मैथिलिचरण गुप्त का जीवन परिचय | Maithili Sharan Gupt Biography In Hindi

मैथिलिचरण गुप्त का जीवन परिचय | Maithili Sharan Gupt Biography In Hindi

नर होकर निराश न करो मन को कविता और साकेंत जैसे अमर काव्य लिखने वाले हिंदी साहित्यकार मैथिलिचरण गुप्त ही थे. खड़ी बोली हिंदी के स्तम्भ कहे जाने वाले गुप्त जी ने ब्रज जैसी भाषा में काव्य लिखने की बजाय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का अनुसरण करते हुए हिंदी में कदम रखा था.

और आज उनकों आजादी के दौर में युवाओं के दिनों में आजादी की हकार भरने वाले राष्ट्रभक्त कवि भी कहा जाता हैं. ऐसें उज्जवल जीवन के धनी श्री मैथिलिचरण गुप्त के बारे में सक्षिप्त जानकारी के लिए नजर डालते हैं.

मैथिलिचरण गुप्त जीवन परिचय Maithili Sharan Gupt Biography Hindi

मैथिलिचरण गुप्त का जीवन परिचय Maithili Sharan Gupt Biography In Hindi

बिंदु जानकारी
नाम मैथिलीशरण गुप्त
जन्म 3 अगस्त 1886
आयु 78 वर्ष
जन्म स्थान झाँसी, उत्तरप्रदेश
पिता का नाम रामचरण गुप्त
माता का नाम कशीवाई
पत्नी का नाम ज्ञात नहीं
पेशा लेखक, कवि
भाषा शैली ब्रजभाषा
मृत्यु 12 दिसम्बर 1964
मृत्यु स्थान चिरगाँव
अवार्ड पद्म भूषण, पद्म विभूषण, राष्टकवि,डी.लिट.
रचनाएं यशोधरा रंग में भंग साकेत भारत भारती

भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष का आवहान करने और भारतीय संस्क्रति की तात्विक विशेषताओं को अपने प्रबंध काव्य के माध्यम से व्याख्या करने के कारण मैथिलिचरण गुप्त राष्ट्रकवि के रूप में जाने-माने गये. आपका जन्म 1886 को चिरगांव जिला झाँसी उत्तरप्रदेश में हुआ था.

आपकी शिक्षा घर पर ही हुई, परन्तु काव्य दीक्षा सरस्वती के स्वनामधन्य संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के द्वारा प्राप्त हुई. आपके भारत-भारती नामक काव्य को अतीव लोकप्रियता प्राप्त हुई और भारत के राष्ट्रिय जागरण में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा.

आपकी सभी कविताओं में राष्ट्रीयता और सांस्कृतिकता का उन्मेष दिखाई पड़ता हैं. सांकेत आपका सर्वश्रेष्ट महाकाव्य हैं. जिनमे राम के पावन चरित्र को आधुनिक परिवेश में उपस्थित करने के साथ ही उपेक्षिता उर्मिला के आँसू पोछने का भी काम किया हैं.

मैथिलिचरण गुप्त सरल-निश्छल स्वभाव के आदर्श पुरुष थे. जो सम्पूर्ण हिंदी जगत में दद्दा नाम से विख्यात थे. बीसवी शताब्दी के हिंदी कवियों की कई पीढियों को आपकी कविता ने भाव और भाषा की द्रष्टि से प्रभावित किया हैं.

राष्ट्रिय आन्दोलन के सभी स्वरों को आपने अपने स्वरों द्वारा मुखरित किया हैं. आपकों उत्तरी भारत के सांस्कृतिक नव-जागरण का प्रतिनिधि कवि भी कहा जा सकता हैं. मैथिलिचरण गुप्त ने प्रबंध काव्य भी लिखे हैं. और मुक्तक कविताओं की भी रचना की हैं. आपके खंडकाव्य विशेष रूप से लोकप्रिय हुए हैं.

मैथिलिचरण गुप्त की जीवनी

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त (३ अगस्त १८८६ – १२ दिसम्बर १९६४) हिंदी के प्रख्यात कवि थे. खड़ी बोली हिंदी के महत्वपूर्ण कवियों में गुप्त जी का सर्वोच्च स्थान हैं. साहित्य जगत में इन्हें दद्दा कहकर सम्बोधित किया जाता था. 

भारत की आजादी के संग्राम में मैथिलीचरण जी का बड़ा योगदान रहा हैं. इन्होने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों का जोश बढ़ाने के लिए वर्ष 1912 में भारत भारती नामक कृति की रचना की. यह रचना काफी असरदार साबित हुई, राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने मैथिलिचरण गुप्त को इसी रचना के बाद राष्ट्रकवि की उपाधि दी.

वर्ष 1954 में मैथिलिचरण गुप्त को भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया. इनके जन्म दिवस 3 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय कवि दिवस मनाया जाता हैं. 

जन्म और आरंभिक जीवन

मैथिलीशरण गुप्त 3 अगस्त 1886 को झांसी के पास ही चिरगाँव में जन्मे थे. इनकी माँ का नाम काशी बाई और पिता का नाम रामचरण कनकने था. बालपन में इनकी रूचि पढाई की बजाय खेलकूद पर अधिक थी. आगे चलकर उन्होंने नियमित अध्ययन को छोड़ दिया.

गुप्त ने घर पर रहकर ही हिंदी, बांगला और संस्कृत के साहित्य का गहन अध्ययन किया. इन्हें रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादास पन्त और मुंशी अजमेरी का मार्गदर्शन मिला.

मैथिलीशरण गुप्त ने महज 12 वर्ष की आयु में ब्रज भाषा से अपनी लेखनी की शुरुआत की. उनकी पहली कविता रचना का नाम कनकलता था. धीरे धीरे इनका सम्पर्क साहित्य के प्रकांड पंडित महावीर प्रसाद द्वेदी से हुआ और इन्होने खड़ी बोली हिंदी में कविताई लिखनी शुरू की जो द्वेदी जी की सरस्वती मासिक पत्रिका में प्रकाशित होती थी.

मैथिलीशरण गुप्त का काव्य परिचय

गुप्त का पहला काव्य संग्रह रंग में भंग तथा दूसरा जयद्र्थ वध प्रकाशन में आया. इसके पश्चात इन्होने बंगाली के प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ मेघनाथ वध का ब्रज भाषा में रूपांतरण किया. 1912 में गुप्त को जन जन तक पहुचाने वाली भारत भारती का प्रकाशन हुआ.

मैथिलिचरण गुप्त ने प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ स्वप्नवासवदत्ता का अनुवाद प्रकाशित करवाया. वर्ष 1916 में इन्होने साकेत महाकाव्य की रचना आरम्भ की जो वर्ष 1931 में जाकर पूरा हुआ. इसी समय इन्होने पंचवटी भी लिखा और अपना प्रेस क्लब आरम्भ कर पुस्तकों का प्रकाशन शुरू कर दिया.

1931-32 के समय इनकी मुलाक़ात महात्मा गांधी से होती हैं, इस समय ये यशोधरा उपन्यास लिख रहे थे. गांधी ने इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि दी. 16 अप्रैल 1941 को इन्होने सत्याग्रह में भाग लिया और जेल में बंद कर दिए गये.

करीब सात महीने तक मैथिलिचरण गुप्त को आगरा और झांसी की जेल में रखा गया, तथा आरोप सिद्ध न होने के कारण बाद में इन्हें छोड़ दिया गया. वर्ष 1948 में गुप्त जी को आगरा यूनिवर्सिटी ने दी लिट् की उपाधि से अलंकृत किया.

वर्ष 1952 से 1956 तक मैथिलिचरण गुप्त राज्य सभा के सदस्य मनोनीत किये गये. इसी दौरान इन्हें पद्म विभूषण दिया गया. भारत के राष्ट्रपति डॉ प्रसाद ने इन्हें 1962 में अभिनन्दन ग्रन्थ उपहार में दिया और हिन्दू यूनिवर्सिटी से इनको डी लिट् व मानद प्रोफेसर के रूप सम्मान दिया गया.

मैथिलिचरण गुप्त ने झांसी और अपने गाँव चिरगाँव में दो प्रेस भी स्थापित की. वर्ष 1962 में इन्होने सरस्वती पत्रिका की गोल्डन जुबली के कार्यक्रम में अध्यक्षता की.  1963 में अपने छोटे भाई सियाराम चरण गुप्त के निधन से बड़ा सदमा पंहुचा, जिससे वे उभर न पाए और 12 दिसम्बर 1964 को ह्रदयाघात से इनका निधन हो गया.

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