मुन्तखाब उत तवारीख | Muntakhab-ut-Tawarikh In Hindi

Muntakhab-ut-Tawarikh In Hindi : मुन्तखाब उत तवारीख ग्रंथ का लेखक अकबर का समकालीन विद्वान अब्दुल कादिर बदायूँनी हैं. इस किताब के तीन भाग हैं.पहले भाग में दिल्ली के सुल्तानों, बाबर और हुमायूँ के शासनकाल का वर्णन हैं. दूसरे भाग में 1595 ई तक अकबर के शासनकाल का उल्लेख हैं.

मुन्तखाब उत तवारीख | Muntakhab-ut-Tawarikh In Hindi

मुन्तखाब उत तवारीख | Muntakhab-ut-Tawarikh In Hindi

मुन्तखाब उत तवारीख के तीसरे भाग में मुसलमानों और संतों का विवरण हैं. बदायूँनी को अकबर की सेवा में रहने का अवसर भी मिला था. अकबर के आदेशानुसार उसने महाभारत (रज्मनामा) और रामायण का फारसी में अनुवाद भी किया. उसने अन्य कुछ पुस्तकों की भी रचनाएं की.

बदायूँनी एक कट्टर रुढ़िवादी सुन्नी मुसलमान था और वह धर्मान्धता तथा संकीर्णता से ग्रस्त था. उसे अकबर के समय की प्रगतिशील सहिष्णुता तथा समन्वयवादी विचारधाराओं में न तो कोई रूचि थी और न ही सहानुभूति. इसलिए उसे अकबर की नीतियाँ पसंद नही थी.

और उसने अकबर के शासन की अतिशयोक्ति से निंदा की. बदायुनी ने मुन्तखाब उत तवारीख की रचना काफ़ी गोपनीयता के साथ की और अकबर के शासनकाल में इसकी जानकारी किसी को नहीं हो पाई.बदायूँनी ने अपनी पुस्तक को एक राजनीतिक इतिहास के रूप में लिखा हैं.

मुन्तखाब उत तवारीख में युद्धों व विद्रोहों का विस्तृत विवरण हैं. प्रशासनिक व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया हैं. अकबर के समय की घटनाओं तथा अकालों की भी जानकारी मिलती हैं. अकबर की धार्मिक नीति के विकास से सम्बन्धित प्रत्येक घटना का विवरण और इबादत खाना में हुए वाद विवाद का भी उल्लेख किया गया हैं.

बदायूँनी ने अकबर पर यह आरोप लगाया हैं कि वह व्यक्तिगत रूप से इस्लाम की जड़े खोद रहा हैं. वस्तुतः बदायूँनी बदली हुई परिस्थतियों में इस्लाम को ढालने की आवश्यकता को अनुभव नहीं कर पाया.

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वह इस्लाम के प्राचीन एवं अरबी रूप के प्रति आस्थावान बना रहा. बदायूँनी के मुन्तखाब उत तवारीख की एक कमी यह हैं कि उसमें तिथियाँ गलत दी गई हैं. अतः इसका घटनाक्रम दोष पूर्ण हो जाता हैं. इन दोषों के उपरान्त भी ऐतिहासिक दृष्टि से उसके ग्रंथ का अपना विशेष महत्व हैं.

लेखक

मुंतखब-उत-तवारीख भारत में मुसलमानों का सबुकतीगिन से 1595 तक का एक सामान्य इतिहास है , जो 1590 में शुरू हुआ और उसके बाद शेखों, विद्वानों, चिकित्सकों और कवियों की आत्मकथाएँ आईं। अब्द अल-कादिर बदाउनी ने इस इतिहास को 1590 के पूर्वार्द्ध में लिखना शुरू किया था। पुस्तक अक्टूबर 1595 में पूरी हुई थी। इसमें 618 सौर वर्ष की ऐतिहासिक घटनाओं को शामिल किया गया है। मुंतखब-उत-तवारीख काफी हद तक ख्वाजा निज़ाम-उद-दीन अहमद सरहिंदी के तबकात-ए-अकबर शाही (जिसे तबकात-ए-अकबरी के नाम से भी जाना जाता है) पर आधारित है.

मुन्तखाब उत तवारीख में भारत के मुसलमानों का एक सामान्य इतिहास है। पहले खंड में गजनवी , घुरिद वंश , मामलुक राजवंश (दिल्ली) , बाबर और हुमायूं के शासकों और राजाओं के बारे में ऐतिहासिक विवरण हैं । यह भारत के इतिहास को मुगल सम्राट हुमायूं (24 जनवरी 1556) की मृत्यु के बाद गजनवीड्स साम्राज्य (एडी 977) के संस्थापक सबुकतीगिन के राज्याभिषेक से दर्ज करता है।

मुन्तखाब उत तवारीख के दूसरे खंड में 14 फरवरी 1556 से अक्टूबर 1595 तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के पहले चालीस वर्षों को शामिल किया गया है। अब्द अल-कादिर बदाउनी अकबर का चश्मदीद गवाह था। यह खंड अकबर के प्रशासनिक उपायों का एक असामान्य रूप से स्पष्ट और आलोचनात्मक विवरण है, विशेष रूप से धर्म और उसके आचरण के संबंध में। इस खंड को अकबर की मृत्यु तक छुपा कर रखा गया था और जहांगीर के राज्याभिषेक के बाद (लगभग 1605 में) प्रकाशित हुआ था।

किताब मुन्तखाब उत तवारीख के तीसरे भाग में संतों, कवियों और साहित्यकारों के जीवनी वृत्तांत हैं जो या तो उन्हें जानते थे, या अकबर के दरबार से जुड़े हुए थे । 38 शेखों (धार्मिक नेताओं), 69 विद्वानों, 15 दार्शनिकों, चिकित्सकों और 67 कवियों से संबंधित हैं। यह काम अकबर की धार्मिक गतिविधियों पर शत्रुतापूर्ण टिप्पणियों के लिए जाना जाता है । जहाँगीर के शासनकाल (1615) के कम से कम दसवें वर्ष तक इसके अस्तित्व को स्पष्ट रूप से गुप्त रखा गया था ।

जब माथिर-ए-रहिमी के लेखक मुल्ला अब्द अल-बाम नहवंडी को यह पता नहीं था कि उन्होंने 1616 में अपना काम कब पूरा किया। मिरात अल के लेखक शेख मुहम्मद बा सहारनपुरी के अनुसार- 1667 में रचित आलम ने कहा, ‘अब्द अल-कादिर बदाउनी के बच्चों ने जहांगीर से कहा कि वे काम के अस्तित्व के बारे में नहीं जानते हैं।

प्रकाशन

मुन्तखाब उत तवारीख का पहला फारसी भाषा का पाठ 1864 में लखनऊ से प्रकाशित हुआ था , लेकिन यह अब उपलब्ध नहीं है। इस काम के पाठ का दूसरा मुद्रित संस्करण कॉलेज प्रेस, कलकत्ता द्वारा 1865 में प्रकाशित किया गया था और बाद में मुन्तखाब उत तवारीख का अनुवाद जीएसए रैंकिंग (वॉल्यूम I), डब्ल्यूएच लोव (वॉल्यूम II) और टीडब्ल्यू हैग द्वारा अंग्रेजी में किया गया था। (वॉल्यूम III) (एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता द्वारा 1884-1925 के बीच उनकी बिब्लियोथेका इंडियाका श्रृंखला के एक भाग के रूप में प्रकाशित)।

मौलवी एहतिशाम-उद-दीन मुरादाबादी ने पहले मुन्तखाब उत तवारीख उर्दू में अनुवाद किया था, जिसे मुंशी नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ द्वारा 1889 में प्रकाशित किया गया था। अब्द-शुकुर इब्न शेख अब्दुल-वसी थतहवी ने फारसी भाषा में मुन्तखाब उत तवारीख का सार संस्करण लिखा ।

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