तबकाते अकबरी

तबकाते अकबरी का लेखक ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद हैं. वह विद्वान व्यक्ति था. इसके साथ ही वह एक पराक्रमी सैनिक भी था. और उसने अकबर के विभिन्न अभियानों में महत्वपूर्ण भाग लिया.

तबकाते अकबरी Tabaqat E Akbari In Hindi

तबकाते अकबरी Tabaqat E Akbari In Hindi

तबकाते अकबरी में 987- 88 ई से लेकर 1593-94 ई तक का भारत का इतिहास उपलब्ध हैं. इसमें न केवल बाबर, हुमायूँ और अकबर का वर्णन हैं अपितु देश के प्रांतीय मुसलमान राज्यों का भी वर्णन हैं.

इससे ग्रंथ का महत्व और अधिक बढ़ जाता हैं. डॉ रिजवी ने लिखा हैं कि निजामुद्दीन ने तबकाते अकबरी की रचना के लिए अकबरनामा सहित 28 ग्रंथों का सहारा लिया और सामग्री की काफ़ी खोजबीन तथा जांच पड़ताल के बाद लिखा.

निजामुद्दीन की एक विशेषता यह रही हैं कि उसने धार्मिक कट्टरपन तथा पक्षपात का सहारा नहीं लिया हैं. इस दृष्टि से उसकी रचना अबुल फजल और बदायूँनी से अधिक निष्पक्ष कही जा सकती हैं. डॉ आशीर्वादीलाल ने लेखक पर आरोप लगाते हुए लिखा हैं कि इस ग्रंथ में निजी मत ठीक से व्यक्त नहीं किये गये हैं.

स्मिथ ने लिखा हैं कि यह ग्रंथ बाहय घटनाओं का रूखा और नीरस वृतांत हैं. अकबर की धार्मिक उच्छ्रंखलाओं की सर्वथा उपेक्षा कर देता हैं और अनेक महत्वपूर्ण बातों को किंचित्मात्र भी उल्लेख नहीं करता. इन कमियों के उपरान्त भी तबकाते अकबरी किताब काफ़ी महत्वपूर्ण हैं.

निजामुद्दीन अहमद

भारतीय इतिहासकार निजामुद्दीन अहमद का जन्म 1551 ई में हुआ इनके पिता का नाम मुहम्मद मुकीम-ए-हारावी था. यह मुगल सम्राट अकबर का मीर बख्शी था. इसने इतिहास के एक महत्वपूर्ण ग्रंथ तबकात ए अकबरी को लिखा था. सन 986 से अकबर के शासन काल के 38 वें साल 1593 तक के कालखंड की मुख्य घटनाओं को इसने कलमबद्ध किया था.

तबकाते अकबरी किताब 9 भागों में विभाजित हैं. इसके शुरूआती भागों में सल्तनत ए दिल्ली के सभी मुगल शासकों का विवरण मिलता हैं. साथ ही इसके अन्य खंडों में दक्कन, मालवा, गुजरात, बंगाल, सिंध, मुल्तान व कश्मीर के बारे में भी लिखा गया हैं.

निजामुद्दीन काफी पढ़ा लिखा विद्वान और लोगों के प्रति मिलनसार इंसान था. उस समय के समाज के प्रत्येक वर्ग के नजरिये और विचारों के बारे में इनकी अच्छी समझ भी रही. अकबर के साथ निजामुद्दीन के काफी नजदीकी ताल्लुक थे, वह कई हमलों में मुगल सेना के साथ जाया करता था.

गुजरात आक्रमण के बाद उसे वहां के बख्शी पद पर नियुक्त कर दिया. , मालवा और अजमेर की रियासतों में भी उच्च पद पर आसीन रहा. 1594 ई में इसका निधन हो गया था. भारत के मध्यकालीन इतिहास लेखन के विषय में निजामुद्दीन का अहम योगदान था.

इन्होने अकबरनामा और आईने अकबरी से भी कई घटनाओं को अपने इतिहास लेखन में शामिल किया. बाबर के बारे में जानकारी बाबरनामा से ली. इस तरह मुगल काल में अबल फजल की चापलूसी तथा बदायूनी की कट्टरता और घ्रणा भरे अतीत लेखन के बीच एक मध्यधारा के इतिहास लेखन में निजामुद्दीन ने स्वयं को स्थापित किया.

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