क्षेत्रवाद क्या है कारण समस्या व समाधान | What Is Regionalism in India In Hindi

क्षेत्रवाद क्या है कारण समस्या व समाधान | What Is Regionalism in India In Hindiक्षेत्रीयता या क्षेत्रवाद एक राजनीतिक विचारधारा व समस्या है. जो राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध स्थानीय हितों को सर्वोपरि रखती हैं. regionalism in India pdf & regionalism meaning में आज हम विस्तार से जानेगे कि क्षेत्रवाद का अर्थ क्या है क्षेत्रवाद के कारण ( causes of regionalism in India) तथा क्षेत्रवाद की समस्या व समाधान के बारे में What Is Regionalism in India में आज जानेगे.

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What Is Meaning Of Regionalism in Hindi

हमारा देश विविधताओं वाला देश है. यहाँ पर भौगोलिक, सांस्कृतिक, भाषाई भिन्नता विद्यमान हैं. तथापि ये भिन्नताएं हमारे लिए कौतूहल का कारण बनती हैं. तो कई बार अतिवादिता के कारण शासन के लिए व्यवस्था निर्माण में समस्या भी पैदा करती हैं.

आजादी के समय हमारा भारत आर्थिक दृष्टि से सक्षम राष्ट्र नहीं था. विदेशी शासकों द्वारा हमारी अर्थव्यवस्था का अत्यधिक दोहन व प्रान्तों का असंतुलित विकास इसका प्रमुख कारण रहा हैं. स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त हमारी संघीय सरकार ने राज्य पुनर्गठन व अन्य उपायों द्वारा असंतुलन की इस व्यवस्था को ठीक करने का प्रयास किया.

प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, हमारी ऐतिहासिक पृष्टभूमि इत्यादि के कारण क्षेत्रीय भिन्नताएं मौजूद रही. स्वतंत्रता के पश्चात राज्यों के गठन की प्रक्रिया भी इसका एक कारण रही. राज्यों का निर्माण, ब्रिटिश प्रांतों के विलय, देशी रियासतों के एकीकरण एवं राजनीतिक सामाजिक एकीकरण के फलस्वरूप हुआ.

जाति, धर्म, सम्प्रदाय व्यक्ति विशेष की अग्रणी छवि आदि ने भी राज्य पुनर्गठन की प्रक्रिया को प्रभावित किया. आर्थिक विकास का स्तर, नौकरशाही की राजनीति प्रतिबद्धता क्षेत्रीय आकांक्षाएं भौगोलिक स्वरूप के कारण भी राज्यों में क्षेत्रीय असंतुलन विद्यमान रहा.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एकमात्र लक्ष्य आजादी प्राप्त करना था. उस दौर में ये आकांक्षाए गौण रही, किन्तु 1947 के पश्चात ये पुनः प्रधान हो गई. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात विभिन्न प्रांतों की इन मांगों ने क्षेत्रवाद की भावनाओं को बलवती किया.

  • राज्यों के पुनर्गठन की मांग
  • नवीन राज्य निर्माण मांग
  • भारत संघ में ही अधिक स्वायत्ता की आकांक्षा
  • प्राकृतिक संसाधनों के वितरण सम्बन्धी विवाद
  • केंद्र से अधिकाधिक आर्थिक सहायता प्राप्त करना
  • अधिकाधिक आर्थिक सहायता प्राप्त करना
  • अधिकाधिक राजनीतिक सहभागिता का दावा.

क्षेत्रवाद क्या है (What Is Regionalism In Hindi)

स्थानीय निवासियों द्वारा संघ या राज्य की तुलना में किसी क्षेत्र विशेष या प्रांत से लगाव व उनकी प्रोन्नति के प्रयास क्षेत्रवाद की श्रेणी में आते हैं. क्षेत्रवाद का उद्देश्य हैं. अपने संकीर्ण क्षेत्रीय स्वार्थों की पूर्ति. यह ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें क्षेत्र विशेष के लोग आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक शक्तियों की अन्य से अधिक मांग करते हैं.

क्षेत्रवाद के कारण (Causes Of Regionalism)

  1. प्रकृति प्रदत्त भिन्नताएँ व असमानताएं
  2. प्रशासन द्वारा संसाधनों के समान वितरण का अभाव या प्रशासनिक भेदभाव.
  3. केन्द्रीय निवेश व विकास सम्बन्धी भिन्नता
  4. ऐतिहासिक एवं राजनीतिक कारण
  5. सांस्कृतिक विविधताएं
  6. भाषाई विविधता से क्षेत्रवाद की भावना को बल

संकीर्ण क्षेत्रीय आकांक्षाएं के राष्ट्र को दुष्परिणाम झेलने पड़ते है जैसे

  • देश की अखंडता को चुनौती-क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बलवती होने की प्रक्रिया में राष्ट्र की एकता व अखंडता को गौण कर दिया जाता हैं, यहाँ तक कि उग्र स्वरूप में तो कई बार पृथकतावाद का भाव भी पनपने लगता हैं. जो राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती दे डालता हैं. क्षेत्र विशेष का संघ सरकार व उसकी नीतियों से भरोसा उठ जाता हैं. हमारी राष्ट्रीय राजनीति में पिछले सात दशकों का अनुभव इस संबध में अच्छा नहीं रहा हैं.
  • नए राज्यों की मांग
  • क्षेत्रीय राजनीति एवं राजनीतिक दलों का प्राबल्य
  • भूमि पुत्र की अवधारणा
  • स्वयंभू नेताओं का उदय
  • राष्ट्रीय कानूनों व आदेशों को चुनौती- अराजकता की स्थिति का पनपना
  • अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में देश की साख खराब होना- आंतरिक क्षेत्रीय समस्याओं का हमारी अंतर्राष्ट्रीय छवि को खराब करता हैं. कभी मानवाधिकार के नाम पर तो कभी लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरक्षण के नाम पर अन्य राष्ट्र हमारी क्षेत्रवाद के आधार पर उठ रही मांगों की आड़ में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आलोचनाएं करते हैं.

क्षेत्रवाद की समस्या का समाधान (Resolution Of Problem Of Regionalism)

समस्या के समाधान का उपाय उसके कारणों में निहित होता है. क्षेत्रवाद पनपने के कारणों को समाप्त करने से ही इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता हैं. कुछ उपाय जिनसे हम क्षेत्रवाद की समस्या से राहत पा सकते हैं.

  • संतुलित राष्ट्रीय नीति निर्माण– केंद्र सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह सभी क्षेत्रों के समान विकास हेतु नीति निर्माण के समय राजनीतिक भेदभाव किये बिना संतुलित व समदर्शी नीति निर्माण करे. छोटे व संसाधनों की दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्रों/ राज्यों के विकास को भी समान प्राथमिकता दे तो धीरे धीरे वहां के निवासियों में विश्वास पैदा होता जाएगा व क्षेत्रवाद का उग्र स्वरूप शांत होगा.
  • राज्यों में स्थाई आधारभूत ढाँचागत विकास क्षेत्रीय भिन्नताओं में कमी लाने के लिए पिछड़े व अविकसित क्षेत्रों में सिंचाई, बिजली, यातायात व संचार के आधारभूत साधनों के विकास को प्राथमिकता देनी होगी, जिसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम सामने आयेंगे.
  • विकास के विशेष कार्यक्रमों का परियोजनाओं के रूप में प्रारम्भ किया जाना– यह प्रक्रिया सरकार ने प्रारम्भ कर भी दी हैं. सूखा संभाव्य क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP) मरु विकास कार्यक्रम (DDP) पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (AADP) जनजाति क्षेत्र विकास कार्यक्रम (TADP) विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना आदि से क्षेत्रीय असंतुलन कम किया जा सकता हैं.
  • प्रशासनिक दृष्टि से छोटे राज्यों का गठन– छोटे छोटे राज्यों से प्रांतीय सरकारों द्वारा स्थानीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलाए जा रहे हैं. केन्द्रीय करों के वितरण में ही हिस्सेदारी बढ़ती हैं.
  • सांस्कृतिक भिन्नता को एकीकरण की ताकत बनाना दूरदर्शन, रेडियो, समाचार पत्रों व अन्य संप्रेषण माध्यमों द्वारा भिन्नता को ही ताकत के रूप में उभरना हमारी पहल हो. संस्कृतियों की पहचान व प्रतिष्ठा देना व उन्हें एक दूसरे के साथ साहचर्य भाव से जोड़ना एकीकरण का माध्यम हो सकती हैं.
  • भाषायी विविधता का सम्मानहमारा संविधान भी इन्हें मान्यता देकर विविधता को स्वीकार कर चुका हैं. हमें सभी प्रांतों को भाषाओं को परस्पर सम्मान देना होगा. अनुवाद का दायरा बढ़ाना होगा. विद्यालय पाठ्यक्रम में इन्हें समुचित स्थान देना होगा.

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