तारीखे दाउदी (Tarikhe Daudi)

तारीखे दाउदी (Tarikhe Daudi): इस ग्रंथ के लेखक का नाम अब्दुल्ला हैं. परन्तु उसके बारे में किसी प्रकार की जानकारी नहीं मिल पाई हैं. इस ग्रंथ में बहलोल लोदी से दाऊदशाह (1517 ई में बंगाल का सुल्तान) तक के ही समय का वर्णन हैं. इसमें अलौकिक कहानियों की भरमार हैं. तिथियों के मामलों में बड़ी भूले की गई हैं.

तारीखे दाउदी (Tarikhe Daudi In Hindi)

तारीखे दाउदी (Tarikhe Daudi In Hindi)

दिल्ली के सुल्तानों के इतिहास की जानकारी के लिए राजकीय अधिकारियों तथा स्वतंत्र इतिहासकारों द्वारा फारसी भाषा में लिखित साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता हैं. जानकारी के ये स्रोत अधिकांशतः उन लोगों के माध्यम से प्राप्त हुए हैं जो या तो घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे.

अथवा उन्होंने प्रत्यक्षदर्शियों से सुनकर अपने ग्रंथों का प्रणयन किया था. प्रसिद्ध इतिहासकार गोथे ने लिखा हैं कि मैं एक ऐसे समय की अनुभूति करता हूँ, जब इतिहास आँखों देखी घटनाओं के आधार पर लिखा जाएगा. सल्तनतकालीन इतिहास की जानकारी इस कसौटी पर खरी उतरी हैं.

हालांकि अधिकांश फारसी लेखकों ने राजकीय संरक्षण में अपने सुल्तान को प्रसन्न करने की दृष्टि से ग्रंथ लिखे थे. फलस्वरूप ऐसे इतिहास को निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता. कुछ कमियों के बावजूद हमारे पास सल्तनतकालीन इतिहास जानने के सम सामयिक स्रोत इतने कम हैं कि हमें इन ग्रंथों की सहायता लेनी पड़ती हैं.

जहाँ तक विदेशी यात्रियों के विवरण का प्रश्न हैं, वे पूर्वाग्रह से पीड़ित थे और उन्होंने भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति को समझने में भारी भूलें की हैं. हाँ उन्होंने हमारे नगरों एवं गाँवों का जो चित्र प्रस्तुत किया हैं वह काफ़ी रोचक हैं.

तारीखे दाउदी का लेखक व अवधि

लेखकअब्दुल्ला
अवधि1575-76 ईस्वी

अब्दुल्ला द्वारा लिखित तारिख-ए- दाउदी दिल्ली के बहलोल लोदी से लेकर बंगाल के अंतिम अफगान सुल्तान दाऊद खान कररानी तक के अफगान शासकों के इतिहास से संबंधित है । यह पुस्तक दाऊद कररानी को समर्पित थी जो 1576 में अकबर के सेनापति खान जहान द्वारा राजमहल की लड़ाई में पराजित हुए थे ।

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अब्दुल्ला, लेखक ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्यों के अध्ययन में बिताया और लोगों की स्थिति की जांच की। उसने तारीख-ए-दाउदी में अफगान सुल्तानों के बिखरे हुए अभिलेखों को पुस्तक रूप में एकत्र किया। लेकिन घटनाओं का क्रम कालानुक्रमिक क्रम में नहीं दिया गया है, पाठ अक्सर फारसी छंद, हिंदी दोहे और पड़ोसी राज्य जौनपुर के इतिहास से बाधित होता है।

इसलिए राजनीतिक इतिहास के साथ-साथ अनेक उपाख्यानों को पुस्तक में स्थान मिला है। वह तारीख-ए-शेर शाही जैसे मानक कार्यों का हवाला देते हैं अब्बास सरवानी, और अहवाल-ए-हुमायूं बादशाह उनके स्रोतों के रूप में।

तारीख-ए-दाउदी कई जगहों पर उपयोगी जानकारी देता है जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। लेखक सूर सुल्तानों, विशेष रूप से इस्लाम शाह सूर के उत्तराधिकारियों का विस्तृत विवरण देता है। इस अवधि के दौरान बंगाल को प्रांतीय सूर और कर्रानियों के अधीन स्वतंत्रता प्राप्त थी। इसलिए यह पुस्तक बंगाल के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।

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