स्तूपों की खोज कैसे हुई भारत के मुख्य स्तूप Sanchi Amaravati Stupas In Hindi

स्तूपों की खोज कैसे हुई मुख्य स्तूप Sanchi Amaravati Stupas In Hindi : बौद्ध कला में स्तूपों का महत्वपूर्ण स्थान हैं साँची और अमरावती के स्तूप तत्कालीन वास्तुकला के अद्भुत नमूने हैं. आज हम साँची और अमरावती के स्तूपों के बारें में संक्षिप्त में जानते हैं.

Sanchi Amaravati Stupas In Hindi

स्तूपों की खोज कैसे हुई भारत के मुख्य स्तूप Sanchi Amaravati Stupas In Hindi

साँची के स्तूप की खोज– भोपाल से बीस मील उत्तर पूर्व की ओर एक पहाड़ी की तलहटी में साँची कनखेड़ा नामक गाँव बसा हुआ हैं. साँची का स्तूप एक पहाड़ी के ऊपर बना हुआ हैं. जो मुकुट जैसा दिखाई देता हैं. 1818 ई में साँची की खोज हुई.

मेजर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस क्षेत्र में कई सप्ताह रूककर इन अवशेषों का निरिक्षण किया, उन्होंने इस स्थान पर चित्र बनाएं, वहां के अभिलेखों का अध्ययन किया और गुम्बंदनुमा ढांचे के बीचों बीच खुदाई की. उन्होंने इस खोज के निष्कर्षों को एक अंग्रेजी किताब में लिखा हैं.

अमरावती के स्तूप की खोज– 1796 ई में  स्थानीय राजा एक मन्दिर का निर्माण करना चाहते थे. उन्हें अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गये.इन्होने इसके पत्थरों का उपयोग करने का निश्चय किया, ऐसा प्रतीत हुआ कि इस छोटी सी पहाड़ी में संभवतः कोई खजाना छुपा हैं.

कुछ वर्षों के बाद कॉलिन मैकेंजी नामक एक अंग्रेज अधिकारी को इस क्षेत्र से गुजरने का अवसर मिला. यदपि उन्होंने यहाँ कई मूर्तियाँ प्राप्त की और उनका विस्तृत चित्राकंन भी किया, परन्तु उनकी रिपोर्ट कभी प्रकाशित नहीं हुई.

गुंटूर के कमिश्नर द्वारा अमरावती की यात्रा करना– 1854 ई में गुंटूर के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की. उन्होंने कई मूर्तियों तथा उत्कीर्ण पत्थरों को एकत्रित किया और वे मद्रास ले गये. उन्होंने अमरावती के स्तूप पश्चिमी तोरणद्वार की खोज की और इस निष्कर्ष पर पहुचे कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था.

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अमरावती के स्तूप के उत्कीर्ण पत्थरों को विभिन्न स्थानों पर ले जाना- 1850 के दशक में अमरावती के स्तूप के उत्कीर्ण पत्थरों को भिन्न भिन्न स्थानों पर ले जाया गया. कुछ उत्कीर्ण पत्थर कोलकाता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल पहुचें.

तो कुछ पत्थर मद्रास के इंडिया ऑफिस पहुचे, कुछ पत्थर तो लन्दन तक पहुच गये. कई अंग्रेज अधिकारियों ने अपने बागों में अमरावती की मूर्तियाँ स्थापित की. वास्तव में इस क्षेत्र का प्रत्येक नया अधिकारी यह कहकर अमरावती की कुछ मूर्तियाँ उठा कर ले जाता कि उसके पूर्व के अधिकारियों ने भी ऐसा ही किया था.

साँची क्यों बच गया जबकि अमरावती नष्ट हो गया– संभवतःअमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी. तब तक विद्वान् इस बात के महत्व को समझ नहीं पाए थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय, खोज की जगह पर ही संरक्षित करना महत्वपूर्ण था.

1818 में साँची की खोज हुई. उस समय तक भी इस स्तूप के तीन तोरणद्वार खड़े थे. चौथा तोरणद्वार वहीँ पर गिरा हुआ था. इसके अतिरिक्त टीला भी अच्छी दशा में था. उस समय कुछ विदेशियों ने यह सुझाव दिया था कि तोरणद्वारों को पेरिस या लन्दन भेज दिया जाए. परन्तु कई कारणों से साँची का स्तूप वहीँ बना रहा और आज भी बना हुआ हैं. दूसरी ओर अमरावती का महाचैत्य अब केवल एक छोटा सा टीला हैं जिसका सम्पूर्ण गौरव नष्ट हो चुका हैं.

भारत के प्रमुख स्तूप

पिपरहवा स्तूप

भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य के सिद्धार्थ नगर जिले में बर्डपुर‌ नाम के स्थान के पास एक गांव मौजूद है जिसे पिपर हवा गांव कहा जाता है। यह इलाका सुगंधित काले नमक और चावल के लिए काफी ज्यादा प्रसिद्ध है। 

पीपर हवा गांव अपने पुरातत्व ऐतिहासिक स्थल के लिए और खुदाई के लिए भी काफी अधिक प्रसिद्ध है। यहां पर विभिन्न स्तूप और कई मठों के खंडहर के अवशेष आज भी मौजूद है। कुछ विद्वानों का ऐसा मानना है कि यह ऐसी जगह है जहां पर भगवान बुद्ध के द्वारा अपने जीवन के शुरुआती 29 साल बिताए गए थे।

ऐसा कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के पिता जी शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु इसी के पास में मौजूद थी। आपकी जानकारी के लिए बता दे कि इस स्तुप के कुछ अवशेष और भस्मकलश को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक म्यूजियम में सुरक्षित करके रखा गया है।

नागार्जुनकोंडा स्तूप

अमरावती से तकरीबन 95 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर की दिशा में नागार्जुन पहाड़ी मौजूद है जो कि कृष्ण नदी के तट पर है। यहां पर नागार्जुनकोंडा स्तूप मौजूद है। पहले यह इलाका ईक्ष्वाकुवंशी राण की राजधानी थी जो कि सातवाहन के उत्तराधिकारी थे। 

ईक्ष्वाकुवंशी ब्राह्मण धर्म को मानने वाले थे परंतु उनकी जो रानियां थी, वह बुद्ध मजहब को मानती थी और उन्ही की प्रेरणा से यहां पर स्तूप का निर्माण करवाया गया था। यहां पर महा स्तुप के साथ ही सात बौद्ध धर्म से संबंधित दूसरे मंदिर और स्मारक भी बने हुए हैं।

सारनाथ का धमेक स्तूप 

इसका निर्माण गुप्त काल के दरमियान छठी शताब्दी में करवाया गया था। यह स्तूप देखने में पत्थर के ढोल के जैसा दिखाई देता है।  इस स्तूप का निर्माण करने में ईट का इस्तेमाल किया गया है। इसकी ऊंचाई तकरीबन 128 फीट के आसपास में है और इसके बीच में विभिन्न आले हैं जो भगवान बुद्ध की प्रतिमा को स्थापित करने के लिए बनाए गए होंगे, ऐसा कहा जाता है।

भरहुत स्तूप

इसका निर्माण सम्राट अशोक ने अपने शासन काल के दरमियान करवाया था और साल 1873  में अंग्रेजी अधिकारी जनरल कनिंघम के द्वारा इसे खोजा गया था। उन्होंने इस स्तुप के अवशेष को इकट्ठा करके कोलकाता म्यूजियम में सुरक्षित रखे थे।

जानकारी के अनुसार भरहुत स्तूप का व्यास तकरीबन 68 फीट और इसके चारों और पत्थरों की एक लंबी बाढ़ लगी हुई थी। जहां पर बुध और 30 जातक कथाएं अंकित की गई थी जिसमें यह दिखाया गया है कि किस प्रकार भगवान बुद्ध पशुओं की पूजा करते हैं। इसके अलावा एक चित्र में हाथियों के द्वारा बोधि वृक्ष की पूजा करते हुए भी दिखाया गया है। स्तूप में अलंकरण देवयानी तथा यक्षिणी के चित्र भी छपे हुए हैं।

FAQ:

Q: पिपरहवा स्तूप कहां है?

ANS: उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में

Q: सारनाथ का धमेख स्तूप कहां है?

ANS: बिहार के सारण जिले में

Q: नागार्जुनकोंडा स्तूप कहां है?

ANS: अमरावती से तकरीबन 95 किलोमीटर की दूरी पर कृष्णा नदी के तट पर

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