श्रीमद्भागवत गीता पर निबंध | Essay on Bhagwat Geeta In Hindi

श्रीमद्भागवत गीता पर निबंध | Essay on Bhagwat Geeta In Hindi: जिस तरह ईसाइयों के लिए बाइबल, इस्लाम को मानने वालों के लिए कुरान का महत्व है उसी तरह हिन्दू धर्म के लिए गीता को धार्मिक पुस्तक माना जाता है। यह सार्वभौमिक मानव की बात करती है न केवल हिंदुओं की। आज के निबंध में हम गीता के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करेंगे।

श्रीमद्भागवत गीता पर निबंध Essay on Bhagwat Geeta In Hindi

श्रीमद्भागवत गीता पर निबंध Essay on Bhagwat Geeta In Hindi

गीता महाभारत के भीष्म पर्व का भाग है ,जिसमें 18 अध्याय तथा 2700 श्लोक हैं. गीता में कई तरह के दार्शनिक तथा धार्मिक सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया है। जैसे योग, स्वधर्म ,स्थितप्रज्ञ , आपद धर्म, कर्म योग ,लोक संग्रह की अवधारणा, राज ऋषि का सिद्धांत  तथा निष्काम कर्म का सिद्धांत.

गीता के सभी सिद्धांतों का केंद्र बिंदु मनुष्य को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना ही है। श्रीमद्भागवत गीता में कृष्ण के द्वारा दिए गए अर्जुन को  उपदेशों का वर्णन किया गया है ,जब रण के मैदान में अर्जुन अपने  क्षत्रिय धर्म को इस बात पर  टालना चाहता है, कि जिन से वह युद्ध कर रहा है, वह उसके शत्रु ना होकर उसके ही परिवार के लोग हैं।

इस प्रकार जब अर्जुन अपने प्रिय जनों को युद्ध मैदान में सामने देखकर  क्षत्रिय धर्म को भूल जाता है अर्थात युद्ध नहीं करना चाहता तब भगवान श्री कृष्ण गीता के उपदेश अर्जुन को सुनाते हैं तथा अर्जुन को अपने कर्तव्य के प्रति जागृत कर ,अधर्म के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार करते हैं꫰

 गीता का प्रमुख उद्देश्य सभी परिस्थितियों में व्यक्ति को अपने कर्तव्य पथ से  विचलित  ना होने का संदेश देना है. जिसके लिए श्री कृष्ण ने निष्काम कर्म करने की शिक्षा दी। श्री कृष्णा ने अर्जुन को संदेश देते हुए बताया कि परिणामों की ओर ध्यान ना दे कर तथा फल की इच्छा किए बगैर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

गीता  निष्काम कर्म योग के सिद्धांत के साथ ही आत्मा की अमरता अर्थात पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार किया गया है। गीता में कहा गया है -” आत्मा को ना तो कोई शस्त्र काट सकता है, ना ही  आग उसे जला सकती है , न ही हवा उसे सुखा सकती है”. अर्थात आत्मा अमर है और आत्मा अजर है।

श्री कृष्णा ने अर्जुन को उपदेश देते हुए बताया है कि तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है उसके परिणाम पर नहीं इसलिए परिणाम  से प्रेरित होकर कर्म नहीं करना चाहिए꫰

निष्काम कर्म की शिक्षा के द्वारा श्री कृष्णा ने अर्जुन के अंतर्द्वंद तथा हृदय में बैठे गहरे डर को दूर करने का प्रयास किया, जिसमें अर्जुन युद्ध के बाद की भयावह स्थिति जिसमें उसके अपने परिवार के लोग मारे जाने थे , ऐसी कल्पना करके अर्जुन हथियार डाल चुका था।

निष्काम कर्म सिद्धांत ज्ञान ,भक्ति तथा कर्म के बीच पाए जाने वाले  आंतरिक  द्वंद्व के मध्य बेहतर सामंजस्य स्थापित करने का  लाजवाब प्रयास किया गया है इसलिए निष्काम कर्म सिद्धांत को सर्वांगीण योग की संज्ञा भी दी जाती है।

गीता में कहा गया है, कि कर्मों का फल अवश्य ही मिलेगा परंतु उनके प्रति आसक्ति की भावना नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी लालच के अपने धर्म के अनुसार तथा अपने स्वभाव के अनुसार पूर्व निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

निष्काम कर्म सिद्धांत  प्रवृत्ति मार्ग तथा निवृत्ति मार्ग के बीच का अर्थात मध्यम मार्ग स्थापित करने का संदेश देता है ,जिसके अनुसार फल की इच्छा ना करना निवृत्ति मार्ग तथा कर्तव्य का पालन करना प्रवृत्ति मार्ग की अवधारणाएं हैं.

श्री कृष्ण के अनुसार मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में कर्म करते रहना चाहिए. इसका तर्क यह दिया गया है  ,कि शरीर का अस्तित्व बनाए रखने के लिए कर्म करते रहना आवश्यक है। सत्व रज तथा तमो तीनों गुणों से परिपूर्ण  यह प्रकृति मानव को प्रत्येक समय कर्म करने के लिए मोटिवेट करती रहती है।

ज्ञान योग भक्ति योग तथा निष्काम कर्म योग तीनों में सर्वश्रेष्ठ कौन है इसकी व्याख्या करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने  12 वे श्लोक में बताया है कि लगातार किए गए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से भी श्रेष्ठ भक्ति है, भक्ति से भी श्रेष्ठ निष्काम कर्म योग है ,क्योंकि निष्काम कर्म योग से शांति मिलती है.

भगवद गीता से मेरे जीवन में आये बदलाव (निबंध) | Changes in my life from Bhagavad Gita Essay in Hindi

जब जब जीवन में हम राह से भटकते है या असमंजस की स्थिति में होते है तब तब हमें एक सच्चे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती हैं. मेरे जीवन में भागवत गीता ने वह भूमिका अदा की. जीवन के समक्ष जब भी नयें प्रश्न उपस्थित हुए, मेरा रुख गीता की ओर हुआ. और मैंने संतोषजनक जवाब पाया और जीवन में बड़ा बदलाव देखने को मिला. कुछ सरल सी अवधारणाएं गीता में दी गई जिसको लेकर मनुष्य सदैव अनुतरित रहता हैं.

गीता में आत्मा को अविनाशी कहा हैं. यानी न तो उसका जन्म होता है न मरण. इसलिए भयभीत होकर जीने अथवा मरने के डर से हमें मुक्त रहना चाहिए. मृत्यु एक सच्चाई है मगर हम नहीं मरते हैं हमारी आत्मा सदैव जीवित रहती है, हम शरीर का त्याग करते है तथा नयें शरीर को पाते हैं. भविष्य की चिंता, बूढ़े होने व मरने की चिंता में व्यथित होने की बजाय वर्तमान पर ध्यान दे तथा आंतरिक संतुष्टि और ख़ुशी के लिए निरंतर कर्म करते रहे.

हमारी गीता सिखाती हैं कि बदलाव प्रकृति का नियम हैं. यहाँ कुछ भी चिरस्थायी नहीं है, हम भी नहीं. जो कुछ भी आज है वह कल ही उसी रूप में होगा ऐसा सम्भव नहीं हैं. गरीबी, अमीरी, सुख दुःख, मेरा तेरा ये सब बदलते रहते हैं. यहाँ तक कि अपने दोस्त रिश्तेदार और स्वजन भी बदल जाया करते हैं. वृद्ध लोग मृत्यु को प्राप्त होते है तथा नवजात जन्म लेकर हमारे परिवेश का अंग बनते हैं. मैंने इन सच्चाइयों को जीवन में अपनाने की कोशिश की, आज मैं स्वयं को पहले से अधिक परिपक्व और परिवर्तन के प्रति स्वयं को सहज पाता हूँ. विपरीत हालातों में भी अच्छे कल की आस को लेकर जीना सीखा हैं.

जीवन में अपेक्षाए कभी समाप्त नहीं होती हम उसे पूरा करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं, कभी कामयाब होते है तो कभी निराशा हाथ लगती हैं. सफलता मिलने की स्थिति में हम निरंतर लगे रहते है मगर विफल होने पर कई बार लक्ष्य ही बदल देते हैं. गीता के रहस्यमय और बुद्धिमान उपदेशों में एक यह कि आप कर्म करते रहे, फल की चिंता न करें. कर्म को हम नियंत्रित कर सकते है फल देना ईश्वर का काम हैं.

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