बेरोजगारी पर निबंध | Essay on Unemployment in Hindi

Essay on Unemployment in Hindi प्रिय विद्यार्थियों आपका स्वागत हैं आज हम तेजी से बढ़ती बेरोजगारी पर निबंध आपकों यहाँ बता रहे हैं. छोटी बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को हिंदी में बेरोजगारी की समस्या पर अनुच्छेद भाषण निबंध विभिन्न शब्द सीमा में बेरोजगारी का निबंध 5, 10 लाइन, 100, 200, 250, 300, 400, 500 शब्दों में कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 के स्टूडेंट्स के लिए निबंध लिखने को कहा जाता हैं. आप इस लेख की मदद से एक अच्छा निबंध लिख पाएगे.

बेरोजगारी पर निबंध | Essay on Unemployment in Hindi

बेरोजगारी पर निबंध

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बेकारी अथवा बेरोजगारी आज हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या हैं. Unemployment का अर्थ होता है काम करने की इच्छा करने वाले लोगों को  काम का न मिलना बेरोजगारी कहते हैं. एक युग था

जब हमारा देश सोने की चिड़ियाँ कहा जाता हैं सभी लोगों के पास कोई न कोई काम था लेकिन हजारो सालों की गुलामी तथा विदेशी सिस्टम को आयात कर अपने काम धंधों को खोकर अब काम कम और लोगों की कतार लग गई हैं. युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी पर छोटा बड़ा निबंध बता रहे हैं.

बेरोजगारी निबंध 1 (400 शब्द)

प्रस्तावना– वर्षों तक पराधीनता का कष्ट झेलकर जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तो तब अनेक समस्याएं सामने आई. प्रारम्भ में शरणार्थी समस्या, औद्योगिक विकास की समस्या और रियासतों के एकीकरण की समस्या प्रधान थी.

लेकिन अप्रत्याशित जनसंख्या वृद्धि होने से बेरोजगारी की समस्या इतनी व्यापक रूप से उभरी कि इसका समाधान अभी तक नहीं हो पाया हैं. वर्तमान में नगरों में शिक्षित तथा ग्रामीण क्षेत्र में अशिक्षितों की बेकारी का भयंकर रूप देखा जा सकता हैं.

बेरोजगारी एक जटिल समस्या- बेरोजगारी की समस्या व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को भयंकर रूप से प्रभावित कर रही हैं. देश के नवयुवक निराश होते जा रहे हैं. सामाजिक जीवन में रहन सहन के स्तर में गिरावट होती जा रही हैं. भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा हैं.

रिश्वतखोरी और दुराचार को प्रोत्साहन मिल रहा हैं. बेरोजगारी से युवावर्ग में भयंकर असंतोष पनप रहा हैं. जिससे देश में आंदोलन की प्रवृत्तियां अशांति और अराजकता का प्रसार हो रहा हैं.

बेरोजगारी के कारण- इस समस्या के समाधान के लिए इसके कारणों और निराकरण के उपायों पर विचार करना सार्थक सिद्ध हो सकता हैं. इस समस्या के मुख्यतया ये कारण है-

जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि, गलत आरक्षण नीति, रोजगारोन्मुख शिक्षा का अभाव आदि. इसके अलावा लघु कुटीर उद्योगों का हास तथा मशीनीकरण का अत्यधिक प्रचार भी बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण हैं.

समस्या के समाधान के उपाय- बेरोजगारी की इस भयानक समस्या के समाधान हेतु उक्त कारणों का निवारण करना जरुरी हैं. इस दिशा में हमारा सर्वप्रथम कार्य बढ़ती हुई जनसंख्या को नियंत्रित करना व रोकना होगा.

परिवार नियोजन और विवाह की आयु सीमा में वृद्धि कर इस समस्या का कुछ निवारण करने में सफल हो सकते हैं.

लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास करना होगा. कृषि उत्पादन को बढाने के लिए भी प्रयत्न करना होगा. मशीनीकरण के विकास को भी तीव्र गति से प्रसारित करना होगा.

शिक्षा प्रणाली में भी क्रांतिकारी परिवर्तनों के द्वारा उसे व्यवसायोंन्मुखी बनाकर स्वावलम्बन तथा स्वरोजगार कस प्रसार करना जरुरी हैं. देश में ऐसे आर्थिक कार्यक्रम लागू किये जाए, जिनमें अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध हो सके.

उपसंहार- इस प्रकार हम समस्या के समाधान के लिए सरकारी और गैर सरकारी सभी स्तरों पर प्रयत्न किये जाने की आवश्यकता हैं.

इस समस्या के समाधान के लिए जनता का सहयोग सबसे वांछनीय हैं. राष्ट्रव्यापी समस्या मानकर दृढ संकल्प से सभी इसके समाधान में जुट जाए तो कोई शक्ति इसमें बाधक नहीं हो सकती.

बेरोजगारी निबंध 2 (500 शब्द)

पढ़ लिखकर रोजगार की तलाश में हैं जो
बेकार युवक कैसे हिंदोस्ता उठायेगे.

भारत में बेरोजगारी एक अनार सौ बीमार की मूर्तिमान कहानी हैं. शिक्षा संस्थानों से प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में डिग्री और डिप्लोमा लेकर निकलने वाले युवाओं की भीड़ के लिए नौकरियाँ और रोजगार कहाँ से आए, देश में करोड़पतियों और अरब पतियों की संख्या बढ़ रही हैं.

देशी कम्पनियाँ विदेशी कपनियों का अधिकरण कर रही हैं. विदेशी कम्पनियाँ देश में निवेश कर रही हैं. भारत महान आर्थिक शक्ति बनने जा रहा हैं.

दूसरी ओर इस महान भारत में करोड़ो लोग बीस पच्चीस रुपये रोज पर जीवन बिताने को मजबूर है सपनों से सच्चाई को नहीं ढका जा सकता हैं.

भारत में बेरोजगारी दिशा व दशा– देश में बेरोजगारी के कई स्वरूप देखने को मिलते हैं. एक हैं आंशिक अल्पकालिक बेरोजगारी और दूसरी पूर्ण बेरोजगारी. आंशिक बेरोजगारी गाँवों में अधिक देखने को मिलती हैं.

वहां फसल के अवसर पर श्रमिकों को काम मिलता हैं. शेष समय वे बेरोजगार रहते हैं. निजी प्रतिष्ठानों में कर्मचारी की नियुक्ति अनिश्चितता से पूर्ण रहती हैं.

बेरोजगारी का दूसरा स्वरूप शिक्षित प्रशिक्षित बेरोजगारों तथा अशिक्षित अकुशल बेरोजगारों के रूप में दिखाई देता हैं.

बेरोजगारी के कारण– भारत में दिनों दिन बढ़ती बेरोजगारी के निम्न कारण हैं.

  • जनसंख्या के घनत्व में वृद्धि– यह बेरोजगारी की समस्या का मुख्य कारण हैं. जनसंख्या जिस गति से बढ़ती हैं, रोजगार के अवसर उस गति से नहीं बढ़ते हैं.
  • व्यावसायिक शिक्षा का अभाव– आज की शिक्षा प्रणाली में व्यावसायिक परामर्श की कोई व्यवस्था नहीं हैं. आज का बालक जो शिक्षा पाता हैं वह उद्देश्यरहित होती हैं. इस प्रकार वर्तमान शिक्षा प्रणाली भी बेकारी की समस्या का मूल कारण हैं.
  • लघु एवं कुटीर उद्योगों का अभाव– सरकार की उद्योग नीति भी इस समस्या को विकराल बना रही हैं. हमारे यहाँ औद्योगिकीकरण के रूप में बड़े उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा हैं. मशीनीकरण के कारण बेकारी की समस्या और बढ़ गई हैं. लघु अथवा कुटीर उद्योगों के विकास से रोजगार के जो अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, वह बड़े उद्योगों के लगने से नहीं मिल सकते हैं.
  • राजनीतिक स्वार्थ– आज आरक्षण के नाम पर समाज के एक बड़े शिक्षित वर्ग की दुर्दशा हो रही हैं. राजनीतिक स्वार्थों के कारण शिक्षित बेरोजगारी की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही हैं.
  • कृषि की उपेक्षा- सरकार द्वारा उद्योगों पर विशेष ध्यान देने और कृषि क्षेत्र की उपेक्षा किये जाने से ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ रही हैं.
  • स्वरोजगार योजनाओं का दुरूपयोग– सरकार स्वरोजगार को प्रोत्साहन तथा सहायता दे रही हैं.किन्तु उनका लाभ वास्तविक पात्रों को नहीं मिल पाता हैं.

समस्या समाधान के प्रयास– किसी समस्या के कारण जान लेने के बाद निवारण का मार्ग स्वयं खुल जाता हैं. आज सबसे अधिक आवश्यकता सामाजिक क्रांति लाने की हैं.

जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण आज के युग की मांग हैं. शिक्षा व्यवसाय केंद्रित हो, शिक्षार्थियों को शिक्षा के साथ साथ रोजगारपरक उचित परामर्श दिया जाय. लघु और कुटीर उद्योगों को विकसित किया जाय.

उपसंहार– बेरोजगारों की बढ़ती फौज देश की अर्थव्यवस्था और विकास के बड़े बड़े दावों की पोल खोल रही हैं. बेकारी भत्तों, मुफ्त अनाज बांटने के नाटकों आदि से यह विकट समस्या नहीं सुलझेगी. आर्थिक और सामाजिक स्तर पर क्रन्तिकारी बदलाव और नियंत्रण ही इसका उपचार हो सकता हैं.

बेरोजगारी निबंध 3 (600 शब्द)

रोजगार अनिवार्य आवश्यकता- मनुष्य को जीवन यापन करने के लिए भोजन, वस्त्र, इत्यादि अनेक चीजों की आवश्यकता होती हैं. इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसको धन चाहिए.

धन का उपार्जन नौकरी, खेती अथवा व्यापार करके ही किया जाता हैं. समाज में रहने वाले हर व्यक्ति को जीवन यापन के लिए कोई न कोई आजीविका का साधन या रोजगार अवश्य ही चाहिए. दुर्भाग्यवश हमारे देश में बेरोजगारी की समस्या विकट होती जा रही हैं.

बेरोजगारी बढ़ने के कारण- हमारे देश में बेरोजगारी बढ़ने के अनेक कारण हैं. जो संक्षेप में इस प्रकार हैं.

  1. जनसंख्या बढ़ते जाने से बेरोजगारी भी बढ़ती जाती है, जिस गति से जनसंख्या बढ़ती है, उस गति से रोजगार के साधन नहीं बढ़ते हैं.
  2. हमारा देश कृषि प्रधान देश हैं. लेकिन उद्योगों को आगे बढ़ाने और कृषि की उपेक्षा करने के कारण लोग खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं.
  3. हमारी शिक्षा व्यवस्था समय के अनुकूल नहीं है. तकनीकी शिक्षा बहुत महंगी है नौकरी पर ही जोर हैं. स्वरोजगार का प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा हैं.
  4. हमारी अर्थव्यवस्था विदेशों की नकल पर चल रही हैं. खेती की उपेक्षा हो रही हैं.
  5. विदेशी बाजारों में होने वाली मंदी भी रोजगार को प्रभावित करती हैं.
  6. नवम्बर 2016 में विमुद्रीकरण नोट्बन्दी ने भी बेरोजगारी बढ़ाई हैं.

बेरोजगारी के दुष्परिणाम- बेरोजगारी के बढ़ने के दुष्परिणाम दिन प्रतिदिन हमारे सामने आ रहे हैं. देश की अधिकांश पूंजी थोड़े से लोगों के हाथ में सिमटती जा रही हैं.

अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होता जा रहा हैं. बेरोजगार नौजवान अपराधों की ओर मुड़ रहे हैं. आम आदमी में भीतर ही भीतर वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश और असंतोष धधकने लगा हैं.

यह स्थिति कभी भी विस्फोट का रूप ले सकती हैं. इससे हमारी राष्ट्रीय एकता तथा स्वतंत्रता का भी संकट पैदा हो सकता हैं.

बेरोजगारी दूर करने के उपाय- बेरोजगारी बढ़ाने वाले कारकों का निवारण करके ही रोजगार की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती हैं. जनसंख्या पर नियंत्रण किया जाना चाहिए.

एक या दो बच्चों वाले परिवारों को रोजगार की सुविधा दी जानी चाहिए. शिक्षा प्रणाली सस्ती और रोजगार के योग्य बनाने वाली होनी चाहिए.

बड़े बड़े उद्योग पर ही जोर न देकर अतिलघु और कुटीर उद्योगों का जाल फैलाया जाना चाहिए. और उन्हें विशालकाय उद्योगों के मुकाबले सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए.

हमारी अर्थव्यवस्था एवं योजनाओं में अधिक से अधिक रोजगार के अवसर उत्पन्न करने वाली होनी चाहिए.

सरकारी प्रयास- बेरोजगारी को दूर करने के लिए सरकारी स्तर पर भी काफी प्रयास किये जा रहे हैं. मनरेगा से भ्रष्टाचार की समाप्ति, स्वरोजगार के लिए बैंकों से सस्ते ऋण की व्यवस्था, विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए जीएसटी आदि कर प्रणाली में सुधार, मुद्रा, स्टेंडअप उद्योगों की स्थापना में सरकारी अनुमतियों की सुलभता अनेक उपाय साकार ने किये हैं.

राज्य सरकारों का सहयोग तथा युवाओं को नौकरियों के पीछे भटकना छोड़ स्वरोजगार की ओर मुड़ना भी बेरोजगारी से मुक्ति दिलाने के लिए आवश्यक हैं.

बेरोजगारी निबंध 4 (700 शब्द)

Long Essay on Unemployment in Hindi In 700 Words

बेरोजगारी का अर्थ है, कार्य करने में पूर्ण सक्षम एवं इच्छित होने के उपरान्त भी उसे अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए काम नहीं मिलता हैं तथा काम की खोज में वह इधर उधर हाथ मारता रहता है.

तथा वह ऐसे अपराधों से घिर जाते है और अनिच्छा में कुछ गलत कदम उठाता है जो विधि नियमों के मुताबिक़ गलत होता है. आज बेरोजगारी या बेगारी न सिर्फ भारत की प्रमुख समस्या है बल्कि आज एक वैश्विक समस्या का रूप धारण कर चुकी है.

बेरोजगारी के मूल कारण जानने से पूर्व हमें इनकी स्थितियों के बारे में समझना होगा. आपकों जानकारी हो बेरोजगारी की कई स्थितियां है, भारत में बेरोजगारी की समस्या के प्रायः के रूप आम तौर पर देखने को मिलता हैं.

भारत में बेरोजगारी के प्रकार (types of unemployment in hindi)

  • खुली बेरोजगारी– इसका अर्थ उस तरह की बेरोजगारी से है, जिसमें व्यक्ति काम तो करना चाहता है, मगर उसे कोई कार्य नहीं मिल पाता है, यही वजह है कि खुली बेरोजगारी की समस्या के कारण बड़ी तादाद में लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं.
  • शिक्षित बेरोजगारी- मूल रूप से भारत में बेरोजगारी का यह स्वरूप सबसे अधिक दिखाई देता है. यह एक तरह से खुली बेरोजगारी ही है. जिसमें फर्क बस इतना है कि काम की चाहत रखने वाला व्यक्ति पढ़ा लिखा है तथा वह अपनी योग्यता के मुताबिक़ कार्य चाहता हैं.
  • घर्षणात्मक बेरोजगारी- यह वह स्वरूप है जिसके जिम्मेदार हमारे बाजार होते हैं, बाजार में आए दिन होने वाले उतार चढाव और मांग में होने वाली परिवर्तन के कारण बेरोजगारी का यह स्वरूप देखने को मिलता है.
  • मौसमी बेरोजगारी- भारत की अधिकांश जनता का मुख्य व्यवसाय कृषि है, जो अधिकतर पांच या छः माह का कार्य होता है. इस अवधि के बाद उसके करने के लिए कोई कार्य नहीं होता है जिसके चलते उत्पन्न बेरोजगारी को मौसमी बेरोजगारी का नाम दिया जाता हैं.
  • शहरी बेरोजगारी- आजकल शहरों और कस्बों को रोजगार का केंद्र माना जाता है, इसी कारण बड़ी संख्या में लोग अपने गाँवों को छोडकर शहरों का रूख करते है, मगर शहर में आने के बाद भी उन्हें रोजगार का कोई अवसर हाथ नहीं लगता है तो इस प्रकार की बेरोजगारी को शहरी बेरोजगारी के नाम से जाना जाता हैं.
  • ग्रामीण बेरोजगारी- प्राचीन भारत में कार्यों के आधार पर समाज में वर्ण व्यवस्था थी. जिसके अनुसार किसान के घर में जन्म लेने वाला कृषि कार्य, सुनार का बेटा सुनारी, लोहार का बेटा लुहारी का कार्य करता था. मगर आज यह व्यवस्था समाप्त हो चुकी हैं, जिसके कारण लोगों को अपने पुश्तैनी कार्य के प्रति लगाव नही रहा है और उन्हें बेरोजगारी से गुजरना पड़ रहा हैं.
  • संरचनात्मक बेरोजगारी- जब देश के उद्योग जगत में किसी तरह के मूलभूत बदलाव लाए जाते है तो उन उद्योगों के कर्मचारियों, मजदूरों में कमी कर दी जाती है इस तरह के बदलावों से बहुत से लोग बेरोजगार हो जाते है. बेरोजगारी का यह स्वरूप संरचनात्मक बेरोजगारी कहलाता हैं.
  • अल्प रोजगार– जिन्हें हम दहाड़ी मजदूरी कहते है यह एक ऐसे मजदूरों का तबका है जिन्हें नित्य कार्य मिलने की बजाय कुछ दिन का काम मिलता है, शेष अंतराल का समय उन्हें बेरोजगारी में बिताना पड़ता हैं.
  • छिपी हुई या अद्रश्य बेरोजगारी- मुख्य रूप से कृषि के क्षेत्र में बेरोजगारी का यह स्वरूप मुख्य रूप से पाया जाता है. कई बार आवश्यकता से अधिक लोग काम पर लगे होते है. आवश्यकता से अधिक काम पर लोगों को वहां से निकाल भी दिया जाए तो उत्पादन में कोई फर्क नहीं पड़ता है, इस तरह की प्रछन्न या छिपी हुई बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या हैं.

बेरोजगारी के कारण और निवारण (What is Unemployment? Its Main Causes, Effects and Solutions)

भारत में बेरोजगारी की समस्या के कई कारण है. जिनमें से सबसे बड़ा कारण जनसंख्या में तेजी से हो रही वृद्दि हैं. अधिक लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रोजगार के भी अधिक अवसर स्रजन करने होगे,

यदि हम इस तरह की व्यवस्था नही कर पाए तो स्वाभाविक तौर पर बेरोजगारी की दर तीव्र गति से बढ़ेगी. दूसरी कारण हमारी शिक्षा व्यवस्था है. हमारी स्कूलों में बच्चों को सैद्धांतिक ज्ञान रटवाया जाता है न कि व्यवहारिक ज्ञान.

बच्चों को स्वयं के रोजगार आरम्भ कर पाने का सामर्थ्य पैदा कर पाने वाली शिक्षा व्यवस्था को अपनाना पड़ेगा. अंग्रेजों के आगमन के समय के साथ ही भारत के कुटीर उद्योगों को समाप्त करने के प्रयास हुए है. हमारी इस प्राचीन परम्परा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता हैं.

आजादी के बाद से ही लघु और कुटीर उद्योग पर ध्यान नहीं दिया गया है. बड़े उद्योगों को बढ़ावा मिलने के साथ ही कुटीर उद्योग समाप्त हो गये तथा इनके सहारे जीवन चलाने वाले लोग बेरोजगार बन गये.

भले ही भारत को कृषि प्रधान देश माना जाए, आज भी हमारी अधिकतर आबादी कृषि कार्य पर आश्रित है मगर कृषि सुधारों के अभाव में वे एक छोटी अवधि तक ही अल्प रोजगार प्राप्त कर पाते हैं.

बेरोजगारी के कई दुष्परिणाम आज हमारे सामने है. जहाँ एक तरफ बेरोजगारी की समस्या बढने से देश में गरीबों की संख्या में वृद्धि होती है. वही भूखमरी जैसी समस्या का जन्म भी हो जाता है.

एक बेरोजगार व्यक्ति की मानसिक स्थिति बड़ी दयनीय होती है वह काम की जुगाड़ में चोरी, डकैती तथा हिसा जैसे अपराधों की राह पर चल पड़ता हैं. बेरोजगारी की समस्या से तंग आकर लोग अपराध की दुनियां में प्रवेश कर लेते है,

कुछ लोगों में जीवन के प्रति हताशा इस हद तक घर कर जाती है कि वे आत्महत्या कर अपनी जीवनलीला ही खत्म कर देते हैं. दूसरी तरफ अपराधी तथा राजनेता इन राह भ्रमित लोगों को अपने हित से उपयोग लेते है

तथा कोई भी मौका मिलने पर इनका शोषण करने से नहीं चुकता है. बेरोजगारी की इस समस्या के कारण देश के सामाजिक एवं राजनीतिक ढाँचे में कई समस्याएं जन्म लेने लगती हैं.

भारत में बेरोजगारी एक समस्या और इसका समाधान पर निबंध | Essay On Unemployment In India In Hindi

शताब्दियों की गुलामी के बाद जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो सभी नागरिकों को अपनी आर्थिक दशा सुधरे जाने की आशा होने लगी.

हमारे सविधान में सभी नागरिकों को समान रूप से भविष्य निर्माण करने का संकल्प व्यक्त किया गया. नव स्वतंत्र देशों में औद्योगिक विकास तथा शासन तन्त्र के विस्तार के कारण प्रारम्भ में रोजगार के साधन सुलभ बन गये.

यहाँ प्रथम पंचवर्षीय योजना के साथ ही शरणार्थी समस्या, जनसंख्या वृद्धि तथा उचित विकास दर न रहने से रोजगार की समस्या बढ़ने लगी और नागरिकों को योग्यता एवं श्रम शक्ति के अनुसार रोजगार न मिलने से बेरोजगारी का भयंकर संकट सामने आने लगा.

बेरोजगारी की समस्या (Problem of unemployment)

विकासशील देश भारत में जिस तीव्र गति से विकास होना चाहिए था, वह नही हो सका. इसका सबसे अधिक प्रभाव उन शिक्षित नवयुवकों पर पड़ा, जो रोजगार की तलाश में भटकने लगे और भविष्य के प्रति निराश होकर सरकार से असंतुष्ट रहने लगे.

वस्तुतः देश की जनसंख्या जिस तीव्रतम गति से बढ़ी है, उसके अनुरूप रोजगार के साधन उपलब्ध नही हुए है. सरकारी तन्त्र में लालफीताशाही, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार बढ़ता गया.

आम जनता के जीवन स्तर में काफी गिरावट आई तथा आर्थिक विषमता उतरोतर बढ़ती गई. इससे नई पीढ़ी में असंतोष बढ़ा. फलस्वरूप आंदोलनकारी प्रवृतियाँ, अशांति और अराजकता का भयंकर प्रसार होने लगा.

इन सब बुराइयों के मूल में बेरोजगारी की समस्या है. आज तो अच्छे पढ़े-लिखे एवं योग्य नवयुवकों को रोजगार मिल पाना अतीव कठिन हो गया है और आज के समय में बेरोजगारी एक ज्वलंत समस्या बनकर उभर रही है.

भारत में बेरोजगारी के कारण (problems caused due to unemployment in india)

हमारे देश में रोजगार के अवसर निरंतर घट रहे है. इसके प्रमुख कारण ये है.

  1. जनसंख्या की अप्रत्याशित वृद्धि होने से रोजगार के उतने साधन नही है.
  2. लघु कुटीर उद्योगों का हास और मशीनीकरण का प्रसार बेरोजगारी का एक अहम कारण भी है.
  3. व्यावसायिक शिक्षा एवं स्वरोजगार की ओर पूरा ध्यान नही दिया गया है.
  4. जातिवाद, क्षेत्रवाद तथा अन्य कारणों से नौकरी के लिए आरक्षण का गलत तरीका अपनाया जा रहा है.
  5. सार्वजनिक उद्योगों की घाटे की स्थति और उत्पादकता का न्यून प्रतिशत रहने से रोजगार के नए अवसर नही मिल पा रहे है.
  6. शासन तन्त्र पर स्वार्थी राजनीती एवं भ्रष्टाचार हावी हो रहा है.
  7. पंचवर्षीय योजनाओं में मानव श्रम शक्ति का सही नियोजन नही हो पाया है.

इन सब कारणों से भारत में लगातार रोजगार के साधन घट रहे है और बेरोजगारी बढ़ रही है. इससे युवा वर्ग अत्यंत परेशान है.

बेरोजगारी की समस्या का समाधान (Solution to unemployment problem)

रोजगार के घटते साधन और बेरोजगारी के बढ़ने के कारणों पर नजर डाले तो यह कहा जा सकता है कि इस समस्या का निराकरण किया जा सकता है.

इसके लिए सर्वप्रथम देश की बढ़ती हुई जनसंख्या को प्रभावी रूप से नियंत्रित करना होगा. लघु एवं कुटीर उद्योगों एवं कृषि प्रधान हस्तकलाओं को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. शिक्षा ऐसी हो जो स्वरोजगार एवं व्यावसायिक क्षमता प्रदान करे.

देश में वर्तमान में नौकरियों के लिए आरक्षण की जो व्यवस्था चल रही है. उसे समाप्त करके योग्यता को ही प्राथमिकता दी जावे और कृषि कार्यों के उचित प्रसार करने पर बल दिया जावे.

शिक्षा प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव परिवर्तन कर नवयुवकों को स्वावलम्बी बनाया जावें. शासन तन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता एवं भ्रष्ट राजनीती पर अंकुश लगाया जावे.

पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण तथा क्रियान्वयन में इस बात का पूरा ध्यान दिया जावे तथा ऐसे आर्थिक उपाय किये जावे जिनसे रोजगार के साधनों में वृद्धि की जा सके.

बेरोजगारी निबंध का सार (essay on unemployment in hindi)

इस प्रकार के उपाय करने पर रोजगार के घटते साधनों पर न केवल अंकुश लगाया जा सकेगा, अपितु रोजगार सुलभ होंबे में परेशानी नही रहेगी.

बेरोजगारी की समस्या का समाधान सरकारी और गैर सरकारी सभी स्तरों पर प्रयास करने से ही हो सकता है. इसके लिए देश की युवा पीढ़ी का सहयोग नितांत अपेक्षित है.

क्योकि रोजगार की समस्या से अधिक वे ही प्रभावित हो रहे है. अतः उचित उआय करने पर रोजगार के साधनों की वृद्धि निश्चित ही हो सकती है.

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