ईर्ष्या पर सुविचार अनमोल वचन | Jealousy Quotes In Hindi

ईर्ष्या पर सुविचार अनमोल वचन | Jealousy Quotes In Hindi : इर्ष्या को जलन का नाम दे सकते हैं. यह पूर्वस्थापित गुण है और लगभग सभी इंसानों में पाया जाता हैं. सामान्य स्तर तक इर्ष्या होना मानवीय गुण है मगर इर्ष्या में बुराई का भाव नही आने देना चाहिए. यह सत्य है कि दुनियां में अधिकतर दुखों का कारण ही इर्ष्या है भले ही हमारे पास कुछ ना हो हमारे पड़ोसी के पास भी कुछ नही होना चाहिए, यदि वह सुखी है उसकी मेहनत से वह साधन सम्पन्न है तो हमें जलन होगी, यह इर्ष्या का बुरा स्वरूप हैं. हमें इस तरह की भावना को समाप्त करने की कोशिश करनी चाहिए, संसार में सभी अपने अपने भाग्य एवं कर्मों का ही फल प्राप्त करते हैं. दोस्तों आज हम इर्ष्या पर सुविचार (Jealousy Quotes Hindi, jealousy in a relationship) में कुछ दार्शनिकों के ईर्ष्यालु व्यक्ति पर थोट्स जानेगे.

ईर्ष्या पर सुविचार अनमोल वचन | Jealousy Quotes In Hindi

ईर्ष्या पर सुविचार अनमोल वचन | Jealousy Quotes In Hindi

इर्ष्या का जन्म हमेशा प्रेम के साथ होता है, परन्तु उसके साथ यह सदा मृत्यु को प्राप्त नही होती हैं.


इर्ष्या में प्रेम की अपेक्षा आत्म प्रेम अधिक रहता हैं.


इर्ष्या कब्र की भांति निर्दय होती हैं, इसमें कोयले अग्नि के कोयले होते हैं.


यदि आपका मित्र आपकी कामयाबी से जलता है तो वह आपका कभी मित्र नही हो सकता हैं. उसे अपना प्रतिद्वंद्वी ही समझे.


एक बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा दूसरों के गुणों व अच्छाइयों को देखकर उनसे सीखता है न कि इर्ष्या करता हैं.

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हीनता से जलन का जन्म होता है यह इसे दूर करने की बजाय और दबाती हैं.


जलन महामारी है जिसे जल्द से जल्द नही रोका जाता है तो संक्रमन का खतरा उत्पन्न हो जाता हैं.


व्यक्ति अपने दुखों से अधिक दुखी नही होता जितना वह दूसरों के सुख से दुखी होता हैं.


ईर्ष्यालु व्यक्ति का कभी कोई पड़ोसी नही हो सकता हैं.


उन इंसानों के समक्ष खुश रहिये जो आपसे इर्ष्या करते है उन्हें जलाने के लिए चेहरे की झूठी ख़ुशी ही पर्याप्त हैं.


समान स्तर के लोगों में इर्ष्या की भावना प्रबल होती हैं.


जो लोग आपसे जलते है उन्हें अपना दुश्मन मत मानिए क्योंकि वे आपकों अपने से श्रेष्ठ समझते हैं,


कुछ लोग मात्र आनन्द पाने के लिए तथा दूसरों को नीचा दिखाने के लिए इर्ष्या करते हैं.


अपने नजदीकी मित्र की प्रगति को देखकर इर्ष्या न करे, बल्कि उससे सबक लेकर आगे बढना चाहिए.


यदि आप किसी के सुखी जीवन से दुखी है तो समझ लीजिए आप उससे इर्ष्या करते हैं.


इर्ष्या नकारात्मक सोच की निशानी हैं.


दुनिया का यह नियम है असफल लोगों का मजाक उड़ाना और सफल लोगों से जलना.


मूर्ख लोग समझदार से तथा राह भ्रमित स्त्री पतिव्रता नारी से इर्ष्या करती हैं.


जो लोग हमारे दूसरों की सफलता से जलते है वे जीवन में कभी सफल नही हो सकते हैं,


दुसरे की सफलता आपसे कुछ नही चुराती है इसलिए इर्ष्या करने की बजाय प्रेरणा लीजिये.


जलने का अर्थ यही है कि ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति जिस से ईर्ष्या करता है, उसे वह स्वयं बड़ा मानता है.

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इर्ष्या और अभिमान कभी न करे, न अपने लिए न अपनों के लिए क्योंकि इस संसार में कुछ भी अपना नही हैं.


खो दिया उसे मैंने, जिसे खुदा से तमाम मन्नतों में माँगा था. सिर्फ दो पल के गुस्से से, अंदर की इर्ष्या से.


वो चाँद मेरे चाँद को देखकर दिल ही दिल में जलता होगा, मेरे चाँद के दीदार को वो हर दिन सजदे करता होगा.


इर्ष्या और द्वेष उस अग्नि की तरह होते है जिसे जंगल स्वयं उत्पन्न करता है और फिर उसमें जलकर भी ख़ाक हो जाता हैं. ऐसे आत्म विनाश का दोषः दूसरों पर मढ़ना उचित नही होता हैं.

ईर्ष्या पर सुविचार   

ईर्ष्या एक ऐसी भावना है जो दूसरे का नहीं बल्कि स्वयं का नुकसान करती है।


ईर्ष्या करने वाला मनुष्य द्वेष भावना से ग्रसित हो जाता है।


ईर्ष्या कभी किसी का भला नहीं करती है बल्कि एक दूसरे के प्रति अपनत्व की भावना को मिटा देती है।


ईर्ष्यालु मनुष्य कभी चैन से नहीं रह पाता है वह अंदर ही अंदर ईर्ष्या भाव से बेचैन ही रहता है।


ईर्ष्या मनुष्य की दुश्मन है मित्रता के भाव में मिलावट कर देती है।


ईर्ष्या एक स्वाभाविक अनुभूति है लेकिन मनुष्य उसे अपने अच्छे व सकारात्मक विचारों से नियंत्रित कर सकता है।


ईर्ष्या मनुष्य के चरित्र में लाभ की जगह हानि के बीज बोती है।


ईर्ष्या में पड़कर मनुष्य कभी आंतरिक रूप से खुशी अनुभव नहीं कर पाता है।


अधिक ईर्ष्या एक प्रकार का विकार है जो मनुष्य को आंतरिक रूप से बीमार कर देती है।


ईर्ष्या से ग्रसित व्यक्ति में प्रेम भावना का अभाव नज़र आता है।


ईर्ष्या मनुष्य को उसके ध्येय से दूर ले जाती है, वह सही रास्ता प्राप्त नहीं कर पाता है अक्सर भ्रम में पड़ जाता है।


ईर्ष्या में पड़कर मनुष्य जीवन में सफलता के रास्ते में स्वयं रुकावट बनता है।


ईर्ष्या मनुष्य को एक दूसरे के प्रति ग्लानि भाव से भर देती है। मनुष्य स्वयं को दूसरों से कम आंकता है।


एक दूसरे से ईर्ष्या करना प्रेम के स्थान पर क्रोध भावना को उत्पन्न करता है। ईर्ष्या मनुष्य को जीवन में पीछे धकेल देती है।


ईर्ष्या जीत की बजाए हार की ओर ले जाती है। ईर्ष्या से कभी मनुष्य ऊँचा नहीं उठ सकता है क्योंकि ईर्ष्या मनुष्य को नीचे गिरा देती है।


ईर्ष्या से क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध मनुष्य के जीवन में अशांति भर देता है।


ईर्ष्या के भाव को अपना कर मनुष्य अपने जीवन में विकास को रोक लेता है और जो ईर्ष्या नहीं करता है वह मन मस्तिष्क से इस विकार के प्रभाव से खुद को नियंत्रित कर लेता है।


ईर्ष्या वो अवगुण है जो मनुष्य की अंतरात्मा की अच्छाई को बुराई में बदल देती है। मन स्वच्छता से दूर गंदगी से भर जाता है। आत्मा दूषित हो जाती है।


ईर्ष्यालु मनुष्य अपनी परेशानियों के समाधान की ओर कम ध्यान देता है बल्कि ईर्ष्या में लिप्त होने पर दूसरे मनुष्य के लिए भी परेशानी खड़ी करने की सोचता है।


शक्ति विहीन मनुष्य ईर्ष्या से भर जाता है जो ईर्ष्या के तहत खुद में कमज़ोर भावना को जन्म देता है और शक्ति से विमुख असमर्थ अनुभव करता है।


ईर्ष्या से रहित मनुष्य अपना जीवन निखार लेता है जबकि ईर्ष्या में पड़ा व्यक्ति अपना जीवन बिगाड़ लेता है।


ईर्ष्या किसी ज़हर से कम नहीं जो मनुष्य के आदर्श स्वरूप को नष्ट कर देती है।


ईर्ष्या अन्य दुर्भावों से मिलने पर अपराध का रूप धारण कर लेती है जिसका परिणाम घातक सिद्ध होता है।


ईर्ष्या करने वाला कभी सच्चा प्रेम नहीं कर सकता है क्योंकि ईर्ष्या जहाँ उत्पन्न होगी प्रेम वहाँ से दूर हो जायेगा।


ईर्ष्या किसी प्रतियोगिता में जीत हासिल नहीं कराती क्योंकि जीत मेहनत और प्रयास से पाई जाती है।


ईर्ष्या वो अवगुण है जो मनुष्य को अंदर ही अंदर खोखला करती जाती है जो दुष्कर्म में बदल जाती है अगर अत्यधिक हो जाती है।


ईश्वर ने मनुष्य को अनेक भावों से पूर्ण बनाया है लेकिन मनुष्य ईर्ष्या रूपी निर्गुण को अपना कर स्वयं और समाज के लिए बुराई समान है।


ईर्ष्या कभी मनुष्य का उद्धार नहीं करती बल्कि अनेक बुराइयों को उत्पन्न कर देती है।


ईर्ष्यालु व्यक्ति बुद्धिमान नहीं होते क्योंकि वह मूर्खतापूर्ण दूसरों से ईर्ष्या करने में अपना समय बर्बाद करते हैं, अपना जीवन सुनहरा बनाने की बजाये गलत रास्ते की ओर रुख कर लेते हैं।


समाज के लिए ईर्ष्यालु मनुष्य कभी हितकारी साबित नहीं होते हैं और ना ही समाज को अच्छा स्वरूप दे पाते हैं बल्कि सुधारक रूप में वह अहितकारी होते हैं, अच्छे नहीं बन पाते हैं।


ईर्ष्या से पीड़ित व्यक्ति स्वार्थी भी हो जाता है जो दूसरों को नीचा गिराने की सोचता है और दूसरों के ऊँचा उठने पर ईर्ष्या भाव से भरकर दूसरों के रास्ते में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करता है।


ईर्ष्या मनुष्य को मीठी वाणी से दूर कर कर्कश व कड़वे शब्द से दूसरों को चोट पहुँचाती है।


ईर्ष्या मनुष्य को सुकर्म से विमुख कर दुष्कर्म की ओर प्रेरित करती है।


ईर्ष्यालु मनुष्य कभी अपने दिमाग को अच्छा स्वरूप नहीं दे पाते और सोच में नकारात्मक का भाव भर लेते हैं व सकारात्मक पहलू से विमुख हो जाते हैं।


ईर्ष्या मनुष्य को दोहरा रूप जीने को मजबूर करती है और मनुष्य दोहरी भूमिका के मध्य अपनी वास्तविकता भूल जाता है।


ईर्ष्यालु मनुष्य कभी सही गलत का उचित निर्णय लेने में समर्थ नहीं होते हैं।


ईर्ष्या खुशी को अपने जीवन में भी प्रसारित नहीं होने देती है बल्कि दूसरों की खुशी से अलग अपनी खुशी की कामना करती है।


ईर्ष्या करने वाले को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है और ना ही बदला जा सकता है बस उनकी भावनाओं को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए और स्वयं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और अपने मार्ग को सफल बनाना चाहिए।


ईर्ष्यालु मनुष्य दूसरों के गुणों से जलता है अगर वह इस जलन को छोड़कर अपने अच्छे गुणों को अपनाये तो अपना जीवन खुशहाल बना सकता है एवं स्वयं का व्यक्तित्व श्रेष्ठ कर सकता है।


ईर्ष्या मनुष्य को समझदारी के गुण से विरक्त कर देती है। ईर्ष्या से भरा व्यक्ति समझदार नहीं होता है।


ईर्ष्या में पड़ा मनुष्य दूसरों में कमियाँ बताते हुए असल में स्वयं के अवगुण ही प्रदर्शित करता है।


एक दूसरे की चुगली करना ईर्ष्या भावना से जुड़ी है। चुगली उसी की की जाती है जिस से ईर्ष्या होती है।


ईर्ष्या कभी प्रेम करने वालों के प्रति शब्दों के मीठे बोल नहीं बोलती है बल्कि कर्कश वाणी के कड़वे शब्द निकलते हैं।


ईर्ष्या से भरा मनुष्य दूसरों व स्वयं में कमियाँ अनुभव करता है।


मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह ईर्ष्या करके अपने जीवन में प्रेम को दूर कर दे या ईर्ष्या को अपने विचारों से हटाकर प्रेम को‌ अपना लें।


ईर्ष्या से भरा मनुष्य किसी बात का सही व सकारात्मक पहलू नहीं देख पाता है बल्कि नकारात्मकता से भर जाता है और अपना जीवन गलत दिशा में मोड़ लेता है।


ईर्ष्या मनुष्य को समाज में सम्मान नहीं दिलाती है बल्कि ईर्ष्या मनुष्य को अपराध की ओर ले जाती है।


मनुष्य अगर आपसी तुलना करने पर नियंत्रण कर ले तो ईर्ष्या का बीज बोया नहीं जा पाएगा।


ईर्ष्या मनुष्य के कमज़ोर होने का सूचक है। जो मनुष्य को बलशाली कभी नहीं होने देती है।


मनुष्य जहाँ एक दूसरे की बराबरी नहीं कर पाता है और वह कार्य नहीं कर पाता जो दूसरे करते हैं तो ईर्ष्या से भर जाता है और अपना ही नुकसान करता है।


ईर्ष्या से मनुष्य का व्यक्तित्व निखरता नहीं है बल्कि जीवन विनाश की ओर बढ़ जाता है। ईर्ष्या से न सम्मान प्राप्त होता है और न ही आत्मविश्वास जागृत हो पाता है।


अगर मनुष्य अपने विचारों में सकारात्मकता को अपनाये और अपने कार्य में व्यस्त रहे तो ईर्ष्या जैसे दुर्गुण से छुटकारा पा सकता है।


मनुष्य ईर्ष्या से ग्रसित हो तो सही मार्ग भी नहीं दिखते बल्कि सिर्फ ईर्ष्या की भावना से भरा मार्ग ही दिखता है।


मनुष्य ईर्ष्या में पड़कर सच्चाई से दूर हो जाता है और बुराई को न्योता देता है।


ईर्ष्या रिश्तों में दरार डाल देती है और अपनत्व की भावना आपसी रिश्तों में खत्म कर देती है।

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