अपमान पर सुविचार अनमोल वचन | Insult Quotes In Hindi

अपमान पर सुविचार अनमोल वचन | Insult Quotes In Hindi : अपमान दुनिया की सबसे बुरी चीज हैं. चाहे व्यक्ति गरीब  ही क्यों न  हो उसका अपना  आत्म सम्मान होता हैं. तथा उसके इसी सेल्फ रिस्पेट पर चोट करना ही अपमान कहलाता हैं. कई बार जाने अनजाने में किसी की इन्सुल्ट हो जाए तो उससे क्षमा माफी मांग लेने में कोई हर्ज नही हैं. क्योंकि अपमान व्यक्ति में बदले की भावना को जन्म देता है जिसका परिणाम अपराध के रूप में सामने आता हैं. आज हम अपमान पर सुविचार (Insult Quotes Hindi,Quotes On Insult ) में दार्शनिकों के कुछ थोट्स आपके लिए लाए हैं चलिए जानते हैं आख़िर उनका अपमान के बारे में क्या मानना हैं. 

अपमान पर सुविचार अनमोल वचन | Insult Quotes In Hindi

अपमान पर सुविचार अनमोल वचन | Insult Quotes In Hindi

एक अपमान की अपेक्षा एक चोट को बहुत शीघ्र भुला दिया जाता हैं.


जो व्यक्ति अपमान को सह लेता है, वह हानि को आमंत्रित करता हैं.


अपमान करके दान देना, विलंब से देना, मुख फेर के देना, कठोर वचन बोलना और देने के बाद पश्चाताप करना- ये पांच क्रियाएं दान को दूषित कर देती हैं।


जो व्यक्ति अपने को अपमानित होने देता हैं, वह इसके ही योग्य होता हैं.


अपमान का बदला लेने की अपेक्षा उसकी ओर ध्यान न देना अच्छा हैं.

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यदि तुम अपमान पूर्ण शब्द कहोगे तो उनको सुनोगे भी.

इन्सल्ट शायरी | Insult Shayari | Love Insult Shayari

चुप रहता है अक्सर अपमान सहकर भी वो हैसियत से नहीं नसीयत से वाकिफ हैं.


मैं कोई चाल नही, जिसे तुम चल जाओगे
भूचाल हूँ कैसे सम्भाल पाओगे
मौन मेरा प्रेम था जो तेरे लिए दिखावा रहा
अब मुझे तुम अपमान की सूली ना चढा पाओगे.


अपमान किया उस माँ का जिसका तिरस्कार त्रिदेव ना कर सके. क्या जीके करना ओ इन्सान, जो इन्सान के रूप में भगवान को पहचान न सके.


अपमान वो घाव है जो सम्मान को चकनाचूर कर देता हैं.


तू क्या समझता है मैं मरा नहीं हूँ
मैं कई कई बार बेज्जत हुआ हूँ.


चुप बैठा गुस्से में शुरू कर देता प्रतिकार
अपमान के घुट पीता हूँ मैं बार बार
हर चीज की आदत पड़ जाती है पर
पता नही अच्छा क्यों नही लगया
बार बार पीने पर भी स्वाद में ये जहर
स्वाभिमान सोचता हैं.


अब न कोई समान की चाह है
और ना ही अपमान का भय है
अब तो लगता है मेरी बर्बादी तय है
हाँ शायद यही मेरी नियति है
अब तो इस जिन्दगी के सफर में
मैं एक ऐसा राहगीर हूँ
जिसे मंजिल की कोई ख्वाइश नही.


अक्सर हम अपने अपमान को संघर्ष समझ बैठते हैं.


ना किसी की झूठी तारीफ़ करू
ना ही किसी का अपमान
शरीर बुरा हो सकता है
पर आत्मा है भगवान


चलो एक खेल खेलते है एक दुसरे का अपमान करते और तब तक खेलेगे जब तक दोनों में से कोई एक हार नही जाता


दूसरों का अपमान करके अपनों को सम्मान देना निकृष्ट सोच को बढ़ावा देना हैं.


जरूरत नही ऐसे रिश्तों की
जो नजरअंदाज करे मेरे अपमान को
ऐसी भी क्या मोहब्ब्त की
मैं खो दू अपने आत्म सम्मान को


हर युग में नारी का अपमान हुआ हैं
क्या द्वापर, क्या सत युग हर बार पाप हुआ हैं.


एक बात हमेशा ध्यान रखों
कि समय और स्थिति कभी भी
बदल सकती है इसलिए कभी
किसी का अपमान मत करो


किसी इन्सान को जानवर कहना उस जानवर का अपमान हैं.


जिसको डर अपमान का, चिंता अपने मान की
ऐसा तो कभी नही चाहा, न ज्ञान है संसार का


जो केवल अपने और अपने पैसों का गुणगान करे, उनके साथ रहके आप खुद का अपमान न करे.


सम्मान और अपमान हम कह के हासिल नही कर सकते, हमारे कृत्य और हमारी चाल चलन ही निर्भर करता है कि समाज से पान खाने को मिलेगा या लात

अपमान पर सुविचार

मनुष्य को किसी का अपमान नहीं करना चाहिए वरना उसका फल भी भुगतना पड़ता है। अपमान करना पाप की श्रेणी में आता है।


वक्त और हालात बदलते रहते हैं इसलिए किसी का अपमान करने से पहले सौ बार सोचना चाहिए। किसी का अपमान करने से बचना चाहिए।


जिन मनुष्य के स्वभाव में दूसरों का अपमान करना होता है ऐसे मनुष्य अपने लिए सम्मान के सभी रास्ते बंद कर देते हैं।


प्रकृति का नियम है कि जो जैसा करेगा उसे वैसा मिलेगा। अगर मनुष्य दूसरों का अपमान करेगा तो उसे भी अपमान मिलेगा।


अपमान निर्धारित नहीं होता है यह हमें हमारे व्यवहार, क्रिया- प्रतिक्रिया, कार्य, सोच आदि पर निर्भर करता है। अपमान करने वाले की सोच नकारात्मकता से भरी होती है।


हर मनुष्य का अपना आत्म सम्मान होता है इसलिए किसी को अपमानित करके खुद का सम्मान नहीं खोना चाहिए।


किसी का अपमान अगर गलती से भी हो जाए तो माफी माँग लेनी चाहिए क्योंकि किसी का अपमान करना बुरा होता है।


अपमान उस चोट की तरह है जिसका घाव नहीं भरता है।


शास्त्रों में दान को सुसंस्कार माना गया है जो ईश्वर की कृपा प्राप्ति का मार्ग माना जाता है और अगर किसी को दान अपमान करके दिया जाए तो दोष लगता है।


अपमान का तीखा वार मनुष्य के स्वाभिमान को चोट पहुँचाता है।


स्वयं का आत्मसम्मान बहुत बड़ी बात है। गलत को सहना गलत को सहयोग देना होता है इसी तरह  अपमान को सहना भी कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।


किसी को अपमानित कर कड़वे शब्द सुनाने से स्वयं को भी कड़वे शब्दों से इत्तेफाक करना पड़ सकता है।


मनुष्य को कभी अपने माता-पिता का अपमान नहीं करना चाहिए, ना ही बड़े बुजुर्गों और असहाय लोगों का अपमान करना चाहिए वरना ईश्वर कृपा से विमुख होना पड़ता है।


अपमान की आग ऐसी जलती है कि वह सम्मान को भी अपनी आग से चोट पहुँचा देती है।


कोई व्यक्ति किसी का अपमान करके महान नहीं बन सकता है।


ऐसे रिश्तों में कोई अपनापन नहीं रहता है जो अपमान करते हैं और दूसरों के आत्म सम्मान की कद्र नहीं करते हैं।


जीवन चक्र में समय बदलता रहता है और मनुष्य की स्थिति भी एक सी नहीं रहती है किसी का अपमान करना कई बार स्वयं के लिए घातक सिद्ध होता है।


अपमान करने वाला मनुष्य ईश्वरीय कृपा से विमुख हो जाता है।


अपमान करना बुरी आदत है इसे अपने व्यक्तित्व में नहीं अपनाना चाहिए।


मनुष्य को संसार में अपने अपमान का डर कमज़ोर बनाता है और सामना करने का सामर्थ्य मज़बूत बनाता है।


मनुष्य को कभी किसी की स्थिति देखकर अपमान नहीं करना चाहिए क्योंकि स्थिति का खुद पर नियंत्रण नहीं होता है कभी भी किसी की भी स्थिति बदल जाती है।


जो लोग सिर्फ खुद का बखान करते हैं और पैसों का गुमान करते हैं ऐसे लोगों का साथ स्वयं का अपमान समान है क्योंकि वहाँ कद्र नहीं होती है।


अपमान का बड़ा जवाब मौन होता है।


स्वाभिमान के आगे अपमान को सहन नहीं किया जा सकता है।


ऐसे रिश्ते, रिश्ते नहीं जिन्हें अपनों के अपमान से कोई फर्क नहीं पड़ता है।


किसी मनुष्य को अपना अपमान इतना भी नहीं सहना चाहिए कि आत्म सम्मान ना रहे।


अपमान जीवन में मनुष्य की हकीकत बता देता है और जीवन में सबसे बड़ी सीख मिल जाती है।


किसी का अपमान करके कोई मनुष्य दूसरे मनुष्य का दिल दुखाता है जो स्वयं में पाप समान है।


कभी कभी अपमान का वार भारी पड़ता है जो परिस्थिति बदल देता है।


अपमान करके अगर मनुष्य खुश होता है तो यह उसके गलत संस्कार को दर्शाते हैं।


मनुष्य दर्द सह सकता है लेकिन अपमान सहना कई बार असहनीय हो जाता है। 


जिस प्रकार गलत कार्य के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए उसी प्रकार अपने अपमान के खिलाफ बोलना कोई बुरी बात नहीं है।


अपमान करना अच्छे कर्मों से विरक्त कर देता है।


अपमान मनुष्य को किसी मनुष्य के मन में जगह नहीं बनाने देता है बल्कि नफरत पैदा कर देता है।


अपमान करके कोई किसी का सगा नहीं हो पाता है।


अपमान में रिश्तों का अपनापन खो जाता है और रिश्तों के मध्य दूरियाँ आ जाती हैं।


मित्रता में अपमान का हस्तक्षेप होने पर मित्रता अपनी अच्छाई खो देती है क्योंकि सच्ची मित्रता कभी अपमान नहीं करती है।


अपमान किसी भी युग में सही नहीं माना गया है और नारी का अपमान तो सबसे बड़ा महापाप है।


जिस प्रकार मनुष्य का सम्मान मूल्यवान होता है उतना ही बुरा किसी का अपमान होता है। अपमान करने वाला अपना मान खो देता है।


अपमान करके मनुष्य स्वयं के लिए कई अच्छे रास्ते बंद कर देता है।


मनुष्य का मान अपमान जीवन में एक अहम भूमिका निभाता है। अगर मनुष्य का मान समाज में प्रतिष्ठित करता है तो अपमान करना मनुष्य को नीचे गिरा देता है।


अपमान सहना भी एक सीमा व मर्यादा की हद तक बर्दाश्त होता है उसके बाद मनुष्य की प्रतिक्रिया रोष को उत्पन्न करती है।


अपमान मनुष्य के बीच दुश्मनी के बीज बो देती है जिसके तहत मनुष्य में प्रेम भावना का अंत हो जाता है।


अपमान करना अच्छे संस्कार की श्रेणी में नहीं आता है।


मनुष्य को अपने अच्छे कर्मों से विमुख नहीं होना चाहिए भले किसी के द्वारा अपमान हो या सम्मान हो। मनुष्य को अपमान के डर से अपना दायित्व नहीं भूलना चाहिए।


आपसी रिश्तों को जोड़ने वाले सम्मान पाते हैं और दूर करने वाले अपमान के भागी होते हैं। खुशियाँ बाँटने वाले सम्मान पाते हैं और दुख दर्द देने वाले अपमान पाते हैं।


किसी असहाय के अपमान की सज़ा ईश्वर की अदालत ज़रूर सुनाती है।


दूसरों का अपमान करने वाला भी अपमानित होता है सम्मानपूर्वक जीवन जी नहीं पाता है।


कभी भी बुरे वक्त में मदद करने वाले, सपने पूरे करने वाले, खुशी देने वाले का अपमान नहीं करना चाहिए।


पुरुष का सम्मान नारी का अपमान न करने पर निर्भर होता है। अपमान करने वाला पुरुष भी नारी की नज़रों में अपना सम्मान खो देता है।


मनुष्य जीवन में अपना अपमान सह ले लेकिन कभी अपमान करने वाले के सामने टूटना नहीं चाहिए, मज़बूत बनना चाहिए।


अगर कोई किसी का अपमान करता है तो उसे उसका दोगुना अपमान प्राप्त होता है।


अपमान एक दूसरे के मन में प्रतिशोध की भावना को जन्म देता है।


जिस मनुष्य को अपमान करने की आदत होती है उनको दुश्मन बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती है क्योंकि उनके दुश्मन खुद बन जाते हैं।


जो मनुष्य सम्मान का आदर करते हैं वो कभी किसी का अपमान नहीं करते हैं।


जो मनुष्य स्वयं से कमज़ोर मनुष्य का अपमान करता है असल में वह स्वयं इतना कमज़ोर होता है कि अपने दिल की रोष भावना का प्रदर्शन दूसरे मनुष्य पर करता है।


अगर कोई मनुष्य अधिक बार अपमान करे तो उससे दूरी बनाना ही बुद्धिमानी है।


दूसरों के आगे किसी को शर्मिंदा करना, उनकी कमियों का मज़ाक उड़ाना अपमान स्वरूप है जिसका परिणाम अच्छा नहीं होता है।


परिवार के सदस्यों का अपमान कभी दूसरे लोगों के सामने नहीं करना चाहिए क्योंकि अगर घरवाले अपनों का सम्मान नहीं करेगें तो अन्य लोग भी नहीं करेगें।


अपमान का सबसे अच्छा उत्तर है अपमान करने वाले से अत्यधिक सुख, समृद्धि, नाम, शौहरत, सफलता प्राप्त कर लेना कि अपमान सार्वजनिक रूप से सम्मान बन जाए।


मनुष्य सोचता है कि किसी का अपमान कर उसे सुधारा जा सकता है जबकि अपमान से कोई सुधार नहीं होता है बल्कि मन आहत होता है।

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