जल प्रदूषण क्या है कारण प्रभाव एवं रोकने के उपाय | Water Pollution in Hindi

जल प्रदूषण क्या है कारण प्रभाव एवं रोकने के उपाय Water Pollution in Hindi: जलाशय, मीठे जल के बड़े तालाब, झीले तथा नदियाँ मानव व जन्तुओं के लिए पेयजल के मुख्य स्रोत है. अधिकांश कस्बें, बड़े शहर व औद्योगिक नगर भी इन्ही जल स्रोतों के निकटवर्ती क्षेत्रों में बसे हुए है. घरेलू अपशिष्ट एवं औद्योगिक अपशिष्ट इन्ही जल स्रोतों में प्रवाहित किया जाता है. जिससे बड़ी मात्रा जल प्रदूषण होता है. जल प्रदूषण विकास शील तथा विकसित राष्ट्रों के लिए एक समस्या बन गईं है. वाटर पोल्यूशन क्या है, इनके कारण प्रभाव तथा जल प्रदूषण को रोकने के लिए किन उपायों को अपनाना चाहिए, इसकी चर्चा इस लेख में करेगे.

जल प्रदूषण क्या है कारण प्रभाव रोकने के उपाय Water Pollution in Hindi

विषय सूची

जल प्रदूषण क्या है कारण प्रभाव एवं रोकने के उपाय Water Pollution in Hindi

इन जल स्रोतो का प्रदूषण विभिन्न प्रदूषकों जैसे वाहित मल (Sewage), कार्बनिक अपमार्जकों (detergents), जल में विलयित पीडकनाशी व कीटनाशी औद्योगिक द्रव अपशिष्ट में घुले कार्बनिक व अकार्बनिक रसायनों, हानिकारक सूक्ष्मजीवों, नदी नालों के साथ बहकर आने वाले मृदा अवसाद (soil sediment) के कारण जल प्रदूषण होता है.

जल प्रदूषण क्या है अर्थ एवं परिभाषा (What is water pollution Meaning & Definition in hindi)

जीवमंडल में जीवों के शरीर के सम्पूर्ण भार का दो तिहाई या 66 प्रतिशत भाग जल ही होता है. मानव रक्त में 79%, मस्तिष्क में 80%, हड्डियों में 10 प्रतिशत जल की मात्रा निहित होती है. जल समस्त जैविक कारकों के शरीर के भागों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.

प्राकृतिक जल में किसी भी अवांछित बाह्य पदार्थ की उपस्थिति जिससे जल की गुणवत्ता में कमी आती हो, जल प्रदूषण कहलाता है. सिंचाई या पीने के लिए जो पानी उपलब्ध है वह मनुष्य की विकृत जीवन पद्धति के कारण प्रदूषित होता जा रहा है.

सिंचाई में कीटनाशकों का उपयोग, उद्योगों द्वारा दूषित पानी को जल स्रोतों में छोड़ा जाना, तेजाबी वर्षा, शहरों के सीवरेज के पानी को नदियों एवं झीलों में छोड़ा जाना. खनिजों का पानी में घुला होना जल प्रदूषण के मुख्य कारण है.

जल प्रदूषित होने से मनुष्य केवल रोगग्रस्त ही नही होते बल्कि भूमि की उत्पादकता में गिरावट भी आती है. जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत निम्नलिखित है.

  • घरेलू अपमार्जक
  • वाहित मल
  • औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ
  • कीटनाशकों का उपयोग
  • ताप एवं आणविक बिजलीघर आदि के प्रयोग से निकलने वाला प्रदूषित जल आदि. जलीय प्रदूषण से जलीय पौधों व जन्तुओं की वृद्धि रुकने व इनकी म्रत्यु हो जाने के साथ साथ भूमि की सतह पर जल अवरोधी सतह बन जाने से भूमिगत जल के स्तर में कमी आती है. उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल को उपचारित कर उद्योगों में पुनः कम में लाया जाना चाहिए.

जल प्रदूषण के कारण (Cause of Water Pollution in Hindi)

प्रदूषित जल के प्राकृतिक व मानव जनित दो प्रकार के कारण होते है.-

जल प्रदूषण प्राकृतिक स्रोत (Natural sources of water pollution)-

  • जल प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोतों के अंतर्गत जन्तुओं के मल पदार्थ, पादपो व जन्तुओं के अवशेष, ह्यूमरस, विभिन्न प्रकार के खनिजों की खानों से निकलकर जल में सम्मिश्रण, भू क्षरण इत्यादि सम्मिलित है.
  • बहते हुए पानी में कई बार धातुओं जैसे आर्सेनिक, सीसा (लेड), केडमियम, पारा इत्यादि की मात्रा अधिक हो जाती है. तो ऐसा जल जहरीला हो जाता है.

मानव जनित स्रोतों से जल प्रदूषण (Water Pollution from Human Generated Sources)

  • घर से निकलने वाले कचरे में सड़े फल, तरकारियों के छिलके, कूड़ा करकट, गंदा साबुन व अपमार्जक युक्त प्रमुख है. घरेलू अपशिष्ट पदार्थ मलिन बहिस्राव को मलिन जल कहते है.
  • जनसंख्या में वृद्धि होने के साथ पानी अधिक खर्च होने लगा तथा कल कारखानों में भी पानी की मांग तेजी से बढ़ी. वस्त्र उद्योग, कागज, रसायन उद्योगों में पानी की खपत ज्यादा होती है व प्रयोग के बाद हल प्रदूषित होता है. इस प्रकार औद्योगिकिकरण की प्रगति के साथ साथ प्रदूषित जल की मात्रा भी बढती है.
  • जल में कणीय पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म अघुलनशील पदार्थ, कोलायडी व सूक्ष्मजीव होते है. घरों से निकलने वाली गंदगी में रसोईघरों, स्नानघरों व शौचालयों से निकलने वाली गंदगी प्रदूषकों के रूप में उपस्थित रहती है.
  • कई बार नाइट्रोजन व फास्फोरस की मात्रा अधिक होने पर समुद्र में शैवालों की संख्या अधिक बढ़ जाती है जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगता है. जल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने से वह हड्डियों के रोग उत्पन्न करता है.
  • घरों व उद्योगों से निकले प्रदूषित जल को नदियों व नालों में छोड़ दिया जाता है. आज जल प्रदूषण इतना बढ़ चुका है, कि नदियाँ प्रदूषित जल लेकर समुद्रों में इसे मिलाकर प्रदूषित करती जा रही है.

जल प्रदूषण के मुख्य कारण (water pollution causes and effects)

वाहित मल (SEWAGE as water pollution In Hindi)

यह अधिकांश कार्बनिक पदार्थ होते है. जो सूक्ष्मजीवों द्वारा CO2 व जल में ऑक्सीकृत कर दिए जाते है. अतः जल स्रोतों में वाहित मल का अनुपात कम है तो जल प्रदूषित नहीं हो पाएगा.

लेकिन यदि झील या नदी में अधिक वाहित मल को विसर्जित किया है तो सूक्ष्मजीवों की आबादी बहुत बढ़ जाएगी और उनकी श्वसन क्रिया में जल में घुलित ऑक्सीजन समाप्त हो जाएगी तथा उसी अनुपात में जल में CO2 की मात्रा बढ़ जाएगी.

CO2 के अभाव में मछलियाँ व अन्य जलीय जन्तु व पौधें मर जाएगे और नदी या झील एक बदबूदार जलाशय बन जाएगा. एक इकाई आयतन जल में निर्धारित समय में O2 के उपयोग की मात्रा ज्ञात करके कार्बनिक प्रदूषकों की मात्रा का अनुमान लगा देते है, इस प्रकार के मापन को जैव रासायनिक आवश्यक ऑक्सीजन (BIOLOGICAL OXYGEN DEMAND BOD) कहते है.

चमड़े के कारखानों, पशु वधशालाओं, यात्री जहाजों व नौकाओं द्वारा विसर्जित वाहित मल में अनेक संक्रामक जीवाणु होते है. जो मानव व जन्तुओं के कई रोगों जैसे (हैजा, टायफाइड, पीलिया) के कारक है. वाहित मल जलीय जीवों के पोषक है और जलाशयों को अधिक उर्वर या सुपोषी (EUTROPHIC) बनाते है.

सुपोषकों से शैवालों की वृद्धि तेजी से होती है और अल्प काल में ही जलाशय, झील, नदी आदि शैवालों की सघन फूली हुई वृद्धि से भर जाती है. इसे शैवाल ब्लूम (ALGAL LOOM) कहते है.

शैवालों के मरने से इनका जीवाणुओं द्वारा अपघटन भी होता है, जिससे जल में O2 की मात्रा कम हो जाती है. साथ ही साथ जल प्रदूषण बढ़ता जाता है. ऐसी अवायवीय परिस्थतियों में अनेक जलीय पौधें व मछलियाँ मर जाती है.

विभिन्न उद्योगों द्वारा द्रव अपशिष्ट विसर्जन (Fluid waste excretion by various industries)

विभिन्न उद्योगों जैसे पेट्रो रसायन, उर्वरक तेल शोधन, औषधि रेशे, रबर, प्लास्टिक आदि के कारखानों से निकला द्रव अपशिष्ट नदियों के लिए गंभीर प्रदूषक है.

इन कारखानों से निकलने वाले अपशिष्टों में अनेक विषाक्त रसायन व अम्ल घुले रहते है, ये जल को दूषित करते है तथा भूमि में रिसकर भूमितल के जल को भी प्रदूषित करते है.

इन द्रव अपशिष्टों के कारण झीलों के जल का प्रदूषण हो जाता है. इनमें रहने वाले पेड़ पौधे मर जाते है. जन्तुओं तथा मनुष्यों द्वारा इस जल को पीने से अनेक गम्भीर रोग हो जाते है.

ये विषाक्त पदार्थ एक जीव से दूसरे जीव में खाद्य श्रंखला द्वारा स्थानातरित हो जाते है. रसायन उद्योग व पारा, द्रव अपशिष्टों के रूप में नदियों और फिर समुद्री जल में पहुच जाता है. स्वचालित नौकाओं के विरेचन से भी पारा व सीसा होता है और जल में मिलता रहता है.

यह अत्यंत विषाक्त मिथाइल पारा बनाता है जो जलीय जन्तुओं के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है. जल का दूसरा धातु प्रदूषक सीसा (lead) है.

यह सीसा खनन व स्वचालित जलवाहक रेचकों द्वारा जल में पहुचता है तथा जन्तुओं में खाद्य श्रंखला द्वारा पहुचकर विषाक्त प्रभाव दिखाता है.

जल प्रदूषक के रूप में रासायनिक उर्वरक (Chemical fertilizer as a water pollution In Hindi)

कृषि उत्पादन में वृद्धि करने हेतु रासायनिक उर्वरकों जैसे यूरिया, पोटाश, डाइमोनियम फास्फेट आदि का उपयोग किया जाता है. ये उर्वरक जल के साथ बहकर जलाशयों में आ जाते है. इस कारण शैवाल ब्लूम (algal bloom) बनते है.

जल प्रदूषण के रूप में पीडकनाशी व कीटनाशक (Pidicidal and pesticide in the form of water pollution In Hindi)

फसल के रोगाणुओं व कीटों का नाश करने हेतु पीड़कनाशीयों व कीटनाशकों का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है. पीड़क नाशक ddt का उपयोग कृषि में नाशक जीवों को नष्ट करने व मच्छरों का नाश करने में किया जाता है. इसका अधिक उपयोग अब एक गंभीर मृदा एवं जल प्रदूषण का कारण बन गया है.

ये सभी अविघनीय कार्बिनिक यौगिक है. इसके लगातार उपयोग से मृदा व जल में इनकी सांद्रता बढती जाती है. ये रसायन जैविक आवर्धन (biological magnification) भी प्रदर्शित करते है.

इन हानिकारक रसायनों की सांद्रता उतरोतर पोषकस्तरों में बढ़ती जाती है. जब पादप शरीर में ddt की सांद्रता बढ़ती जाती है तब इन पर निर्भर शाकाहारी कीटों मछलियों द्वारा इन पादपों का भक्षण, इन उपभोक्ताओं में ddt की सांद्रता को और अधिक बढ़ा देते है.

इसी क्रम में खाद्य श्रंखला के अंतिम मासाहारी उपभोक्ताओं में DDT की सांद्र्ट्स की वृद्धि होना हानिप्रद हो जाता है. मानव द्वारा मच्छलियों को खाने से उनका स्वास्थ्य गम्भीर रूप से प्रभावित होता है.

प्रदूषित जल पीने योग्य नही होता है. इसमें प्राय एक विशिष्ट प्रकार की दुर्गन्ध आती है. यह नहाने धोने के लिए उपयुक्त नही होता है. इसमें अनेक रोगों (टाइफाइड, हैजा व पीलिया) के रोगाणु होते है. ये प्रदूषित जल पीने से रोग फैलते है.

सागरीय जल का प्रदूषण (Pollution of sea water)

सागरीय जल का प्रदूषण निम्न कारणों से होता है.

  • सागर के तटवर्ती भागो में नगरीय एवं औद्योगिक प्रतिष्ठानों से अपशिष्ट जल, मलजल, कचरा तथा विषाक्त रसायनों का विसर्जन.
  • ठोस अपशिष्ट पदार्थों खासकर प्लास्टिक की वस्तुओं का सागरों में निस्तरण.
  • तेल वाहक जलयानों से भारी मात्रा में खनिज तेल का रिसाव तथा अपतट सागरीय तेल कुंपो से निसंतत प्रदूषण. खनिज तेल के रिसाव से सागरीय जल की सतह पर तेल की परत (oil slicks) बन जाती है. जो सागरीय जीवों को नष्ट कर देती है.
  • भारी धात्विक पदार्थों यथा सीसा, तांबा, जस्ता, क्रोमियम व निकल आदि का वायुमंडलीय मार्ग से सागरों में पहुचना. जलयानों तथा नाभिकीय शस्त्रों के परीक्षण से निकलकर सागरों में पहुचना आदि.

सागरीय जल प्रदूषण को रोकने के उपाय (Can Do To Reduce Water Pollution)

सागरीय जल को विश्व समुदाय की ओर से प्रदूषण मुक्त रखने के लिए प्रभावी उपाय जरुरी है. यदि प्रदूषकों के सागरों में विसर्जन एवं निस्तारण पर पूर्ण रोक संभव नही है तो कम से कम उसकी न्यूनतम मात्रा तो निर्धारित होनी चाहिए.

इस सन्दर्भ में कई कानून भी बनाए गये है. यथा उच्च सागर के कानून, महाद्वीपीय मग्न तट कानून आदि. लेकिन ये कानून पर्याप्त नही है.

गहरे सागरों के विदोहन, सागरों के सामरिक और सैनिक उपयोग, वैज्ञानिक शोध आदि से सम्बन्धित कानून तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है. सागरीय जैविक प्रक्रिया के अध्ययन के लिए गहन एवं व्यापक पारिस्थतिकीय शोध की अति आवश्यकता है.

जल प्रदूषण का प्रभाव (impact of water pollution on human health)

  • पारे द्वारा प्रदूषित जल के उपयोग से मिनिमाटा रोग हो जाता है.
  • पेयजल में नाइट्रेड की अत्यधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. तथा इससे नवजात शिशुओं की म्रत्यु भी हो जाती है. नाइट्रेड के कारण ब्लू बेबी सिंड्रोम नामक बीमारी हो जाती है.
  • पेयजल में फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा से दांतों में विकृति आ जाती है.
  • जल में आर्सेनिक होने से ब्लैकफुट बीमारी हो जाती है. आर्सेनिक से डायरिया, पेरिफेरल, फेफड़े व त्वचा का कैंसर हो जाता है.
  • प्रदूषित जल से मानव की खाद्य श्रंखला प्रभावित होती है.
  • मछुआरों की आजीविका व स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है.

जल प्रदूषण पर नियंत्रण, रोकने के उपाय (Control over water pollution in hindi)

निम्नलिखित उपाय जल प्रदूषण के नियंत्रण हेतु कारगर हो सकते है.

  • मानव समुदाय को जल प्रदूषण के विभिन्न पक्षों के विषय में चेतना तथा जन जागरण कराना होगा तथा जल प्रदूषण का सही बोध कराना होगा.
  • आम जनता को जल प्रदूषण एवं उससे उत्पन्न कुप्रभावों के बारे में शिक्षित करना होगा.
  • आम जनता को घरेलू अपशिष्ट प्रबन्धन में दक्ष करना होगा.
  • औद्योगिक प्रतिष्ठान हेतु स्पष्ट नियम बनाए जाए, जिससे वें कारखानों से निकले अपशिष्टों को बिना शोधित किये नदियों, झीलों या तालाबों में विसर्जित ना करे.
  • नगरपालिकाओं के लिए सीवर शोधन सयंत्रों की स्थापना कराई जानी चाहिए तथा सम्बन्धित सरकार को प्रदूषण नियंत्रण की योजनाओं के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए आवश्यक धन तथा अन्य साधन प्रदान किये जाएं.
  • नियमों एवं कानूनों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए. तथा इनके उल्लघन करने पर कठोर सजा एवं अर्थ दंड मिलना चाहिए.

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