हरिओम पंवार जी की कविताएँ Hariom Pawar Poems In Hindi Free Download

Hariom Pawar Poems In Hindi Free Download हरिओम पंवार जी की कविताएँ : राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाले डॉ हरिओम पंवार हिंदी काव्य विधा के वीर रस के कवि और गायक हैं. उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले में सिकन्दराबाद के निकट बुटना में 24 मई 1951 को हुआ था. मेरठ युनिवर्सिटी से इन्होने LLM अर्थात लो में स्नातको त्तर तक शिक्षा पाई. हरिओम पंवार जी कानून के कॉलेज प्रोफेसर हैं. इंदिरा जी की मृत्यु पर, अयोध्या की आग पर इनकी लोक प्रिय रचनाएं है. कई बार हम इन्हें टीवी पर काव्य पाठ के आयोजनों में लाइव सुनते हैं. आज हम पंवार जी की कुछ कविताएँ आपकें साथ साझा कर रहे हैं. 

Hariom Pawar Poems In Hindi Free Download

हरिओम पंवार जी की कविताएँ Hariom Pawar Poems In Hindi Free Download

dr hariom pawar poems download: आज हम आपके सामने पेश करेंगे हरिओम पंवार की कविता विडियो ऑडियो के लिए आप उनकी कविताओं का वाचन सुन सकते हैं.

साथ ही डॉ हरिओम पवार कवि सम्मेलन, hariom panwar wikipedia के रूप में उनकी समस्त हिंदी कविताओं काव्य सम्मेलनों के विडियो आप यहाँ से सीधे देख सकते हैं देशभक्ति पर आधारित वीर रस कविताएँ राजनीति पर हरिओम की कविताएँ आप यहाँ सुन सकते हैं.

Best Hindi Poem On Kashmeer Problem By Hariom Panwar

घाटी के दिल की धड़कन
काश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था
डमरू वाले शिव शंकर की जो घाटी कल्याणी था
काश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता था
जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था
काश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था
काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था
काश्मीर वो डूब गया है अंधी-गहरी खाई में
फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में

ये अग्नीगंधा मौसम की बेला है
गंधों के घर बंदूकों का मेला है
मैं भारत की जनता का संबोधन हूँ
आँसू के अधिकारों का उदबोधन हूँ
मैं अभिधा की परम्परा का चारण हूँ
आजादी की पीड़ा का उच्चारण हूँ

इसीलिए दरबारों को दर्पण दिखलाने निकला हूँ
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
बस नारों में गाते रहियेगा कश्मीर हमारा है
बस नारों में गाते रहियेगा कश्मीर हमारा है
छू कर तो देखो हिम छोटी के नीचे अंगारा है
दिल्ली अपना चेहरा देखे धूल हटाकर दर्पण की
दरबारों की तस्वीरें भी हैं बेशर्म समर्पण की

काश्मीर है जहाँ तमंचे हैं केसर की क्यारी में
काश्मीर है जहाँ रुदन है बच्चों की किलकारी में
काश्मीर है जहाँ तिरंगे झण्डे फाड़े जाते हैं
सैंतालिस के बंटवारे के घाव उघाड़े जाते हैं
काश्मीर है जहाँ हौसलों के दिल तोड़े जाते हैं
खुदगर्जी में जेलों से हत्यारे छोड़े जाते हैं

अपहरणों की रोज कहानी होती है
धरती मैया पानी-पानी होती है
झेलम की लहरें भी आँसू लगती हैं
गजलों की बहरें भी आँसू लगती हैं

मैं आँखों के पानी को अंगार बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
काश्मीर है जहाँ गर्द में चन्दा-सूरज- तारें हैं
काश्मीर है जहाँ गर्द में चन्दा-सूरज- तारें हैं
झरनों का पानी रक्तिम है झीलों में अंगारे हैं
काश्मीर है जहाँ फिजाएँ घायल दिखती रहती हैं
जहाँ राशिफल घाटी का संगीने लिखती रहती हैं
काश्मीर है जहाँ विदेशी समीकरण गहराते हैं
गैरों के झण्डे भारत की धरती पर लहरातें हैं

काश्मीर है जहाँ देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहाँ तीन सौ सत्तर अड़चन होती है
काश्मीर है जहाँ दरिंदों की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छप्पन की राम कहानी चलती है
काश्मीर है जहाँ हमारा राष्ट्रगान शर्मिंदा है
भारत माँ को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहाँ देश का शीश झुकाया जाता है
मस्जिद में गद्दारों को खाना भिजवाया जाता है

गूंगा-बहरापन ओढ़े सिंहासन है
लूले – लंगड़े संकल्पों का शासन है
फूलों का आँगन लाशों की मंडी है
अनुशासन का पूरा दौर शिखंडी है

मै इस कोढ़ी कायरता की लाश उठाने निकला हूँ
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
हम दो आँसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
हम दो आँसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
पल दो पल चर्चा होती है बहुत बड़ी दुर्घटना पर
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर
मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर
भारत के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर

वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बँटवारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो
फिर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अँधियारों का

कुर्सी भूखी है नोटों के थैलों की
कुलवंती दासी हो गई रखैलों की
घाटी आँगन हो गई ख़ूनी खेलों की
आज जरुरत है सरदार पटेलों की

मैं घाटी के आँसू का संत्रास मिटाने निकला हूँ
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
जब चौराहों पर हत्यारे महिमा-मंडित होते हों
जब चौराहों पर हत्यारे महिमा-मंडित होते हों
भारत माँ की मर्यादा के मंदिर खंडित होते हों
जब क्रश भारत के नारे हों गुलमर्गा की गलियों में
शिमला-समझौता जलता हो बंदूकों की नालियों में

अब केवल आवश्यकता है हिम्मत की खुद्दारी की
दिल्ली केवल दो दिन की मोहलत दे दे तैय्यारी की
सेना को आदेश थमा दो घाटी ग़ैर नहीं होगी
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा उनकी खैर नहीं होगी

जिनको भारत की धरती ना भाती हो
भारत के झंडों से बदबू आती हो
जिन लोगों ने माँ का आँचल फाड़ा हो
दूध भरे सीने में चाकू गाड़ा हो

मैं उनको चौराहों पर फाँसी चढ़वाने निकला हूँ
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||
अमरनाथ को गाली दी है भीख मिले हथियारों ने
अमरनाथ को गाली दी है भीख मिले हथियारों ने
चाँद-सितारे टांक लिये हैं खून लिपि दीवारों ने
इसीलियें नाकाम रही हैं कोशिश सभी उजालों की
क्योंकि ये सब कठपुतली हैं रावलपिंडी वालों की
अंतिम एक चुनौती दे दो सीमा पर पड़ोसी को
गीदड़ कायरता ना समझे सिंहो की ख़ामोशी को

हमको अपने खट्टे-मीठे बोल बदलना आता है
हमको अब भी दुनिया का भूगोल बदलना आता है
दुनिया के सरपंच हमारे थानेदार नहीं लगते
भारत की प्रभुसत्ता के वो ठेकेदार नहीं लगते
तीर अगर हम तनी कमानों वाले अपने छोड़ेंगे
जैसे ढाका तोड़ दिया लौहार-कराची तोड़ेंगे

आँख मिलाओ दुनिया के दादाओं से
क्या डरना अमरीका के आकाओं से
अपने भारत के बाजू बलवान करो
पाँच नहीं सौ एटम बम निर्माण करो

मै भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने निकला हूँ
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन निकला हूँ ||

हरिओम पवार: मेरा पूरा भारत धर्म-स्थान है मेरा राम तो मेरा हिंदुस्तान है

चर्चा है अख़बारों में
टी. वी. में बाजारों में
डोली, दुल्हन, कहारों में
सूरज, चंदा, तारों में
आँगन, द्वार, दिवारों में
घाटी और पठारों में
लहरों और किनारों में
भाषण-कविता-नारों में
गाँव-गली-गलियारों में
दिल्ली के दरबारों में

धीरे-धीरे भोली जनता है बलिहारी मजहब की
ऐसा ना हो देश जला दे ये चिंगारी मजहब की

मैं होता हूँ बेटा एक किसानी का
झोंपड़ियों में पाला दादी-नानी का
मेरी ताकत केवल मेरी जुबान है
मेरी कविता घायल हिंदुस्तान है

मुझको मंदिर-मस्जिद बहुत डराते हैं
ईद-दिवाली भी डर-डर कर आते हैं
पर मेरे कर में है प्याला हाला का
मैं वंशज हूँ दिनकर और निराला का

मैं बोलूँगा चाकू और त्रिशूलों पर
बोलूँगा मंदिर-मस्जिद की भूलों पर
मंदिर-मस्जिद में झगडा हो अच्छा है
जितना है उससे तगड़ा हो अच्छा है

ताकि भोली जनता इनको जान ले
धर्म के ठेकेदारों को पहचान ले
कहना है दिनमानों का
बड़े-बड़े इंसानों का
मजहब के फरमानों का
धर्मों के अरमानों का
स्वयं सवारों को खाती है ग़लत सवारी मजहब की |
ऐसा ना हो देश जला दे ये चिंगारी मजहब की ||

बाबर हमलावर था मन में गढ़ लेना
इतिहासों में लिखा है पढ़ लेना
जो तुलना करते हैं बाबर-राम की
उनकी बुद्धि है निश्चित किसी गुलाम की

राम हमारे गौरव के प्रतिमान हैं
राम हमारे भारत की पहचान हैं
राम हमारे घट-घट के भगवान् हैं
राम हमारी पूजा हैं अरमान हैं
राम हमारे अंतरमन के प्राण हैं
मंदिर-मस्जिद पूजा के सामान हैं

राम दवा हैं रोग नहीं हैं सुन लेना
राम त्याग हैं भोग नहीं हैं सुन लेना
राम दया हैं क्रोध नहीं हैं जग वालो
राम सत्य हैं शोध नहीं हैं जग वालों
राम हुआ है नाम लोकहितकारी का
रावण से लड़ने वाली खुद्दारी का

दर्पण के आगे आओ
अपने मन को समझाओ
खुद को खुदा नहीं आँको
अपने दामन में झाँको
याद करो इतिहासों को
सैंतालिस की लाशों को

जब भारत को बाँट गई थी वो लाचारी मजहब की |
ऐसा ना हो देश जला दे ये चिंगारी मजहब की ||

आग कहाँ लगती है ये किसको गम है
आँखों में कुर्सी हाथों में परचम है
मर्यादा आ गयी चिता के कंडों पर
कूंचे-कूंचे राम टंगे हैं झंडों पर
संत हुए नीलाम चुनावी हट्टी में
पीर-फ़कीर जले मजहब की भट्टी में

कोई भेद नहीं साधू-पाखण्डी में
नंगे हुए सभी वोटों की मंडी में
अब निर्वाचन निर्भर है हथकंडों पर
है फतवों का भर इमामों-पंडों पर
जो सबको भा जाये अबीर नहीं मिलता
ऐसा कोई संत कबीर नहीं मिलता

जिनके माथे पर मजहब का लेखा है
हमने उनको शहर जलाते देखा है
जब पूजा के घर में दंगा होता है
गीत-गजल छंदों का मौसम रोता है
मीर, निराला, दिनकर, मीरा रोते हैं
ग़ालिब, तुलसी, जिगर, कबीरा रोते हैं

भारत माँ के दिल में छाले पड़ते हैं
लिखते-लिखते कागज काले पड़ते हैं
राम नहीं है नारा, बस विश्वाश है
भौतिकता की नहीं, दिलों की प्यास है
राम नहीं मोहताज किसी के झंडों का
सन्यासी, साधू, संतों या पंडों का

राम नहीं मिलते ईंटों में गारा में
राम मिलें निर्धन की आँसू-धारा में
राम मिलें हैं वचन निभाती आयु को
राम मिले हैं घायल पड़े जटायु को
राम मिलेंगे अंगद वाले पाँव में
राम मिले हैं पंचवटी की छाँव में

राम मिलेंगे मर्यादा से जीने में
राम मिलेंगे बजरंगी के सीने में
राम मिले हैं वचनबद्ध वनवासों में
राम मिले हैं केवट के विश्वासों में
राम मिले अनुसुइया की मानवता को
राम मिले सीता जैसी पावनता को

राम मिले ममता की माँ कौशल्या को
राम मिले हैं पत्थर बनी आहिल्या को
राम नहीं मिलते मंदिर के फेरों में
राम मिले शबरी के झूठे बेरों में

मै भी इक सौंगंध राम की खाता हूँ
मै भी गंगाजल की कसम उठाता हूँ
मेरी भारत माँ मुझको वरदान है
मेरी पूजा है मेरा अरमान है
मेरा पूरा भारत धर्म-स्थान है
मेरा राम तो मेरा हिंदुस्तान है

Dr Hariom Pawar ki Kavita Sangrah – डॉ हरिओम पंवार की कविता

मै अदना सा कलमकार हूँ घायल मन की आशा का
मुझको कोई ज्ञान नहीं है छंदों की परिभाषा का
जो यथार्थ में दीख रहा है मैं उसको लिख देता हूँ
कोई निर्धन चीख रहा है मैं उसको लिख देता हूँ
मैंने भूखों को रातों में तारे गिनते देखा है
भूखे बच्चों को कचरे में खाना चुनते देखा है
मेरा वंश निराला का है स्वाभिमान से जिन्दा हूँ
निर्धनता और काले धन पर मन ही मन शर्मिंदा हूँ

मैं शबनम चंदन के गीत नहीं गाता
अभिनंदन वंदन के गीत नहीं गाता
दरबारों के सत्य बताता फिरता हूँ
काले धन के तथ्य बताता फिरता हूँ

जहाँ हुकूमत का चाबुक कमजोर दिखाई देता है
काले धन का मौसम आदमखोर दिखाई देता है।

जिनके सर पर राजमुकुट है वो सरताज हमारे हैं,
जो जनता से निर्वाचित हैं नेता आज हमारे हैं,
इसीलिए अब दरबारों से केवल एक निवेदन है,
काले धन का लेखा-जोखा देने का आवेदन है,
क्योंकि भूख गरीबी का एक कारण काला धन भी है,
फुटपाथों पर पली जिंदगी का हारा सा मन भी है,
सिंहासन पर आने वालो अहंकार में मत झूलो,
काले धन के साम्राज्य से आँख मिलाना मत भूलो,
भूख प्यास का आलम देखो जाकर कालाहान्डी में,
माँ बेटी को बेच रही है दिन की एक दिहाड़ी में,
झोपड़ियों की भूख प्यास पर कलमकार तो चीखेगा,
मजदूरों के हक़ की खातिर मुट्ठी ताने दीखेगा,
पूरी संसद काले धन पर मौन साधकर बैठी है,
शुक्र करो के जनता अब तक हाथ बांधकर बैठी है,
झोपड़ियों को सौ-सौ आँसू रोज रुलाना बन्द करो,
सेंसैक्स पर नजरें रखकर देश चलाना बन्द करो,
जिस दिन भूख बगावत वाली सीमा पर आ जाती है
उस दिन भूखी जनता सिंहासन को भी खा जाती है।

मैं झुग्गी झोपड़ पट्टी का चारण हूँ
मैला ढोने वालों का उच्चारण हूँ
आँसू का अग्निगन्धा सम्बोधन हूँ
भूखे मरे किसानों का उद्बोधन हूँ
संवादों के देवालय को सब्जी मंडी बना दिया
संसद में केवल कोलाहल शोर सुनाई देता है।

आज व्यवस्था का चाबुक कमजोर दिखाई देता है।
काले धन का मौसम आदमखोर दिखाई देता है।।

काला धन वो धन है जिसका टैक्स बचाया जाता है
अक्सर ये धन सात समन्दर पार छुपाया जाता है
काले धन की अर्थव्यवस्था पूरा देश रुलाती है
झोपड़ पट्टी के बच्चों को खाली पेट सुलाती है
ये निर्धन के हिस्से की इमदादों को खा जाती है
मनरेगा के, अन्त्योदय के वादों को खा जाती है
बॉलीवुड की आधी दुनिया काले धन पर जिंदा है
चुपके-चुपके चोरी-चोरी दो नंबर का धंधा है
जब व्हाइट पैसे से बनती थी तो फिल्में काली थी
नैतिकता की संपोषक थी शुभ संदेशों वाली थी
काले धन की फ़िल्मी दुनिया इन्द्रधनुष रंगों में है,
पर दुनिया में जगह हमारी नंगों-भिखमंगों में है
काले धन के बल पर गुंडे निर्वाचित हो जाते हैं
भोली-भाली भूखी जनता में चर्चित हो जाते हैं
खनन माफिया काले धन के बल पर ऐंठे-ऐंठे हैं
स्विस बैंकों की संदूकों के तालों में जा बैठे हैं।

राजमहल के दर्पण मैले-मैले हैं
नौकरशाही के पंजे जहरीले हैं
शासकीय सुविधा बँट गयी दलालों में
क्या ये ही मिलना था पैंसठ सालों में
सैंतालिस में हम आजाद हुए थे आधी रजनी को
भोर नहीं आई अँधियारा घोर दिखाई देता है।
काले धन का मौसम आदमखोर दिखाई देता है।

हम काले धन वालों का धन-धाम नहीं पा सकते हैं
इनकी भूख हिमालय सी है ये खानें खा सकते हैं
इनके काले तारों से तो नीलाम्बर डर सकता है
इनकी भूख मिटाने में तो सागर भी मर सकता है
अपनी माँ भारत माता से नाता तोड़ चुके हैं ये
मीर जाफरों जयचन्दों को पीछे छोड़ चुके हैं ये।

काले धन का साम्राज्य कानून तोड़ते देखा है
प्रशासनिक व्यवस्था के नाखून तोड़ते देखा है
सचिवालय इनकी सेवा में खड़ा दिखाई देता है
हसन अली भी संविधान से बड़ा दिखाई देता है
इनके बाप विदेशी खातों की सूची में बैठे हैं
ये भारत में गद्दाफी के मार्कोस के बेटे हैं
गॉड पोर्टिकल खोजा है
फ्रॉड पोर्टिकल खोजो
जो काले धन के मालिक हैं उनका आज और कल खोजो

जो काले धन के मालिक हैं नाम बताओ डर क्या है
उनको उनके कर्मों का अंजाम बताओ डर क्या है
उनके नाम छिपाना तो संवैधानिक गद्दारी है
संविधान की रक्षा करना सबकी जिम्मेदारी है
दुनिया भर के आगे हाथ पसारोगे
लेकिन काले धन की जंग नकारोगे
झोली लेकर और घूमना बंद करो
अमरीका के चरण चूमना बन्द करो
भारत को कर्जा मिलता है भारत के काले धन से

पश्चिम की दादागीरी का दौर दिखाई देता है।
काले धन का मौसम आदमखोर दिखाई देता है।।

दोनों सत्ता और विपक्षी चुप्पी साधे बैठे हैं
आँखों पर गंधारी जैसी पट्टी बांधे बैठे हैं
इसीलिए अब चौराहों पर सब परदे खोलूँगा मैं
चाहे सूली पर टंग जाऊँ मन का सच बोलूँगा मैं
हो ना हो ये काले धन के खातेदार तुम्हारे हैं
या तो कोष तुम्हारा है या रिश्तेदार तुम्हारे हैं

कलम सत्य की धर्मपीठ है शिवम् सुन्दरम् गाती है
राजा भी अपराधी हो तो सीना ठोक बताती है
इसीलिए दिल्ली की चुप्पी आपराधिक ख़ामोशी है
वित्त मंत्रालय की कुर्सी कालेधन की दोषी है
मंत्रिमण्डल गुरु द्रोण सा पुत्र मोह का दोषी है
जो काले धन का मालिक है देश द्रोह का दोषी है

एफ डी आई लाने की जो कोशिश करती है दिल्ली
भारत को गिरवी रखने की कोशिश करती है दिल्ली
उससे आधी कोशिश अपना धन लाने में कर लेते
भूख गरीबी से लड़ लेते खूब खजाने भर लेते
काला धन वापस आता तो खुशहाली आ सकती थी
धन के सूखे मरुस्थलों में हरियाली आ सकती थी

लाख करोड़ों अपना दुनिया भर में है
लाख करोड़ों काला धन इस घर में है
इससे आधा भी जिस दिन पा जायेंगे
हम दुनिया की महाशक्ति बन जायेंगे
काले धन वाले बैठे हैं सोने के सिंहासन पर
भूखा बचपन उनके चारों ओर दिखाई देता है।
काले धन का मौसम आदमखोर दिखाई देता है।।

काले धन पर चैनल भी आवाज उठाते नहीं मिले,
कोई स्टिंग ब्लैक मनी का राज दिखाते नहीं मिले
काश! खोजते वो नम्बर जो ब्लैक मनी तालों के हैं,
ऐसा लगता है चैनल भी काले धन वालों के हैं

काले धन पर सत्ता और विपक्षी दोनों गले मिलो
भूखी मानवता की खातिर एक मुक्कमल निर्णय लो
संसद में बस इतना कर दो छोडो सभी बहानों को
राष्ट्र संपदा घोषित कर दो सारे गुप्त खजानों को
काला धन घर में भी है उसकी रफ़्तार मंद कर दो
हज़ार पाँच सौ के नोटों का फ़ौरन चलन बंद कर दो
नकद रूपये में क्रय विक्रय की परम्परा को बंद करो
बिना चेक के लेन देन की परम्परा को बंद करो
किसके लॉकर में क्या है डिक्लेरेसन करवाओ
कितने सोने का मालिक है एफिडेविट भरवाओ
फिर बैंको के एक एक लॉकर को खुलवाकर देखो
किसने कितना सच बोला है सब कुछ तुलवाकर देखो
केवल चौबीस घंटे में कालाधन बाहर आएगा
केवल ये कानून वतन से भ्रष्टाचार मिटवायेगा

जिस दिन भारत की संसद ऐसा कानून बनाएगी।
लोकपाल की कोई जरूरत शेष नहीं रह जायेगी।।

पंवार की कविता शोर्ट पॉएम

मैं भी गीत सुना सकता हूँ शबनम के अभिनन्दन के
मै भी ताज पहन सकता हूँ नंदन वन के चन्दन के
लेकिन जब तक पगडण्डी से संसद तक कोलाहल है
तब तक केवल गीत पढूंगा जन-गण-मन के क्रंदन के

जब पंछी के पंखों पर हों पहरे बम के, गोली के
जब पिंजरे में कैद पड़े हों सुर कोयल की बोली के
जब धरती के दामन पार हों दाग लहू की होली के
कैसे कोई गीत सुना दे बिंदिया, कुमकुम, रोली के

मैं झोपड़ियों का चारण हूँ आँसू गाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

कहाँ बनेगें मंदिर-मस्जिद कहाँ बनेगी रजधानी
मण्डल और कमण्डल ने पी डाला आँखों का पानी
प्यार सिखाने वाले बस्ते मजहब के स्कूल गये
इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गये

कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल चलें
सोन -चिरैया सूली पर है पंछी गाना भूल चले
आँख खुली तो माँ का दामन नाखूनों से त्रस्त मिला
जिसको जिम्मेदारी सौंपी घर भरने में व्यस्त मिला

क्या ये ही सपना देखा था भगतसिंह की फाँसी ने
जागो राजघाट के गाँधी तुम्हे जगाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

एक नया मजहब जन्मा है पूजाघर बदनाम हुए
दंगे कत्लेआम हुए जितने मजहब के नाम हुए
मोक्ष-कामना झांक रही है सिंहासन के दर्पण में
सन्यासी के चिमटे हैं अब संसद के आलिंगन में

तूफानी बदल छाये हैं नारों के बहकावों के
हमने अपने इष्ट बना डाले हैं चिन्ह चुनावों के
ऐसी आपा धापी जागी सिंहासन को पाने की
मजहब पगडण्डी कर डाली राजमहल में जाने की

जो पूजा के फूल बेच दें खुले आम बाजारों में
मैं ऐसे ठेकेदारों के नाम बताने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

कोई कलमकार के सर पर तलवारें लटकाता है
कोई बन्दे मातरम के गाने पर नाक चढ़ाता है
कोई-कोई ताजमहल का सौदा करने लगता है
कोई गंगा-यमुना अपने घर में भरने लगता है

कोई तिरंगे झण्डे को फाड़े-फूंके आजादी है
कोई गाँधी जी को गाली देने का अपराधी है
कोई चाकू घोंप रहा है संविधान के सीने में
कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में
कोई ढाँचे का गिरना यू. एन. ओ. में ले जाता है
कोई भारत माँ को डायन की गाली दे जाता है

लेकिन सौ गाली होते ही शिशुपाल कट जाते हैं
तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

जब कोयल की डोली गिद्धों के घर में आ जाती है
तो बगुला भगतों की टोली हंसों को खा जाती है
इनको कोई सजा नहीं है दिल्ली के कानूनों में
न जाने कितनी ताकत है हर्षद के नाखूनों में

जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है
तब माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है
जब-जब भी जयचंदों का अभिनन्दन होने लगता है
तब-तब साँपों के बंधन में चन्दन रोने लगता है

जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते हैं
तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते हैं
सिंहों को ‘म्याऊं’ कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है
बिल्ली में क्या ताकत होती कायरता दिल्ली में है

कहते हैं यदि सच बोलो तो प्राण गँवाने पड़ते हैं
मैं भी सच्चाई गा-गाकर शीश कटाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

‘भय बिन होय न प्रीत गुसांई’ – रामायण सिखलाती है
राम-धनुष के बल पर ही तो सीता लंका से आती है
जब सिंहों की राजसभा में गीदड़ गाने लगते हैं
तो हाथी के मुँह के गन्ने चूहे खाने लगते हैं

केवल रावलपिंडी पर मत थोपो अपने पापों को
दूध पिलाना बंद करो अब आस्तीन के साँपों को
अपने सिक्के खोटे हों तो गैरों की बन आती है
और कला की नगरी मुंबई लोहू में सन जाती है

राजमहल के सारे दर्पण मैले-मैले लगते हैं
इनके ख़ूनी पंजे दरबारों तक फैले लगते हैं
इन सब षड्यंत्रों से परदा उठना बहुत जरुरी है
पहले घर के गद्दारों का मिटना बहुत जरुरी है

पकड़ गर्दनें उनको खींचों बाहर खुले उजाले में
चाहे कातिल सात समंदर पार छुपा हो ताले में
ऊधम सिंह अब भी जीवित है ये समझाने आया हूँ |
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

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Dr. Hariom Pawar || चंद्रशेखर आजाद कौन थे जानिए || Kavi Sammelan के शीर्षक से तुलसी दर्शन से चैनल पर प्रकाशित यह कविता वाचन आजादी के वीरों की बलिदानी और आज के देश के दुश्मनों पर कटाक्ष करते उनके काव्य की पंक्तियाँ भी आप भी सुने,

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देश के युवाओं का खून खोल देने वाली हरिओम पंवार की वीर रस की कविता को आप ऑडियो कैसेट के रूप में सुन सकते हैं. उनके कवि सम्मेलनों के गीत, कविताएँ, गजले, गाने शायरी चुटकले हर किसी को पसंद आते हैं. आपके लिए प्रस्तुत हैं उनकी एक और भावभरी देशभक्ति कविता.

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दल बदलू नेता by hari om pawar mp3 के शीर्षक से प्रकाशित यह कविता जनजन जाग्रति और इंदिरा व कांग्रेस पर व्यंग्य में क्रांति का आह्वान और जीत तुम्हारी ही होगी, सुनियें उनकी प्रसिद्ध कविता.

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कवि सम्मेलन प्रयागराज में बाबा रामदेव के सम्मुख आस्था चैनल में हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार में आयोजित सम्मेलन का पूरा विडियो आज्ञा हो तो छेडू वीणा की झंकार की कविता अवश्य सुने.

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