मानवाधिकार पर निबंध | Essay On Human Rights in Hindi language

नमस्कार आज हम मानवाधिकार पर निबंध Essay On Human Rights in Hindi language पढ़ेगे. मानव के बेसिक राइट्स को ह्यूमन राईट कहा जाता है जो गौरवपूर्ण जीवन बिताने के लिए आवश्यक माने जाते हैं. आज के निबंध में हम मानवाधिकार और मानवाधिकार आयोग के बारे में विस्तार से पढ़ेगे. उम्मीद करते है ह्यूमन राईट का यह निबंध आपको पसंद आएगा.

मानवाधिकार पर निबंध Essay On Human Rights in Hindi

मानवाधिकार पर निबंध Essay On Human Rights in Hindi language

विश्व मानवाधिकार दिवस पर निबंध Essay on World Human Rights Day In Hindi

मानव अधिकार (Human Rights) वे मूलभूत अधिकार हैं, जिनका उपभोग करने के लिए प्रत्येक नागरिक अधिकृत हैं. जीवन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार,  जीविकापार्जन का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार जैसे मूलभूत अधिकार मानव अधिकारों के अंतर्गत ही आते हैं.

विश्व के अधिकांश देशों में ये अधिकार संविधान द्वारा प्रदान किए गये हैं. भारत में भी संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 14 से लेकर 35 के द्वारा ये नागरिकों को विभिन्न प्रकार के अधिकार प्रदान किए गये हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल मानव अधिकारों की रक्षा के लिए विश्व भर में सुनिश्चित करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था (manav adhikar aayog) हैं, जिसका मुख्यालय लंदन में स्थित हैं.

मानव अधिकार क्या है (what are human rights)

वैसे तो मानव अधिकार अवधारणा का इतिहास काफी पुराना हैं, पर इसकी वर्तमान अवधारण दूसरे विश्वयुद्ध के विध्वस के बाद विकसित हुई.

वर्ष 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकृत किया. मानव अधिकारों का उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे मनु स्मृति, हितोपदेश , पंचतंत्र तथा यूनानी दर्शन में भी मिलता हैं.

वर्ष 1215 में इंग्लैंड में जारी मैग्नाकार्टा में नागरिकों के अधिकार का उल्लेख था, उन सभी अधिकारों को मानव अधिकार की संज्ञा नही दी जा सकती थी.

वर्ष 1525 में जर्मनी के किसानों द्वारा प्रशासन से मांगे गये अधिकारों की बारह धाराओं को यूरोप में मानव अधिकारों का प्रथम दस्तावेज कहा जा सकता हैं.

मानव अधिकार के प्रकार व इतिहास (Human rights type and history)

1789 में फ़्रांस क्रांति से फ़्रांस की राष्ट्रीय सभा ने नागरिकों के अधिकारों की घोषणा की. जिसके कारण विश्व में समानता, बन्धुत्व व स्वतंत्रता के विचारों को बल मिला.

19 वी शताब्दी में ब्रिटेन और अमेरिका में दास प्रथा की समाप्ति के लिए कई कानून बने और 20 वीं शताब्दी आते आते मानव अधिकारों को लेकर विश्व में कई सामाजिक परिवर्तन हुए.

जिसमें बाल श्रम का विरोध प्रारम्भ हुआ एवं विभिन्न देशों में महिलाओं को चुनाव में मतदान का अधिकार मिलस. वर्ष 1864 में हुए जेनेवा समझौता से अंतर्राष्ट्रीय मानवतावादी सिद्धांतों को बल मिला तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकारों की मान्यता की बात हो गईं.

मानव अधिकार दिवस (human rights Day)

10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकार कर लिया. इसकी प्रस्तावना में कहा गया हैं,

चूंकि मानव अधिकार के प्रति उपेक्षा और घ्रणा के कारण हुए बर्बर कार्यों के कारण मनुष्य की आत्मा पर अत्याचार हुए हैं. अतः कानून नियम बनाकर मानव अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक हैं.

इसके प्रथम अनुच्छेद में स्पष्ट उल्लेख हैं, कि सभी मानवों को गौरव और अधिकार के मामले में जन्मजात और स्वतन्त्रता और समानता प्राप्त हैं. उन्हें बुद्धि और अंतरात्मा की देन प्राप्त हैं और उन्हें परस्पर भाईचारे के साथ बर्ताव करना चाहिए.

इसके बाद के अनुच्छेद दो में कहा गया हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को घोषणा में सन्निहित सभी अधिकारों और आजादियों को प्राप्त करने का हक़ हैं.

इस मामले में जाति, वर्ण, लिंग, भाषा धर्म या राजनीति या अन्य विचार प्रणाली, किसी देश या समाज विशेष में जन्म सम्पति या किसी प्रकार की अन्य मर्यादा आदि के कारण किसी तरह का भेदभाव नही किया जाएगा.

मानवाधिकार के तहत किसी भी व्यक्ति को न तो शारीरिक यातना दी जाएगी न उनके प्रति निर्दयी, अमानुषिक या अपमानजनक व्यवहार अपनाया जाएगा. ऐसे ही कई महत्वपूर्ण व आवश्यक मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा कुल 30 अनुच्छेदों में की गई.

मानव अधिकार का महत्व व आवश्यकता (Importance and need of human rights)

इन मानव अधिकारों से सम्बन्धित यह घोषणा कोई कानून नही हैं और इसके कुछ अनुच्छेद वर्तमान तथा सामान्य रूप से मानी जाने वाली अवधारणाओं के प्रतिकूल हैं.

फिर भी इसके कुछ अनुच्छेद या तो कानून के सामान्य नियम हैं या मानवता की सामान्य धारणाएं हैं. इस घोषणा का अप्रत्यक्ष रूप से कानूनी प्रभाव हैं तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा एवं कुछ कानून ज्ञाताओं के मतानुसार यह संयुक्त राष्ट्र का कानून हैं.

भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन 23 दिसम्बर 1993 में किया गया. इस समय न्यायमूर्ति पूर्व चीफ जस्टिस एचएल दत्तू  इसके अध्यक्ष हैं.

यह आयोग किसी पीड़ित व्यक्ति या उसके ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा मानव अधिकारों के अतिक्रमण या किसी लोक सेवक द्वारा इसके उल्लघन की अनदेखी करने के संबंध में याचिका प्रस्तुत कर सकता हैं.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और इसके कार्य

यह न्यायालय में मानव अधिकार से सम्बन्धित मामलों में दखल, कैदियों की दशा का अध्ययन तथा प्रकाशन, संचार माध्यमों, सेमीनार तथा अन्य माध्यमों के द्वारा समाज के सभी वर्गों में मानव अधिकार की शिक्षा का प्रचार करता हैं.

यह आयोग अभियोग या जांच के लिए आवश्यक सूचनाएं व दस्तावेज प्राप्त करने के लिए किसी भी संस्थान का दौरा कर सकता हैं.

या किसी संस्थान में प्रवेश कर सकता हैं. किसी शिकायत की जांच पूरी होने के बाद आयोग उचित कार्यवाही या अन्य उचित कार्यवाही की संस्तुति कर सकता हैं.

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अतिरिक्त भारत के 29 में से 23 राज्यों में मानव अधिकारों के मामलों की सुनवाई के लिए राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन किया गया हैं.

जनतंत्र की अवधारणा मानव मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने की बढ़ती हुई आवश्यकताओं से जुडी हुई हैं. इसके बिना एक व्यक्ति के लिए न तो व्यक्तित्व का विकास संभव हैं और न ही सुखी जीवन व्यतीत कर पाना. मानव अधिकार के अभाव में लोकतंत्र की कल्पना बेकार हैं.

अंतर्राष्ट्रीय संगठन ह्यूमन राइट्स वाच की 175 देशों में मानवाधिकार की स्थति का जायजा लेने वाली रिपोर्ट में भारत में मानव अधिकारों की स्थति के बारे में कहा गया हैं यहाँ महिलाओं बच्चों तथा आदिवासियों के मानव अधिकारों से जुडी समस्या अधिक हैं.

मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना हैं, कि इसका मूल कारण सभी राज्यों में राज्य मानव अधिकार आयोग का न होना हैं. भारत में मानवाधिकार की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए इसके सभी राज्यों में मानव अधिकार आयोग का गठन अनिवार्य हैं.

मानव परिवारों में सभी सदस्यों को जन्मजात गौरव तथा सम्मान प्राप्त करने का अधिकार हैं जो ही विश्व शान्ति तथा न्याय व स्वतंत्रता की बुनियाद हैं. अतः सम्पूर्ण मानवता की रक्षा के लिए विश्व समुदाय को खुलकर मानव अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाना चाहिए.

मानव अधिकार आयोग पर निबंध | Essay On Human Rights Commission In Hindi

प्रिय साथियो आपका स्वागत है Essay On Human Rights Commission In Hindi में  हम आपके साथ मानव अधिकार आयोग पर निबंध साझा कर रहे हैं. कक्षा 1,2,3,4,5, 6,7,8,9,10 तक के बच्चों को मानवाधिकार आयोग भारत के कार्य पर निबंध टिप्पणी पर सरल भाषा में हिन्दी निबंध (ह्यूमन राइट्स कमिशन एस्से)  को परीक्षा के लिहाज से याद कर लिख सकते हैं.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति का विचार और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार हैं. इसके अंतर्गत बिना हस्तक्षेप के कोई राय रखना और किसी भी माध्यम के जरिये से तथा सीमाओं की परवाह न करके किसी की सूचना और धारणा का अन्वेषण, ग्रहण तथा प्रदान सम्मिलित हैं.

मानव अधिकार क्या है 

ये वे प्राकृतिक अधिकार हैं जिनका प्रत्येक नागरिक उपभोग कर सकता हैं. मानव अधिकारों के अंतर्गत जीवन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, जीविकापार्जन का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार आते हैं.

संसार का प्रत्येक लोकतांत्रिक देश अपने नागरिकों को ये अधिकार प्रदान करता हैं. भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 से 35 तक इन अधिकारों का प्रावधान किया गया हैं. विश्वस्तर पर मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल हैं जिनका मुख्यालय लन्दन में हैं.

मानव अधिकार आयोग की आवश्यकता

भारत में मूल अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका के अलावा कुछ और सरंचनाओं का भी निर्माण किया गया हैं. इनमें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति एवं जाति आयोग तथा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग प्रमुख हैं.

ये संस्थाएं क्रमशः अल्पसंख्यकों, महिलाओं, दलितों के अधिकारों तथा मानवाधिकारों की रक्षा करती हैं.

भारत का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग व कार्य

मौलिक अधिकारों और अन्य अधिकारों की रक्षा के लिए वर्ष 2000 में भारत सरकार ने कानून द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया हैं.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में सर्वोच्च न्यायालय का एक पूर्व न्यायधीश, किसी उच्च न्यायालय का एक पूर्व न्यायधीश तथा मानवाधिकारों के सम्बन्ध में ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले दो और सदस्य होते हैं.

कार्यक्षेत्र

मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायते मिलने पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग स्वयं अपनी पहल या किसी पीड़ित व्यक्ति की याचिका पर जांच कर सकता हैं.

जेलों में बंदियों की स्थिति का अध्ययन कर सकता हैं. मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध कर सकता हैं. या शोध को प्रोत्साहन कर सकता हैं.

प्राप्त शिकायतों का स्वरूप

आयोग को प्रतिवर्ष हजारों शिकायतें मिलती हैं. इनमें से अधिकतर हिरासत में मृत्यु, हिरासत के दौरान बलात्कार, लोगों के गायब होने, पुलिस की ज्यादतियों, कार्यवाही न किये जाने पर, महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार आदि से सम्बन्धित होती हैं.

आयोग को स्वयं मुकदमा सुनने का अधिकार नहीं हैं. यह सरकार या न्यायालय को अपनी जांच के आधार पर मुकदमें चलाने की सिफारिश कर सकता हैं.

आयोग का दुरूपयोग

प्रत्येक व्यक्ति के मूल अधिकारों की रक्षा का पक्ष हर कोई लेता हैं. शक्तिशाली लोग, सत्ता या समूह किसी के अधिकारों का हनन न करे. यदि ऐसा हो तो वह आयोग की शरण में जा सकता हैं.

यह व्यवस्था निसंदेह मानवता की भलाई के लिए बनाई गई, मगर कई बार व्यक्ति विशेष या दल विशेष के प्रभावों के चलते मानव अधिकार आयोग ने निष्पक्षता से काम नहीं लिया हैं.

देश के समुदाय विशेष के किसी व्यक्ति की झूठी अपवाह या कश्मीर में सेना पर पत्थरबाजी करने वाले के अधिकारों की रक्षा के लिए ह्यूमन राईट कमिशन का कारवां बचाव में खड़ा हो जाता हैं.

मगर यही आयोग कैराना, सिख दंगे, कश्मीर विस्थापित लोगों के पुनर्वास अथवा उनके अधिकारों की बात नहीं करेगा. इसी दोगलेपन के चलते भारत में मानवाधिकार आयोग का प्रभाव शून्य ही नजर आता हैं.

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