शॉपिंग मॉल पर निबंध | Essay On Shopping Mall In Hindi

Essay On Shopping Mall In Hindi: नमस्कार दोस्तों आज हम शॉपिंग मॉल पर निबंध लेकर आए हैं. आज हम मॉल संस्कृति अर्थात कल्चर के दौर में जी रहे हैं. वर्ष 2005 के बाद तो इस पाश्चात्य प्रभाव में हमारे शहर व कस्बें इस रंग में रंग गये हैं. फैशन के इस दौर में शॉपिंग मॉल महत्वपूर्ण आवश्यकता एवं सच्चाई बन चुके हैं. आज के निबंध, भाषण,अनुच्छेद, पैराग्राफ में हम मॉल की यात्रा, नुक्सान, लाभ, इतिहास आदि के बारें में जानेंगे.

Essay On Shopping Mall In Hindi

Essay On Shopping Mall In Hindi

250 शब्दों में Essay on a visit to a shopping mall in hindi

मैं गाँव में रहने वाला देहाती लड़का रहा, एक बार चाचाजी के साथ शहर चल पड़ा. शहर में उनका अपना घर था. एक दिन चाची जी के साथ खरीददारी के लिए मॉल उनके साथ गया. अब तक मैंने आगे का कुछ सोचा न था. मेरे ख्यालों में था बस बाजार जा रहे है किराने या सब्जी की दूकान से सामान लेकर लौट आएगे. टैक्सी पकड़ी और सरदार चौक के पास कांच की बहुमंजिली इमारत में हमने प्रवेश किया.

हमने पहली टियर में प्रवेश किया, कुछ रेस्टोरेंट थे कुछ खाया पिया, और लिफ्ट में बैठकर तीसरी मंजिल पहुँच गये वहां देखा तो मानों आँखे चौंधिया गई, पूरा बाजार अटा पड़ा था. खिलौने, किताबे, इलेक्ट्रॉनिक, कपड़े, जूते, जनरल स्टोर क्या क्या नहीं था लोग आ जा रहे थे. अपनी इच्छा से वस्तुएं अपने बैग में रख रहे थे. जब तक मैं कुछ समझ पाता. चाची ने मेरे लिए एक ड्रेस ली तथा चेंज रूम में जाकर पहनने को कहा. कुछ खरीददारी की और सारा सामान पेमेंट काउंटर तक पहुँच गया. बिल लिया और नकद देकर हम नीचे आए तो देखा हमारा सामान पैक होकर आ चूका था.

वाकई लाजवाब और चकित करने वाला ये बाजार था. मैं कोतुहलवश शॉपिंग मॉल को निहारता रहा. जो कुछ दिख रहा था बड़ी अजीब ही था. मेरे गाँव से पूरी तरह अलग था. उस दिन हम घर लौट आए. मेरे लिए शॉपिंग मॉल की पहली यात्रा का अनुभव एक नई दुनियां में जाने जैसा था. गाँव लौटकर मैंने अपने स्कूल दोस्तों को बताया तो वे भी उसी चकित भाव से अजीब तरह के सवाल पूछते थे. आखिर हम सभी दोस्तों ने सर्दियों की छुट्टियों में शॉपिंग मॉल की यात्रा का प्लान बनाया और इस यात्रा में मैंने गाइड की भूमिका निभाई.

शॉपिंग मॉल पर निबंध 700 शब्दों में

शॉपिंग मॉल में हमें हमारी आवश्यकता के सभी सामान बड़ी ही आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। शॉपिंग मॉल में हमें फर्नीचर से लेकर के ज्वेलरी के समान, सुंदर सुंदर कपड़े, जूते- चप्पल साथ ही साथ मनोरंजन के सामान भी प्राप्त हो जाते हैं। शॉपिंग मॉल एक बहुत बड़े विस्तार में बनाया जाता है और यहां पर सुरक्षा गार्ड को भी शॉपिंग मॉल की सुरक्षा के लिए रखा जाता है क्योंकि कई बार शॉपिंग मॉल से लोग चोरी भी करते हैं, ऐसे में उन्हें पकड़ने के लिए सुरक्षा गार्ड होने आवश्यक है।

अधिकतर शॉपिंग मॉल शहरों में ही पाए जाते हैं क्योंकि शॉपिंग मॉल को बनाने में जितना खर्चा आता है उसकी पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि शॉपिंग मॉल में अधिक से अधिक ग्राहक आए और यह तभी संभव है जब शॉपिंग मॉल किसी शहर में खोला गया हो क्योंकि शहरों में लोगों की कमाई अधिक होती है। इसलिए वह लोग अपनी आवश्यकता की चीजों पर खर्च करने के लिए शॉपिंग मॉल अवश्य जाते हैं।

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वहीं ग्रामीण इलाके में शॉपिंग मॉल के सफल होने की संभावना काफी कम ही रहती है क्योंकि ग्रामीण इलाके में अधिकतर बेरोजगारी पाई जाती है। इसलिए लोग अपनी आवश्यकता की चीजें शॉपिंग मॉल की जगह पर दुकानदारों से ही प्राप्त कर लेते हैं।

शॉपिंग मॉल में जब कोई व्यक्ति घूमने जाता है तब वह शॉपिंग मॉल की सुंदरता को देख कर के बहुत ही आनंदित होता है। शॉपिंग मॉल के अंदर खाने पीने की बहुत सारी चीजें मौजूद होती हैं। इसलिए कई लोग शॉपिंग मॉल से शॉपिंग करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि अपने परिवार के साथ सुबह का, दोपहर का अथवा शाम का भोजन ग्रहण करने के लिए शॉपिंग मॉल जाते हैं।

शॉपिंग मॉल का निर्माण बड़े स्थान पर किया जाता है। इसलिए शॉपिंग मॉल के अंदर तमाम प्रकार की सुविधाएं मौजूद होती है। ग्राहक अपनी पसंद की किसी भी चीज को शॉपिंग मॉल से आसानी से प्राप्त कर सकता है।

शॉपिंग मॉल के अंदर बड़े पैमाने पर कांच का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा शॉपिंग मॉल में ठंडक के लिए एसी भी लगाई जाती है ताकि गर्मियों के मौसम में लोग बिना गर्मी का सामना किए हुए शॉपिंग मॉल से खरीदारी कर सकें। विकलांग लोगों के लिए और बुजुर्गों के लिए शॉपिंग मॉल में लिफ्ट की सुविधा भी होती है।

अगर शॉपिंग मॉल दो मंजिला है तो 1 मंजिल से दूसरी मंजिल पर जाने के लिए सिड़ियों के अलावा लिफ्ट भी होती है। हालांकि विकलांग लोगों के अलावा बड़े, बूढ़े, बच्चे सभी लोग लिफ्ट से जाना पसंद करते हैं क्योंकि लिफ्ट में चढ़ना कुछ लोगों को रोमांचकारी अनुभव लगता है।

कई बड़े शॉपिंग मॉल के अंदर बच्चों के खेलने के लिए एक अलग से ही विभाग बनाया जाता है, जहां पर बच्चे वीडियो गेम खेल सकते हैं और आनंद प्राप्त कर सकते हैं। शॉपिंग मॉल के अंदर छोटा सा टॉकीज भी होता है, जहां पर लोग फिल्म देखने के लिए जाते हैं और फिल्म देखने का दरमियांन उन्हें पॉपकॉर्न भी खाने के लिए दिया जाता है।

शॉपिंग मॉल से शॉपिंग करने पर धोखाधड़ी होने की कोई भी संभावना नहीं होती है, क्योंकि शॉपिंग मॉल में कोई दुकानदार नहीं होता है बल्कि शॉपिंग मॉल में सभी सामान एक लाइन से रखे हुए होते हैं। हमें बस शॉपिंग मॉल में जाना होता है और जिस सामान को हमें प्राप्त करना है उसे ले लेना होता है।

इसके पश्चात जब हम सारी खरीदारी कर लेते हैं तो वापस आने के पश्चात हमें बिल काउंटर पर अपने सभी सामान जमा करने होते हैं। इसके पश्चात शॉपिंग मॉल के कर्मचारियों के द्वारा आपके सभी सामान को चेक किया जाता है और उसके जितने पैसे होते हैं वह आपको बता दिए जाते हैं। इसके पश्चात आप नगद में अथवा कार्ड से अपने सामान की पेमेंट कर सकते हैं। इसके पश्चात आप शॉपिंग मॉल से लिए हुए सामान को अपने घर ले कर के जा सकते हैं।

लोग शॉपिंग मॉल से खरीदारी करना इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि त्योहारों के मौके पर अथवा किसी विशेष दिन पर शॉपिंग मॉल के अंदर डिस्काउंट भी ऑफर किया जाता है जिसके अंतर्गत उन्हें हर सम्मान पर डिस्काउंट प्राप्त होता है। इसलिए लोग थोड़े से डिस्काउंट के लिए शॉपिंग मॉल से खरीदारी करना पसंद करते हैं। शॉपिंग मॉल खुलने का निश्चित समय होता है। उसी समय के दरमियान ग्राहकों को शॉपिंग कर लेनी होती है।

Shopping Mall Essay In Hindi 1000 words

भारतीय बाजार सदियों से अपनी अलग पहचान लिए थे, मगर वर्तमान तक आते आते इनका स्वरूप पूर्णतया बदल चूका हैं. एक जमाने में हमारे देश में छोटे बाजार लगते थे जिन्हें हाट बाजार या साप्ताहिक बाजारों के नाम से जाना जाता था. गाँव, शहर हो या कस्बा हमारा दैनिक जीवन किराणे की दूकान से सम्बद्ध था.

बचपन में हम भी अपनी माताजी या बड़ी बहिन के साथ दुकान पर आवश्यक घरेलू सामान लाने के लिए जाया करते थे. मगर आज के बाजार का स्वरूप पूरी तरह बदल चूका हैं. अब हाट बाजारों के स्थानों पर शोपिंग मॉल बन रहे हैं. बड़े शहरों में इनकी तादाद तो निरंतर बढ़ती ही जा रही हैं. हमारे नित्य जीवन की सभी आवश्यकताएं मॉल ही अब पूरी करता हैं. आज गाँवों को छोड़ दे तो शहरों में संगठित और असंगठित रूप में फुटकर सेवा देने वाले दुकानदारों की संख्या निरंतर घट रही हैं.

अब मॉल संस्कृति में जहाँ बाजार का स्वरूप सिमट गया हैं वही इस नई कल्चर ने खरीददारों को एक नयें अनुभव देने वाली बाजार प्रणाली को जन्म दिया हैं. जिसमें समूहीकरण का दृश्य तो दीखता ही है साथ ही विश्वसनीयता व मनोरंजन की पूर्ति भी हो जाती हैं. शहरों के इन बड़े बड़े शॉपिंग मॉल की एक ही छत के नीचे समस्त तरह के सामान को खरीदा जा सकता हैं. पहले जब कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक, जूते, घर का सामान आदि की खरीद करनी होती तो पूरे बाजार का चक्कर काटना पड़ता था, मगर अब ये समस्त वस्तुएं एक ही मॉल में एक नया अनुभव प्रदान करने वाले वातावरण में उपलब्ध हो जाया करती हैं.

एयरकंडीशनर युक्त आज के शॉपिंग मॉल अपने ग्राहकों को सभी मौसम में सुरक्षा पर्सन करते हैं. यही कारण है कि अधिकतर शहरी लोग मॉल जाकर ही खरीददारी करना पसंद करते हैं. कुछ लोग मॉल जाकर आने में अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ा हुआ महसूस करते हैं. बहरहाल मॉल की यात्रा से भले ही व्यक्ति का स्टेट्स बढ़े न बढ़े मगर यहाँ एक ही वस्तु सभी ब्रांड में उपलब्ध हो जाया करती हैं. वहीँ मॉल की सामग्री की कीमत भले ही आसमान को छूने वाली हो मगर उसकी विश्वसनीयता भी ग्राहकों को निरंतर विश्वास बहाल करने में सहायक होती हैं.

शॉपिंग मॉल को अच्छा टाइम पास का स्थल भी कहा जा सकता हैं अधिकतर युवा एवं युवतियां अपने समय बिताने अथवा दिखावे के लिए मॉल आते हैं. पार्किंग फ़ीस न होना तथा ग्राहक को कोई वस्तु खरीदने के लिए बाध्य न करने की नीतियों के कारण आवारागर्दी करने वालों का ठिकाना भी ये मॉल बन गये हैं. निश्चय ही ये सहायक है या नहीं मगर शॉपिंग मॉल ने भारतीय पारम्परिक बाजार की संस्कृति में आमूल चूल परिवर्तन अवश्य किये हैं.

21 वीं सदी में जैसे जैसे मध्यमवर्गीय जीवन में आर्थिक दृष्टि से मजबूती मिली. शहरी मॉल की कल्चर को भी बढ़ावा मिला. यदि मॉल के भारत में इतिहास की बात की जाए तो वर्ष 2001 में भारत में मात्र 3 मॉल ही थे. जिनमें चेन्नई में स्थित स्पेंसर प्लाजा भी एक था जिसे अंग्रेजी काल 1863-64 में बनाया गया था. मगर 2005 और फिर 2007 आते आते देश में मॉल की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई इनकी संख्या तीन से बढ़कर 343 हो गई. वर्ष 2008 के मुकाबले यह संख्या बढ़कर दोगुना अर्थात 570 हो गई. 2019-20 में इनकी संख्या 4 हजार के आसपास बताई जाती हैं.

फुटकर विक्रेताओं को नया संगठित रूप इन सुपर मॉल से मिला हैं. देश के 2 व 3 टीयर शहरों में हर साल कई नयें शौपिंग मॉल खुल रहे है मगर दूसरी तरफ ये बंद भी उतनी ही तेजी से हो रहे हैं. गलत स्थान चयन के कारण कई मॉल जिन उम्मीदों को लेकर आरम्भ किये जाते हैं उन पर खरा नहीं उतर पाते हैं. देश में कई प्रसिद्ध शॉपिंग मॉल भी है जिनकी ख्याति देश विदेश में भी हैं इनमें नोयडा का डीएलएफ, लूलू का अंतर्राष्ट्रीय मॉल कोच्ची, सलेक्ट सिटी वाल्क दिल्ली, फिनिक्स मुंबई तथा एलेंट मॉल चंडीगढ़ मुख्य रूप से हैं.

मॉल को दुसरे शब्दों में हम माल से मालामाल बाजार भी कह सकते है जहाँ रसोई में प्रयुक्त सामग्री से लेकर फिल्म देखने तक का प्रबंध हो जाता हैं. देशी मानस स्वयं को पाश्चात्य शैली के इस नयें रूप के अनुसार स्वयं को अनुकूलित करने की जदोजहद में लगा हैं. घर में जो पकवान नहीं बनते है वो मोल्स के रेस्टोरेंट में उपलब्ध हो जाया करते हैं.

भोला भाला व्यक्ति पश्चिम की इस संस्कृति में ढलने का प्रयत्न तो जीतोड़ कर रहा है मगर उसकी चुनौतियां भी अपार हैं. शॉपिंग मॉल के रेस्टोरेंट में लजीज पकवान भले ही पेट के लिए सेहतमंद हो न हो प्रतिष्ठा तो बनती हैं. मेनू में लिखे आइटम सम्भवतः जीवन में कभी पहले न सुने हो, बस अपनी कलाकारी तो आजमा ही आते हैं वेटर से बस गुफ्तगू इस बिंदु पर होती है कि अमुक आइटम में क्या क्या मिलेगा और कितने लोग पेट भर सकेगे.

हमारा बाजारी कल्चर दुनिया में विरला ही हैं. फैशन, किराने या सब्जी कुछ भी हो बिना मोल भाव और आलू ले लो, प्याज ले लो, ५० रूपये में पांच किलों के स्वर के गुंजन के बिना तो दिल को सुकून ही नहीं मिलता कि बाजार होकर आए हैं. भला ये सब शॉपिंग मॉल में तो नहीं मिल सकता, वहां न तो कोई हमसे बहस करने वाला मिलेगा न ड्रेस की मेसिंग बताने वाला गाइड मिलेगा, बस वस्तुएं होंगी और उन पर लगे होंगे कीमत के स्टिकर्स. जो मन करे थैला भर लीजिए और पेमेंट खिड़की में केस या कार्ड स्वाइप करवा दीजिए.

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