वर्तमान युग में गांधीवाद की प्रासंगिकता पर निबंध | Essay on Gandhism in Hindi

नमस्कार आज के निबंध वर्तमान युग में गांधीवाद की प्रासंगिकता पर निबंध Essay on Gandhism in Hindi में आपका स्वागत हैं. स्टूडेंट्स के लिए यहाँ सरल भाषा में गांधीवाद पर निबंध दिया गया हैं. इस निबंध में हम जानेगे कि गांधीवाद क्या है प्रमुख सिद्धांत बाते आज के समय में इसका महत्व क्या हैं. उम्मीद करते है ये आपको पसंद आएगा.

गांधीवाद पर निबंध Essay on Gandhism in Hindi

वर्तमान युग में गांधीवाद की प्रासंगिकता पर निबंध Essay on Gandhism in Hindi

महात्मा गांधी की विचारधारा को गांधीवाद के नाम से जाना जाता है. महात्मा गाँधी उस उस व्यक्ति का नाम हैं, जो असत्य को सत्य से, हिंसा को अहिंसा से, घ्रणा को प्रेम से तथा अविश्वास को विश्वास से जीतने में विश्वास करते थे.

भले ही आज गांधीजी नही हैं, लेकिन उनके विचारों, आदर्शों तथा सिद्धांतों के रूप में वे जिन्दा हैं. गाँधी के विचार क्रियात्मक योगदान में जितने उस समय प्रासंगिक थे, आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं.

महात्मा गाँधी ने जनभावना को महत्व देकर और परम्परागत राष्ट्रवाद की विचार धरा में सुधार करते हुए, 21 वीं सदी के भारत के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया.

महात्मा गाँधी ने विभिन्न प्रकार के रचनात्मक कार्यों के द्वारा विभिन्न समुदायों के मध्य समन्वय स्थापित करने का कार्य किया. गांधीवाद की विचारधारा परम्परागत राष्ट्रवाद के’ विचारों से ऊपर उठकर थी.

गांधी पूरे विश्व को अपना राष्ट्र मानते थे. वे भारतीय वैदिक परम्परा में कही गईं, बातों के अनुसार विश्व पूजन तथा माता भूमि पुत्रोः प्रथ्विया में विश्वास करते थे. मोहनदास करमचंद गाँधी ने संकटग्रस्त विश्व को भारतीय चिन्तन के अनुरूप बनाकर संसार को एक नई राह दिखाई.

आज भी गांधीवाद में सर्वधर्म सद्भाव की की निति की महत्वपूर्ण प्रासंगिकता बनी हुई हैं. सर्वधर्म समभाव यानि सभी मतों धर्मों के प्रति समान व्यवहार आज भी सामाजिक एवं सांस्कृतिक अनिवार्यता बना हुआ हैं.

धर्म व्यक्ति की व्यक्तिगत आस्था का विषय हैं. उसे सामाजिक स्तर तक आने के लिए सर्वधर्म समभाव की भावना के अंतर्गत आना होगा.

धार्मिक कट्टरता आज के समय में आतंकवाद का रूप ले चुकी हैं, जिसका नतीजा हम सभी के समक्ष हैं. मानव धर्म के रूप में स्वामी विवेकानंद तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर ने विश्व को मानवता की राह दिखाई थी. जिस तरह विज्ञान सार्वभौमिक हैं, उसी तर्ज पर धर्म भी सार्वभौमिक होना चाहिए.

गांधीवाद के अनुसार एक धर्म को श्रेष्ट समझने का अर्थ हैं, दूसरे धर्म को हीन समझना. महात्मा गाँधी ने दुनिया को इस तथ्य से अवगत कराते हुए धर्म को वैश्विक एवं सार्वभौमिक बनाने का प्रयत्न किया.

आज के आधुनिक समाज में भी संकुचित साम्प्रदायिकता धर्म एवं अंध कट्टरवाद को कैसे स्वीकार किया जा सकता हैं. धर्म को केवल नैतिकता का पर्याय मानना चाहिए.

आज के विश्व संकट का मुख्य कारण वैश्विक राजनीती का सिद्धांतहीन होना हैं. मैकियावेली की निति से असहमत होते हुए, गांधीवाद के अंतर्गत राजनीति में साधन शुद्धि का समावेश कर राजनीति को एक नया आयाम प्रदान किया. गांधीजी ने अन्याय का प्रतिकार करने के लिए शस्त्र के स्थान पर अशस्त्र पर बल दिया.

गांधी जी ने स्पष्ट किया था, कि जिस अनुपात में साधन का उपयोग होगा, उसी अनुपात में साध्य की प्राप्ति होगी. गांधीजी का समस्त चिन्तन एवं आचरण धर्म एवं राजनितिकता के सिद्धांतों पर आधारित हैं.

गांधी जी की दृष्टि में निति शून्य राजनीति सबसे निकृष्टतम हैं. इसी कारण छल कपट, दम्भ और अविश्वास का पोषण करने वाली राजनीती को धर्म विहीन होने के कारण नही मानते हैं.

आर्थिक क्षेत्र में गांधीवाद के अंतर्गत स्वदेशी एवं विकेंद्रीकरण के विचार का मूल्यांकन किया जा सकता हैं. वैश्वीकरण के नाम पर नाम पर शुरू हुए आर्थिक सुधारों से गरीबी मूल्यवृद्धि, बेरोजगारी, विषमता, अपराध, उपभोक्ता संस्कृति आदि में वृद्धि हुई हैं.

सिर्फ लाभ कमाने के लिए बाजार अर्थव्यवस्था में उत्पादन किया जा रहा हैं और प्रोद्योगिकी के माध्यम से प्रकृति से अन्याय कर रहे हैं.

गांधीजी ने प्रकृति एवं मनुष्य के नैसर्गिक सम्बन्धों और स्थायी विकास एवं समुचित तकनीक पर जोर दिया. गांधीवाद सादगीपूर्ण जीवन शैली, स्वदेशी की भावना और विकेंद्रीकरण पर बल दिया.

जिसके माध्यम से 21 वी सदी में अर्थतंत्र का विकास किया जा सकता हैं. गाँधी जी ने पूंजीवाद का इसलिए विरोध किया था, क्योंकि वे मशीनों द्वारा मानवीय श्रम का अपक्षय उचित नही मानते थे.

बेरोजगारी के निराकरण के लिए उन्होंने श्रम को बचाने के स्थान पर अधिक से अधिक श्रम उत्पादन कार्यों में लगाने पर जोर दिया.

इसी मानसिकता के कारण चरखा, हथकरघा एवं कुटीर ग्रामीण उद्योगों की स्थापना का समर्थन किया, जिससे उद्योगों के विकेंद्रीकरण की योजना क्रियान्वित की जा सके. गांधी ने कहा था कि वे विद्युत्, जहाज निर्माण, लौह इस्पात एवं भारी मशीनरी कारखानों को ग्रामीण उद्योगों के साथ खड़ा होते देखना चाहते हैं.

21 वीं सदी में सामाजिक न्याय की प्रासंगिकता बढ़ गई हैं. क्योंकि यह संकल्पना व्यक्ति मात्र को मनुष्य होने का सम्मान प्रदान करती हैं. गांधीवाद सामाजिक न्याय का दर्शन हैं, क्योंकि यह सामाजिक समस्याओं की व्याख्या इस रूप में की हैं, जिससे व्यक्ति की चेतना अधिकाधिक सामाजिक जीवन की ओर अग्रसर हो सके.

गाँधी जी न्यायमुक्त शोषणविहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे, जो आज के लोकतांत्रिक समाजों का परम लक्ष्य हैं. गांधीवाद में न्याय सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास हैं.

गांधीजी गुण एवं कार्य के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर देना चाहते थे. इस कारण वे वर्ण व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक न्याय की अवधारणा तक पहुचते हैं.

जाति प्रथा को सामाजिक दास्ता का प्रतीक मानकर उन्होंने इसके विरुद्ध जन आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया. उन्होंने अछूतों के लिए हरिजन का नाम दिया और हरिजन सेवक संघ बनाया.

गांधीजी का हरिजन उत्थान सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु एक क्रांतिकारी कदम था. उनका अटूट विश्वास था, कि साम्प्रदायिक सद्भाव सामाजिक न्याय का ठोस आधार बन सकता हैं और सामाजिक न्याय की नीव पर ही स्वराज्य का भव्य महल खड़ा किया जा सकता हैं.

यह भी पढ़े

उम्मीद करता हूँ दोस्तों वर्तमान युग में गांधीवाद की प्रासंगिकता पर निबंध Essay on Gandhism in Hindi का यह निबंध आपको पसंद आया होगा. यदि आपको गांधीवाद पर दिया गया निबंध पसंद आया हो तो अपने दोस्तों के साथ जरुर शेयर करें.

अपने विचार यहाँ लिखे