औरंगजेब का इतिहास व जीवन परिचय Aurangzeb History in Hindi

औरंगजेब का इतिहास व जीवन परिचय Aurangzeb History in Hindi भारत पर लम्बे शासन करने वाले मुगल राजवंश छठें और अंतिम प्रभावशाली शासक आलमगीर था. इनका पूरा नाम अब्दुल मुज्जफर मुहीउद्दीन मोह्हमद औरंगजेब आलमगीर था. आज के आर्टिकल में उनका इतिहास, बायोग्राफी में सम्पूर्ण जीवन और अहम घटनाओं को विस्तार से जानेंगे.

औरंगजेब का इतिहास

औरंगजेब का इतिहास

बिंदुऔरंगजेब का शोर्ट इतिहास
पूरा नामअब्दुल मुज्जफर मुहीउद्दीन मोह्हमद औरंगजेब आलमगीर
जन्म स्थानदाहोद, गुजरात
जन्म4 नवम्बर 1618
धर्ममुस्लिम
माता-पिताशाहजहाँ, मुमताज़ महल
पत्नियाँऔरंगाबादी महल, झैनाबादी महल, बेगम नबाव बाई व उदैपुरी महल
मृत्यु3 मार्च 1707

मुगल वंश का छठा शासक और अंतिम शासक औरंगजेब को इतिहास में बड़े क्रूर और अत्याचारी शासक बताया जाता हैं. सभी मुग़ल शासकों में कट्टर और अत्याचारी औरंगजेब ने सता प्राप्ति की खातिर अपने भाइयो और पिता से युद्ध किया| औरंगजेब का इतिहास ने अपने शासनकाल में बड़ी संख्या में हिन्दू मन्दिरों को ध्वस्त किया| गैर मुस्लिम प्रजा पर अत्याचार किये और धर्मांतरण पर जोर दिया|

शायद इनकी यह अत्याचारों की कहानी ही औरंगजेब और मुग़ल सम्राज्य के पतन का कारण बनी| सम्पूर्ण उतर भारत से बिहार बंगाल महाराष्ट्र होते वर्तमान पाकिस्तान के पार अफगान सीमा तक फैले मुगल सम्राज्य के अंत की जड़े औरंगज़ेब ने ही जमाई| औरंगज़ेब की म्रत्यु के बाद सम्पूर्ण मुग़ल सम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया| जिन्हें एक करने वाला फिर कोई मुग़ल शासक नही बना|

औरंगजेब का जीवन परिचय व इतिहास (Aurangzeb History & Jeevan Parichay)

महान मुग़ल सम्राटो में गिना जाने वाले औरंगजेब का जन्म 4 नवम्बर 1618 को गुजरात के दाहोद जिले में हुआ था| आज भी दाहोद में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं जो काफी कट्टर भी हैं| इसके पिता का नाम शाहजहाँ जो बाबर द्वारा स्थापित मुग़ल वंश का पांचवा उतराधिकारी था| औरंगजेब की माँ का नाम मुमताज़ महल बताया जाता हैं|

यह महल का तीसरा बेटा था| इससे बड़े दो भाई और चार बहिन थी| शाहजहाँ उस समय गुजरात क्षेत्र में सूबेदार था| औरंगजेब का पूरा नाम अब्दुल मुज्जफर मुहीउद्दीन मोह्हमद औरंगजेब आलमगीर| जो बचपन से ही मुस्लिम कट्टरवाद अपने जेहन में बनाए हुए था|

उनके पूर्वजो द्वारा गैर मुस्लिम के साथ की गईं रियायते उन्हें कतई बर्दास्त नही थी| राजव्यवस्था के अनुसार शाहजहाँ ने अपने बड़े बेटे दारा शिकोह को अपना उतराधिकारी घोषित किया था| मगर औरंगजेब स्वय राजगद्दी पर बैठना चाहता था| अब उसके पास एक ही विकल्प था वो था विद्रोह पिता और भाइयो को परास्त कर उनकी गद्दी हासिल करना|

आरम्भिक जीवन 

इससे पूर्व जब औरंगजेब 8 वर्ष का था तो उसके दादा जहाँगीर द्वारा इनको और इसके बड़े भाई दारा शिकोह को बंदी बनाकर लाहौर दरबार भेज दिया था| उस समय शाहजहाँ स्वय उतराधिकारी के लिए सघर्ष कर रहा था| जब उन्हें 1628 में शासक घोषित कर दिया तो इनके दोनों बेटो को लाहौर से दिल्ली दरबार सौप दिया| उस समय औरंगजेब की आयु 10 वर्ष थी|

अपने पिता के साथ आगरा किले में ही इनके पढ़ाई का प्रबंध किया गया था| 6 वर्षो तक आलमगीर को अरबी और फ़ारसी की विधिवत शिक्षा दी गईं| शिक्षा पूरी होने के बाद इन्हे 16 वर्ष की आयु में दक्कन के क्षेत्र का सूबेदार बना दिया| जब इसे दक्कन का गर्वनर बनाया तो सबसे पहला काम वर्तमान महारष्ट्र का नाम बदलकर औरगाबाद किया| 19 साल की आयु में दुरानी से शादी की| 1640 के आस-पास शाहजहाँ दाराशिकोह को अपना उतराधिकारी घोषित करने के बारे में विचार में था इसी बिच उसकी एक बेटी की जलकर मौत हो गईं| जो औरंगजेब के साथ ही थी| जब इस बात का पता शाहजहा को चला तो वह औरंगजेब  पर बहुत क्रोधित हुआ तो आगरा दरबार से बहिष्कार कर दिया|

दक्कन में कुछ समय तक गर्वनर रहने के बाद औरंगजेब को सिंध और मुल्तान भेज दिया| जहा पर मुगलों और अफगानों के बिच सघर्ष चल रहा था| यहाँ उसे कोई ख़ास सफलता नही मिली| अफगानों के खिलाफ किये गये प्रत्येक सैन्य आक्रमण के बाद शाहजहाँ अधिक नाराज हो गया और वहां से उसे निकाल कर फिर दक्कन में भेज दिया |जहा वो उस समय के दक्षिण भारत के शक्तिशाली सम्राज्य गोलकुंडा और बीजापुर के सूल्तानो के साथ लड़ रहा था| काफी वर्षो तक चल रहे तनाव में आखिर शाहजहाँ ने हारकर अपनी सेनाए वापिस बुला दी|

उतराधिकार सघर्ष 

अब तक औरंगजेब को पिता से मिल रही उपेक्षाओ से समझ चूका था| यह सब बड़े भाई दारा शिकोह के कहने पर कर रहा हैं| 1652 में  औरंगजेब ने शाहजहा को मारने के लिए कई बार जहर भी भेजा मगर उनके विशवास पात्र स्वय के रहते हुए अपने प्रजापालक को मरते नही देखना चाहते थे| इसी कारण इन्होने जहर स्वय पी लिया था| ऐसा बताया जाता हैं| कितनी सच्चाई हैं इसमे नही कहा जा सकता | 1952 में शाहजहाँ शारीरिक रूप से बेहद कमजोर होकर बीमार रहने लगा था|

औरंगजेब उस समय 34 वर्ष का हो चूका था| यह उसके लिए अपने पिता और भाइयो से बदला लेने का सुनहरा अवसर था|अपने बड़े भाई दारा शिकोह को फासी देकर बूढ़े शाहजहाँ को जेल में बंद कर दिया| और अपना राज्यभिषेक करवा लिया| अब अपने पिता और भाइयो से बदला लेने के बाद अपनी कट्टरता को राज्य भर में बर्फाना शुरू कर दिया|तब तक औरंगजेब  ने इतने शत्रु बना लिए थे 50 वर्षो के शासनकाल ने पिछले 200 वर्षो में पूर्वजो की पूरी मेहनत पर पानी फिर गया| सभी राज्यों ने स्वय को स्वतंत्र राज्य के रूप में घोषित कर दिया|

गुरु तेग बहादुर को फांसी

उसने गैर मुसलमानों पर लगने वाले जजिया कर को फिर से शुरू कर दिया| और धर्मांतरण को मजबूरन करवाने लगा| औरंगज़ेब का पहला निशाना कश्मीरी पंडित बने| सबसे पहले इन्हे जबरन मुस्लिम बनाने का काम शुरू कर दिया|

उस समय सम्पूर्ण भारत में ऐसा कोई स्वतंत्र शासक नही था| जो उनकी नीतियों का विरोध कर सके| अधिकतर राजे-महाराजे औरंगजेब के गुलाम बन चुके थे| जिनमे राजपूताने के राजपूत शासक भी थे| हिन्दू सरक्षक होने के बावजूद वो औरंगज़ेब का विरोध नही कर सके|कश्मीरी हिन्दू पंडित अपने धर्म पर हो रहे अत्याचार की गुहार लगाने सिखों के नौवे गुरु तेगबहादुर जी के पास गये| जिन पर गुरु ने इस अत्याचार का विरोध किया तो औरंगजेब ने उन्हें फांसी की सजा दे दी ताकि और कोई विरोध करने की हिमाकत नही कर सके| इस तरह अपने शासन के शुरूआती वर्षो में ही औरंगजेब ने सिखों और राजपूतो को अपना दुश्मन बना लिया|

औरंगजेब का साम्राज्य विस्तार

औरंगजेब को उतराधिकार में इतना सम्राज्य मिला जिसे वह ठीक से संभालता तो यकीनन अगले आने वाले सैकड़ो वर्षो तक मुगल सम्राज्य का दिल्ली पर आधिपत्य हो सकता था| तेगबहादुर को फासी के बाद पंजाब के सिख और कश्मीरी पंडित औरंगज़ेब के पूर्णत विरोधी हो गये थे|हालाकि सूबेदार रहते हुए औरंगज़ेब गोलकुंडा और बीजापुर को नही जीत पाया था| वो सपना इन्होने जल्द ही पूरा कर लिया| मगर इन राज्यों को लगातार बचाए रखना औरंगज़ेब के लिए सबसे बड़ी चुनोती थी| क्युकि उस समय मराठा महाराजा शिवाजी के नेतृत्व में संगठित हो चुके थे|

शिवाजी कई वर्षो तक औरंगजेब के साथ लड़ते रहे| इन युद्दो ने औरंगजेब को बड़े आर्थिक संकट में डाल दिया| लेकिन उसने लड़ाई जारी रखी और शिवाजी को अपने झासे में लाकर बंदी बनाने में भी सफल रहा| मगर साभाजी बच निकले| शिवाजी भी अपनी चाल से औरंगजेब से बचकर निकल गये| कुछ वर्ष बाद शिवाजी की म्रत्यु भी हो गईं| मगर उनके उत्रधिकारियो ने औरंगज़ेब के अन्तकाल तक लड़ाई जारी रखी| औरंगजेब की म्रत्यु 1707 में हुई थी|

औरंगजेब की धार्मिक नीति

मुग़ल सम्राज्य के सभी शासक मुस्लिम धर्म के अनुयायी थे| जो इस्लाम को मानते थे| मगर जबरदस्ती किसी पर थोपने के पक्ष में नही थे| औरंगजेब की विचारधारा इन सबसे अलग थी जो गजवा ए हिन्द की विचारधारा को मानता था|औरंगजेब कट्टर मुस्लिम आक्रान्ता था| जो जबरदस्ती प्रजा को इस्लाम काबुल करवाना चाहता था| इसके लिए इन्होने जजिया कर को फिर से लागू किया, हिन्दू देवी देवताओं के मन्दिर तुड्वाए, साथ ही हिन्दू कन्याओं का जबरदस्ती मुसलमानों के साथ विवाह करवाने का काम औरंगज़ेब ने किया|

औरंगजेब ने अपने राज्य की नीतियों को कुरान आधारित बना लिया| सती प्रथा पर रोक,गैर मुस्लिमो को पूजा करने और तीर्थ करने पर रोक| हिन्दू तीज त्योहारों पर पूर्ण रोक लगा दी| राज्य में गाना बजाना प्रतिबंधित कर दिया|दारुल इस्लाम औरंगजेब का परम लक्ष्य था जो हिन्दुओ को काफिर कह कर सम्बोधित करता था| साथ ही हिन्दू राष्ट्र को इस्लाम का देश बनाने की रणनीति पर चल रहा था| औरंगजेब ने अपनी धर्मनीति को ही राजनीति बनाया| हिन्दू और सिख प्रजा पर जुल्म ढहाने शुरू कर दिया| इसका एक कारण यह भी था इसका कोई विरोधी नही था जो इन नीतियों का विरोध कर सके| जिन्होने औरंगजेब की इस निति का विरोध किया वो अंजाम भुगत चुके थे|

धार्मिक नीति तथ्य व घटनाएं

  • औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुस्लिम था, उसने सिक्कों पर कलमा खुदवाना नौरोज का त्यौहार मनाना, तुलादान व झरोखा दर्शन बंद कर दिया.
  • 1663 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया , अकबर ने भी इसके प्रयास किये थे व कोतवाल को आदेश दिए थे कि किसी को इच्छा के विरुद्ध सती न होने दिया जाए, किन्तु औरंगजेब ने पूर्णत सती प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया था.
  • 1663 में हिन्दुओं की तीर्थ यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया. 1665 में एक राज्यादेश द्वारा मुस्लिम व्यापारियों पर ढाई व हिन्दू व्यापारियों पर पांच प्रतिशत सीमा शुल्क निर्धारित किया गया.1667 में मुस्लिम व्यापारियों को सीमा शुल्क से पूर्णत मुक्त कर दिया लेकिन बाद में पुनः लगा दिया.
  • 1668 ई से ही राजपूतों एवं मराठों को छोड़कर सभी हिन्दुओं को पालकी या अच्छे घोड़ों की सवारी पर प्रतिबंध लगा दिया तथा हथियार रखने पर भी प्रतिबंध लगा दिया.
  • औरंगजेब ने वेश्याओं को देश छोड़ने के आदेश दिए और दरबार में 1668 से होली व दीपावली मनाने पर प्रतिबंध लगा दिया.
  • 1669 में अपने शासन के 11 वें वर्ष में झरोखा दर्शन की प्रथा को समाप्त कर दिया.
  • 1669 में बनारस फरमान द्वारा हिन्दू मन्दिरों व पाठशालाओं को तोड़ने की आज्ञा दी. 1669 में बनारस का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का केशवदेव मंदिर तथा गुजरात का सोमनाथ मंदिर तोडा गया.
  • वर्ष 1669 में मुहर्रम और 1670 में अपना जन्म दिवस मनाने पर रोक लगा दी.
  • 1679 में हिन्दु शासकों को टीका देने की प्रथा समाप्त कर दी.
  • औरंगजेब ने गाजी की उपाधि धारण की जो उसकी असहिष्णु व जेहादी मनोवृति का प्रतीक था.
  • हिन्दुओं को नौकरी देने के सन्दर्भ में उनका कहना था ” दुनियावी मामलों में धर्म का क्या लेना देना”
  • इस्लामिक कट्टरता के कारण इन्हें जिन्दा पीर तथा सादगी पूर्ण जीवन के लिए शाही दरवेश कहा जाता था. औरंगजेब कठोर तम मुगल शासक था.
  • औरंगजेब ने गुरूवार की रात को पीरों की मजार तथा कब्रों पर दीपक जलाने की प्रथा पर रोक लगा दी.
  • औरंगजेब के शासन काल में हिन्दू मनसबदारों का प्रतिशत 33 प्रतिशत हो गया था, यह मुगल काल में सर्वाधिक था. इनमें भी ज्यादा मराठा और दक्षिण के अमीर थे.

मुहतसिबों की नियुक्ति

औरंगजेब ने मुहतसिबों की नियुक्ति की, जो मुसलमानों के धर्म शरियत आचरण की देखरेख करते थे. मुल्ला औजवाजीह पहला मुहतसिब था. मुहतसिब के अन्य कार्य जुआघरों, वेश्यावृत्ति को रोकना, माप और तौल की निगरानी करना, सार्वजनिक स्थानों पर मादक द्रव्यों के प्रयोग को रोकना, हिन्दू मन्दिरों और पाठशालाओं को नष्ट करना तथा मिल्लत (मुस्लिम प्रजा) के नैतिक चरित्र की देखभाल करना था. किन्तु मुहतसिब नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप नहीं करते थे. साम्राज्य में भांग उत्पादन, शराब व जुआ खेलने पर प्रतिबंध लगाया.

जजिया विवाद

1679 में सभी हिन्दुओं पर जजिया कर लगा दिया गया. जजिया सर्वप्रथम मारवाड़ में लागू किया गया जिसे औरंगजेब ने दारुल हर्ब घोषित किया था. जजिया कर लगाने का मेवाड़ शासक राजसिंह के नेतृत्व में राजपूतों ने विरोध किया.इटली के यात्री मनूची ने इसका वर्णन किया हैं. जहांआरा बेगम ने जजिया लागू करने का विरोध किया था. जजिया की वसूली के लिए गैर मुसलमानों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया था. मनूची जजिया लगाने का मुख्य कारण रिक्त राजकोष बताता हैं. 1704 में औरंगजेब को दक्कन से जजिया कर हटाना पड़ा था.

औरंगजेब के जजिया कर लगाने का उद्देश्य धार्मिक न होकर राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित था. क्योंकि वह राजपूतों और मराठों के विरुद्ध मुसलमानों को संगठित करना चाहता था. खफी खान लिखता हैं कि जजिया के तहत लाखों में इकट्ठी की गई रकम का थोड़ा सा हिस्सा शाही खजाने में नहीं पहुचता था जबकि जजिया से हिंदू औरंगजेब से नाराज हो गये थे/ औरंगजेब की जजिया लगाने की धार्मिक नीति का उद्देश्य भारत को दार उल हर्ब के स्थान पर दार उल इस्लाम बनाना था. औरंगजेब की धार्मिक नीति के कारण मुगल साम्राज्य का पतन हुआ.

व्यक्तित्व

औरंगजेब एश और विलाशी का जीवन व्यतीत किया| उसने मरने तक छ से सात शादियाँ भी की| मुस्लिम रीती रिवाजो का बड़ी सिद्दत से पालन करता था| उसके व्यक्तिव की एक बड़ी खामी ही थी|

जो सम्पूर्ण मुगल सम्राज्य की कोपभाजन बनी| वो थी औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता बस वह यही चाहता था| सभी प्रजा कुरान को माने और इसके अनुसार जीवन व्यतीत करे| दुसरो के धर्म की इज्जत करना तो उन्हें तो म्रत्यु से अधिक बुरा लगता था| एक कट्टर मुसलमान की तरह औरंगजेब का निजी जीवन था| इतना जरुर हैं औरंगजेब खान-पान और वेशभूषा के मामले में सयमित था|

औरंगजेब का शासन काल और राजव्यवस्था

कई मायनों में औरंगजेब अपने पूर्ववर्ती और पश्चवर्ती मुगल शासकों में अलग था. वह पूरी तरह कला का दुश्मन था. अपने राज्य में इस्लाम की शरीयत के विरुद्ध वह कोई भी कार्य पसंद नहीं करता था. इसकी शासन प्रणाली और कलाओं को एक एक कर जानते हैं.

स्थापत्य कला व इमारतें

मुगल शासक औरंगजेब के काल में मुगल स्थापत्य कला पतन की ओर अग्रसर हो गई. उसके काल में दिल्ली के लाल किले में पूर्ण संगमरमर से मोती मस्जिद बनी. लाहौर की बादशाही मस्जिद फिदई खान की देखरेख में बनाई तथा औरंगाबाद में अपनी प्रिय बेगम रबिया दुर्रानी की स्मृति में मकबरा बनवाना शुरू किया, जो 1669 में बनकर तैयार हुआ. यह बीबी का मकबरा नाम से प्रसिद्ध हैं. यह ताजमहल की घटिया नकल पर बना हैं. इसे दक्षिण का ताजमहल भी कहा जाता हैं. इसे काला ताज एवं दूसरा ताज भी कहते हैं. इसके वास्तुकार अताउल्ला खा थे. इसके निर्माण एवं मरम्मत का कार्य शाहजादा आजम की देखरेख में हुआ, उज्जैन के पास फतेहाबादी की मस्जिद भी औरंगजेब ने बनवाई. लद्दाख की पहली मुगल मस्जिद का निर्माण औरंगजेब ने करवाया था. इन्होने पिंजौर के बाग़ का भी निर्माण करवाया.

चित्रकला

औरंगजेब ने चित्रकला को इस्लाम के विरुद्ध मानकर बद करवा दिया. इससे चित्रकार अन्य राज्यों की राजधानियों में चले गये, इस के चलते एक नवीन चित्र शैली भारत में विकसित हुई. इतिहासकार मनूची लिखता है कि औरंगजेब की अनुमति से अकबर के मकबरे वाले चित्रों को चूने से पोत दिया गया था. औरंगजेब के उत्तराधिकारी फर्रखसियर ने चित्रकला को पुनः संरक्षण दिया. मुगलकाल में यूरोपीय चित्रकला से प्रभावित चित्रकारों में बसावन, केशवदास, मिशकिन, दौलत व अबुल हसन थे.

औरंगजेब कालीन साहित्य

मिर्जा मुहम्मद काजिम औरंगजेब के समय प्रथम व अंतिम सरकारी इतिहासकार था. उसने आलमगीर नामा में औरंगजेब के शासन के प्रथम इक्कीस वर्षों का इतिहास लिखा हैं. बाद में औरंगजेब ने राज्य में समकालीन इतिहास लेखन पर रोक लगा दी.

लेकिन मुहम्मद हाशिम उर्फ़ खफी खां ने गुप्त रूप से औरंगजेब का इतिहास मुन्तखब उल लुबाब में लिखा. इसमें बाबर के समय से लेकर मुहम्मद शाह रंगीला तक के समय 1733 ई तक का समग्र और वस्तुनिष्ट इतिहास लिखा हैं. मुहम्मद हाशिम को खफी खा की उपाधि मुहम्मद शाह रंगीला ने इसलिए दी कि उसने बहुमूल्य पुस्तक को लम्बे समय तक छुपाएँ रखा. अकील खां गाजी ने 1650 से 1663 ई तक इतिहास जफरनामा ए आलमगीरी में लिखा. मीर मुहम्मद ने तारीख ए शाहशुजा लिखा.

भीमसेन के नुस्खा ए दिलकुशा में औरंगजेब के शासनकाल में दक्षिण की जानकारी मिलती हैं. ईसर दास नागर की फुतुहात ए आलमगीरी में राजपूताना व मालवा में औरंगजेब के काल की घटनाओं की जानकारी मिलती हैं. इसमें मारवाड़ के राठौड़ों के साथ औरंगजेब के सम्बंधों का वर्णन हैं.

औरंगजेब के काल में मुहम्मद साकी द्वारा लिखित मआसिरे आलमगीरी को जदुनाथ सरकार ने मुगल राज्य का गजेटियर कहा हैं. औरंगजेब ने 1663 ई में अरब ग्रंथों की सहायता से फ़ारसी में प्रशासनिक नियमों, न्याय व कानून की पुस्तक फतवा ए आलमगीरी का संकलन कराया. इसकी रचना शेख निजाम की अध्यक्षता में 6 व्यक्तियों द्वारा की गई. यह भारत में मुस्लिम कानून का सबसे बड़ा डाइजेस्ट हैं.

मामूरी ने औरंगजेब के समय में ही तारीख ए औरंगजेब लिखी. मामूरी ने जागीरदारी संकट को बेजागिरी की समस्या कहा. इसकी पुत्री जैबुन्निसा एक कवयित्री थी उसने दीवान ए मख्फी की रचना की. सुजानराय भंडारी द्वारा लिखित खुलासत उल तवारीख में महाभारत काल से लेकर औरंगजेब की मृत्यु तक का इतिहास संक्षिप्त में दिया गया है. इसमें औरंगजेब के काल की आर्थिक स्थिति राज्यों की भौगोलिक सीमाओं और व्यापारिक मार्गों का जिक्र हैं. इसी काल में ही पद्मावत और मृगावत दो श्रेष्ठ हिंदी ग्रंथों की रचना की गई.

संगीतकला

रसबैन खा, सुखी सेन, कलावंत, हयात सरस नैन और किरपा इस काल के मुख्य संगीतज्ञ थे. औरंगजेब ने वर्ष 1695 ई में संगीत को इस्लाम विरोधी घोषित कर उस पर पाबंदी लगा दी, जिसका प्रमुख कारण यह था कि वह मितव्ययिता एवं दरबारियों की विलासिता को रोकना चाहता था, किन्तु इस काल में फ़ारसी भाषा में भारतीय शास्त्रीय संगीत पर सर्वाधिक पुस्तकें लिखी गई. स्वयं आलमगीर कुशल वीणा वादक था. संगीत पर पाबंदी लगाने के बाद संगीत प्रेमियों द्वारा अनोखे तरीके से विरोध किया था. संगीत प्रेमियों ने तबला व तानपूरे का जनाजा औरंगजेब के महल के सामने से निकाला तो आलमगीर ने कहा इसकी कब्र इतनी गहरी दफनाना ताकि आवाज आसानी से बाहर न निकल सके.

फकिरूल्लाह ने प्रसिद्ध संगीत ग्रंथ मानकुतूहल का फ़ारसी अनुवाद रागदर्पण नाम से करके उसे आलमगीर को समर्पित किया. मिर्जा रोशन जमीर ने संगीत की मआसिरे आलमगिरी में उल्लेखित हैं कि औरंगजेब ने सगीतज्ञ मुकर्रम सफवी को कहा संगीत मुबह अर्थात न अच्छा न बुरा मैं संगीत को पखावज के बिना नहीं सुन सकता और उस पर पाबंदी है इसलिए मैंने गाना छोड़ दिया. औरंगजेब के अपने पोते जहांदरशाह हेतु मिर्जा मुहम्मद खान से संगीत की पुस्तक तुहफत उल हिन्द लिखवाई. अब्दुल कादिर ने एक लाख नज्म की रचना औरंगजेब के समय ही की थी.

औरंगजेब आदर्श कैसे ?

बड़ी संख्या मे आज भी ऐसे लोगों का समूह हैं जो औरंगजेब को गलत बताते हैं उनका मानना हैं इतिहासकारों ने जानबूझकर औरंगजेब की एक ऐसी छवि पेश की गईं| जिनमे वह एक कट्टर मुस्लिम आक्रान्ता की तरह दिखाया जाता हैं| मै जब औरंगजेब जानने के लिए कुछ रिसर्च कर रहा तो मुझे लोगों के कमेंट्स देखकर अचम्भा हुआ|

उनके अनुसार औरंगजेब सभी शासकों में अच्छा था| उसने पिता और भाई को इसलिए मारा क्युकि वे बेहद फिजूलखर्ची थी| दुसरे पॉइंट में इनका कहना हैं औरंगजेब ने सिर्फ हिन्दुओ के मन्दिर तुड्वाए बल्कि मुस्लिम मस्जिदे भी तुड्वाए| उन मन्दिरों और मस्जिदों को तुडवाया गया

जिन में कुछ लोग बैठकर धर्म के नाम पर जनता से पैसे एठते थे| इन महाशयों के ये तर्क कुछ दम रखते हैं मगर जब किसी का इतिहास लिखा जाता हैं, तो इतिहासकार स्वय अपने विचार उसमे नही डालता हैं| साथ ही जो लिखा जाता हैं उसका प्रमाण भी प्रस्तुत करना पड़ता हैं| जब औरंगजेब लिखी गईं तो उसको मरे 100 साल भी नही हुए थे|

उनके क्रत्यो को भुगतने वाले लोग जिन्दा थे| औरंगजेब के वे सारे फरमान और उनकी राजनीति आज भी सग्रहालयो में सुरक्षित हैं| इतना सब कुछ जानने के बावजूद लोग औरंगजेब को हीरो मानते हैं तो जनाब कुछ नही हो सकता आपकी किस्मत ही फूटी हैं| चलिए छोड़ते हैं |

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