Essay On Sita In Hindi | माता सीता पर निबंध

Essay On Sita In Hindi माता सीता पर निबंध : भारतीय संस्कृति ने स्त्री को देवी माना हैं. समस्त देवताओं से पूर्व उनका नाम यथा उमा शंकर, लक्ष्मी नारायण, सीताराम के जरिये उन्हें अर्द्धांगिनी माना हैं. हमारे शास्त्रों में कहा गया हैं किजहाँ नारियों का सम्मान होता हैं वहां देवता वास करते हैं. दुर्गा, सरस्वती, पार्वती और मैया सीता को भारतीय संस्कृति की परिचायक देविया मानी गई हैं. सीता भगवान राम की धर्म पत्नी एवं पतिव्रता नारी थी. जीवन में तमाम परेशानियों के उपरान्त राम पर विश्वास और जीवन संगिनी के रूप में आदर्श नारी का चरित्र प्रस्तुत करती हैं. Essay On Sita In Hindi में आज हम माता सीता के बारे में इस निबंध में जानेगे.

माता सीता पर निबंध Essay On Sita In Hindi

माता सीता पर निबंध Essay On Sita In Hindi

माता सीता पर निबंध 1

हिन्दू धर्म और हमारे प्राचीन इतिहास में एक से बढाकर एक महान देविया हुई है. जिन्हें हम पूजते है. उन्ही में से एक है. माता सीता जो भगवान् राम की धर्म पत्नी थी. माता सीता दैवीय तथा मानवीय दोनों रूपों में लोकप्रिय है.

देवी सीता को अनेक नामो से जाना जाता है. जिसमे वैदेही, जानकी, मैथलैयी, भगवती, पृथ्वी पुत्री, सिया आदि सीता माता के प्रमुख नाम है. प्राचीन मान्यताओ के अनुसार माता सीता का जन्म पृथ्वी की कोख में हुआ है.

सीताजी का पालन पोषण सुनैना तथा राजा जनक ने किया. जिसे हम उनके माता पिता मानते है. सीता में अनेक क्षत्रिय गुण थे. सीता बुद्धिमान और साहसी महिला थी. देवी सीता व्य्वस्क हो जाने पर पिता जनक ने घोषणा की ओर सभी को सीता के स्वयवर में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया.

सीता के स्वंयवर में अनेक राजा महाराजाओ ने भाग लिया. जिसमे धनुष को तोड़ने की शर्त रखी है. इसमे भगवान श्रीराम ने इस शर्त में जीत गए. और राम का विवाह सीता के साथ सम्पन्न हुआ.

लंकापति रावण की नजर सीता पर थी. जिस कारण वह सीता को अपना बनाना चाहता था. लेकिन स्वंयवर में रावण शर्त को हार जाने के कारण रावण का ये सपना सपना ही रह गया.

राम अपनी सौतेली माँ के कहने पर अयोध्या को छोड़कर वनवास के लिए चले गए. वनवास में रावण ने सीता का हरण कर लिया. जिसके बाद राम और लक्ष्मण सीता की खोज में निकल पड़ते है. लम्बी खोज के बाद सीता को ढूंढ लेते है.

राम को रावण वचन देता है. कि यदि सीता चाहिए, तो मुझे हरा कर ले जाओ. राम अपने वचनों चलकर रावण का वध कर सीता को वापस अयोध्या लाते है. इस ख़ुशी में सभी दीपक जलाते है. जिसे अज हम दीपावली के पर्व के रूप में मनाते है. अयोध्या वापसी के बाद लोगो की सुनी सुनाई बातो पर राम सीता को छोड़ देते है. तथा सीता फस्म हो जाती है.

Essay On Sita In Hindi | माता सीता पर निबंध 2

रामायण और  रामचरितमानस में सीता राम की कथा का विस्तृत  उल्लेख मिलता हैं. वे मिथिला के  राजा जनक की सबसे बड़ी बेटी थी.  सीता के युवा होने पर  उनके  विवाह के लिए स्वयंवर रचा  गया, जिसमें शर्त यह थी कि शिव धनुष को उठाने वाला राजकुमार ही सीता से विवाह कर सकेगा.

आखिर श्रीराम ही थे जिन्होंने शिव धनुष को उठाया. स्त्री व पतिव्रता धर्म की पालना करने वाली श्रेष्ट नारियों में सीता की गिनती होती हैं, इन्हें लक्ष्मी का अवतार तथा सौभाग्य की देवी के रूप में भी जाना जाता हैं.

नामसीता
उपनामवैदेही तथा जानकी
माता, पितासुनैना, जनक
वंशगोत्र निमी
रूपलक्ष्मीवावार (अवतार)
कालरामायण काल
संतानलव और कुश
पतिश्रीराम
मन्त्रॐ सीताय नमः
पर्वसीता नवमी

सीता कौन थी जन्म कहानी ? (Who is Devi Sita Birth Story)

सीता माता के जन्म के सम्बन्ध में दो कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें कौन सी अधिक प्रमाणित है इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता हैं. आम धारणा के अनुसार माना जाता हैं राजा जनक के खेत में हल जोतते समय एक पेटी निकली.

उस पेटी में सीता थीमैथिलि में हल को सीत कहते हैं इसलिए इन्हें सीता या जनकसुता जानकी, जनकात्मजा कहते हैं. भूमि से उत्पन्न होने के कारण इनकी माता पृथ्वी मानी जाती हैं जिसके कारण सीताजी को भूमिपुत्री या भूसुता भी कहते हैं.

एक अन्य कथा के अनुसार माता सीता वेदवती के अगले जन्म के रूप में रावण व उसकी पत्नी मन्दोदरी की बेटी के रूप में रावण से बदला लेने के लिए उत्पन्न हुई. इसके पीछे कारण यह बताया जाता हैं कि वेदवती नामक सुंदर व सुशील कन्या विष्णु की परम भक्त थी वह उनसे विवाह करना चाहती थी.

इसी के लिए उसने संसार का त्याग कर वन में घोर तपस्या करने लगी. एक दिन रावण की नजर उस पर पड़ी तो वह उसके रूप का मोहित हो गया तथा उसके साथ दुर्व्यवहार करना चाहा. तो उसने स्वयं को यज्ञ की अग्नि में आहूत करते हुए रावण को श्राप दिया कि वे अगले जन्म में उनकी बेटी बनकर आएगी तथा उसकी मृत्यु का कारण बनेगी.

ऐसी मान्यता हैं कि कुछ ही समय बाद मन्दोदरी के गर्भ से एक सुंदर पुत्री ने जन्म लिया, मगर रावण ने अपने श्राप से भय से उसे समुद्र में बहा दिया. जलदेवी ने उस कन्या को बचाकर पृथ्वी को सौप दिया, तथा पृथ्वी ने सीता को जनक के घर बेटी के रूप में उन्हें सौप दिया.

सीता का बचपन और विवाह (Sita’s Childhood and Marriage)

बचपन से ही सीता में बुद्धिमान्, साहसी तथा अलौकिक गुण विद्यमान थे. उनके बल व तेज का कोई सानी नहीं था वह एक हाथ से शिव धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा लेती थी. विवाह की आयु होने पर सीताजी के पिता ने समस्त राजाओं को न्यौता देकर स्वयंवर रचाया तथा शिव धनुष को उठाने वाले महाबली यौद्धा से उनकी शादी होगी, यह शर्त रखी गई.

स्वयंवर में देश विदेश के हजारों राजकुमार आए थे. अयोध्या नरेश दशरथ जी के पुत्र भगवान राम अपने गुरु विश्वामित्र जी व लखन के साथ स्वयंवर में हिस्सा लेने आए थे. प्रभु तथा मैया सीता का प्रभात में एक दूजे को देखने का अवसर मिल गया था.

स्वयंवर के आयोजन में बारी बारी से सभी वीरों ने अपनी ताकत का परिचय दिया मगर वह उसे हिला तक नहीं पाए, लगभग सभी परम शक्तिशाली यौद्धा जब धनुष को हिला नहीं पाए तो जनक को यह चिंता खाने लगी कि कही मेरी बेटी अविवाहित ही नहीं रह जाए,

तभी सरल सौम्य, परम तेजस्वी भगवान राम एक पल में शिव धनुष को तोड़ डालते हैं. शिवजी के धनुष के टूटने की गर्जना से पृथ्वी कम्पित हो उठती हैं तथा परशुराम जी बेहद क्रोध में सभा में आते हैं. अपनी विनम्रता से प्रभु राम परशुराम के क्रोध को शांत करते हैं तथा राम सीता का विवाह सम्पन्न होता हैं.

रामायण सीता हरण की कहानी (Ramayan Sita Haran Story or Katha In Hindi)

राम और सीता विवाह सम्पन्न होने के बाद अयोध्या नगरी लौटे, कुछ समय तक उनका वैवाहिक जीवन सुख से बीता, मगर जब भगवान राम के राज्याभिषेक का प्रश्न आया तो भरत की माता कैकेयी ने दशरथ से मांगे अपने दो वचन पूर्ण करने को कहा, उनका पहला वचन राम को 14 वर्ष का वनवास तथा भरत को राजा बनाना.

प्रभु राम ने अपने पिताजी के वचन की पालना करते हुए सीता व भाई लक्ष्मण के साथ वन को चले जाते हैं. वहां रावण की बहिन सूर्पनखा के साथ लक्ष्मण की कहासुनी के बाद रावण सोने का हिरण बनाकर सीता की कुटियाँ के आगे से भेजते हैं सीता हिरन को लाने के लिए कहती हैं राम हिरण का पीछा करते हुए काफ़ी दूर निकल जाते हैं तब रावण साधू के वेश में आकर सीता का हरण कर लेता हैं.

सीता हरण की कथा [Story of Seeta Haran]

साधू के वेश में रावण लक्ष्मण रेखा को पार कर भिक्षा देने के लिए कहता हैं जैसे ही सीता रावण के पास आती हैं वह अपने असली रूप में आकर सीता का हरण कर लेता हैं. पुष्पक विमान से समय सीता ने अपनी चूड़ियाँ व कुछ चिह्न नीचे की तरफ फेके थे ताकि राम को पता चल सके कि इस दिशा में सीता को लेकर कोई गया. लंका जाते समय रावण का मुकाबला जटायू पक्षी से होता हैं वह सीता को बचाने के लिए अपनी जान दे देता हैं.

अन्तोगत्वा रावण सीता को लंका में ले जाकर राक्षसों के कड़े पहरे में अशोक वाटिका में छोड़ देता हैं. दूसरी तरफ जब राम व लखन कुटियाँ में वापिस आते हैं तो सीता को न देखकर व आवाजे देते हुए उनकी खोज में लग जाते हैं.

वहीँ उन्हें सीता के फेके हुए चिह्न मिल जाते हैं जिसके बाद के सुग्रीव व हनुमान से उनका मिलन होता हैं बलि के वध के बाद भगवान राम हनुमान को सीता का पता लगाने के लिए भेजते हैं. सात समन्दर पार हनुमान जी चक्कर लगाने के बाद सीता को अशोक वाटिका में पाते हैं.

तथा उन्हें राम की निशानी देकर रावण के सिपाहियों के हाथो कैद होकर रावण की शक्ति का अनुमान लगाने दरबार में जाते हैं जिसके पश्चात उनकी पूछ में आग लगाई जाती हैं, हनुमान जी पूछ की आग से सोने की लंका को जलाकर सीता की खोज कर लेने के बाद राम से मिलते हैं.

सीता के लिए रावण से युद्ध

इतिहास में अधिकतर युद्धों में स्त्री ही कारण रही. संभवतः रावण के विनाश तथा राम के साथ युद्ध का कारण सीता ही थी. अपने पूर्वजन्म के श्राप की पूर्ति के लिए उन्होंने राम से युद्ध में रावण को मरवा दिया. कहा जाता हैं कि जब राम युद्ध में विजयी हुए तो उन्होंने सीता को अपनाने से मना कर दिया. तब अग्नि परीक्षा के द्वारा स्वयं को उन्होंने पतिव्रता साबित किया.

अयोध्या आने के बाद लोग सीता के बारे में अपमानजनक शब्दों से सम्बोधित करने लगे, एक राजा के रूप में राम ने प्रजा के हित में सीता का त्याग कर दिया तथा लक्ष्मण को उन्हें तपोवन में छोड़ आने के लिए कहा, उस समय सीता जी गर्भवती थी.

वहां वे गुरु विशिष्ट के आश्रम में रहने लगी यही लव कुश का जन्म हुआ. तथा राम के अश्वमेध यज्ञ का घोडा इन्ही सीता पुत्रों ने रोक लिया तथा पिता पुत्र के युद्ध की स्थिति में विशिष्ट जी ने आकर सम्पूर्ण सच्चाई बताई.

उसी समय सीता ने पृथ्वी माँ से विनती कि यदि मैं पवित्र हूँ तो जमीन फाड़कर मुझे जगह दे. तभी वे पृथ्वी के गर्भ में माँ की गोद में समा गई. इस प्रकार सीता माता ने अपना बलिदान दे दिया. और अपनी पवित्रता का प्रतीक छोड़ा.

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