खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन परिचय | Khan Abdul Ghaffar Khan Biography In Hindi

खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन परिचय  Khan Abdul Ghaffar Khan Biography In Hindi: अब्दुल गफ्फार खान का जन्म एक पठान परिवार में 1890 में गाँव उतमैजी में हुआ था. उनकी प्राथमिक शिक्षा पेशावर में हुई. उसके बाद वह पढ़ने के लिए अलीगढ़ भेजे गये जहाँ उनको बहुत से शिक्षाशास्त्रियों व राष्ट्रवादियों से मिलने का सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ. उनमें से मुख्य थे उनके प्रधानाध्यापक माननीय रेवरेंडविग्रम, गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा अब्दुल कलाम आजाद आदि.

खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन परिचय  Khan Abdul Ghaffar Khan Biography In Hindi

खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन परिचय  Khan Abdul Ghaffar Khan Biography In Hindi
नामसीमांत गांधी’, ‘बाचा ख़ान’, ‘बादशाह ख़ान’
पूरा नामखान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान
जन्म6 फरवरी 1890
जन्म स्थानपेशावर, पाकिस्तान
पिता का नामबैरम खान
माता का नाम
राष्ट्रीयताभारतीय
धर्ममुस्लिम

khan abdul ghaffar khan in hindi

अब्दुल गफ्फार खान का एक महत्वूर्ण राजनैतिक जीवन 1919 के दौरान शुरू हुआ. जब उन्होंने रोलेट एक्ट के विरोध में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए खिलाफत आंदोलन में भाग लेना शुरू किया.

उसके बाद उन्होंने 1920 से लेकर 1947 तक कांग्रेस के सभी क्रियाकलापों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जैसे असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह तथा भारत छोड़ो आंदोलन 1942 आदि.

वह कई वर्षों तक कांग्रेस की कार्यकारी समिति में एक अडिग कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते रहे पर उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के निमंत्रण को सदैव अस्वीकार किया.

इस बिच वह कई बार गिरफ्तार हुए तथा उनके जीवन के 14 वर्ष उन्होंने जेल में बिताएं. गांधी के साथ उसके प्रतिछाया स्वरूप रहते रहते उनके विचार व क्रियाकलाप हुबहू गांधी के तुल्य हो गये थे. जिसके चलते वे 1920 से ही सीमांत गांधी के रूप में पुकारे जाने लगे.

1939 में सीमांत गांधी ने द्वितीय विश्व युद्ध की नीतियों को अस्वीकार करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया था. वह 1940 में पुनः कांग्रेस में शामिल हुए, जब युद्ध नीति में संशोधन किया गया. अब्दुल गफ्फार खान एक उत्कट स्वतंत्रता सेनानी के साथ साथ एक समर्पित समाज सुधारक भी थे.

सामाजिक पुनरुत्थान की आवश्यकता को महसूस करते हुए उन्होंने गांधी के सिद्धांतों को सर्वप्रथम स्वयं अपने जीवन में उतारा तथा उसका प्रचार करते रहे. वह दृढ़ता के साथ अहिंसा व खादी संस्कृति में विश्वास करते थे.

वह ग्रामीण कुटीर उद्योगों तथा महिलाओं व दबाए गये लोगों के उत्थान हेतु पूर्ण रूप से जागरूक थे. उन्होंने सामाजिक परिवर्तन के सकारात्मक पहलू व उद्देश्यों को कार्यान्वित करते हुए खुदाई खिदमतगार नामक संस्था की स्थापना 1929 में की.

यह संस्था रेड शर्ट के नाम से भी जानी गई. उनकी उत्साहपूर्ण सामाजिक परिपक्वता को देखते हुए फखार ए अफगान उपाधि से विभूषित किया गया. उन्होंने 1940 में एक दूसरी खुदाई खिदमतगार संस्था की स्थापना की जिसका नाम मकर ई एलाई ई खुदाई खिदमतगार रखा था.

सीमांत गांधी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के समर्थक थे. उन्होंने अपने प्रान्त में बहुत से राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना की. उनमें से विशेष रूप से चर्चित रहे उतमंजा का आजाद हाई स्कूल तथा अंजुमन उल अफगानी.

उन्होंने 1928 में पस्तो भाषा में एक मासिक स्कूल पख्तून का सम्पादन किया, जो कि 1931 में बंद हो गई. पुनः कुछ वर्ष बाद वह दस रोजा नाम से प्रकाशित होने लगी.

अब्दुल गफ्फार खां एक पवित्र मुसलमान थे तथा धर्म निरपेक्षता में विश्वास करते थे. यह जातीय राजनीती को दंड स्वरूप मानते थे तथा मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान राष्ट्र बनाने के सख्त विरोधी थे तथा कभी नहीं चाहते थे कि देश का बंटवारा हो.

विभाजन के बाद उन्होंने पठानों के लिए अलग पख्तूनिस्तान की स्थापना के लिए एक अलग संघर्ष की शुरुआत की तथा इस सम्बन्ध में पाकिस्तान सरकार उन्हें कई बार जेल में बंद करती रही. वह देश से निर्वासन स्वरूप कई वर्ष अफगानिस्तान में रहे.

1969 में उन्हें गांधी जन्म शताब्दी समारोह में भारत में आमंत्रित किया गया. 1987 में उन्हें भारत के सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया. ठीक उसके एक वर्ष बाद 1988 में खान अब्दुल गफ्फार खान का देहांत हो गया.

खान अब्दुल गफ्फार खान का व्यक्तिगत परिचय

गफ्फार खान एक बहुत ही बड़े राजनेता और अहिंसा वादी विचारधारा के समर्थक थे और यही कारण है कि कई लोग उन्हें धार्मिक नेता के तौर पर जानते थे।

खान ने खिदमतगार आंदोलन की स्टार्टिंग साल 1929 में की थी और इस आंदोलन की सफलता के कारण अंग्रेजी गवर्नमेंट काफी परेशान रहने लगी थी।

खान इंडिया के बंटवारे के बहुत ही सख्त विरोधी थे और उन्होंने अलग पाकिस्तान की मांग का भी कभी समर्थन नहीं किया। वह भारत को अखंड भारत के तौर पर देखना चाहते थे।

अब्दुल गफ्फार खान का प्रारंभिक जीवन

वर्तमान के पाकिस्तान देश में साल 1890 में पेशावर शहर में 6 फरवरी के दिन एक मुस्लिम फैमिली में अब्दुल गफ्फार खान का जन्म हुआ था।

इनके पिताजी का नाम बैरम खान था। इनकी माताजी के नाम के बारे में अभी तक कोई भी जानकारी हमें प्राप्त नहीं हो पाई है।

शिक्षा 

अब्दुल गफ्फार खान के पिताजी चाहते थे कि खान अब्दुल गफ्फार खान अच्छी पढ़ाई लिखाई करें और इसीलिए अपने बेटे को एजुकेशन दिलाने के लिए उन्होंने अपने बेटे का दाखिला मिशनरी स्कूल में करवा दिया,

परंतु पठान समुदाय के विरोध के कारण इन्हें पढ़ाई करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा परंतु फिर भी इन्होंने पढ़ाई की और अपनी मिशनरी स्कूल से पढ़ाई को पूरी करने के बाद यह अलीगढ़ चले आए।

जहां पर गर्मियों की छुट्टियों के दिनों में यह समाज सेवा करने का काम करते थे क्योंकि इन्हें समाज सेवा करना काफी अच्छा लगता था 

कैरियर

जब साल 1919 में पेशावर में मार्शल कानून को लागू किया गया,तब खान ने शांति के प्रस्ताव को गवर्नमेंट के सामने प्रस्तुत किया परंतु गवर्नमेंट के द्वारा इनके प्रस्ताव को नकार दिया गया और इन्हें अरेस्ट कर लिया गया.

जिसके पीछे अंग्रेजी गवर्नमेंट के द्वारा यह कारण बताया गया कि यह अंग्रेजी गवर्नमेंट के खिलाफ लोगों को विद्रोह करने के लिए उकसाते थे।

खान अब्दुल गफ्फार खान को जेल में रखने के लिए अंग्रेजी गवर्नमेंट के द्वारा कुछ फर्जी गवाह भी ढूंढने की कोशिश की गई थी जो यह बयान दे सके कि गफ्फार खान अंग्रेजी गवर्नमेंट के खिलाफ लोगों को भड़काने का काम करते थे.

परंतु लाख कोशिशें करने के बावजूद भी अंग्रेजी गवर्नमेंट के अधिकारियों को कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो खान अब्दुल गफ्फार खान के खिलाफ झूठी गवाही दे सकें परंतु इसके बावजूद अंग्रेजी गवर्नमेंट के द्वारा फर्जी आरोप में तकरीबन 6 महीने तक की सजा के तौर पर उन्हें जेल में रखा गया।

खुदाई खिदमतगार संगठन 

खान अब्दुल गफ्फार खान के द्वारा एक सामाजिक संगठन बनाया गया था जिसका नाम इन्होंने खुदाई खिदमतगार रखा था। संगठन बनने के कुछ ही टाइम के बाद संगठन का काम पॉलिटिकल काम में चेंज हो गया

खान अब्दुल गफ्फार खान का जेल में जाना  

सत्याग्रह करने के कारण गफ्फार खान को साल 1930 में एक बार फिर से अंग्रेजी गवर्नमेंट के द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और इसके बाद इन्हें पंजाब के गुजरात जेल में भेज दिया गया।

जेल में पहुंचने के बाद इनकी मुलाकात जेल में मौजूद दूसरे कैदियों से हुई जिनसे इनकी अच्छी दोस्ती हुई। जेल में रहने के दरमियान ही इन्होंने सिख धर्म से रिलेटेड कई ग्रंथ पढे, साथ ही गीता की स्टडी भी की।

इसके अलावा जेल में रहने की दरमियांन हीं मुसलमान और हिंदू कैदियों के बीच आपसी मेल मिलाप को बढ़ाने के लिए उन्होंने कुरान और गीता भी पढ़ना चालू कर दिया।

खान की संगति से जेल में रहने वाले दूसरे कैदी भी अच्छे खासे प्रभावित हुए और उन्होंने भी कुरान,गीता और गुरु ग्रंथ साहिब का अध्ययन करना स्टार्ट कर दिया।

जेल से रिहाई 

खान अब्दुल गफ्फार खान को एक समझौते के अंतर्गत तब जेल से आजाद किया गया जब साल 1931 में 29 मार्च को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन और महात्मा गांधी के बीच एक पॉलिटिकल समझौता हुआ।

यह सम्मेलन लंदन में आयोजित हुआ था, जिसे गांधी-इरविन समझौता कहा जाता है। जेल से बाहर आने के बाद खान अब्दुल गफ्फार खान सामाजिक काम करने लगे।

गांधी जी से मुलाकात

खान की गांधी जी से मुलाकात तब हुई जब गांधीजी साल 1919 में रोलेट एक्ट का विरोध कर रहे थे।गांधी जी से मुलाकात होने के बाद खान अब्दुल गफ्फार खान गांधी जी के विचारों से काफी ज्यादा प्रभावित हुए।

इसके बाद वह अगले साल खिलाफत आंदोलन में भी शामिल हो गए।साल 1921 में खिलाफत कमेटी के जिला अध्यक्ष के पद को खान अब्दुल गफ्फार खान ने ग्रहण किया।

खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा खुदाई खिदमतगार की स्थापना

कांग्रेस पार्टी की एक कमेटी में साल 1929 में शामिल होने के बाद खुदाई खिदमतगार नाम के एक संगठन की स्थापना खान अब्दुल गफ्फार खान ने की और लाल कुर्ती आंदोलन का आवाहन उन्होंने पख्तूनो के लिए किया।

अंग्रेजी गवर्नमेंट के खिलाफ विद्रोह भड़काने के आरोप में अंग्रेजी गवर्नमेंट के द्वारा गफ्फार खान को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें तकरीबन 3 साल की सजा सुनाई गई। सजा काटने के बाद जब वह जेल से बाहर आए तब उन्होंने अपने आंदोलन को और भी फास्ट कर दिया।

पुरस्कार

भारत के प्रति खान अब्दुल गफ्फार खान के योगदान को देखते हुए भारत के सबसे बड़े पुरस्कार भारत रत्न से गफ्फार खान को साल 1987 में नवाजा गया, जो उनके लिए काफी गर्व की बात थी।

मृत्यु

पाकिस्तानी गवर्नमेंट ने साल 1988 में गफ्फार खान को पाकिस्तान के पेशावर में ही उनके घर में नजरबंद कर दिया था। साल 1988 में ही 20 जनवरी के दिन खान अब्दुल गफ्फार खान ने इस धरती पर अपनी आखिरी सांसे ली और उन्होंने इस धरती को अलविदा कह दिया।

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