गुरु भक्ति की आदर्श कहानी- Guru Bhakti Story in Hindi

Guru Purnima Story in Hindi- गुरु भक्ति की आदर्श कहानी- Guru Bhakti Story in Hindi / Guru or shishy ki kahani story हमारी भारतीय परम्परा में गुरूजी का स्थान त्रिदेव (शिव, ब्रह्मा, विष्णु) से बढ़कर माना हैं. अबोध अज्ञानी बच्चें के ज्ञान चक्षु खोलने वाले गुरू ही होते हैं. आज के इस लेख में हम महान गुरु व शिष्यों की गुरुभक्ति की कुछ प्रेरणादायी कहानियां आपके साथ यहाँ शेयर करेंगे.

गुरु भक्ति की आदर्श कहानी- Guru Bhakti Story in Hindi

गुरु भक्ति की आदर्श कहानी- Guru Bhakti Story in Hindi

एक वक्त की बात हैं किसी गाँव में एक बड़े तपस्वी रहा करते थे. वे अपने शिष्यों को नित्य पाठ पढ़ाते थे. उनके यहाँ गाँव के सभी शिष्यों में एक युवा होनहार बालक भी था, जिसमें गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा थी. गुरु जी अपने शिष्यों को एक मन्त्र विद्या देने की बात करते थे.

जब शिष्य उनसे मंत्र पूछते तो वे कहते वक्त आने पर आप सभी को बता दूंगा. आखिर वो दिन आ ही गया. जब गुरूजी ने अपने सभी शिष्यों से कहा – आज मैं आपकों वो मन्त्र दूंगा जिसकी आपको अगले 12 माह सिद्धि करनी हैं.

गुरूजी ने सभी शिष्यों को मंत्र बता दिया, मगर उस दिन वह नवयुवक नहीं आया था. अगले दिन जब उसे इस बात का पता चला तो उसने पाया कि सभी साथी मंत्र की सिद्धि में लगे हैं वह अकेला बच गया, वह भागा भागा गुरूजी के पास गया और उन्हें सारी घटना बताई गुरूजी ने कहा – इसमें मेरी गलती नहीं हैं आप नहीं आए.

अब अगले वक्त तक इंतजार करिये. वह नवयुवक ऐसे ही मानने वालों में नहीं था. सुबह शाम सोते जागते, नहाते धोते गुरु जी के पीछे लगा ही रहता और मंत्र मांगता रहा. एक दिन गुरूजी जंगल में निवृत होने के लिए निकले वह भी उनके पीछे भागा और मंत्र मांगने लगा. गुरूजी भी तंग आ गये. गुरूजी ने कहाँ सही वक्त आने पर दूंगा.

अगले दिन वह शिष्य निश्चय कर आया कि आज वह मंत्र लेकर ही लौटेगा. उस दिन जब गुरूजी निवृत होने निकले तो वह फिर बोल पड़ा – गुरूजी मंत्र दे दीजिए. गुस्से में बोले ” टेम दैखे न कटेम भाग अठै सूं ” भोली प्रवृति का नवयुवक मन ही मन प्रसन्न हुआ उसने सोचा कि यही मंत्र हैं. वह प्रसन्न मुद्रा पर इसका जाप करने बैठ गया.

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कुछ वक्त बाद उसी गाँव में एक लड़के की मौत हो गई अभी अभी शादी हुई, सभी दुखी हारे मन से उसे श्मशान की ओर ले जा रहे थे. तभी किसी को याद आया कि हमारे यहाँ कुछ संत हैं जो मरे व्यक्ति को जीवित कर सकते हैं. वे तुरंत उन शिष्यों के पास गये. उन्होंने मंत्र लगाया पर कोई काम नहीं आया. आखिर में उस नवयुवक ने भी ” टेम दैखे न कटेम भाग अठै सूं ” मंत्र का जाप किया तो मरा लड़का जीवित हो गया.

यह देखकर सभी शिष्य गुरूजी के पास पहुंचकर शिकायत करने लगे कि आपने हमें नकली मंत्र दिया हैं. असली मंत्र तो उसके पास है जो उस दिन नहीं आया था. गुरु ने उस नवयुवक को बुलाया और पूछा तुझे मैंने मन्त्र कब दिया- वह बोला आपने ही तो बताया था ” टेम दैखे न कटेम भाग अठै सूं “

गुरूजी बोले वो कोई मंत्र नहीं था. यह तो तुझे भगाने के लिए कहा था तेरी अटूट श्रद्धा, विश्वास और भक्ति से यह सिद्ध हो गया.

शिक्षा: गुरु के प्रति सच्ची भक्ति भवसागर पार करा देती हैं.

गुरु भक्त शिष्य आरुणि की कहानी

प्राचीन काल की बात हैं, जब गुरु अपने शिष्यों को नगर के बाहर शांत माहौल में बने गुरुकुलों में विद्याध्ययन कराते थे. उनके शिष्यों की संख्या सैकड़ों में थी जो आश्रम में रहकर ही अध्ययन किया करते थे. बरसात का मौसम था ऋषि धौम्य अपने आश्रम में विराजित शिष्यों को विद्या दे रहे थे, आसमान में घने बादल छाएँ हुए थे.

एक दोपहर की बात है अचानक मौसम बदलता है तथा काले घने बादलों के साथ आकाश की दसों दिशाएं घोर गर्जन करने लगी. सहसा ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गई और देखते ही देखते मानों बादल फट गया. चारों ओर जल ही जल का सागर हो गया. गुरूजी थोड़ी चिंता में बोले इतनी बारिश आज से पूर्व कभी न हुई थी, कुछ देर ऐसे ही मूसलाधार बारिश होती रही तो खेत की मेड इतना दवाब न झेल पाएगी और सारी फसल तबाह हो जाएगी.

गुरूजी ने अपनी बात पूरी की ही नहीं कि एक शिष्य धीरे से बोला मेरी कुटियाँ भी रिस रही होगी यह कहता हुआ चलता बना, तभी दूसरा उठा मेरी कुटियाँ का पिछला हिस्सा भी टूट सकता है कहकर चलता बना. इस तरह किसी ने कपड़ों का बहाना किया तो किसी ने और कुछ कहते हुए सभी गुरूजी की कुटियाँ से खिचकते बने.

आरुणि अभी तक वहां शांत बैठा था वह भी खड़ा हुआ और बोला गुरूजी मुझे आगया दीजिए मैं खेत पर जाता हूँ तथा बाँध को पक्का कर देता हूँ, गुरूजी ने कह कहते हुए आज्ञा दी कि भले ही कड़ी मेहनत करनी पड़े मेड कमजोर मत बनाना.

गुरूजी की आज्ञा पाकर वह तेजी से खेत की तरफ चल दिया. उसने वहां जाकर देखा तो खेत की मेड एक जगह से टूट चुकी थी. खेत का सारा पानी तेज गति से वहां बह रहा था. आरुणि उस टूटी मेड की जगह मिट्टी डाल डालकर थक गया मगर तेज जल प्रवाह के आगे उसकी मेहनत काम नहीं आ रही थी, पानी उस रेत को बहाकर ले जा रहा था.

गुरूजी की आज्ञा पालन करना जरुरी था, मगर कैसे वो इस बहते पानी को रोके तथा पक्का बाँध बनाएं. उन्हें यकायक एक विचार आया और बांध के टूटे हिस्से पर मिट्टी लाकर डालने की जगह वह स्वयं लेट गया. आखिर जल धारा को भी आरुणि की हठ के आगे हार माननी पड़ी और खेत का बहता पानी रुक गया.

पूरी रात बीत गई मगर वह उसी अवस्था में बिना शरीर को हिलाएं डुलाएं वहां लेटा रहा. बारिश थम चुकी थी भौर हुई. सभी शिष्य गुरु के समक्ष बैठकर अध्ययन में लग गये. आरुणि के नजर न आने पर गुरूजी ने चिंतित भाव से उसके बारे में पूछा तो एक शिष्य ने जवाब दिया उसे कल दोपहर खेत की तरफ जाते हुए देखा था उसके बाद वह कभी दिखाई नहीं दिया.

किसी ने कहा वह अपनी कुटियाँ में सो रहा होगा, गुरूजी ने पता करने को भेजा तो वह कही नहीं मिला. गुरूजी अब किसी की न सुनकर खेत की तरफ चल पड़े और खेत के पास जाकर पुकारने लगे आरूणि… आरूणि… बेटा आरूणि. मगर कोई जवाब नहीं मिल रहा था. वे खेत के चक्कर लगाने लगे. आखिरी में उन्हें टूटे बांध के मुहाने के पास बेहोश पड़े आरुणि को देखा. उन्हें सारा माजरा समझ आ गया और आँखों से आंसू की धारा बह निकली.

तुरंत उसकी तरग लपक पड़े उसे उठाकर शरीर को मिट्टी से साफ़ किया तथा कपड़े से ढककर मालिश करने लगे. जब उसे होश आया तो गुरु ने कहा मुझे आप पर गर्व हैं मैं आपको वरदान देता हूँ आप समस्त विद्याओं में पारंगत हो सुखपूर्वक जीवन बिताओं और खूब नाम करों, गुरूजी के ये वचन सत्य ही सिद्ध हुए.

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