नारी सशक्तिकरण पर निबंध | Nari Sashaktikaran Essay In Hindi Pdf | Women Empowerment In Hindi

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नारी सशक्तिकरण पर निबंध Women Empowerment In Hindi

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नारी सशक्तिकरण हिंदी निबंध 1

नारी सशक्तिकरण से आशय

प्राचीन भारत में नारी को समाज तथा परिवार में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था. उस समय स्त्रियाँ सुशिक्षित और समर्थ होती थी. समाज और राज्य के संचालन में भी उनका योगदान होता था. भारत में पराधीनता के प्रवेश के साथ ही नारी का पतन आरम्भ हो गया.

उनकी स्वतंत्रता प्रतिबंधित हो गई, उनको शिक्षा प्राप्त करने तथा देश समाज के प्रति कर्तव्यपालन से रोक दिया गया. वह अशक्त और असमर्थ हो गई. स्वाधीन भारत के लिए नारी की अशक्तता कदापि हितकर नहीं. वह देश के नागरिकों की आधी संख्या हैं.

उनके बिना देश का भविष्य उज्ज्वल हो ही नहीं सकता. अतः नारी के संबल, शिक्षित और समर्थ बनाने की आवश्यकता को गहराई से महसूस किया गया, उसको शिक्षा प्राप्त करने, घर से बाहर जाकर काम करने, समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने के लिए अवसर दिया जाना जरुरी हो गया.

घर से बाहर कार्यालयों, उद्योगों, राजनैतिक संस्थाओं में नारी को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना राष्ट्र की आवश्यकता बन चूका हैं. नारी को सशक्त बनाने का काम तेजी से आगे बढ़ रहा हैं. परन्तु संसद तथा विधान सभाओं में उसके लिए स्थान आरक्षित होना अभी भी शेष हैं.

नारी को सशक्त बनाने के प्रयास हो रहे हैं. उद्योग, व्यापार, उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक शोध एवं प्रशासन के क्षेत्र में वह निरंतर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. स्थानीय शासन में उसे 33 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त हो चूका हैं. संसद और विधानसभाओं भी उसे आरक्षण प्राप्त होना सुनिश्चित हैं. अच्छी शिक्षा प्राप्त होने पर वह स्वयं ही सशक्त हो जायेगी.

वर्तमान समाज में नारी की स्थिति

स्वतंत्र भारत में नारी ने अगड़ाई ली हैं. वह फिर से अपने पूर्व गौरव को पाने के लिए बैचेन हो उठी हैं. शिक्षा व्यवस्था, विज्ञान, सैन्य सेवा, चिकित्सा, कला, राजनीति हर क्षेत्र में वह पुरुष से कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं.

वह सरपंच है, जिला अध्यक्ष है, मेयर है, मुख्यमंत्री है, प्रधानमंत्री है, राष्ट्रपति हैं. लेकिन अभी तक तो यह सौभाग्य नगर निवासिनी नारी के हिस्से में ही दिखाई देता हैं. उसकी ग्रामवासिनी करोड़ों बहिनें अभी तक अशिक्षा, उपेक्षा और पुरुष के अत्याचार झेलने को विवश हैं. एक ओर नारी के सशक्तिकरण की, उसे संसद और विधानसभाओं में ३३ प्रतिशत आरक्षण देने की बातें हो रही हैं तो दूसरी और पुरुष वर्ग उसे नाना प्रकार के पाखंडों और प्रलोभनों से छलने में लगा हुआ हैं.

सशक्तिकरण हेतु किये जा रहे प्रयास- भारतीय नारी का भविष्य उज्ज्वल हैं. वह स्वावलम्बी बनना चाहती हैं. अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाना चाहती हैं. सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराना चाहती हैं.

देश की प्रमुख सशक्त नारियों का परिचय

स्वतंत्रता के लिए होने वाले आंदोलन में अनेक नारियों ने अपना योगदान देकर नारी शक्ति का परिचय दिया था. रानी लक्ष्मीबाई से कौन अपरिचित हैं. सरोजनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित, सचेत कृपलानी, राजकुमारी अमृतकौर, अरुणा आसफअली आदि को कौन नहीं जानता.

भारत की इंदिरा गांधी, जय ललिता, मायावती, महादेवी, मन्नू भंडारी, लता मंगेशकर, सानिया मिर्जा, बछेंद्री पाल, कल्पना चावना, सुनीता विलियम्स आदि नारियों ने विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की हैं. देशीय और अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारतीय नारियों ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं. इनमें मल्ल विद्या का उल्लेख विशेष उल्लेखनीय हैं.

उपसंहार

पुरुष और नारी के संतुलित सहयोग में ही दोनों की भलाई हैं. दोनों एक दूसरे को आदर दे तथा एक दूसरे को आगे बढ़ाने में सहयोग करे. इसी से ही भारत का भविष्य उज्ज्वल होगा.

नारी सशक्तिकरण हिंदी निबंध 2

भारतीय संस्कृति में नारी का स्थान

आदिकाल से हमारा देश नारीपूजक रहा हैं, तभी तो नारायण से पूर्व लक्ष्मी, शंकर से पूर्व भवानी, राम के पूर्व सीता और कृष्ण के पूर्व राधा का नामोच्चार होता हैं. भारतीय समाज में विदुषी महिलाओं की कोई भी कमी नहीं रही. रणभूमि में भारतीय नारी ने अपने जौहर दिखाए, लेकिन दैनिक जीवन में भारतीय नारी कभी नर के समकक्ष सम्मान की अधिकारिणी नहीं बन पाई.

नारी की वास्तविक स्थिति

समाज का पचास प्रतिशत वर्ग नारी वर्ग हैं. किन्तु समाज के निर्माण में उसकी भूमिका को प्रायः नजरअंदाज किया जाता हैं. सच तो यह है कि समाज का पुरुष वर्ग नारी की भूमिका का विस्तार नहीं चाहता है. उसे भय है कि नारी अभ्युदय से उसका महत्व और एकाधिकार समाप्त हो जाएगा. अशिक्षा और रुढ़िवादी दृष्टिकोण ने नारी की भूमिका की स्थिति को शौचनीय बना रखा हैं.

नारी शिक्षा का महत्व

शिक्षित नारी तो दो कुलों का उद्धार करती हैं. नारी को अशिक्षित रखकर राष्ट्र की आधी क्षमता का विनाश किया जा रहा हैं. शिक्षित नारी ही बच्चों का लालन पोषण ठीक ढंग से कर पाती हैं. वह बच्चों में अच्छे संस्कार उत्पन्न कर सकती हैं. उसे समाज में सभ्य ढंग से जीना आता हैं. शिक्षा, नारी में आत्मविश्वास पैदा करती हैं. और बुरे दिनों में उसकी सबसे विश्वसीय सहायिका बनती हैं.

शिक्षित नारी की भूमिका

नारी शिक्षा का देश में जितना प्रचार प्रसार हुआ हैं. उसका श्रेष्ठ परिणामों सभी के सामने हैं. आज नारी जीवन के हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करने की क्षमता रखती हैं. शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, धर्म, समाज सेवा और सेना में भी आज नारी प्रशन्सनीय भूमिका निभा रही हैं.

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी नारी चेतना करवट ले रही हैं. उनको स्थायी स्वशासन में 30 प्रतिशत भागीदारी का अधिकार मिल गया हैं. किन्तु यहाँ भी अशिक्षा ने उसकी भूमिका को पृष्टभूमि में डाल रखा हैं. पंचायतों में उसके प्रतिनिधि ही भाग ले रहे हैं. नारी आज सफल व्यवसायी हैं, प्रबन्धक, अध्यापक है, वकील है, मंत्री है, प्रधानमंत्री है, राज्यपाल है, मुख्यमंत्री हैं, वैज्ञानिक है तथा साहसिक अंतरिक्ष अभियानों में पुरुषों से होड़ लेती हैं. कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं.

शिक्षित नारी का आदर्श स्वरूप

भारतीय नारी ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को प्रमाणित किया हैं. कुछ महिलाएं शिक्षित होने का अर्थ कतिपय हास्यास्पद क्रियाकलापों से जोड़ लेती हैं. उनके अनुसार विशेष वेशभूषा अपनाना, फैशन परेडो और किटी पार्टियों में भाग लेना ही शिक्षा और प्रगतिशीलता की निशानी हैं.

भारतीय नारी के कुछ महत्वपूर्ण दायित्व हैं. उसे अपने विशाल नारी समाज को आगे बढ़ाना हैं. देश की ग्रामीण बहिनों को उनके अज्ञान एवं अंधविश्वासों से मुक्ति दिलानी हैं. हमें अपनी खेल सम्बन्धी महान परम्पराओं की पुनः स्थापना करनी हैं.

नारी सशक्तिकरण निबंध 3

यदि हम अपने देश की ही बात करे तो आए दिन प्रति हजार लोगों पर स्त्रियों की संख्या निरंतर कम ही होती जा रही हैं. इसका दूसरा पहलु सरकार की ओर से कथित दलीले हैं. सरकार के कथनानुसार गाँव के लोगों तक 100 फीसदी शिक्षा पहुच चुकी हैं. जिससे कारण बालिका शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के विषय में लोगों में जागरूकता बढ़ रही हैं.

मगर आज की स्थति बया करती है, आज भी कई जातिया ऐसी हैं जहाँ लडको की संख्या अधिक और लड़कियों की संख्या में कमी हैं. मजबूरन अब लोगों को अपनी जाति की परिधि से बाहर निकलकर शादी ब्याह करना पड़ता हैं. सभव हैं अभी भी स्थति नियंत्रित की जा सकती हैं. फिर भी हम नही जगे, तो जिस तरह जीवो की प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं. जिनमे कल बेटियों का नाम भी आ सकता हैं.

बेटी हम सभी के घर में उजाले का दीपक हैं, भला वो भी तो इंसान हैं. वह इस संसार की जगत जननी हैं. जिनकी रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य भी हैं. इसलिए आज हम सभी यह सकल्प करे कि कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाते हुए, इन्हे भी बेटों की तरह जीने का अधिकार देगे.

नारी सशक्तिकरण हिंदी निबंध 4

संकट एवं चुनौतियों का मुकाबला करने में महिलाएं अपने शौर्य और पराक्रम में कभी पीछे नही रही हैं. इन्होने सदा ही आगे बढ़कर चुनौतियों का न केवल समझदारी के साथ सामना किया हैं, बल्कि इन्हें अपने साहस एवं सूझ बुझ से परास्त भी किया हैं.

जब भी राष्ट्र एवं विश्व मानवता पर संकट के बादल छाएँ है युवतियों के शौर्य ने ही प्रचंड प्रभजन बनकर इन्हें छिन्न भिन्न किया हैं.

कथाएँ वैदिक इतिहास की हो या फिर उपनिषदों की अथवा आधुनिक समय की, सभी ये ही सच बताती हैं कैकेय राज्य की राजकुमारी अप्रतिम यौद्धा था. एक भीषण युद्ध में कैकेयी ने अपनी जान पर खेलकर अपने पति दशरथ की जान बचाई थी. जगन्माता सीता युद्धकला में अत्यंत निपुण थी. रणचंडी दुर्गा और महाकाया काली का शौर्य तो सर्वविदित हैं.

वैदिककाल में महिलाओं को न केवल ज्ञान प्रदान किया जाता था, बल्कि उन्हें युद्ध की कला एवं कुशलता में पारंगत होने के लिए विधिवत प्रशिक्षण भी दिया जाता था. अतः वैदिक काल की महिलाएं किसी भी पराक्रमी युवा से कम नही होती थी. अपने देश का प्राचीन इतिहास महिलाओं के शौर्य एवं पराक्रम से भरा पड़ा हैं.

ऐसी अनगिनत घटनाएं है जिनमें महिलाओं ने अपनी रणकुशलता एवं समझदारी से हारी बाजी को जीत में बदल दिया और इतिहास की धारा को मोड़ने में सक्षम और समर्थ हो सकी. घुड़सवारी, तलवारबाजी, धनुषविद्या जैसी अनेक युद्धकलाओं में पारंगत अनेकों वीरांगनाओं के नाम इतिहास में दर्ज है अमर हैं.

भारत में नारी सशक्तिकरण का इतिहास (mahila sashaktikaran in hindi)

भारत के स्वतंत्र होने का इतिहास भी इस तथ्य का साक्षी हैं वर्ष 1857 से वर्ष 1947 तक लम्बे स्वतंत्रता संघर्ष में देशवासियों के ह्रदय में देशभक्ति एवं क्रांति की भावों को आरोपित करने वाले युवाओं के साथ युवतियों की भूमिका भी सराहनीय रही. वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई भी थी.

उनके समान अद्भुत साहस, शौर्य, पराक्रम एवं जज्बा आज भी किसी में देख पाना संभव नही हैं. जबकि रानी लक्ष्मीबाई तो तब मात्र 30 वर्ष की थी. उनकी सेना की एक और जाबाज झलकारीबाई युवती ही थी. उन्ही की प्रेरणा से सुंदर, मुंदर, जूही, मोतीबाई जैसी नृत्यांगनाएं क्रांति की वीरांगनाएँ बन गई. स्वाधीनता की बलिवेदी पर स्वयं का सर्वस्व लुटाने वाली ये वीरांगनाएं आज भी किसी प्रेरणा से कम नही हैं.

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