जाति प्रथा पर निबंध | Essay On Caste System In Hindi

जाति प्रथा पर निबंध Essay On Caste System In Hindi नमस्कार दोस्तों आज के निबंध में आपका स्वागत हैं. आज हम इस निबंध में जातिवाद भारत में जाति प्रथा का अर्थ परिभाषा महत्व इतिहास आदि बिन्दुओं पर दिया गया हैं. उम्मीद करते है आपको जाति प्रथा पर दिया गया निबंध पसंद आएगा.

जाति प्रथा पर निबंध Essay On Caste System In Hindi

जाति प्रथा पर निबंध Essay On Caste System In Hindi

जाति व्यवस्था निबंध 150 शब्द

वर्षों से चली आ रही परम्पराएं जब वर्तमान समय के अनुकूल नही रहती हैं, तो कोई भी आधुनिक समाज बेहिचक उसमें मूलभूत परिवर्तन करता हैं.

जो समाज केवल परम्परा के नाम पर आज से हजारों साल पूर्व बनाई गई प्रथाओं को जो आज के समय के अनुकूल नही हैं, फिर भी उनका अनुसरण करता रहे, वह समाज निश्चित तौर पर पिछड़ जाएगा.

यही नई वो आधुनिक जमाने के अन्य समाजों से भी अलग थलग पड़ जाएगा. सदस्यों में विद्रोह तथा संघर्ष की भावना उत्पन्न होने लगेगी. भले ही आज के समय में जाति व्यवस्था को पूर्ण खत्म नही किया जा सकता,

मगर समय के मुताबिक इसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता है. आज जातियों के तमाम कठोर बंधन समाप्त हो चुके हैं, न ही जातियों का धार्मिक आधार रहा हैं, फिर भी आज जातिवाद निरंतर पल रहा हैं.

आधुनिक समाज व सरकारों द्वारा विभिन्न कानून व योजनाएं बनाकर दलित व पिछड़े समाजों को समकक्ष लाने के प्रयत्न चल रहे हैं. जाति आज के समय में राजनीति पर हावी हो रही हैं.

चुनाव भी जातिगत आधार पर लड़े जाने लगा हैं. अनेक जातियों ने अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए राजनीति का सहारा लेना शुरू किया हैं.

इसके अतिरिक्त जाति पंचायतों एवं संयुक्त परिवार के विघटन के कारण जाति प्रथा को उसी पुराने रूप में बनाए रखना संभव नही रह गया. अनेक सामाजिक अधिनियमों ने भी जाति व्यवस्था की स्थिरता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया. स्वयं जाति व्यवस्था से उत्पन्न दोषों ने भी इसके बारे में लोगों में संदेह उत्पन्न होने लगा.

जातिगत विभेद को दूर करके ही एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता हैं. इसलिए यह व्यवस्था की गईं, कि राज्य किसी भी नागरिक के प्रति धर्म, वंश अथवा जाति के आधार पर भेदभाव नही करेगा.

जाति प्रथा निबंध 300 शब्द

हमारे यहाँ पर जाति प्रथा पर प्रचलित कहावत हैं ”जाति न पूछो साध की पूछ लीजिए ज्ञान” यानि व्यक्ति की पहचान उनकी जाति से नही बल्कि उनके ज्ञान के आधार पर होनी चाहिए. प्राचीन हिन्दू परम्परा में जाति व्यवस्था व्यक्ति के कर्म पर आधारित थी. 

मगर आज के भारतीय समाज में caste system का स्वरूप पूरी तरह से बिगड़ गया हैं, अब व्यक्ति की जाति का निर्धारण उनके जन्म के आधार पर ही कर दिया जाता हैं. एक समय में जाति system को राजनितिक आर्थिक तथा सामाजिक रूप से एकता स्थापित करने के लिए बनाई गई थी, जो आज बिलकुल अनुपयोगी हो चुकी हैं.

समय में बदलाव के साथ कुछ ऐसी कुरीतियों तथा प्रथाओं ने जन्म ले लिया, जो समाज द्वारा खिची गईं लक्ष्मण रेखा के कारण पनपी और उनके उल्लघन को समाज के इन तथाकथित सुधारकों ने दंडनीय अपराध घोषित कर दिया.

सामाजिक बहिष्कार का दंड विधान, समाज से बहिष्कृत होने का भय किसी हिन्दू को या मुस्लिम से या फिर एक जाति के सदस्य को किसी अन्य जाति के सदस्यों से प्रेम या विवाह करने से रोकता हैं.

संभवत मानव समाजों में स्तरीकरण दो भिन्न दिशाओं से विकसित हुआ हैं, हालांकि दोनों एक दूसरे में काफी हद तक समा गये हैं. इसी प्रकार के स्तरीकरण को क्रमशः वंशागत (जातिगत) स्तरीकरण और सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं.  सामाजिक स्तरीकरण में एक समाज के अंतर्गत पद स्तरों की एक व्यवस्था विकसित हो जाती हैं.

भारत में जाति प्रथा का इतिहास

जातिगत स्तरीकरण से दो भिन्न समाजो के विलय का बोध हो जाता हैं जब एक जातीय समूह दूसरे जातीय समूह या समूहों पर स्थायी रूप से न्यूनाधिक प्रबल हो जाता हैं, तो जातीय स्तरीकरण निर्मित हो जाता हैं.

भारत में हिन्दू जाति व्यवस्था इसी प्रकार के स्तरीकरण का उदहारण हैं, हिन्दू समाज भारत की आदिकालीन जातियों तथा कालान्तर में बाहर से आकर बसने वाली विजेता आर्य जातियों के विलय से बना हैं.

हिन्दू धर्म में चार वर्णों का मुख्य आधार कर्म एवं गुण था. हिन्दू मान्यता के अनुसार जाति प्रथा के इस विभाजन से चार प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र ये मुख्य वर्ण माने गये थे. आज के समय में इन्ही चार वर्णों से आगे हिन्दू धर्म में कुल जातियों की संख्या 4 हजार से अधिक हो चुकी हैं.

इन चार वर्णों की विशेषताओं के आधार विभिन्न जातियों के एक सामान्य स्तरीकरण की पहचान करते हैं. जबकि किसी जाति विशेष की विशिष्ट विशेषताओं एवं सामाजिक स्तरीकरण में वास्तविक स्थति की पहचान के लिए हमे जाति प्रारूप सम्बन्धी संदर्भातमक विचारों का सहारा लेना पड़ता हैं.

वर्तमान में जाति प्रथा का स्वरूप

भारतीय जाति व्यवस्था में बदलते हुए मूल्यों के साथ परिवर्तन हो रहा हैं, तथा धन एवं शिक्षा, उच्च एवं निम्न वर्ग दोनों जातियों के सदस्यों की पहुच के भीतर हो गये हैं. इन परिवर्तनों का आरम्भ मुख्य रूप से 19 वी शताब्दी से हुआ, जब राजा राममोहन राय और कुछ अन्य प्रगतिवादियों ने जाति व्यवस्था के विरोध में आवाज उठानी शुरू की.

भारत के स्वतंत्र होने के बाद यहाँ समतावादी मूल्यों पर आधारित लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना हुई, तब जाति व्यवस्था के नियमों में तेजी से परिवर्तन होने लगे. ओद्योगिकिकरण, नगरीकरण, शिक्षा, स्त्री जागरूकता तथा गतिशीलता में वृद्धि होने से जाति व्यवस्था के बंधन कमजोर पड़ने लगे.

भारतीय समाज में जाति प्रथा पर निबंध Essay on Caste System in Indian Society in Hindi

आज हम एक ऐसे विषय पर आपकों कुछ जानकारी देने जा रहे है. जिनसे आप बचकर भी नही निकल सकते और ऐसा भी नही कह सकते कि मै किसी जाति को नही मानता. चलिए जो भी हो वो आपका स्वतंत्र विचार है.

जाति व्यवस्था/वर्ण व्यवस्था का इतिहास जानने की कोशिश की जाए तो हमे सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति और मानव इतिहास तक जाना होगा. कुछ लोग भारत में जाति व्यवस्था की शुरुआत वैदिक काल से मानते है मगर सभी विद्वान इस पर एक मत नही है.

हिन्दू समाज के विभाजन के आधार को जातियता का नाम दिया है जैसे-क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, यादव, जाटव, केवट आदि। परन्तु वास्तव में ये जातियाँ नहीं है अपितु समाज मे इनका क्या स्थान है और क्या महत्व है? इन सब बातों को आधार बनाकर विभाजन हुआ है।

एक तरह से ये जाति विभाजन लोगों की पहचान का आधार है। मनुष्यों के कार्यों के आधार पर यह विभाजन हुआ है। वास्तव में समस्त संसार में स्त्री और पुरुष दो जातियाँ हैं। इसके अतिरिक्त और कोई तीसरी जाति नहीं है।

जाति शब्द का अर्थ और उत्पति

यह एक संस्कृत भाषा का शब्द है जिन्हें संस्कृत की व्याकरण में आकृति ग्रहण जातिलिंगनांचनसर्वं भाक्‌ सकृदाख्यातनिर्गाह्या गोत्रंच चरणै: सह सूत्र से परिभाषित किया गया है. इसका हिंदी में अर्थ होता है वह समूह/वर्ग या आकृति को पृथक किया जा सके. जिसका आधार जन्मजात होता था.

व्यक्ति के पूर्वजो को पूर्व निर्धारित कार्यो के अनुसार एक वर्ग में रखा जाता था. जिन्हें अपने पैतृक धंधे के सिवाय कोई कार्य करने की इजाजत नही होती थी. साथ ही जिस व्यक्ति का जिस जाति में जन्म हुआ उसे कभी बदला नही जाएगा. जैसे यदि कोई क्षत्रिय जाति/कुल में जन्मा व्यक्ति युद्ध या शासन के कार्यो में भी भाग ले सकता था.

प्राचीन भारत में जाति प्रथा (Caste system in ancient India)

प्रसिद्ध ग्रन्थ मनु स्मृति में श्रम के आधार पर भारतीय समाज को ब्राहमण , क्षत्रिय , वेश्य और शुद्र इन चार वर्गो में विभाजित किया गया था. आज की जाति व्यवस्था और छुआछुत, दलित, उच्च वर्ग, निम्न वर्ग यह सब इसी वर्गीकरण का बिगड़ा हुआ रूप है.

जो समाज में इंसान इंसान के बिच भेद करता है. भारत में इस जाति व्यवस्था की बुराई के चलते कई वर्ग शिक्षा, चिकित्सा तथा आधारभूत मानवीय मानको से आज तक वंचित है. तो दूसरी तरफ उच्च जाति के लोगों का हर क्षेत्र में आज भी काफी हद तक दबदबा कायम है.

भारत के साथ साथ मिस्र ,यूरोप जैसे देशों के इतिहास में भी जाति व्यवस्था का वर्णन मिलता है. आरम्भ के समय में सामाजिक कार्यो में आसानी के लिहाज से सभी वर्गो को अलग अलग जातियों में बाटा गया था. जिनमे कुशलता के आधार पर लोग एक जाति से दूसरी जाति में आ सकते थे. अपने विवाह सम्बन्ध स्थापित कर सकते थे.

मगर धीरे धीरे समय परिवर्तन और लोगों की संकीर्ण सोच ने जाति का अर्थ संकीर्ण रूप में लेना शुरू कर दिया तथा एक व्यक्ति को जन्म से ही एक जाति विशेष की लक्ष्मण रेखा में बाँध दिया गया जिसके बाहर कदम भी रखना वर्जित तथा वेदों के विरुद्ध समझा गया.

वर्तमान भारत में जाति व्यवस्था (Caste system in present India)

वर्तमान समय में जाति व्यवस्था का एक और संकीर्ण रूप और विचारधारा चलन है जिसको जातिवाद के रूप में परिभाषित किया जाता है. केवल अपनी जाति को वरीयता देना या उच्च मानना जातिवाद कहलाता है. चाहे राजनीति हो या शिक्षा इन क्षेत्रों में वीभत्स रूप विशेष रूप से सामने आ रहा है.

जिसके कारण कुछ वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व कम या पहुच कम होने के कारण वो पिछड़ जाते है. आरक्षण को भारत में लागू करना भले ही निम्न और पिछड़े लोगों को उत्थान के रूप में बताया जाता है. मगर इसने अप्रत्यक्ष रूप से जाति व्यवस्था को फिर से खड़ा करने का प्रयत्न किया है.

अब वो समय आ चूका है जब भारत से इस कुरीति को दूर किया जाना चाहिए. क्युकि अब हर घटना, या मौत को जाति विशेष के नजरिये से लोगों को देखने की लत लग चुकी है. इसके कई उदहारण हाल ही के दिनों में देखने को मिल रहे है.

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