बहुला चौथ 2022 व्रत कथा विधि महत्व | Bahula Chauth Vrat Katha Puja Vidhi

बहुला चौथ 2022 व्रत कथा विधि महत्व | Bahula Chauth Vrat Katha Puja Vidhi : आगामी 15 अगस्त को बहुला चतुर्थी जिन्हें बहुत चौथ संकट चौथ भी कहा जाता हैं. भाद्रपद महीने की कृष्ण चतुर्थी को पशु प्रेम और धार्मिक परम्परा का निर्वहन करते हुए इसे मनाते हैं. इस दिन भगवान् श्री गणेश जी व्रत भी धारण किया जाता हैं. इस दिन प्रथम पूज्य श्री गणेश और गौ माता की पूजा अर्चना भी की जाती हैं.

बहुला चौथ 2022 व्रत कथा विधि महत्व | Bahula Chauth Vrat Katha Puja Vidhi

बहुला चौथ 2022 व्रत कथा विधि महत्व | Bahula Chauth Vrat Katha Puja Vidhi

14 अगस्त की सुबह से बहुला चतुर्थी का व्रत प्रारम्भ होता हैं. जो सांय को चन्द्रदर्शन के साथ ही व्रत की समाप्ति होती हैं. इस दिन विशेषकर विवाहित स्त्रियाँ नहा-धोकर पूर्ण श्रद्धा के साथ गणेश जी का व्रत आराधना आरम्भ करती हैं. जब शाम हो जाती हैं, तो पुन: नहा-धोकर भगवान् श्री गणेश जी की पूजा पाठ आरम्भ होता हैं.

बहुला चतुर्थी के दिन दूध, दुर्वा, सुपारी, गंध, अक्षत गणेश जी को अर्ध्य चढ़ाया जाता हैं. पूर्ण भक्तिभाव से बहुला चतुर्थी का व्रत रखने से मन की सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं.

साथ सारे मानसिक और शारीरिक रोगों व् कष्टों से निजात मिलती हैं. इस दिन व्रत धारण करने भर से सन्तान और सुख-सम्पति की प्राप्ति होती हैं. बहुला चतुर्थी के दिन गेहूँ तथा चावल से बने उत्पादों का उपयोग करना पाप माना जाता है

बहुला चौथ कब मनाया जाता है? (Bahula Chauth 2022 Date)

श्रावण या सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन तथा नागपंचमी से एक दिन पूर्व बहुला चतुर्थी का व्रत पड़ता हैं, साल २022 में यह 15 अगस्त के दिन हैं.

बहुला चतुर्थी का महत्व

बहुला चौथ का पर्व मुख्य रूप से गुजरात और उत्तरप्रदेश में खासा प्रसिद्ध हैं. गोपालक भगवान श्री कृष्ण के भक्त मुख्य रूप से इन्हे मनाते हैं. कृषक समाज के इस त्यौहार में गाय, बछड़े और बैल की पूजा की जाती हैं.

कान्हा अपने सम्पूर्ण जीवन में गोचरण का कार्य किया करते थे. गाय कृषक की जिन्दगी का अहम हिस्सा होती हैं. कृषि कार्यो में उपयोगी होने के साथ-साथ गाय को भारतीय संस्कृति में माँ का दर्जा प्राप्त हैं. इस कारण इस पर्व का महत्व और बढ़ जाता हैं.

यह बहुला भगवान् श्री कृष्ण की प्रिय गाय थी. जिन्हें इनको बड़ा प्रेम था. भादों कृष्ण चौथ के गाय के दूध और चाय काफी पीने से परहेज करना चाहिए. माँ कही जाने वाली गाय के इन चीजो का बहुला चतुर्थी के दिन उपयोग करने से पाप लग सकता हैं.

बहुला चौथ कथा (Bahula Chauth Vrat Katha )

बहुला चतुर्थी की कथा में गाय और शेर के मध्य की मार्मिक कहानी बेहद प्रचलित हैं. कृष्ण जी ने अवतार के बाद बचपन और युवावस्था तक कई रास-लीलाए की. बड़े होने के पश्चात वे गायो के ग्वाले बन जाते हैं.

पिता नन्द बाबा की गौशाला से उनको गाय का एक छोटा सा बछड़ा उनका मन मोह लेता हैं. अब कृष्ण अपना अधिकतर समय इसी बहुला नामक गाय के साथ ही बिताते थे. जब वे गाये चारने जाते तो यह भी उनके साथ ही रहता था.

एक दिन कृष्ण बहुला की परीक्षा लेने के लिए जहाँ वह चरने जाती हैं, उपस्थित होकर उनका शिकार करने का बहाना करके आगे बढ़ते हैं, कि बहुला कहती हैं. मेरा बछड़ा सुबह से भूखा प्यासा हैं, मुझे उन्हें दूध पिलाने एक बार वापिस जाने दो. मै वापिस लौट आऊ तक मेरा भक्षण कर लेना.

इस बात पर बड़ी मुश्किल से कसम खाकर वह शेर से वापिस घर आने की अनुमति लेती हैं. नन्द की गौशाला आने के बाद बहुला अपने बछड़े को खूब प्यार दुलार कर दूध पिलाकर वापिस उस शेर की मांद पर जाती हैं. अपने वचन के मुताबिक वह शेर से कहती हैं. अब मेरा शिकार कर अपनी भूख मिटा लो.

तभी भगवान् कृष्ण अपने असली रूप में प्रकट होते हैं और बहुला से कहते हैं. बहुला ये तो तुम्हारी परीक्षा थी, आज तुम अपनी इस परीक्षा में सफल हुई. मै तुम्हे वर देता हु,, भादों की कृष्ण चतुर्थी आज से बहुला चतुर्थी के रूप में जानी जाएगी.

और पूरी मानव जाती तुम्हे माँ मानकर इस दिन तुम्हारी पूजा अर्चना करेगी. तथा इस दिन तुम्हारे लिए जो व्रत रखेगा उसकी मनोकामना पूरी होने के साथ ही सभी सुखो की प्राप्ति होगी.

बहुला चतुर्थी व्रत का तरीका

इस दिन परिवार का प्रत्येक सदस्य बहुला चतुर्थी का व्रत धारण करता हैं. पुरे दिन व्रत रखने के पश्चात सांयकाल की पूजा के साथ ही उपवास तोडा जाता हैं. मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान में बहुला चौथ को अलग-अलग तरीके से मनाया जाता हैं.

इस दिन गाय अथवा बछड़े को मिटटी का बनाया जाता हैं, जिनकी शाम को पूजा होती हैं. पूजा पाठ के बाद बहुला चतुर्थी कथा का वाचन होता हैं.

घर से बाहर या आंगन में खुले आसमा के निचे सभी परिवार के सदस्यों द्वारा उपवास तोडा जाता हैं. बहुला चतुर्थी के दिन मुख्य रूप से गाय के दूध से बनी किसी भी सामग्री का सेवन नही किया जाता हैं.

इस दिन सुबह जल्दी उठकर गाय को बाँधने की जगह साफ़ कर उन्हें हरा चारा खिलाया जाता हैं. इसके अतिरिक्त बहुला चौथ के दिन गाय या बैल से किसी तरह का काम नही करवाया जाता हैं.

भाद्रपद कृष्ण चौथ को यह व्रत मनाया जाता हैं. इस व्रत को माताएं पुत्रों की रक्षा के लिए मनाती हैं. इस दिन केवल गेहूं चावल का भक्षण नही करना चाहिए. गौ के दूध पर उसके बछड़े का अधिकार माना जाता हैं. गाय तथा सिंह की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजन करने का प्रचलन हैं.

बहुला चौथ सावन माह के कृष्ण पक्ष में नाग पंचमी से ठीक एक दिन पहले मनाई जाती हैं.  वर्ष 2022 में यह व्रत 15 अगस्त को हैं.

बहुला चतुर्थी मुहूर्त (Bahula Chaturthi Muhurat) –

भादों की इस कृष्ण चतुर्थी को संकट चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता हैं. इस दिन गायों की पूजा की जाती हैं तथा गौ उत्पादों का सेवन निषेध माना जाता हैं. इस दिन व्रत करने से सुहागन स्त्रियों के पति को लम्बी उम्रः, निसंतान स्त्री को सन्तान की प्राप्ति होती हैं.

बहुला चौथ व्रत15 अगस्त 2022
चतुर्थी तिथि शुरू22:40 -14 अगस्त 2022
चतुर्थी तिथि ख़त्म21:00 – 15 अगस्त 2022

बहुला चौथ की कथा (Bahula Chauth Vrat Katha ) –

गोपालक के नाम से जाने जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण का बहुला चौथ से संबंध माना जाता हैं. कृष्ण गोकुल गाँव की गायें चराया करते थे. गोपियों के साथ रास लीला और गौ चरण का कार्य इनकी दिनचर्या थी. गोकुल गाँव के सैकड़ों ग्वाले कृष्ण के साथ गायें चराने जाया करते थे.

नन्द बाबा की गायों में कृष्ण को एक अति प्रिय गाय थी, जिसका नाम था बहुला. बहुला नाम की गाय और उसके बछड़े को भगवान सबसे अधिक प्रेम करते थे. पौराणिक कथा के मुताबिक़ एक बार एक बार कृष्ण सिंह का रूप धारण कर बहुला को मारने के लिए रोक देता हैं.

बहुला अपने बछड़े के भूखे होने की विनती वनराज से करती हैं. वह कसम खाती हैं कि वो बछड़े को दूध पिलाकर अपना वचन पूर्ण करने वापिस आ जाएगी. बहुत देर तक वार्तालाप के बाद आखिर सिंह बहुला की बात मान लेता हैं तथा उन्हें बछड़े को दूध पिलाने के लिए जाने की अनुमति दे देता हैं.

बहुला अपने बछड़े को आखिरी बार दूध पिलाकर लाड दुलार कर सिंह को दिए गये वचन को पूर्ण करने वहां पहुच जाती हैं. बहुला को देखकर शेर से कृष्ण अपना रूप धारण कर कहते हैं. बहुला तुम मेरी परीक्षा में सफल हुई. आज के बाद मानव जाति आपके उपकारों के लिए सावन की कृष्ण चतुर्थी को बहुला चतुर्थी के रूप में मनाकर आपकी पूजा करेगें.

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