और पाकिस्तान दो नयें देश बने वहीं देशी रियासतों एक प्रकार से स्वतंत्र हो गई. ब्रिटिश सरकार ने घोषणा कर दी थी कि देशी रियासतें अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में विलय हो सकती हैं.

अधिकांश रियासतें भारत अथवा पाकिस्तान में मिल गई और उनकी कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई. भारत के लिए हैदराबाद और जूनागढ़ ने अवश्य ही समस्या उत्पन्न कर दी थी. परन्तु वह शीघ्र ही हल कर दी गई. कश्मीर की स्थिति कुछ विशेष प्रकार की थी.

भारत की उत्तर पश्चिम सीमा पर स्थित यह राज्य भारत और पाकिस्तान दोनों को जोड़ता हैं. यहाँ की जनसंख्या का बहुसंख्यक मुस्लिम धर्मी था. परन्तु वहां का आनुवांशिक शासक एक हिन्दू शासक था. अगस्त 1947 में कश्मीर के शासक ने अपने विलय के विषय में कोई तत्कालिक निर्णय नहीं किया.

पाकिस्तान इसे अपने साथ मिलाना चाहता था. 22 अक्टूबर 1947 को उत्तर पश्चिम सीमाप्रांत के कबाइलियों के भेष में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में घुसपैठ कर आक्रमण कर दिया. साथ ही पाकिस्तान ने अपनी सीमा पर भी सेना का जमाव कर दिया. 4 दिनों के भीतर ही हमलावर आक्रमणकारी श्रीनगर से २५ मील दूर बारामुला तक जा पहुचे.

26 अक्टूबर को कश्मीर के राजा ने आक्रमणकारियों से अपने राज्य को बचाने के लिए भारत सरकार से सैनिक सहायता की मांग की. और साथ ही कश्मीर को भारत में सम्मिलित करने की प्रार्थना की. भारत सरकार ने इस प्रस्ताव को तत्काल स्वीकार कर लिया.

27 अक्टूबर को भारतीय सेनाएं कश्मीर भेज दी गई तथा युद्ध समाप्ति पर जनमत संग्रह की शर्त के साथ कश्मीर को भारत का अंग मान लिया गया. भारत द्वारा जम्मू व कश्मीर की सुरक्षा व कश्मीर के भारत में विलय के निर्णय के कारण और उधर पाकिस्तान द्वारा आक्रमणकारियों को सहायता देने की नीति के कारण कश्मीर दोनों राष्ट्रों के बीच युद्ध का क्षेत्र बन गया.

भारत सरकार ने पाकिस्तान से कहा कि कबाइलियों का मार्ग बंद करे परन्तु जब इस बात के प्रमाण मिलने लगे कि पाकिस्तान सरकार स्वयं इन कबाइलियों की सहायता कर रही है तो १ जनवरी १९४८ को भारत सरकार ने सुरक्षा परिषद में शिकायत की कि पाकिस्तान की सहायता से कबाइलियों ने भारत के प्रमुख अंग कश्मीर पर आक्रमण कर दिया हैं.

जिससे अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को खतरा है. कई सामरिक विश्लेषक भारत के इस निर्णय को भारत के हितों के विपरीत मानते है. सुरक्षा परिषद ने इस समस्या का समाधान करने के लिए 5 राष्ट्रों चेकोस्लोवाकिया, अर्जेन्टीना, अमरीका, कोलम्बिया और बेल्जियम को सदस्य नियुक्त कर मौके की स्थिति का अवलोकन करके समझौता कराने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र आयोग की नियुक्ति की.

संयुक्त राष्ट्र आयोग के कार्य (UN Commission’s work)

संयुक्त राष्ट्र आयोग ने तुरंत कार्य आरम्भ कर दिया और मौके पर स्थिति का अध्ययन कर 13 अगस्त 1948 को दोनों पक्षों से युद्ध बंद करने और समझौता करने हेतु निम्नांकित आधार प्रस्तुत किये.

  • पाकिस्तान अपनी सेनाएं कश्मीर से हटाये तथा कबाइलियों व घुसपैठियों को भी वहा से हटाये
  • सेनाओं द्वारा खाली किये गये प्रदेश का शासन प्रबंध स्थानीय अधिकारी करे.
  • पाकिस्तान द्वारा उपर्युक्त वर्णित शर्तों को पूरा करने की सूचना भारत को दे तब समझौते के अनुसार वह भी अपनी सेनाओं का अधिकांश भाग वहा से हटा ले.
  • भारत सरकार युद्ध विराम के अंदर उतनी ही सेनाए रखे जितनी कि इस प्रदेश में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के कार्य में स्थानीय अधिकारियों को सहायता देने के लिए वांछनीय हो.

इस सिद्धांत के आधार पर दोनों पक्ष एक लम्बी वार्ता के बाद 1 जनवरी 1949 को युद्ध विराम के लिए सहमत हो गये. कश्मीर के विलय के अंतिम निर्णय जनमत संग्रह से किया जाना था. जनमत संग्रह की शर्तों को पूरा करने के लिए एक अमेरिकी नागरिक एडमिरल चेस्टर निमित्ज को प्रशासक नियुक्त किया गया.

उन्होंने जनमत संग्रह के संबंध में दोनों पक्षों से बातचीत की किन्तु उसका कोई परिणाम नहीं निकला. अंत में उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया. युद्ध विराम के साथ सीमा रेखा निर्धारित हो जाने पर पाकिस्तान के हाथ में कश्मीर का ३२ हजार वर्गमील क्षेत्रफल रह गया.

जिसकी जनसंख्या 7 लाख थी. पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को आजाद कश्मीर नाम से पुकारा. युद्ध विराम रेखा के इस पार भारत के अधिकार में 53 हजार वर्गमील क्षेत्र्फल्था जिसकी जनसंख्या ३३ लाख थी. स्पष्ट है कश्मीर भारत का ही अंग बना था.

भारत पाक के बीच स्थाई है कश्मीर विवाद

स्वतंत्रता के समय भारत की आबादी लगभग 34 करोड़ थी और वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश था. हम आज भी दूसरे स्थान हैं. अपने पडौसियों के साथ यदि हमारे संबंध शांतिपूर्ण रहते है तो आर्थिक व सांस्कृतिक सहयोग की बात बढ़ाई जा सकती थी.

मगर पाकिस्तान इस बात के लिए कतई तैयार नहीं था. पाकिस्तान यह मानने को तैयार नही था कि कश्मीर घाटी की बहुसंख्यक मुसलमान आबादी भारत के साथ शेख अब्दुल्ला के बताए जनतांत्रिक, धर्म निरपेक्ष मार्ग पर ही चलने की इच्छुक हैं.

पाकिस्तान इस बात को भी बहुत जल्द भूल गया कि उसने कश्मीर पर नाजायज कब्जा करने के लिए घुसपैठिये सैनिक भेजे थे. और भारत पर एक अघोषित युद्ध थोप दिया था. अक्टूबर 1947 के कबायली आक्रमण से लेकर अब तक पाकिस्तान ने कश्मीर समस्या को पेचीदा बनाने में कोई कसर नहीं रखी हैं.

धन व धर्म का सहारा लेकर पाकिस्तान ने इस विवाद को धार्मिक रंग देकर अत्यंत गम्भीर बना दिया हैं. कश्मीर का मुद्दा भारत की सुरक्षा व अखंडता से जुड़ा हुआ मुद्दा हैं. तत्कालीन जम्मू कश्मीर राज्य के शासक हरिसिंह को जम्मू कश्मीर राज्य को माउंट बैटन योजना के तहत स्वतंत्र घोषित करना और तत्पश्चात पाकिस्तान के साथ स्टेंडस्टिल एग्रेमेंट (Standstill Agreement) करना कश्मीर और भारत दोनों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा.

पाकिस्तान ने अपने नापाक मंसूबों को पूरा करने के लिए 22 अक्टूबर 1947 को कबायलियों के भेष में कश्मीर पर आक्रमण के लिए भेज दिया. विकट परिस्थतियों में तत्कालीन जम्मू कश्मीर राज्य के शासक हरी सिंह ने अपनी ऐतिहासिक भूल को सुधारते हुए जम्मू व कश्मीर राज्य को भारतीय संघ में शामिल करने के विलय पत्र पर 26 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षर कर दिए.

पंडित नेहरु ने तत्कालीन परिस्थतियों में यह घोषणा कर डाली थी कि कश्मीर विवाद के निपटारे के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका को सहर्ष स्वीकार किया जाएगा. और कश्मीरी जनता की इच्छा को जानने के लिए आत्म निर्णय का अधिकार देने वाला जनमत संग्रह कराया जाएगा.

आज जब कभी भी भारत से सहयोग की बात होती हैं. तो पाकिस्तान कश्मीर का काँटा चुभा कर वार्ताओं को असफल कर देता हैं. यदपि उस घटना के बाद कश्मीर में हुए चुनावों ने जनमत के तर्क की हवा निकाल दी हैं. इसीलिए भारत का तर्क यह है कि जम्मू कश्मीर राज्य में एक नहीं, अनेक बार निष्पक्ष चुनाव हो चुके है और वहां की जनता ने अपने आत्म निर्णय के अधिकार का प्रयोग कर यह दिखला दिया है कि वह भारत के साथ ही रहना चाहती हैं.

कश्मीर का विशेष दर्जा

जिस समय कश्मीर भारत का अंग बना था उस समय शेख अब्दुल्ला के प्रभाव के कारण भारतीय संघ में कश्मीर राज्य की स्वायत्तता की खास पहचान को बनाये रखने के लिए विशेष स्थिति को संवैधानिक संरक्षण दिया गया था.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर राज्य ने अपना अलग संविधान बनाया. विदेशी संबंध, प्रतिरक्षा मामलों एवं संचार जैसे संवेदनशील मुद्दों को छोड़कर इच्छानुसार कानून पास करने की आजादी जम्मू कश्मीर राज्य की विधान सभा को दी गई.

आयकर, उत्पादन शुल्क आदि के बारे में भी इस राज्य की विशेष स्थिति को मान्यता दी गई. जो बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण थी वह यह की भारत के किसी नागरिक को, जो कश्मीर राज्य का नागरिक न रहा हो, वहां जमीन खरीदने का अधिकार नहीं था.

इन सब कारणों ने जम्मू कश्मीर राज्य को देश की मुख्यधारा से अलग थलग रखा. जहाँ इस व्यवस्था ने कश्मीरी नेताओं के और वहां के कुलीन शासक वर्ग के अहंकार को तो तुष्ट किया और उनके स्वार्थों को संरक्षित रखा, वहीं अलगाववाद की भावना को भी प्रोत्साहित किया.

कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिए आधार 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 प्रारम्भ से ही विवाद का विषय रहा हैं. इसी प्रावधान के कारण जम्मू व कश्मीर राज्य को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था. लेकिन यह एक पुर्णतः अस्थायी अंशकालीन व्यवस्था थी. जो तत्कालीन परिस्थतियों के कारण प्रदान की गई थी.

विगत 70 वर्षों में इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने अपने अपने ढंग से प्रयास किये परन्तु अभी तक इसका समाधान नहीं ढूंढा जा सका हैं. कश्मीर समस्या अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पेचीदगियों में फसी हुई हैं.

कश्मीर समस्या और धर्मनिरपेक्षता और भावनात्मक मुद्दा

कश्मीर का विवाद सिर्फ विवादग्रस्त भू भाग तक सिमित नहीं हैं. कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहना उसकी धर्म निरपेक्ष पहचान की एक बड़ी कसौटी भी हैं. कश्मीर राज्य का अर्थ सिर्फ श्रीनगर की घाटी ही नहीं वरन यह लद्दाख का विस्तृत इलाका, जहाँ सियाचिन का ग्लेशियर भी फैला हुआ हैं.

जो इसी राज्य का हिस्सा हैं. भारत चीन सीमान्त का सबसे बड़ा अतिसंवेदनशील भाग हैं. भारत सिर्फ पाक अधिकृत कश्मीर और श्रीनगर की घाटी के बीच सम्बन्धों को सामान्य बना कर यह नहीं मान सकता कि विवाद का निपटारा किया जा चूका हैं. ना ही विस्थापन की अनदेखी कर सकती हैं. कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन ने बहुसंख्यक आबादी को उद्देलित किया हैं.

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