राजस्थान की संस्कृति पर निबंध | Essay On Rajasthan Culture In Hindi

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राजस्थान की संस्कृति पर निबंध Essay On Rajasthan Culture In Hindi

राजस्थान की संस्कृति पर निबंध Essay On Rajasthan Culture In Hindi

प्रस्तावना– सभ्यता और संस्कृति के विषय में बड़ा भ्रम है. किसी विचार और व्यवहार को निखारना, धोना, मांजना या उसमें उतमोतम गुणों का आधान करना ही संस्कृति हैं.

किसी समाज के विचारों, परम्पराओं, दर्शन, कला, शिल्प, साहित्य व धार्मिक विश्वासों का सामूहिक नाम ही संस्कृति कहा जाता हैं. बहुधा संस्कृति और सभ्यता को एक समझ लिया जाता है.

किन्तु  यह ठीक नहीं हैं. संस्कृति मानव समाज का आंतरिक सतत विकास है तो सभ्यता उसके बाह्य भौतिक जीवन का प्रदर्शन हैं.

राजस्थानी संस्कृति– मरु प्रदेश, राजपूताना और अब राजस्थान का भारतीय सांस्कृतिक मानचित्र पर विशिष्ठ स्थान रहा हैं.

मरुस्थल में फलती फूलती शूरवीरों और राजपुत्रों की यह क्षात्र धर्मी धरा केवल शास्त्रों की झंकार और रणोंन्मादी हुंकारों से ही नहीं गूंजी हैं.

रण के साथ ही रंग की साधना, इस धरती की यह विशेषता रही है, जिसने इसे भारतीय संस्कृति की बहुरंगी माला का मूल्यवान रत्न बना दिया गया हैं.

राजस्थान की सांस्कृतिक विशेषताएं– राजस्थानी संस्कृति की अनेक निजी तथा सामान्य विशेषताएं हैं, जो इस प्रकार हैं.

  • शूरता की साधना– राजस्थान सदा से शूरवीरों की जन्मस्थली रहा हैं. वीरता, स्वाभिमान और बलिदान की भावना इस प्रदेश के कण कण में और मन मन में समाई रही हैं. यहाँ के कवियों ने भी इस भावना पर धार चढ़ाई हैं.

बादल ज्यूँ सुरधनुष बिण, तिलक बीणा दूज पुत
बनो न सोभे मौड़ बिण घाव बीणा रजपूत

यहाँ की माताओं ने पालने में ही पुत्र को अपनी भूमि की रक्षा का प्राण निछावर करने की लोरियां सुनाई हैं. व्यक्तिगत वीरता के प्रदर्शन की उन्मत्तता ने इस धरती पर अनेक निरर्थक रक्तपात भी कराए हैं. तथापि शूर वीरता राजस्थानी संस्कृति का प्रधान गुण हैं.

  • शरणागत रक्षा– यहाँ के शासकों ने शरण में आए शत्रुपक्षीय व्यक्ति की रक्षा में अपना सर्वस्व दांव पर लगाया है. हमीर इस परम्परा की मूर्द्धन्य मणि हैं.
  • जौहर व्रत– यहाँ भी राजस्थानी संस्कृति की निजी विशेषता रही हैं. पतियों के केसरिया बाना धारण करके युद्धभूमि में जाने के पश्चात अपने सतीत्व की रक्षा तथा पत्नीव्रत का पालन करने वाली राजपूत नारियाँ जलती चिता में कूदकर जान दे देती थी, इसी को जौहर कहते हैं.
  • अतिथि सत्कार– राजस्थान अपने उदार आतिथ्य भाव के लिए सदा से प्रसिद्ध रहा हैं. अतिथि बनने पर शत्रुओं तक को उचित सम्मान देना, यहाँ की संस्कृति की विशेषता रही हैं.
  • साहित्य एवं कला प्रेम– राजस्थान में केवल रण की ही साधना नहीं हुई, यहाँ शिल्प, कला और साहित्य को भी भरपूर सम्मान और प्रोत्साहन प्राप्त हुआ हैं. कवियों को राज्याश्रय मिला. अनेक उत्कृष्ट काव्यकृतियों का स्रजन हुआ और आज तक यह परम्परा निर्बाध चली आ रही हैं. यहाँ केवल अभेद्य दुर्ग ही निर्मित नहीं हुए अपितु भव्य आवासों, मन्दिरों, जलाशयों तथा कीर्ति स्तम्भों का भी निर्माण हुआ. लोकगीत, लोकनाट्य, कठपुतली प्रदर्शन, संगीत, नृत्य आदि कलाओं ने भी यहाँ समुचित सम्मान पाया हैं.
  • त्यौहार तथा उत्सव– राजस्थान अपने त्योहारों और उत्सवों के लिए भी प्रसिद्ध हैं. गणगौर तथा तीज जैसे विशिष्ट सांस्कृतिक छाप वाले त्योहारों के साथ यहाँ सभी प्रदेशों में प्रचलित होली, दीपावली, दशहरा, रक्षाबंधन आदि त्यौहार भी उत्साह के साथ मनाये जाते हैं. त्योहारों के अतिरिक्त राजस्थान में अनेक मेले और उत्सव भी मनाये जाते हैं. पुष्कर, करौली, भरतपुर,तलवाड़ा, धौलपुर आदि के उत्सव प्रसिद्ध हैं.
  • धार्मिक प्रवृत्तियाँ– राजस्थान में धर्म के प्रति गहरी आस्था सदा से रही हैं. यहाँ अनेक धर्मानुयायी निवास करते हैं. अनेक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल यहाँ प्रतिष्ठित हैं. धार्मिक अनुष्ठान तथा परम्परागत संस्कारों को भी यथेष्ट महत्व प्राप्त हो रहा हैं.

संस्कृति पर आधुनिक प्रभाव– संस्कृति कोई जड़ अवधारणा नहीं होती. वह परिवेश और परिस्थतियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती.

अन्य भारतीय प्रदेशों की भांति राजस्थानी संस्कृति भी आधुनिकता की घुसपैठ से प्रभावित हुई हैं. लोगों की सोच और शैली में परिवर्तन हुआ हैं. शिक्षा का प्रचार प्रसार हुआ हैं. अनेक रूढ़ियाँ और परम्पराएं शिथिल हुई हैं.

उपसंहार– राजस्थानी संस्कृति पुरानी और परम्परा प्रिय रही हैं किन्तु वह निरंतर विकाशील भी हैं देश तथा विदेश में होने वाले नवीन परिवर्तन से वह अछूती नहीं हैं.

अपनी परम्परागत विशेषताओं की रक्षा करते हुए वह नवीनता की लहरों में भी बह रही हैं आधुनिकता और परम्परा का यह समन्वय राजस्थान की संस्कृति को जीवंत बनाए रखेगा.

Rajasthan Culture In Hindi | राजस्थानी संस्कृति परम्परा एवं विरासत

राजस्थानी संस्कृति हिंदी में Culture of Rajasthan राजस्थानी संस्कृति एक बहती नीरा है, जो गाँव गाँव ढानी, चौपाल, पनघट, महल, झौपड़ी, किले, गढ़ी खेत खलिहान में बहती हुई जन जन रुपी सागर के संस्पर्श से इंद्रधनुषीय छटा बिखेरती हैं.

और अपनी महक के साथ पर्व, मेले, तीज त्योहार, नाट्य, नृत्य, श्रृंगार पहनावा, रीती रिवाज, आचार व्यवहार आदि में प्रतिबिम्बित होती हैं.

तथा जिसे रेत के धोरों के साथ साथ वायुमंडल, वसुंधरा तथा रोम रोम में उल्लसित एवं तरंगित अनुभूत किया जा सकता हैं. राजस्थानी संस्कृति समष्टिगत, समन्वयात्मक एवं प्राचीन हैं.

भौगोलिक विविधता एवं प्राकृतिक वैभव ने इसे और आकर्षक बनाया हैं. वस्तुतः राजस्थानी संस्कृति लोक जीवन को प्रतिनिधित्व करने वाली संस्कृति हैं.

पधारों म्हारे देश के निमंत्रण की संवाहक राजस्थानी संस्कृति सांसकृतिक पर्यटन की पर्याय हैं. तैतीस जिलों को अपने आंचल में समेटे राजस्थान की धरती सांस्कृतिक परम्पराओं का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करती हैं.

राजस्थान की सांस्कृतिक परम्पराएं विरासत से जुड़े स्थल, प्रकृति एवं वन्यजीव की विविधता तथा दैदीप्यमान इतिहास पर्यटक के खुला आमंत्रण हैं.

सम्रद्ध लोक संस्कृति के परिचायक तीज त्योहार उमंग के प्रतीक मेले, आस्था और विश्वास के प्रतीक लोक देवता, फाल्गुन की मस्ती में नृत्य करती आकर्षक परिधान से युक्त महिलाएं पर्यटकों को चमत्कृत करने के लिए पर्याप्त हैं. Rajasthan Culture.

धरती धोरा री की झिलमिलाती रेत एवं गूंजता सुरीला लोक संगीत पर्यटक को अभिभूत करने वाला होता हैं. राजस्थान की संस्कृति एवं परम्परा की मुख्य बात यह है कि राजस्थान के जनमानस की विशालता ने जिस प्रकार सभी मान्यताओं और आस्थाओं को फलने फूलने दिया,

उसी प्रकार उनके अनुयायियों के साथ भ्रात भाव रखा. अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह विश्वभर के श्रद्धालुओं का आस्था एवं विश्वास का केंद्र हैं.

जिसमें न धर्म की पाबंदी है न जाति की, न देश की न, सम्प्रदाय की. हिन्दू मुसलमान, सिक्ख एवं अन्य धर्मावलम्बियों द्वारा दरगाह पर अकीदत फूल चढ़ाते हैं, मनौतियाँ मानते हैं.

सूफीमत के संदेशवाहक ख्वाजा साहब के दरबार की दरबार के प्रखर कव्वाल और गायक थे. शंकर शम्भु कव्वाल. आज अजमेर सूफी मत का अंतर्राष्ट्रीय प्रमुख तीर्थ हैं. पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले के नाकौड़ा भैरव जैनियों के पूजनीय है ही परन्तु सनातनियों के मान्य भी हैं.

मेवाड़ के केसरियाजी जैनियों के मान्य है और सनातनियों के भी हैं. यही स्थिति उन लोक देवताओं की हैं. जिन्होंने वहां के सुदूर अंचलों में स्थित आदिवासियों, जनजातियों एवं किसानों को सदियों से आस्था के सूत्र में बांधे रखा.

रुणिचा में चिर समाधि में लीन रामदेव, जिस प्रकार हिन्दुओं के रामदे है उसी प्रकार मुसलमानों के भी रामसा पीर हैं. आज भी बाबा रामदेव उत्तर भारत के प्रमुख पूजनीय देवताओं में से एक हैं.

पाबूजी राठौड़ की गोरक्षा हेतु प्राणहुती सम्बन्धी लोक गाथा लाखों को भाव विभोर करती हैं. लोक गायकों के द्वारा पाबूजी की फड़ को गेय में बांचने की प्रथा मध्यकाल से चली आ रही हैं.

राजस्थान के मध्यकालीन संतों एवं उनके अनुयायियों द्वारा स्थापित मठों, रामद्वारों, मेलों, समागमों तथा यात्राओं के माध्यम से सांस्कृतिक एवं भावनात्मक एकता के यशस्वी प्रयास का सूत्रपात हुआ.

संतों की मानव कल्याण की कामना तथा प्रेमाभक्ति के सिद्धांतों ने यहाँ के समाज में भावनात्मक एकता के आयाम के नए पटल खोले हैं. मन मिलाने का जो प्रयास संतों द्वारा जिस सहजता से किया गया वह स्तुत्य है और यहाँ की संस्कृति की पहचान हैं.

राजस्थानी लोग अपनी संस्कृति और परम्परा पर गर्व करते हैं. उनका दृष्टिकोण परम्परागत हैं. यहाँ साल भर मेलों एवं पर्व त्योहारों का ताँता लगा रहता हैं.

यहाँ एक कहावत प्रसिद्ध हैं. सात वार नौ त्योहार. राजस्थान के मेले और पर्व त्योहार रंगारंग एवं दर्शनीय होते हैं. ये पर्व त्योहार लोगों के जीवन उनकी खुशियाँ और उमंग के परिचायक हैं.

प्रायः इन मेलों और त्योहारों के मूल में धर्म होता है, लेकिन इनमें से कई मेले और त्योहार अपने सामाजिक और आर्थिक महत्व के परिचायक हैं. मनुष्य और पशुओं की अंतनिर्भरता को दर्शाने वाले पशुमेले राजस्थान की पहचान हैं.

पुष्कर का कार्तिक मेला, परबतसर और नागौर के तेजाजी का मेला, जो मूलतः धार्मिक हैं. राज्य के बड़े पशु मेले माने गये हैं. राजस्थान में तीज को त्योहारों में पहला स्थान दिया गया हैं.

राजस्थान में एक कहावत प्रसिद्ध हैं. तीज त्योहारा बावरी ले डूबी गणगौर. इसका अर्थ है कि त्योहारों के चक्र की शुरुआत श्रावण महीने की तीज से होती हैं.

तथा साल का अंत गणगौर के साथ होता हैं. गणगौर धार्मिक पर्व होने के साथ ही राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं. तीज, गणगौर जैसे पर्व महिलाओं के महत्व को भी रेखांकित करते हैं.

राजस्थान में पुरा संपदा का अटूट खजाना हैं. कहीं पर प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की छटा है तो कहीं हड़प्पा संस्कृति के पूर्व के प्रबल प्रमाण एयर कहीं प्राचीनकाल में धातु के प्रयोग के साक्ष्य, कहीं गणेश्वर का ताम्र वैभव तो कहीं प्रस्तर प्रतिमाओं का इतिहास कहीं मरणमूर्तियों और म्रदभांडों से लेकर धातु प्रतिमानों तक का शिल्पशास्त्र बिखरे पड़े हैं.

उपासना स्थल, भव्य प्रासाद, अभेद्य दुर्ग एवं जीवंत स्मारकों का संगम आदि राजस्थान के कस्बों, शहरों एवं उजड़ी बस्तियों में देखने को मिलता हैं.

आमेर, जयपुर, जोधपुर, बूंदी, उदयपुर, शेखावटी के मनोहारी विशाल प्रासाद तथा रणकपुर, ओसियां, देलवाड़ा, झालरापाटन के उत्कृष्ट कलात्मक मंदिर और जैसलमेर की पटवों की हवेलियाँ इत्यादि ऐसे कुछ प्रतीक हैं, जिन पर राजस्थान कलाकारों के हस्ताक्षर हैं.

राजस्थान के ख्यातनाम दुर्गों में चित्तौड़, जैसलमेर, रणथम्भौर, गागरोन, जालौर, सिवाना तथा भटनेर का दुर्ग ऐतिहासिक दृष्टि से प्रसिद्ध रहे हैं.

इनके साथ शूरवीरों के पराक्रम, वीरांगनाओं के जौहर की रोमांचक गाथाएं जुड़ी हुई हैं, जो भारतीय इतिहास की अनमोल धरोहर हैं. राजस्थान के जनमानस को ये दुर्ग और इनसे जुड़े आख्यान सदा से ही प्रेरणा देते आए हैं.

वीरता एवं शौर्य के प्रतीक ये गढ़ और किले अपने अनूठे स्थापत्य, विशिष्ठ सरंचना, अद्भुत शिल्प एवं सौन्दर्य के कारण दर्शनीय हैं.

राजस्थान की चित्रशैलियाँ भी इसके वैभव का प्रमाण है. बूंदी, नाथद्वारा, किशनगढ़, उदयपुर, जोधपुर, जयपुर आदि राजस्थान की चित्रकला के रंगीन पृष्ट हैं.

जिनमें श्रृंगारिकता के साथ साथ लौकिक जीवन की सशक्त अभिव्यक्ति हुई हैं. राजस्थानी शैली गुजराती एवं जैन शैली के तत्वों को अपने में समेटकर मुगल शैली में समन्वित हुई हैं.

राजस्थान के वीर तथा वीरांगनाओं ने जहाँ रणक्षेत्र में तलवारों का जौहर दिखाकर विश्व इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया हैं, वहीँ भक्ति और आध्यात्मिक क्षेत्र क्षेत्र में भी राजस्थान पीछे नहीं रहा हैं.

यहाँ मीरा एवं दादू भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत रहे हैं. भक्ति गीतों में जहाँ एक ओर लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिष्ठा मिली है वही व्यक्ति स्वातंत्र्य का स्वर फूटा और लोकपरक सांस्कृतिक चेतना उजागर हुई हैं.

इस जनचेतना का परिपाक हमें राजस्थान के मेलों और त्योहारों में दिखाई देता हैं. यहाँ के मेलों और त्योहारों के आयोजन में सम्पूर्ण लोकजीवन पूरी सक्रियता के साथ शामिल होकर अपनी भावनात्मक आस्था का परिचय देता हैं.

लोकनृत्य राजस्थानी संस्कृति के वाहक हैं. यहाँ के लोकनृत्यों में लय, ताल, गीत, सूर आदि का एक सुंदर और संतुलित सामजस्य देखने को मिलता हैं.

गेर, चंग, गीदड़, घूमर, ढोल आदि नृत्य राजस्थान के जनजीवन की संजीवनी बूटियां हैं. इस बूटी की घूंटी को लेकर राजस्थान के जनजीवन और लोकमानस ने भूखा नंगा रहते हुए भी मस्ती और परिश्रम से जीना सीखा हैं.

यह दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि राजपूताने में अनेक वीर, विद्वान् एवं कुलाभिमानी राजा, सरदार आदि हुए. जिन्होंने अनेक युद्धों में अपनी आहुति देकर अपनी कीर्ति को अमर बना दिया. राजपूत जाति की वीरता विश्व प्रसिद्ध हैं.

चित्तौड़, कुम्भलगढ़, मांडलगढ़, अचलगढ़, रणथम्भौर, गागरोन, भटनेर, बयाना, सिवाणा, मंडोर, जोधपुर, जालौर, आमेर आदि किलो तथा अनेक प्रसिद्ध रणक्षेत्रों में कई बड़े बड़े युद्ध हुए, जहाँ अनेक वीर राजपूतों ने वहां की मिट्टी का एक एक कण अपने रक्त से तर किया.

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