ठोस कचरा प्रबंधन क्या है | what is solid waste management in hindi

ठोस कचरा प्रबंधन क्या है | what is solid waste management in hindi: आधुनिक समय की भयानक समस्याओं में कचरा निपटान एक बड़ी वैश्विक समस्या हैं. खासकर शहरी जीवन में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के कोई बड़े प्रबंध नहीं होते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप नगर निकायों के पास उस अगलनीय कूड़े को कई किलोमीटर की भूमि पर शहर के बाहर ढेर लगाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता हैं. आज के निबंध, भाषण अनुच्छेद में हम ठोस कचरे के प्रबंधन, निपटान, उपाय आदि पर विस्तृत अध्ययन करेंगे.

what is solid waste management in hindi

ठोस कचरा प्रबंधन क्या है what is solid waste management in hindi

ठोस कचरा प्रबन्धन का अर्थ वातावरण व जन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ठोस कचरे का उपचार, निस्तारण, पुनः उपयोग, पुनः चक्रण तथा ऊर्जा में परिवर्तन करने की प्रक्रियाओं के संचालन का प्रबन्धन करना हैं. यहाँ ठोस कचरे solid waste management से आशय है कि घरों, कारखानों, उद्योगों, अस्पतालों एवं अन्य संस्थानों से निकलने वाला सूखा व गीला अनुपयोगी सामान.

सरल भाषा में कहे तो ठोस कचरे का अर्थ हैं, हमारे घरों, उद्योगों, कार्यालयों, स्कूलों आदि में काम में ली जाने वाली वे कठोर वस्तुएं जिन्हें एक बार उपयोग के बाद हम यूँ ही फेक देते हैं, जो समय के साथ न तो गलती हैं न उसका भर्जन होता हैं. कांच, प्लास्टिक की बनी वस्तुएं, इलेक्ट्रॉनिक के सामान, इलाज में प्रयुक्त सीरिज और दवाई की शीशियाँ आदि हजारों ऐसे उत्पाद हैं जो एक बार काम में लेने के बाद सालो साल उसी अवस्था में रहते हैं. हमारे घरों में प्रयुक्त सब्जी, फल, पौधे की पत्तियां, गोबर आदि कुछ समय बाद खाद के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं. जबकि ठोस वस्तुओं के अवशिष्ट के निपटान की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं हैं. इससे वे न केवल कई एकड़ की जमीन कोई बंजर बनाते हैं बल्कि जमीन और वायु में प्रदूषण भी बढ़ाते हैं.

ठोस अवशिष्ट प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य अधिकतम मात्रा में कूड़े करकट को संयंत्र के माध्यम से पुनरुपयोग अथवा खाद के रूप में बदलने हेतु लायक बनाना. इस कचरे का समुचित उपयोग करके बिजली उत्पादन किया जा सकता हैं. साथ ही बड़ी मात्रा में भूमि के अधिग्रहण को रोका जा सकता हैं. दिल्ली जैसे महानगरों के बाहर मीलो मील तक इसी तरह के कूड़े के ढेर हमारी सफाई व्यवस्था की नाकामी को खुलेआम बया करते हैं. PIB की 2016 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में प्रतिदिन 62 मिलिय न टन कचरा खुले में फेक दिया जाता हैं.

शहरीकरण, औद्योगिकरण और आर्थिक विकास की इस दौड़ में हमने ऐसे ऐसे यंत्र और साधन तो बना लिए जिससे हमें तत्कालिक सुख तो मिल गया, मगर उसके निपटान को लेकर कोई साफ़ कार्ययोजना नहीं थी, जिसका नतीजे में हम हर साल कम होती उपजाऊ जमीन और आसमान छूती ठोस कूड़े की मीनारे किसी भी शहर में स्पष्तया देख सकते हैं. इस विकराल समस्या से दो दो हाथ करने के लिए प्रत्येक नागरिक की भागीदारी परिहार्य हैं. हम अपने घर में कम से कम दो तरह के कचरा पात्र अवश्य रखे, ताकि निपटान योग्य कचरे का तो समुचित उपयोग किया जा सके.

अपशिष्ट को निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है

मूल रूप से हम कचरे को उसकी प्रकृति के आधार पर पांच भागों में विभाजित करते हैं, इसके प्रकार इस तरह हैं.

  • ठोस अपशिष्ट (Solid Waste): ठोस कचरे में कठोर बनी वस्तुएं शामिल की जाती हैं जो घरों, उद्योगों और अस्पतालों में मुख्य रूप में उपयोग में ली जाती हैं.
  • तरल अपशिष्ट (Wet Waste): कचरे के इस प्रकार में दूषित या गंदा जल आता हैं, घरों से निकलने वाला गंदा जल तथा उद्योगों से निष्कासित किया जाने वाला प्रदूषित जल इसके अंतर्गत आता हैं.
  • सूखा अपशिष्ट (Dry waste): सूखे अपशिष्ट में वे पदार्थ या वस्तुएं आती हैं जो पूरी तरह सूखी होती हैं, उसमें द्रव की मात्रा बिलकुल न के बराबर होती हैं.
  • बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट (Biodegradable Waste): कोई भी कार्बन युक्त पदार्थ जो मिट्टी में दबाने से गल जाता हैं तथा मृदा के जीवों द्वारा कार्बनडाई ऑक्साइड. मीथेन और जल की मात्रा को अवशोषित कर लिया जाता हैं.
  • नॉनबायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट (Nonbiodegradable Waste:): ये अधिकतर ठोस प्लास्टिक और धातु के अवशिष्ट होते हैं जिन्हें मृदा के जीवो द्वारा संश्लेषित नहीं किया जा सकता, परिणामस्वरूप वे सालो साल उसी अवस्था में पड़े रहते हैं.

ठोस कचरा प्रबंधन के उपाय (Solid Wastes Controlling Methods)

भारत में ठोस कचरा प्रबंधन के लिए निम्नलिखित उपाय किये गये है. कचरा न्यूनीकरण एवं पुनः प्रयोग, कचरे का पुनः चक्रण, कचरा संग्रहण, उपचार एवं निस्तारण, भाष्मीकरण, गैसीकरण व पाइरोलिसिस.

  • कचरा न्यूनीकरण एवं पुनः प्रयोग- उत्पादों का न्यूनीकरण व पुनः उपयोग कचरा निवारण के उपाय हैं. न्यूनीकरण में उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं दोनों को कचरा कम उत्पादित करने को बताया जाता है. पुनः प्रयोग विधि में जनता को पुनः उपयोगी सामान क्रय करने को प्रोत्साहित किया जाता हैं.
  • कचरे का पुनः चक्रण– कचरे को उपयोगी माल के रूप में उपयोग करना और कचरे की मात्रा कम करना पुनः उपयोग चक्रण कहा जाता है. पुनः चक्रण विधि के तीन स्तर होते है. संग्रहित कचरे में से पुनः चक्रनीय पदार्थों एवं धातुओं को छांटकर एकत्रित काटना, एकत्रित पदार्थों या धातुओं से कच्चा माल तैयार करना, कच्चे माल से नए उत्पाद बनाना.
  • कचरा संग्रहण- शहरों में स्थानीय निकायों द्वारा नियुक्त कर्मचारियों द्वारा विशेष गंदगी वाले कचरे तथा पुनः चक्रीय कचरे को हफ्ते में दो बार संग्रह करवाना चाहिए, ऐसे कचरे जो मक्खियों के प्रजनन एवं आश्रयस्थल हो, या बदबू फैलाने वाले तथा खुले में फैले कचरे को शीघ्रता से उठवाया जाए.
  • कचरा उपचार एवं निस्तारण– कचरा उपचार तकनीकी यह खोज करती है कि प्रबंधन फॉर्म बदलकर कचरे की मात्रा कम की जाय, जिससे कचरा निस्तारण सरल बन जाए. कचरा निस्तारण की विधियाँ कचरे की मात्रा, प्रकार एवं रचना के आधार पर प्रयोग में लाई जाती हैं. जैसे उच्च तापमान पर, जमीन में दबाना, जैविक प्रक्रिया अपनाकर कचरे का निस्तारण करना. उपचार और निस्तारण में से एक विकल्प चुना जाता है. कचरा और अंतिम रूप देने के लिए प्रबंधक तकनीकी कम करना, पुनः चक्रण करना, पुनः उपयोग कर दबाने की तकनीक काम में ली जाती हैं.
  • भाष्मीकरण– भाष्मीकरण मुख्य सामान्य तापीय प्रक्रिया है. इसमें कचरे का दहन ओक्सीजन की उपस्थिति में किया जाता हैं. भाष्मीकरण के बाद कचरा कार्बनडाई ऑक्साइड, पानी की भाप तथा राख में बदल जाता है. यह तरीका ऊर्जा की रिकवरी का साधन है. इसका उपयोग बिजली बनाने के लिए ऊष्मा देने के लिए किया जाता हैं. भाष्मीकरण ऊष्मा देने का अतिरिक्त साधन है. इसमें परिवहन की लागत कम की जाती है. ग्रीन हाउस गैस मीथेन का उत्पादन कम किया जाता हैं.
  • गैसीकरण व पाइरोलिसिस– गैसीकरण व पाइरोलिसिस दोनों समान तापीय प्रक्रिया है. इन प्रक्रियाओं में कचरे के अवयवों को उच्च ताप पर विखंडित किया जाता है. गैसीकरण में कचरे का दहन कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्रों में किया जाता हैं. और पाइरोलोसिस में कचरे का दहन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में किया जाता हैं ये तकनीक कम ओक्सीजन या बिना ऑक्सीजन वाले क्षेत्रों में प्रयोग की जाती हैं. जलने योग्य और बिना जलने योग्य गैसों के मिश्रण से पाइरोसिस द्रव्य पैदा किया जाता है. पाइरोलिसिस की विशेषता है कि वायु प्रदूषण किये बिना उर्जा का पुनः भरण किया जाता है.

ठोस कचरा प्रबंधन के लाभ (advantages and disadvantages of solid waste management pdf)

ठोस कचरा प्रबंधन की प्रक्रिया के अनेक लाभ होते है. इन लाभों में जन स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तन्त्र को तो लाभ मिलता ही है. साथ ही अनेक प्रकार की सामाजिक आर्थिक दशाओं में भी लाभ की प्राप्ति होती हैं. ठोस कचरा प्रबन्धन से उत्पन्न लाभ निम्नानुसार हैं.

  1. ठोस कचरा प्रबंधन से आग लगने, चूहे फैलना, संक्रामक रोगों के कीटों एवं रोगाणुओं के फैलने पर नियंत्रण एवं आवारा जानवरों पर नियंत्रण किया जाता हैं.
  2. ठोस कचरा प्रबन्धन से रोग नियंत्रित होंगे, जन स्वास्थ्य में सुधार होगा, श्रम करने की क्षमता बढ़ेगी, अस्पताओं में मरीजों का भार कम होगा.
  3. इसके कारण जहरीले पदार्थों की निकासी कम होने से जल प्रदूषण नहीं हो सकेगा.
  4. सस्ता और अच्छा वानस्पतिक खाद मिलेगा, कृषि उत्पादन क्षमता बढ़ेगी तथा पैदावार अधिक होगी.
  5. बिजली उत्पादन के लिए सस्ती ऊर्जा प्राप्त होगी, जिससे बिजली उत्पादन व्यय कम होगा.
  6. कचरा निस्तारण से कच्चा माल मिलेगा, जिससे पुनः चक्रण कके पदार्थों से बनी वस्तुएं सस्ती मिलेगी.
  7. कचरा निस्तारण कार्यों में वृद्धि होने पर रोजगार के अवसर अधिक उपलब्ध होगे तथा आय में वृद्धि होगी.
  8. इससे कीमती धातुओं की उपलब्धि होगी.

ठोस कचरा प्रबंधन की प्रक्रिया (Process oF solid waste management pdf in hindi)

ठोस कचरा प्रबंधन से तात्पर्य वातावरण एवं जन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ठोस कचरे के उपचार, निस्तारण, पुनः प्रयोग, पुनः चक्रण व ऊर्जा में परिवर्तन करने की प्रक्रिया से हैं. ठोस कचरे के निस्तारण हेतु शहरी निकायों में यह कार्य सफाई निरीक्षकों को सौप रखा हैं.

नियमित एवं ठेका पद्धति पर नियुक्त सफाई कर्मचारी कूड़े को घरों, अस्पतालों व अन्य प्रतिस्ठानों से लाकर कूड़ा संग्रहण केंद्र पर एकत्रित करते हैं. कचरे के संग्रहण विभिन्न माध्यमो से किया जाता है. कचरा निस्तारण केंद्र पर कचरा उत्पादन स्थलों के अनुसार अलग अलग श्रेणियां निर्धारित कर रखी है. इन श्रेणियों में घरेलू कचरा, औद्योगिक कचरा व विनिर्माण सामग्री का कचरा तथा व्यापारिक प्रतिस्ठानों का कचरा शामिल होता हैं.

इस विविध प्रकार के कचरे में जैविक कचरे, अजैविक कचरे, प्लास्टिक शीशी, धातुओं, कागज, बैटरी, विषैले पदार्थ, ज्वलनशील पदार्थ, विष्फोटक पदार्थ, रेडियोधर्मी पदार्थ तथा संक्रामक रोग फैलाने वाले पदार्थ शामिल हैं.

ठोस कचरा प्रबंधन की आवश्यकता (solid waste management needs and importance)

आधुनिक काल में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिकीकरण व वातावरण प्रदूषण के प्रति लापरवाही ने शहरों में ठोस कचरे की समस्या पैदा कर दी है. इनके कारण शहरों में गंदगी का विस्तार हो गया है. इस गंदगी से बीमारियाँ फैलने लगी है. इस समस्या के निवारण के लिए शहरी निकायों में ठोस कचरा प्रबंधन या कचरा निस्तारण कार्यक्रम आवश्यक हो गया हैं.

ठोस कचरा प्रबंधन कार्यक्रम के उद्देश्य (objectives of solid waste management in india)

भारत में ठोस कचरा प्रबंधन कार्यक्रम के निम्न उद्देश्य हैं.

  1. ठोस कचरे के उचित उपचार या निस्तारण की व्यवस्था करना ताकि लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.
  2. कचरे के पुनः प्रयोग व पुनः चक्रण की व्यवस्था करना.
  3. कचरे को ऊर्जा में परिवर्तित करने की प्रक्रियाओं का संचालन एवं उनका प्रबंधन.
  4. ठोस कचरे के प्रबंधन को प्रशिक्षण देना.
  5. ठोस कचरा जनित समस्याओं से बचने के हेतु कचरा प्रबंधन पर नए नए शोध कार्य, विकास कार्य तथा उपयोग की सुविधाओं को उपलब्ध करवाना.
  6. कचरा जनित बीमारियों को कम करना
  7. पर्यावरणीय दशाओं पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों को कचरा प्रबंधन द्वारा नियंत्रित करना.

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 (Solid Waste Management Rules, 2016)

भारत सरकार ने कानूनी स्तर परा पहल करते हुए ठोस अपशिष्ट को प्रबंधित करने तथा उसके प्रसार को रोकने व एक व्यवस्थित प्रणाली में आम नागरिकों के योगदान के लिए ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन नियम 2016 को प्रस्तुत किया हैं, जो इस तरह हैं.

  • जैव निम्नीकरणीय, गैर-जैव निम्नीकरणीय एवं घरेलू खतरनाक अपशिष्टों को प्रत्येक घर में अलग अलग पात्र में डाला जाए तथा इन्हें केवल नगरीय निकाय के प्रतिनिधि को ही सौपा जाए.
  • स्थानीय निकाय को यह अधिकार होगा कि वह प्रदूषणकर्ताओं से दंड शुल्क का भुगतान ले, निकाय अपनी नियमावली के अनुसार शुल्क व दंड निर्धारित करें.
  • अपशिष्ट निपटान नियम 2016 में सरकार के सभी मंत्रालयों, प्रशासनिक इकाइयों तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं स्थानीय निकायों के कर्तव्यों का वर्णन भी किया गया हैं.
  • इस अधिनियम के नियमों का प्रभाव नगरीय क्षेत्रों में ही होगा.
  • अपशिष्ट उत्पादन कर्ता जो प्रतिदिन 20 से 300 टन महीने तक अपशिष्ट निर्माण करता हैं उन्हें स्थानीय निकाय की पूर्व अनुमति लेनी होगी तथा कर भी देना होगा.
  • ये नियम अक्टूबर 2016 से देशभर में प्रभावी हैं तथा प्रत्येक निर्माता, उत्पादनकर्त्ता, उपभोक्ता, विक्रेता, अपशिष्ट संग्रहकर्त्ता, उपचारकर्त्ता व उपयोग- कर्त्ताओं पर लागू होते हैं.  इससे पूर्व ई-अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 2011 कानून था.

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