भारत के राष्ट्रपति पर निबंध Essay On President Of India In Hindi

भारत के राष्ट्रपति पर निबंध | Essay On President Of India In Hindi : प्रिय विद्यार्थियों आपका स्वागत है आज हम भारत के राष्ट्रपति के पद, स्वरूप, निर्वाचन प्रक्रिया, वेतन, शक्तियाँ व कार्य के बारे में विस्तार पूर्वक राष्ट्रपति भारत पर निबंध में यहाँ जानने वाले हैं. आज का यह निबंध विद्यार्थियों के लिए विशेष उपयोगी है जो महामहिम प्रेसिडेंट के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं. तो चलिए आरम्भ करते हैं.

भारत के राष्ट्रपति पर निबंध | Essay On President Of India In Hindi

भारत के राष्ट्रपति पर निबंध Essay On President Of India In Hindi

भारत के राष्ट्रपति पर निबंध 250 शब्द

माननीय रामनाथ कोविंद जी भारत के 14 वें एवं वर्तमान में राष्ट्रपति हैं, भारतीय लोकतंत्र में कार्यपालिका का मुखिया राष्ट्रपति को माना हैं ये देश के प्रथम नागरिक भी कहलाते हैं. भारत के संविधान में राष्ट्रपति को संसद का अंग माना गया हैं. लोक सभा राज्य सभा और राष्ट्रपति से भारतीय संसद बनती हैं.

डॉ राजेन्द्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति एवं श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटील देश की पहली महिला राष्ट्रपति थी. राष्ट्राध्यक्ष के रूप में राष्ट्रपति अन्य देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं गणतन्त्र दिवस पर ध्वजारोहण एवं राष्ट्रीय पुरस्कारों का वितरण इन्ही के हाथों से किया जाता हैं.

भारत के राष्ट्रपति को 5 लाख रु प्रतिमाह वेतन के अलावा कई भत्ते भी मिलते हैं, व्यवहारिक दृष्टि से भारत जैसे देश में राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री की तुलना में नामात्र की शक्तियाँ होती हैं अमेरिका जैसे देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता की सम्पूर्ण शक्ति उनके प्रेसिडेंट के हाथों में ही होती हैं.

राष्ट्रपति पर निबंध 1000 शब्द

सरकार के तीन अंगों में से कार्यपालिका अंग विधायिका द्वारा स्वीकृत नीतियों और कानूनों को लागू करने के लिए जिम्मेदार हैं. लेकिन सभी देशों में एक ही प्रकार की कार्यपालिका नहीं हो सकती.

मुख्यतः शासन के प्रकार के रूप में संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक का भेद कार्यपालिका के अलग अलग प्रकार एवं कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के आपसी सम्बन्धों पर ही आधारित होता हैं.

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जिस संविधान में कार्यपालिका अपने कार्यों एवं कार्यकाल के लिए व्यवस्थापिका के प्रति जवाबदेह हो, कार्यपालिका के सदस्य आवश्यक रूप से व्यवस्थापिका के भी सदस्य हो एवं राष्ट्र का अध्यक्ष एवं सरकार का अध्यक्ष अलग अलग हो, इस व्यवस्था को संसदात्मक अथवा संसदीय व्यवस्था कहते हैं.

जापान जर्मनी, इटली, ब्रिटेन, भारत इत्यादि संसदीय व्यवस्था के उदाहरण हैं. इसके विपरीत अध्यक्षात्मक व्यवस्था में राष्ट्रपति राज्य एवं सरकार दोनों का प्रधान होता हैं.

तथा वह शासन की सारी शक्तियों का केंद्र बिंदु होता है. अमेरिका, ब्राजील आदि अध्यक्षात्मक व्यवस्था के उदहारण हैं. जबकि फ्रांस, रूस, श्रीलंका आदि अर्द्ध अध्यक्षात्मक व्यवस्था वाले देश हैं.

कार्यपालिका का स्वरूप (Nature Of Executive): भारत में संसदीय व्यवस्था की व्यवस्था की गई है, जिसमें राष्ट्रपति कार्यपालिका का औपचारिक एवं संवैधानिक प्रधान होता हैं. तथा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्री परिषद वास्तविक कार्यपालिका होती हैं.

यदपि राष्ट्रपति का पद गरिमा एवं प्रतिष्ठा का पद माना जाता हैं. वह देश का प्रथम नागरिक माना जाता हैं तथा वरीयता क्रम में सर्वोच्च स्थान रखता हैं. संविधान का अनुच्छेद 52 राष्ट्रपति पद की व्यवस्था करता हैं,

जिसके अनुसार भारत का एक राष्ट्रपति होगा. अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करेगा.

भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन (Election Of President Of India In Hindi)

राष्ट्रपति के निर्वाचन प्रणाली का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 54 एव 55 में किया गया हैं. अनुच्छेद 54 अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाएगा जो संसद के दोनों सदनों लोकसभा एवं राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों तथा राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य से मिलकर बनेगा.

इस प्रकार राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता हैं. यह चुनाव एक विशेष विधि, जिसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमनीय मत विधि कहते हैं. के द्वारा गुप्त रूप से होता हैं.

इस विधि में विजयी होने के लिए उम्मीदवार को कुल डाले गये वैध मतों के आधे से एक मत अधिक प्राप्त करना होता हैं.इसे न्यूनतम कोटा कहते हैं.

राष्ट्रपति का निर्वाचन पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए होता हैं. तथा पुनः चुनाव लड़ सकता हैं. राष्ट्रपति किसी भी समय उपराष्ट्रपति को संबोधित कर अपना त्याग पत्र दे सकता हैं.

शक्तियों के दुरूपयोग, कदाचार, संविधान के उल्लंघन के आरोप में राष्ट्रपति को महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा पद से हटाया भी जा सकता हैं,

जिसका वर्णन संविधान के अनुच्छेद 61 में हैं. यह महाभियोग संसद के किसी भी सदन द्वारा राष्ट्रपति को कम से कम 14 दिन पूर्व सूचित कर लाया जा सकता हैं. महाभियोग के प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित होना चाहिए.

अगर राष्ट्रपति का पद मृत्यु, त्याग पत्र अथवा पदच्युति के कारण रिक्त हो जाए तब छः माह के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव करवाना आवश्यक हैं और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति शेष बची अवधि के लिए नहीं बल्कि पांच वर्ष के लिए निर्वाचित होता हैं.

राष्ट्रपति निर्वाचित होने की योग्यताएं (Qualifications For The Election Of President)

संविधान के अनुसार राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार होने के लिए आवश्यक हैं कि

  1. वह भारत का नागरिक हो
  2. उसकी न्यूनतम आयु पैतीस वर्ष हो
  3. वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो

इसके अतिरिक्त वह सरकार के अंतर्गत किसी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए. गैर गम्भीर व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए निर्वाचक मंडल में से प्रस्तावकों एवं अनुमोदकों की व्यवस्था भी की गई हैं. श्री राजेन्द्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे, जो दो बार निर्वाचित हुए.

भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया (Process of the Presidential election of India)

राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में दो बातों पर विशेष बल दिया गया हैं. प्रथम, निर्वाचक मंडल में जनसंख्या के निकटतम संभव समान प्रतिनिधित्व हो. द्वितीय समस्त विधानसभा सदस्यों द्वारा देय मतों से समता रहे. उक्त उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु निर्वाचक मंडल के प्रत्येक सदस्य की मत संख्या निश्चित करने के लिए विशेष पद्धति अपनाई गई हैं.

राज्य विधान मंडल की मत संख्या प्राप्त करने के लिए राज्य की कुल जनसंख्या वहां के विधानमंडल के कुल चुने हुए सदस्यों में बाँट दी जाती हैं एवं उस भागफल को 1000 से बाँट दिया जाता हैं. निम्न सूत्र से स्पष्ट समझा जा सकता हैं.

विधानमंडल के सदस्यों का मत भार —राज्य की कुल जनसंख्या/राज्य विधानमंडल के निर्वाचित सदस्य ÷ 1000

इस विभाजन में यदि शेष 500 से अधिक आए तो एक माना जाता है एवं भागफल में एक जोड़ दिया जाता हैं. संसद के प्रत्येक सदस्य का मतभार निकालने के लिए राज्यों के विधानमंडल के कुल मतों को दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों में बाँट दिया जाता हैं.

निर्वाचन गुप्त मतदान द्वारा एकल संक्रमनीय आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा होता हैं. इस निर्वाचन में प्रथम, साधारण पद्धति से मतों की न्यूनतम संख्या निर्धारित की जाती हैं. यदि किसी उम्मीदवार को उक्त निर्धारित मत नहीं मिलते तो चाहे उसके सबसे अधिक मत हो.

द्वितीय हार मतदाता को इतने वरीयता मत देने का अधिकार होता हैं जितने उम्मीदवार होते हैं. तृतीय उसको अपनी पसंद से वरीयता निर्धारित करने का अधिकार होता हैं. चतुर्थ यदि प्रथम गणना में किसी भी उम्मीदवार को निर्धारित संख्या में मत नहीं मिलते तो फिर दूसरी गणना प्रारम्भ की जाती हैं.

पंचम पहले उस उम्मीदवार को हटाया जा सकता है जिसकों सबसे कम मत मिले हैं. षष्ट यह क्रिया उस समय तक चलती रहती हैं. जब तक कि किसी एक उम्मीदवार को निर्धारित मत संख्या प्राप्त नहीं हो जाती.

यह पद्धति निम्न उदहारण द्वारा और भी स्पष्ट की जा सकती हैं. हम मान लेते हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव मैदान में चार उम्मीदवार हैं.

वेतन/ विशेषाधिकार/ उन्मुक्तियाँ व अन्य सुविधाएं (Salary/ Privileges/ Immunities And Other Facilities)

भारत सरकार द्वारा 11 सितम्बर 2008 से राष्ट्रपति का वेतन डेढ़ लाख प्रतिमाह निर्धारित किया गया हैं. जब कोई व्यक्ति राष्ट्रपति के पद पर आसीन है तब तक उसके विरुद्ध किसी दीवानी या फौजदारी न्यायालय में कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता हैं न तो किसी गिरफ्तारी के लिए वारंट ही जारी किया जा सकता हैं. और न ही उसे गिरफ्तार किया जा सकता हैं.

दो महीने के लिखित नोटिस देने के पश्चात राष्ट्रपति के विरुद्ध केवल दीवानी कार्यवाही की जा सकती हैं. पूर्व राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाने पर केवल उनकी पत्नी को सेनानिवृत राष्ट्रपति को मिलने वाली पेंशन की आधी राशि तथा सरकारी मकान आजीवन प्राप्त होगा. राष्ट्रपति भवन उनका औपचारिक आवास हैं जो रायसीना हिल्स दिल्ली में स्थित हैं.

इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के निकट छरबरा में उनका ग्रीष्मकालीन निवास स्थित हैं. जिसका नाम द रिट्रीट हैं. इसके अलावा आंध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद में राष्ट्रपति निलयम में भी उनका एक अन्य आवास स्थित हैं.

राष्ट्रपति की शक्तियाँ व कार्य पर निबंध ( Essay On powers & Functions Of President In Hindi)

भारत का संविधान राष्ट्रपति को संवैधानिक अध्यक्ष मानता हैं. आज हम राष्ट्रपति की शक्तियाँ व कार्य में यह जानेगे कि राष्ट्राध्यक्ष को संविधान क्या क्या अधिकार तथा शक्तियाँ देता हैं तथा राष्ट्रपति को कौन कौनसे कार्य करने पड़ते हैं. सामान्यकालीन तथा आपातकालीन शक्तियाँ क्या है तथा उसका उपयोग राष्ट्रपति किस तरह से करते हैं. 

संविधान के अनुसार राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च पदाधिकारी होता हैं. वह राष्ट्राध्यक्ष के रूप में कार्य करता हैं. राष्ट्रपति की शक्तियों को दो भागों में बांटा जा सकता हैं, सामान्यकालीन शक्तियाँ (General Powers) एवं संकटकालीन अथवा आपातकालीन शक्तियाँ.

भारत के राष्ट्रपति की सामान्यकालीन शक्तियाँ (General Powers Of President)

राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां, राष्ट्रपति के कार्य एवं शक्तियां कार्यपालिका शक्ति (Executive Powers): जैसा कि पूर्व में बतलाया गया है राष्ट्रपति भारत की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख होता हैं. संघ का शासन राष्ट्रपति के नाम से किया जाता हैं. वह प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों, भारत के महान्यायवादी, विदेशों में राजदूत एवं राज्यों में राज्यपाल नियुक्त करता हैं. राष्ट्रपति भारत के सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायधीश एवं अन्य न्यायधीश नियुक्त करता हैं.

संघ के स्तर के प्रमुख आयोगों जैसे संघ लोक सेवा आयोग निर्वाचन आयोग, वित्त आयोग आदि के अध्यक्ष और सदस्यों को नियुक्त करने का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त हैं. संविधान का अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को क्षमादान का अधिकार प्रदान करता हैं. जिसके अनुसार वह किसी व्यक्ति के दंड को जिसमें मृत्यु दंड भी शामिल हैं.

क्षमा, विलम्बन, निलम्बन अथवा लघुकरण कर सकता है. इन सभी के साथ राष्ट्रपति भारत की तीनों सेवाओं का प्रधान सेनापति भी होता हैं. उसे मंत्रीपरिषद की कार्यवाही के बारे में सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हैं. अनुच्छेद 78 के अनुसार प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य है कि वह राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सभी सूचनाएं उसे प्रदान करें.

हम जानते है कि राष्ट्रपति की यह सारी शक्तियाँ औपचारिक ही हैं. वह सब कार्य मंत्रिपरिषद की सलाह से ही करता हैं. लेकिन विशेष राजनीतिक परिस्थितियों में राष्ट्रपति को विवेक के अनुसार निर्णय करना पड़ता हैं. औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता हैं. लेकिन वह किसी को ऐसे नियुक्त नहीं कर सकता हैं.

संसदीय व्यवस्था में लोकतंत्र में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही प्रधानमंत्री नियुक्त करता हैं. लेकिन जब चुनाव के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो, ऐसे में अनेक बार राष्ट्रपति राजनीतिक आधार पर फैसला लेते हुए दीखते हैं. 1998 में चुनाव के उपरांत भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सबसे बड़ा था. एवं बहुमत के करीब था, फिर भी राष्ट्रपति ने गठबंधन के नेता श्री अटल बिहारी बाजपेयी से अपने दावे के समर्थन में सम्बन्धित राजनीतिक दलों के दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा तथा इससे भी बढ़कर राष्ट्रपति ने वाजपेयी को पद्ग्रहण करने के मात्र 10 दिन के भीतर लोकसभा में विश्वास मत प्राप्त करने को कहा.

राष्ट्रपति की विधायी शक्ति (Legislative Powers)

संसदीय व्यवस्था होने के कारण राष्ट्रपति कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख होने के साथ ही संघीय व्यवस्थापिका अर्थात संसद का भी अंग होता हैं. इस नाते वह अनेक कार्य करता हैं. जिसे राष्ट्रपति के विधायी कार्य कहा जाता हैं. वह संसद का सत्र बुलाता हैं.

उसका सत्रावसान करता हैं. राष्ट्रपति लोकसभा को उसके कार्यकाल से पूर्व ही भंग कर सकता हैं. जिसका उल्लेख अनुच्छेद 85 में हैं. राष्ट्रपति प्रतिवर्ष संसद के दोनों सदनों को संयुक्त रूप से संबोधित करता हैं. जिसे राष्ट्रपति का अभिभाषण कहते हैं.

राष्ट्रपति राज्यसभा में बारह सदस्यों को मनोनीत कर सकता हैं. जो कला, साहित्य, विज्ञान अथवा समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिए व्यक्ति होते हैं. वह आंग्ल भारतीय समुदाय के दो सदस्यों को लोकसभा में मनोनीत कर सकता हैं.

अनुच्छेद 111 के अनुसार कोई भी विधेयक तब तक अधिनियम अर्थात कानून नहीं बनता जब तक उस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर न हो जाए. राष्ट्रपति ऐसे किसी साधारण विधेयक को संसद को लौटाकर पुनर्विचार के लिए कह सकता हैं. लेकिन यदि संसद इसे दुबारा पारित कर राष्ट्रपति के पास भेजे तब राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य होता होता हैं. अतः इसे राष्ट्रपति का सीमित अथवा निलम्बनकारी निषेधाधिकार या वीटो कहते हैं.

संविधान में राष्ट्रपति के लिए ऐसी कोई समय सीमा तय नहीं की गई है, जिसके अंदर ही उसे विधेयक पर फैसला लेना पड़ता हो. वह विधेयक पर हस्ताक्षर न करे एवं न ही उसे पुनर्विचार के लिए संसद को भेजे बल्कि अपने पास ही लम्बित रख दे. ऐसी स्थिति में यह विधेयक पारित नहीं हो सकेगा. इसे राष्ट्रपति का जेबी निषेधाधिकार अथवा पॉकेट वीटो कहते हैं.

जिसका प्रयोग राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने डाक बिल के सन्दर्भ में किया था. इसके अलावा जब संसद किसी भी सदन का अधिवेशन नहीं चल रहा हो, ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता हैं. जो कानून के समान ही प्रभावी होता हैं. इसका वर्णन अनुच्छेद 123 में हैं. यह अध्यादेश संसद के पुनः समवेत होने पर उसके सामने रखा जाएगा और यदि छः सप्ताह में संसद उसे पारित कर विधि न बनाए तब वह अध्यादेश समाप्त माना जाएगा.

भारत के राष्ट्रपति की शक्तियाँ | Powers Of The President Of India

A. सामान्यकालीन शक्तियाँ- (General carpet powers)
  • कार्यकारी शक्तियाँ/कार्यपालिका
  • विधायी शक्तियाँ
  • वित्तीय शक्तियाँ
  • न्यायिक शक्तियाँ
  • कुटनीतिक शक्तियाँ
  • सैन्य शक्तियाँ
B. आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency powers)

कार्यपालिका या कार्यकारी शक्तियाँ (Executive or executive power)

  • भारत के सभी शासन सम्बन्धी कार्य उसके नाम पर किये जाते है.
  • राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है.
  • वह न्यायवादी की नियुक्ति करता है तथा उसके वेतन आदि निर्धारित करता है. महान्यायवादी, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त अपनें पद पर कार्य करता है.
  • यह भारत के महानियंत्रक, महालेखा परीक्षक, मुख्य चुनाव आयुक्त, तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करता है.
  • संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व् सदस्यों की नियुक्ति.
  • सयुक्त राज्यों की लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष व् सदस्यों की नियुक्ति.
  • राज्य में राज्यपालों
  • वित्त आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति.
  • केन्द्रशासित प्रदेशो के प्रशासक की
  • विभिन्न आयोगों का गठन.
  1. अनुसूचित जाति आयोग
  2. अनुसूचित जनजाति आयोग
  3. अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग
  • अन्तर्राज्यीय परिषद की नियुक्ति
  • राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री से किसी ऐसे निर्णय का प्रतिवेदन भेजने के लिए कह सकता है, जो किसी मंत्री द्वारा लिया गया हो लेकिन पूरी मंत्रिपरिषद से इसका अनुमोदन नही किया गया है.

विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

राष्ट्रपति भारतीय संसद का एक अभिन्न अंग है तथा इसे निम्नलिखित विधायी शक्तियाँ प्राप्त है.

  1. संसद का सत्र बुला सकता है अथवा कुछ समय के लिए स्थगित कर सकता है.
  2. लोकसभा को विघटित कर सकता है.
  3. वह संसद के सयुक्त अधिवेशन का आव्हान कर सकता है जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है.
  4. वह प्रत्येक नये चुनाव के बाद तथा प्रत्येक वर्ष संसद के प्रथम अधिवेशन को संबोधित कर सकता है.
  5. वह संसद में लम्बित किसी विधेयक अन्यथा किसी सम्बन्ध में संसद को संदेश भेज सकता है.
  6. यदि लोकसभा के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष दोनों के पद रिक्त हो तो वह लोकसभा के किसी भी सदस्य को सदन की सदस्यता सौप सकता है.

राज्य सभा में (In the Rajya Sabha)

  1. साहित्य विज्ञान कला व समाज सेवा के क्षेत्र में जुड़े अथवा व्यक्तियों में से 12 लोगों को राज्यसभा के लिए मनोनीत करता है.
  2. वह लोकसभा में दो आगल भारतीय समुदाय के व्यक्तियों को मनोनीत कर सकता है.
  3. वह चुनाव आयोग से परामर्श कर संसद के सदस्यों की निर्हता के प्रश्न पर निर्णय कर सकता है.
  4. कुछ विधेयक की पूर्व अनुमति-भारत की संचित निधि से खर्च संबंधी विधेयक अथवा राज्यों की सीमा परिवर्तन या नया नए राज्य के निर्माण संबंधी विधेयक.
  5. जब एक विधेयक संसद द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. तो वह- विधेयक को अपनी स्वीकृति देता है, विधेयक पर अपनी स्वीकृति सुरक्षित रखता है, विधेयक को संसद के पुनर्विचार को लोटा देता है.
  6. राज्य विधायिका द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यपाल जब राष्ट्रपति के लिए विचार सुरक्षित रखता है तब राष्ट्रपति.

a. विधेयक को स्वीकृति देता है.

b. विधेयक पर अपनी स्वीकृति सुरक्षित रखता है.

c. राज्यपाल को निर्देश देता है कि विधेयक को राज्य विधायिका को पुनर्विचार के लौटा सकता है.

अध्यादेश जारी करना-छ माह छ हफ्तों में.

CAG , UPSC वित्त आयोग व अन्य की रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत करता है.

वित्तीय शक्तियाँ

  1. धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है.
  2. वह वार्षिक वित्तीय विवरण को संसद के समक्ष रखता है.
  3. वह राज्यों तथा केंद्र के मध्य राजस्व के बंटवारे के लिए प्रत्येक पांच वर्ष में एक वित्त आयोग का गठन करता है.
  4. भारत की आकस्मिक निधि से व्यय हेतु अग्रिम भुगतान की व्यवस्था राष्ट्रपति की अनुमति से कर सकता है.

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