पृथ्वीराज चौहान का इतिहास | Prithviraj Chauhan History In Hindi

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास Prithviraj Chauhan History In Hindi नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है आजके आर्टिकल में हम अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के इतिहास के बारे में जानेगे. चौहान दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिन्दू शासक थे, गौरी के साथ दूसरे युद्ध में पराजय के पश्चात यह हिन्दवी सूरज डूब गया था.

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास Prithviraj Chauhan History In Hindi

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास Prithviraj Chauhan History In Hindi
नामसम्राट पृथ्वीराज चौहान
जन्म1149, गुजरात
मृत्यु की जगह और तारीख1192, काबुल
माता पितासोमेश्वर चौहान कमलादेवी
वंशचौहान
घनिष्ठ मित्रचंदबरदाई
पत्नीसंयोगिता
राज्याभिषेक1169 ई. में
राज्य गद्दीअजमेर व दिल्ली

12वीं सदी के अंतिम चरण में चौहान साम्राज्य उतरी भारत में अत्यधिक शक्तिशाली हो गया था. चौहान सम्राज्य का विस्तार कन्नौज से जहाजपुर मेवाड़ की सीमा तक विस्तृत हो गया था.

सोमेश्वर देव की मृत्यु के बाद पृथ्वीराज चौहान 11 वर्ष की अल्पायु में सिंहासन पर बैठा. माता कर्पूरी देवी अपने अल्पव्यस्क पुत्र के राज्य की संरक्षिका बनी.

अपने मंत्री व सेनापति के सहयोग से पृथ्वीराज ने शासन चलाया, उसने अपने विश्वस्त सहयोगियों को उच्च पदों पर नियुक्त किया.

सम्राज्य विस्तार की दृष्टि से चौहान ने अपने पडौसी राज्यों के प्रति दिग्ग्विज्य निति का अनुसरण करते हुए 1182 में महोबा के चन्देल शासक को पराजित किया. इसके उपरांत इन्होने चालुक्यों से एवं कन्नौज के गहड्वालों से संघर्ष किया.

सन 1178 में गजनी के शासक मोहम्मद गौरी ने गुजरात पर आक्रमण किया.यहाँ के शासक भीमदेव चालुक्य ने ख़ासहरड के मैदान में गौरी को बुरी तरह पराजित किया. गौरी ने सीमा प्रान्त के राज्य सियालकोट और लाहौर पर अधिकार कर लिया.

Telegram Group Join Now

सन 1186 से 1191 तक मोहम्मद गौरी पृथ्वीराज चौहान से कई बार पराजित हुआ, हम्मीर महाकाव्य के अनुसार 7 बार, पृथ्वीराज प्रबंध में 8 बार, पृथ्वीराज रासो में 21 बार, प्रबंध चिंतामणी में 23 बार मोहम्मद गौरी के पराजित होने का उल्लेख है.

इन दोनों के मध्य दो प्रसिद्ध युद्ध हुए. तराइन के प्रथम युद्ध 1191 में राजपूतों के प्रहार से गौरी की सेना में तबाही मच गई तथा गौरी भी गोविन्दराय के भाले से घायल हो गया. उसके साथी उसे बचाकर ले गये. पृथ्वीराज चौहान ने गौरी की भागती हुई सेना का पीछा नही किया.

सन 1992 में गौरी पुनः नये ढंग से तैयारी के साथ तराइन के मैदान में आ डटा. मुहम्मद गौरी ने संधिवार्ता का बहाना बनाकर ‘पृथ्वीराज चौहान ‘को भुलावे में रखा. गौरी ने प्रातकाल राजपूत जब अपने नित्य कार्य में व्यस्त थे, तब गौरी ने अचानक आक्रमण कर दिया. गौविंदराय व अन्य यौद्धा युद्ध भूमि में काम आ गये.

गौरी ने भागती हुई सेना का पीछा किया और उन्हें घेर लिया. दिल्ली व अजमेर पर तुर्कों का आधिपत्य हो गया. पृथ्वीराज रासो में उल्लेख है कि पृथ्वीराज को गौरी गजनी ले गया, उन्हें नेत्रहीन कर दिया गया.वहां पृथ्वीराज ने अपने शब्दभेदी बाणों से गौरी को मार दिया और उसके बाद स्वयं को समाप्त कर दिया, किन्तु इतिहासकार इस मत पर एकमत नही है.

चौहान वीर साहसी एवं विलक्ष्ण प्रतिभा का धनी था. इनका विद्या एवं साहित्य के प्रति गहरा लगाव था. जयानक, विद्यापति, बागीश्वर जनार्दन, चंदरबरदाई आदि उसके दरबार में थे.

पृथ्वीराज चौहान ने अपने राज्य सुरक्षा की दृष्टि से पडौसी राज्यों को अपनी शक्ति का परिचय करवाया. कई आक्रमणकारियो को बुरी तरह खदेड़ा, इसलिए इन राज्यों ने पृथ्वीराज चौहान की तरफ आँख उठाकर भी नही देखा.

इतना सब होने पर भी “पृथ्वीराज चौहान” में दूरदर्शिता और कूटनीति का अभाव था. उसने पडौसी राज्यों से युद्ध करके दुश्मनी मोल ले ली. गौरी को कई बार पराजित करने के बाद भी उसकों समाप्त नही किया. डोक्टर दशरथ शर्मा ने पृथ्वीराज चौहान को एक सुयोग्य शासक कहा है.

पृथ्वीराज चौहान का जन्म (Prithviraj Chauhan Birth )

अजमेर के पराक्रमी शासक पृथ्वीराज चौहान का जन्म किस तिथि को हुआ था, इस विषय में सारे स्रोत मौन नजर आते हैं. बताया जाता है कि 1 जून 1163 को गुजरात के एक जिले पाटण में इनका जन्म हुआ था. चाहमान के राजा सोमेश्वर इनके पिता व माता का नाम कर्पूरी देवी था.

इनके छोटे भाई का नाम हरिराज तथा बहन का नाम पृथा था. बचपन से ही चौहान की शिक्षा दीक्षा राजपरिवार में सम्पन्न हुई. कम उम्र में ही ये साहसी, निडर यौद्धा बन गये. इनकी तुलना अपने नाना महाराजा अनंगपाल से भी की जाती है, जो एक वीर यौद्धा भी थे. इनकी बहादुरी को लेकर एक किस्सा प्रचलित है कि बालपन में ही चौहान ने एक शेर का जबड़ा फाड़ दिया था.

पृथ्वीराज चौहान की शिक्षा एवं शुरुआती जीवन (Prithviraj Chauhan Education )

चौहान की पाठशाला विग्रहराज द्वारा स्थापित सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ से हुई, जो कालान्तर में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा मस्जिद का आकार दे दिया गया था.

अपने पिता का असमय देहावसान हो जाने के कारण मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में पृथ्वीराज तृतीय अजमेर की गद्दी के स्वामी बने. उस समय कदम्बदास उनका सुयोग्य प्रधानमन्त्री था. बालक पृथ्वीराज की ओर से उनकी माता कर्पूरी देवी ने बड़ी कुशलता एवं कूटनीति से शासन कार्य सम्भाला.

परन्तु बहुत ही कम समय में ही पृथ्वी राज तृतीय ने अपनी योग्यता एवं वीरता से समस्त शासन प्रबंध अपने हाथ में ले लिया. उसके बाद उसने अपने चारो ओर के शत्रुओं का एक एक कर शनै शनै खात्मा किया एवं दलपंगुल की उपाधि धारणा की.

सम्राट पृथ्वीराज चौहान का परिवार (Prithviraj Chauhan Family )

पितासोमेश्वर
माताकर्पूरदेवी
भाईहरिराज (छोटा)
नानामहाराजा अनंगपाल
बहनपृथा (छोटी)
रानियाँ• जम्भावती पडिहारी
• पंवारी इच्छनी
• दाहिया
• जालन्धरी
• गूजरी
• बडगूजरी
• यादवी पद्मावती
• यादवी शशिव्रता
• कछवाही
• पुडीरनी
• शशिव्रता
• इन्द्रावती
• संयोगिता गाहडवाल
पुत्रगोविंद चौहान
पुत्रीकोई नहीं

सम्राट पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता की कहानी (Prithviraj Chauhan and Sanyogita Story)

चौहान एक वीर पराक्रमी शासक तो थे ही पर क्या आप जानते है वे एक अच्छे प्रेमी भी थे. वैसे तो पृथ्वीराज चौहान के राजपरिवार में इनकी कुल तेरह पत्नियाँ बताई जाती हैं. मगर कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता के साथ प्रेम और फिर अपहरण कर विवाह की कहानी भी लोकप्रिय हैं.

दरअसल पृथ्वीराज अपना दिल संयोगिता को दे चुके थे, संयोगिता भी चौहान से प्रेम करती थी. मगर चौहान के परिवार वाले तथा संयोगिता के पिता के परिवारों के बीच चली आ रही आपसी कलह इस रिश्ते में बाधा बन रही थी.

संयोगिता के पिता ने अपनी बेटी के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया, पृथ्वीराज को नीचा दिखाने के लिए स्वयंवर के प्रवेश द्वार पर उनकी मिट्टी की मूर्ति बनाकर लगा दी. जब चौहान तक इस बात की खबर पहुचती है तो वे एक योजना के तहत संयोगिता का अपहरण कर लेते हैं.

दिल्ली जाकर दोनों विवाह कर लेते हैं, आगे चलकर संयोगिता एक पुत्र को जन्म देती है जिनका नाम गोविन्द चौहान रखा गया था.

पृथ्वीराज तृतीय के प्रमुख सैनिक अभियान एवं विजयें

नागार्जुन एवं भंडानको का दमन: पृथ्वीराज के राजकाज सम्भालने के कुछ समय बाद उसके चचेरे भाई नागार्जुन ने विद्रोह कर दिया. अतः पृथ्वीराज ने सर्वप्रथम अपने मंत्री कैमास की सहायता से सैन्य बल के साथ उसे पराजित कर गुडापुरा एवं आसपास का क्षेत्र अपने अधिकार में कर लिए. इसके बाद ११८२ ई में पृथ्वीराज ने भरतपुर मथुरा क्षेत्र में भंडानको के विद्रोह का अंत किया.

महोबा के चंदेलो पर विजय : पृथ्वीराज ने ११८२ ई में ही महोबा के परमाल देव को हराकर उसे संधि के लिए विवश किया.

चालुक्यो पर विजय: सन ११८४ के लगभग गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार एवं पृथ्वीराज की सेना के मध्य नागौर का युद्ध हुआ जिसके बाद दोनों में संधि हो गई एवं चौहानों की चालुक्यों से लबी शत्रुता का अंत हो गया.

कन्नौज से संबंध: पृथ्वीराज के समय कन्नौज पर गहडवाल शासक जयचंद का शासन था. जयचंद एवं पृथ्वीराज दोनों की राज्य विस्तार की महत्वकांक्षाओ ने उनमें आपसी वैमनस्य उत्पन्न कर दिया.

उसके बाद उसकी पुत्री संयोगिता को पृथ्वी राज द्वारा स्वयंवर से उठा कर ले जाने के बाद दोनों में शत्रुता और बढ़ गई थी. इसी वजह से तराईन के युद्ध में जयचंद ने पृथ्वीराज की सहायता न कर मुहम्मद गौरी की सहायता की.

पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी (Prithviraj Chauhan and Muhammad Gauri)

पृथ्वीराज के समय भारत के उत्तर पश्चिम में गौर प्रदेश पर शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का शासन था. मुहम्मद गौरी ने सन ११७८ में पंजाब मुल्तान तथा सिंध को जीतकर अपने अधीन कर लिया था.

तराइन का प्रथम युद्ध ११९१ का इतिहास History of the First Battle of Tarain 1191

पृथ्वीराज के दिल्ली हांसी सरस्वती एवं सरहिंद के दुर्गों को जीतकर अपने अधिकार में कर लेने के बाद ११९०-९१ में गौरी ने सरहिंद पर अधिकार कर अपनी सेना वहां रख दी. पृथ्वीराज अपने क्षेत्र से आक्रान्ताओं को भगाने हेतु सरहिंद पर आक्रमण करने हेतु बढ़ा.

मुहम्मद गौरी अपने विजित क्षेत्र को बचाने हेतु विशाल सेना सहित तराइन के मैदान में आ डटा. पृथ्वीराज भी अपनी सेना सहित वहां पंहुचा. दोनों सेनाओं के मध्य तराइन का प्रथम युद्ध हुआ जिसमें दिल्ली के गर्वनर गोविन्दराज ने मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया.

घायल गौरी युद्ध भूमि से बाहर निकल गया एवं कुछ ही समय में गौरी की सेना मैदान छोड़ भाग खड़ी हुई. पृथ्वीराज इस विजय के बाद भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा न कर मुहम्मद गौरी व उसकी सेना को जाने दिया. पृथ्वीराज ने ऐसा कर बड़ी भूल की जिसकी कीमत उसे अगले वर्ष ही तराइन के द्वितीय युद्ध में चुकानी पड़ी.

तराइन के द्वितीय युद्ध का इतिहास ११९२ History of the Second War of Tarain 1192

प्रथम युद्ध में जीत के बाद पृथ्वीराज निश्चिन्त हो आमोद प्रमोद में व्यस्त हो गया, जबकि गौरी पुरे मनोयोग से विशाल सेना को पुनः एकत्रित की एवं युद्ध की तैयारियों में व्यस्त रहा.

एक वर्ष बाद ११९२ ई में ही गौरी अपनी विशाल सेना के साथ पृथ्वी राज से अपनी हार का बदला लेने हेतु तराइन के मैदान में पुनः आ धमका.

पृथ्वीराज को समाचार मिलते ही वह भी सेना सहित युद्ध मैदान की ओर बढ़ा. उसके साथ उसके बहनोई शासक समरसिंह एवं दिल्ली के गर्वनर गोविन्द राज भी थे.

दोनों सेनाओं के मध्य तराइन का द्वितीय युद्ध हुआ जिसमें साम दाम दंड भेद की नीति से मुहम्मद गौरी की विजय हुई.

अजमेर व दिल्ली पर उसका अधिकार हो गया. तराइन के युद्ध के बाद गौरी ने अजमेर का शासन का भार कर के बदले पृथ्वी राज के पुत्र गोविन्द राज को दे दिया.

परन्तु कुछ समय बाद ही पृथ्वीराज के भाई हरिराज ने उसे पदच्युत कर अजमेर पर अपना अधिकार कर लिया. तब गोविन्दराज ने रणथमभौर में चौहान वंश के शासन की शुरुआत की. 

मुहम्मद गौरी ने भारत में विजित अपने क्षेत्रों का प्रशासन अपने दास सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को सम्भला दिया एवं स्वयं लौट गया. ऐबक ने अजमेर में विग्रहराज चतुर्थ द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला तुड़वाकर ढाई दिन के झोपड़े में परिवर्तित कर दिया.

तराइन का तृतीय युद्ध History of the Third War of Tarain

भारतीय इतिहास की एक निर्णायक एवं युग परिवर्तनकारी घटना साबित हुआ. इससे भारत में स्थायी मुस्लिम साम्राज्य का प्रारम्भ हुआ. मुहम्मद गौरी भारत में मुस्लिम साम्राज्य का संस्थापक बना.

इसके बाद धीरे धीरे गौरी ने कन्नौज, गुजरात, बिहार आदि क्षेत्रों को जीता और कुछ ही वर्षों में उत्तरी भारत पर मुस्लिम आक्रमणकारियों का शासन स्थापित हो गया.

तराइन के दोनों युद्धों का विस्तृत कवि चन्द्र बरदाई के पृथ्वीराज रासो हसन निजामी के नाजुल मासिर एवं सिराज के तबकात ए नासिरी में मिलता हैं. तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय का प्रमुख कारण गौरी की कुशल युद्ध निति थी.

इसके अलावा पृथ्वीराज का अपने चारो ओर के राजाओं को अपना शत्रु बना लेना, उसमें दूरदर्शिता का अभाव युद्ध की तैयारी न कर आमोद प्रमोद में व्यस्त रहना एवं दुश्मन को कम कर आंकना आदि अन्य कारण थे

जिनकी वजह से पृथ्वीराज तृतीय का तुर्क प्रतिरोध असफल हो गया और देश अन्तः सैकड़ों वर्षों की गुलामी में जकड़ता रहा.

पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबार में पृथ्वीराज विजय का लेखक जयानक पृथ्वीराज रासो के लेखक एवं उसके मित्र चन्द्र बरदाई जर्नादन वागीश्वर आदि विद्वानों को आश्रय प्राप्त था.

कैसी थी पृथ्वीराज चौहान की सेना

12 वीं सदी में अजमेर से दिल्ली तक अपना शासन करने वाले पृथ्वीराज चौहान की सेना बहुत बड़ी तथा संगठित थी. अपने सैन्य बल के दम पर इन्होने कई सैनिक अभियानों में विजय हासिल की.

उनकी सेना में 300 हाथी तथा तीन लाख पैदल और घुड़सवार शामिल थे, संख्याबल और शौर्य के मामलें में चौहान की ताकत में कोई कमी नहीं थी मगर अच्छे घुड़सवारों, अपनों द्वारा साथ न देने व जयचंद की गद्दारी ने इनके साम्राज्य के सूरज की लौ डूबा दी.

फिल्म

यशराज फिल्म्स के बैनर तले 3 जून 2022 में सम्राट पृथ्वीराज मूवी में रिलीज हुई. फिल्म में अभिनेता अक्षय कुमार, संजय दत्त, सोनू सूद तथा अभिनेत्री मानुषी छिल्लर ने काम किया, मगर फिल्म पूरी तरह फ्लाप सिद्ध हुई. पहले मूवी के नाम को लेकर तथा उसके पश्चात जयचंद के किरदार को लेकर देशभर में इसे काफी विरोध भी झेलना पड़ा.

FAQ

Q. सम्राट पृथ्वीराज की इतिहास प्रसिद्ध रानी का नाम क्या था?

Ans: संयोगिता, ये चौहान की प्रिय रानी थी इनकी प्रेम कहानी काफी लोकप्रिय हैं.

Q. पृथ्वीराज चौहान का मन्दिर कहाँ बना हुआ हैं?

Ans: गाजियाबाद के पिलखुआ में चौहान का एक मन्दिर हैं, यहाँ उनकी अस्थियों को अफगानिस्तान से लाकर मन्दिर बनवाया गया था.

यह भी पढ़े

उम्मीद करता हूँ दोस्तो पृथ्वीराज चौहान का इतिहास Prithviraj Chauhan History In Hindi का यह लेख आपकों पसंद आया होगा, यदि आपकों इसमें दी गयी जानकारी पसंद आई हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ जरुर शेयर करें.

1 thought on “पृथ्वीराज चौहान का इतिहास | Prithviraj Chauhan History In Hindi”

  1. हमे हमारे भारतभुमी और भारतीय होने का गर्व है पर हमे भारत का एतीयास सही से ना कीताबो मे बताया गया ना पढ़ाया गया है हमारे देश मे ऐसे ऐसे वीर सपुत हुउ है के उनकी कहानी और कोय जेकर नही है तो,जय हिन्द,,,,,,,,,,,

    Reply

Leave a Comment