मंगलाचरण इन संस्कृत | Mangalacharan In Sanskrit

मंगलाचरण इन संस्कृत Mangalacharan In Sanskrit: उन पदों या श्लोकों या पदों को मंगलाचरण कहा जाता है जो किसी शुभ कार्य की शुरुआत से पूर्व मंगल कामना हेतु पढ़ा या गाया जाता हैं. किसी ग्रंथ, जागरण, प्रार्थना, कथा वाचन आदि से पूर्व स्तुति निमित्त मंगलाचरण के श्लोक पढ़े जाते हैं. जैसे भगवान शिव, गणेश जी या माँ सरस्वती की वंदना स्तुति आदि का पाठ करना मंगलाचरण कहलाता हैं.

Mangalacharan In Sanskrit Hindi

मंगलाचरण इन संस्कृत Mangalacharan In Sanskrit

अथवा

सरस सिरायकी गीता मंगलाचरण

जैसा कि हमने पूर्व में जाना हैं, किसी बड़े ग्रंथ की रचना से पूर्व उसकी सफलता समाप्ति के लिए मंगलाचरण प्रार्थना की जाती हैं, जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने लगभग अपने सभी ग्रंथों में गणेश जी और शिव भगवान की स्तुति इस तरह की हैं.

गाइए गनपति जगवन्दन
शंकर सुवन भवानी के नन्दन ॥
सिद्धि सदन गजवदन विनायक ।
कृपा सिन्धु सुन्दर सब लायक ॥
मोदक प्रिय मुद मंगल दाता ।
विद्या बारिधि बुद्धि विधाता ॥
मांगत तुलसिदास कर जोरे ।
बसहिं रामसिय मानस मोरे ॥


संस्कृत में मंगलाचरण

वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभा
निर्विध्न करू मै देव, सर्वकार्येषु समप्रभा.
गजानंद भूतगणादिसेवितम, कपितथजम्बूफलचारूभक्षणं
उमासुत शोकविनाश्कारकम नमामि विध्नेश्वर पाद पंकजम.
कर्पूरगौंर करुणावतार संसारसार भुजगेन्द्रहारम.
सदा वसंत हर्दियारविन्द, भव भवानीसहित नमामि.
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च संखा त्वमेव.
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्व मम देव देव
लोकाभिराम रणरंगधीर, राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्
कारुप्यरूप करुणाकरत, श्री रामचन्द्र शरण प्रपधो
नीलाम्बुजश्यामल कोमलांग,सीतासमारोपितवामभागम
पाणौ महासायकचारुचाप, नमामिरामं रघुवंशनाथम्
अतुलित बलधामं हैम शैलाभदेहं, दनुजवन कृशानु ज्ञानिनामगर्गन्यम
सकलगुण निधानं वानराणाधीशम, रघुपतिप्रियभक्त वात जात नमामि
मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमता वरिष्ठम.
वातात्मजं भुजनशयन पदमनाभ शुभागंम
लक्ष्मीकांत कमलनयन योगिभिधर्योनगम्यम
वन्दे विष्णु भयभयहर सर्व लोकैकनाथं
करारविन्देन पदारविंद, मुखारविंदेंविनिवेशयन्तम
वटस्य पत्रस्य पुतेश्यान बालं मुकुंद मनसा स्मरामि
वंशी विभूषित करात्रवनीरदाभात पीताम्बरादारुणंविम्बफलाध्रोष्ठात
पूर्णेंदुसुंदरमुखादरविन्दनेत्रात कृष्णातत्पर किमपि त्तव्मंह न जाने
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्ष; स्थले कौस्तुभम
नासाग्रे वरमोक्ति कं करतले, वेणु; करे कंकणम
सर्वागे हरिचंदन सुललित, कंठे च मुक्ताविला
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूड़ामणि;
मूक करोति वाचालं पंगु लघयते गिरिम्
यत्कृपा तमहं वंदे परमानन्दमाधवं

कालिदास ने कुमार-सम्भव जैसे ग्रंथ की शुरुआत मंगलाचरण से न करके उक्त पंक्तियों से ग्रंथ की रचना आरम्भ की हैं.

अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।

अर्थात्– भारतवर्ष की उत्त्तरी दिशा में महान हिमालय पर्वत हैं.


कवि बिहारी ने अपने काव्य ग्रंथ शृंङ्गारात्मक की शुरुआत में भगवान कृष्ण और राधा का स्मरण उक्त पंक्तियों में किया हैं.

मेरी भव-बाधा हरौ राधा नागरि सोइ।
जा तन की झाँईं परैं स्यामु हरित दुति होइ॥

प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथों के मंगलाचरण

यहाँ हम संस्कृत के विद्वानों द्वारा रचित विख्यात काव्य ग्रंथों की शुरुआत के मंगलाचरण और उसके अर्थ इस प्रकार हैं.

महाभारत मंगलाचरण

ऋषि व्यास ने महाभारत की शुर्यात में नर नारायण, नरोत्तम माँ सरस्वती और स्वयं को नमस्कार करते हुए इन प्रसिद्ध श्लोक के साथ इसका शुभारम्भ किया हैं.

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।।

महाभारत के इस मंगलाचरण श्लोक में व्यास ने नारायण श्री कृष्ण भगवान और नरोत्तम अर्जुन को कहा हैं, कही कही नर नारायण के अवतार के रूप में भी उल्लेख मिलता हैं.

रामायण मंगलाचरण

अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥

रामायण के सूर्यसिद्धांत के आरम्भिक पद में रचनाकार ने ब्रह्म का स्मरण करते हुए उन्हें अचिन्त्य, अव्यक्तरूप, निर्गुण, गुणात्मन और समूचे संसार का पालनहार कहा हैं.

श्रीमद्भागवत्पुराण का मंगलाचरण

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतः चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् ।
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः ।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा ।
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि । १ ॥

गणितसारसंग्रह का मंगलाचरण

अलङ्घ्यं त्रिजगत्सारं यस्यानन्तचतुष्टयम् ।
नमस्तस्मै जिनेन्द्राय महावीराय तायिने ॥ १ ॥
सङ्ख्याज्ञानप्रदीपेन जैनेन्द्रेण महात्विषा ।
प्रकाशीितं जगत्सर्वं येन तं प्रणमाम्यहम् ॥ २ ॥

रामचरितमानस का मंगलाचरण

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।१।।

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्॥२॥

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2 comments

  1. मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमता वरिष्ठम.
    वातात्मजं भुजनशयन पदमनाभ शुभागंम
    लक्ष्मीकांत कमलनयन योगिभिधर्योनगम्यम
    वन्दे विष्णु भयभयहर सर्व लोकैकनाथं

    ye kaun sa mantra hai bhai yadi likh rahe ho to sahi mantra likho.

    1. Ye Galt mantra h …bajrang Bali aur Vishnu ji ka mantra mixup Kar the ho …
      Agar Aapko nhi aata to comment Mai Puch sakte h Q jabardasti Galt mantra bta the h…

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