नफरत, घृणा पर सुविचार अनमोल वचन | Hate Quotes In Hindi

Hate Quotes In Hindi (नफरत कोट्स, नफरत स्टेटस) : जहाँ प्रेम नही होता है वहां घृणा का निवास होता हैं. इर्ष्या या घृणा व्यक्ति को पतन की ओर ले जाती है तथा धीरे धीरे उसे संसार से घृणा होने लगती है और अंत में वह अकेला पड़ जाता हैं. छोटी सोच तथा छोटे ह्रदय के लोग हमेशा एक अच्छे और सफल इन्सान से घृणा ही करते हैं. हम अपने दिल में औरों के प्रति प्रेम को पालना चाहिए, इससे दुनियां में हर कोई अपना ही मिलेगा. आज हम नफरत पर अनमोल वचन (Hate Quotes) में विद्वानों के थोट्स को जानेगे.

नफरत, घृणा पर सुविचार अनमोल वचन | Hate Quotes In Hindi

नफरत, घृणा पर सुविचार अनमोल वचन Hate Quotes In Hindi

1#. मनुष्य प्रेम करने की अपेक्षा घृणा अधिक स्थिर रूप से करते हैं.


2#. हम कुछ व्यक्तियों से घृणा करते है, क्योंकि हम उनको नही जानते है और उन्हें कभी न जान सकेगे, क्योंकि हम उनसे घृणा करते है.


3#. कटुतम घृणा उनकी होती है जो हमारे निकटतम सम्बन्धी होते हैं.


4#. घृणा स्थायी दृढ़मूल क्रोध हैं.


5#. घृणा हिंसा का सूक्ष्मतम रूप हैं.

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6#. लोगों को घृणा करना ऐसा ही है जैसे चूहें से पीछा छुड़ाने के लिए अपना घर जला डालना.


7#. यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसकों तुम पसंद करते हो, तो वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसके बारे में तुमकों कभी भी बात नहीं करनी चाहिए.


8#. हम उनसे घृणा करते है जिनसे हम प्रायः डरते हैं.


9#. जो आपसे इर्ष्या करते है उससे घृणा ना करे क्योंकि ये वो ही इन्सान है जो यह समझते है कि आप उनसे बेहतर हैं.

नफरत, घृणा पर सुविचार

नफरत से कभी किसी का भला नहीं होता है यह सकारात्मक सोच को दूषित करती है।


नफरत की आग में जला व्यक्ति जिससे नफरत करता है उसका कभी अच्छा नहीं चाहता और ना ही उसके लिए शब्दों में अच्छे अर्थ की अभिव्यक्ति होती है।


घृणा से कभी प्रेम भावना की उत्पत्ति नहीं होती है जो रिश्तों में दूरियाँ ही लाती हैं।


घृणा जीवन में आपसी रिश्तों के लिए ज़हर समान है जो विश्वास की नींव को कमज़ोर कर देती है और रिश्तों में अलगाव की स्थिति पैदा कर देती है।


नफरत मनुष्य जीवन को सत्कर्मों से भटका देती है क्योंकि नफरत सही कार्य के लिए प्रेरित नहीं करती है।


नफरत मनुष्य को बुरे कार्य की ओर ढकेल देती है जिससे स्वयं के लिए परेशानियाँ खड़ी हो जाती हैं।


नफरत जीवन में अपने लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग की ओर जाने नहीं देती और लक्ष्य प्राप्ति में बाधा बनती है।


नफरत एक दूसरे का अहित करती है जिससे अच्छाई नहीं होती है बल्कि बुरे कर्म होने की आशंका रहती है।


नफरत के वशीभूत मनुष्य स्वयं का जीवन खुशियों से दूर कर लेता है और प्रतिशोध की आग में जलता रहता है।


नफरत करनी है तो बुरे विचारों से करो, बुरी आदतों और बुरे कर्मों से करो ताकि जड़ से इनको मिटा सको।


नफरत वो चिंगारी है जो आपसी दुश्मनी को बढ़ावा देती है और अपनत्व की भावना को खत्म कर देती है।


मनुष्य का जीवन प्रेम स्वरूप है इसे नफरत से दूर रखने में ही भलाई है।


किसी से घृणा करके मनुष्य स्वयं मन खराब करता है क्योंकि घृणा से कभी मन स्वच्छ नहीं होता बल्कि बुरे विचार मन में आते हैं जो विपरीत दिशा की ओर ले जाते हैं और नकारात्मक भावना को तूल देते हैं।


घृणा वो विकार है जो ज़िन्दगी में रिश्तों की आपसी डोर तोड़ देती है।


नफरत को प्रेम में बदलने की कोशिश करनी चाहिए और कभी प्रेम को नफरत में परिवर्तित नहीं होने देना चाहिए फिर रिश्ता चाहे कोई भी हो वास्तविक अपनेपन की भावना नहीं रहती है।


नफरत इतनी भी नहीं करनी चाहिए कि किसी का अहित करने का मन में विचार आए।


नफरत करनी है तो मनुष्य में उत्पन्न बुराई से करो मनुष्य से नफरत नहीं करनी चाहिए क्योंकि मनुष्य को बुरा तो उसके अंतर्मन में उत्पन्न बुराई बनाती है।


नफरत अगर मनुष्य के शब्दों तक रहे तो इतना बुरा नहीं करती लेकिन अगर व्यवहारिक रूप से कार्यरत होती है तो नुकसान करती है।


जीवन को आदर्श स्वरूप बनाने के लिए नफरत जैसे विकारों को त्यागना पड़ता है।


मनुष्य में महानता के गुण यूँ ही नहीं आ जाते हैं बल्कि अपनी दृढ़ निश्चय शक्ति से नफरत जैसी बुरी सोच को अच्छे कर्मों में बदलना पड़ता है, नकारात्मक सोच को सकारात्मक सोच में बदलना पड़ता है।


मनुष्य अगर किसी से दिल से नफरत करता है तो कभी अपने दिल में जगह नहीं दे पाता है।


देश की नींव आपसी प्रेम भावना से दृढ़ होती है न कि नफरत की भावना से दृढ़ होती है।


देश का उद्धार देश के लोगों के हाथों में होता है या तो वह नफरत से लड़ाई झगड़े कर देश कमज़ोर करें या आपसी एकता व प्रेम भावना से मज़बूती प्रदान कर सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर दें।


अपनी मातृभूमि से सच्चा प्रेम करने वाला ही सच्चा भक्त होता है और नफरत करने वाला गद्दार कहलाता है।


नफरत की आग को कभी भड़काना नहीं चाहिए ये अपने साथ कई घर तबाह कर देती है।


मनुष्य एक दूसरे से नफरत करने में अपना समय बर्बाद न करे तो जीवन के लिए अच्छा होता है।


मनुष्य नफरत करते वक्त एक दूसरे की कमियाँ ही देखता है, अच्छाई भूल जाता है।


मनुष्य कई बार एक दूसरे की तरक्की, व्यक्तित्व से भी नफरत करते हैं क्योंकि वे उन जैसे नहीं हो पाते हैं।


मनुष्य खुद से प्यार करने में इतना समय लगाए की अन्य से नफ़रत करने का समय ही न मिले। समय का सदुपयोग करे।


कई बार नफरत की वजह बड़ी होती है कि मनुष्य प्यार नहीं कर पाता तब ईश्वर का ध्यान और स्वयं से प्यार करना सही होता है।


खाली दिमाग शैतान का घर होता है जिसमें नफरत जैसी दुर्भावना जल्दी डेरा डाल देती है इसलिए स्वयं  को अच्छे कार्य में व्यस्त रखना चाहिए।


ऐसा नहीं है कि बुरा करके ही लोग एक दूसरे से नफरत करते हैं कई बार मनुष्य की अच्छाईयाँ भी नफरत पैदा करती है जो मन के वैर व खोखलेपन की ओर इशारा करते हैं।


मनुष्य नफरत करके कुछ अच्छा प्राप्त नहीं कर सकता है।


अगर कोई आपका दिल दुखाए तो ज़रूरी नहीं नफरत ही समाधान हो, दूरी भी एक उपाय हो सकता है।


नफरत तो जान पहचान वालों के बीच ही होती है क्योंकि अजनबी यूँ नफरत नहीं करते हैं।


मनुष्य के अंदर नफरत का बीज किसी के द्वारा पीड़ा देने से पैदा होता है या किसी की तरक्की या व्यक्ति से होता है। किसी के द्वारा मनुष्य इतना परेशान हो जाता है कि मन में नफरत पैदा हो जाती है और किसी की कामयाबी व अच्छाई से इतना जलता है कि नफरत हो जाती है दोनों ही सूरतों में नफरत कभी भला नहीं करती है।


मनुष्य के मन मस्तिष्क में उत्पन्न नफरत स्वयं का ही अहित करती है।


मनुष्य जीवन में कई बार गलतफहमियाँ भी नफरत की वजह बन जाती हैं, कोशिश करनी चाहिए कि वह दूर हो जाये ताकि नफरत प्यार में बदल सके।


मनुष्य की नफरत किसी के बुरे होने का प्रमाण नहीं देती है बल्कि आपसी रंजिश का कारण भी होती है।


अगर नज़रिया नफरत भरा ना हो तो जीवन की खूबसूरती व लोगों में अच्छाईयाँ दिखेगी।


मनुष्य नफरत करके जीवन में खुशी नहीं पा सकता है क्योंकि खुशी के लिए अंतर्मन में शांति व सकारात्मक भावनाओं का बसेरा होना चाहिए।


नफरत का भाव ऐसा है जो मनुष्य को कभी जीत हासिल नहीं करने देता है।


मनुष्य में अगर नफरत का भाव उत्पन्न हो चुका है तो उसे अच्छाई दिखती नहीं है।


मनुष्य जीवन में अगर परेशानियाँ आए तो उनसे घृणा नहीं करनी चाहिए बल्कि सामना करना चाहिए।


मनुष्य में घृणा स्वयं नष्ट नहीं होती है इसको दूर करने के लिए प्रेम का सहारा लेना पड़ता है।


क्रोध वो विकार है जिसकी अधिकता मनुष्य को घृणा का पात्र बना देती है।


मनुष्य को कभी घृणा किसी बीमार व्यक्ति से नहीं करनी चाहिए क्योंकि बीमार तो कोई भी हो सकता है, ना ही किसी नीची जाति से घृणा करनी चाहिए क्योंकि जाति कोई भी नीच नहीं होती है बल्कि मनुष्य ही उसमें भेदभाव करता है और न ही किसी दुखी व्यक्ति से घृणा करनी चाहिए क्योंकि दुख तो किसी के भी भाग्य में आ सकता है।


मनुष्य कई बार अपने स्वभाव, सोच, विचारों और व्यवहार से घृणा के पात्र बन जाते हैं।


मनुष्य की घृणा कभी जीवन में खुशहाली नहीं ला सकती है। जीवन में खुशहाली प्रेम भावना से लाई जा सकती है।


अगर मन में घृणा, द्वेष, ईर्ष्या, भय, चिंता का वास हो तो मनुष्य का जीवन कभी स्वस्थ नहीं हो सकता है।


मनुष्य जीवन में कभी घृणा, घृणा के द्वारा समाप्त नहीं की जा सकती है। घृणा को दूर करने के लिए प्रेम की आवश्यकता पड़ती है।


मनुष्य को अपने जीवन संकटों से कभी घृणा नहीं करनी चाहिए वो और अधिक विशालकाय शैतान समान प्रतीत होती है। अपने संकटों के समाधान के लिए उनका डटकर सामना करना चाहिए।

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