बाज पर कविता Poem On Eagle In Hindi

बाज पर कविता Poem On Eagle In Hindi : अपनी ऊँची हौसलों की उड़ान के लिए बाज जाना जाता हैं. यह अन्य पक्षियों की तुलना में गगन की ऊँचाइयों को नापते हुए अपनी पैनी नजर से धरती पर शिकार भी कर लेता हैं.

एक ही साहसपूर्ण झपट्टे में बड़े से बड़े जीव को अपने पंजों में दबाकर उड़ लेता हैं. गिद्धों की भांति यह दूसरे जीवों द्वारा किये शिकार को खाना पसंद नहीं करता हैं.

राजशाही ठाठ से जीवन जीने वाले बाज के जीवन से हम शिक्षा ले सकते हैं. आज की बाज कविता में हम स्टूडेट्स के लिए प्रेरणा देने वाली कुछ शोर्ट ईगल पोएम्स यहाँ साझा कर रहे हैं.

बाज पर कविता Poem On Eagle In Hindi

बाज पर कविता Poem On Eagle In Hindi

अगर नाप सको
नीले गगन की ऊँचाई
बेधड़क-बेखौफ।
चप्पे-चप्पे पर
रख सको नज़र।
सामर्थ्य और औकात का
कर सको
सही-सही अंदाज़।
बिना बनाये नहाना
तलाश कर लक्ष्य
साध सको निशाना।
पल में भर सको
इतनी तेज परवाज़
कि पीछे रह जाए आवाज़।
तभी,
केवल तभी
पूरा कर सकोगे काज
ज़मानी को होगा तुम पर नाज़
आदमी होते हुए भी
कहला सकोगे बाज़।

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बाज / राखी ओझा

सुनों गौरैयां नही बाज हूं मै,
कहा सिसकिया हू आवाज़ हू मै |
मेरें विस्तृत पंखो की छांव को तो देख़ो,
धरती पर चलती आकाश हू मै |

दे दाना पानी तुम मुझें पकड सकते नही ,
स्वर्णं पिंजरे में रख जकड सकते नही ,
कैंद रहना मैने सीखा ही कहा ,
इन हवाओ से व्याप्त आजाद हूं मै |

मेरा ज़न्म भी हुआ आसमा के लिये ,
मुझ़मे है कुछ नशा दास्तां के लिये ,
मेरें इन परों मे गज़ब का है बल ,
नही रेगना परवाज हू मैं |

मै नही महज़ आंगन सज़ाने के लिये ,
सज़ संवर नाज नख़रे दिखाने के लिये ,
मै आयी यहा कुछ पानें के लिये ,
ना रख कदमो तले सुन ताज़ हूं मैं |

मुझें नापना हैं सागरो को अभी ,
झाकना है मुझें बादलो पर अभी ,
लगानी हैं होड इन तूफानो से ,
टकराना हैं अभी कई चट्टानो से ,
नही मै अंत नही आगाज हूं मैं |

टूट जानें दो पंख़ मेरे टूटे गर ,
यह लय सांस की मुझ़से रूठें अगर ,
थक हारक़र बैठना मुझें गवारा नही ,
बेबाक हूं कहा लाज़ हूं मै |

सुनो गौरैयां नही बाज़ हू मैं,
कहा सिसकियां हूं आवाज़ हूं मैं |

बाज कहाँ आता है बाज / मधुसूदन साहा

लाख़ इसे तुम पाठ पढाओं
बाज़ कहां आता हैं बाज़?

कभीं पक्षीयो के मज़िलस मे
बन ज़ाता सब़का सरदार,
कभीं दूर क्षितिज़ो पर जाक़र
ढूढ़ा करता नया शिक़ार,

झ़ट दबोच लेता पन्जे मे
दुष्टो का हैं यह सरताज़।

लम्बे-चौडे पंख़ पसारे
नापा क़रता हैं आकाश,
कभीं भूल से नही फ़टकती
छोटी चिडिया इसकें पास,
सब पक्षी मे सब़से ज़्यादा
यहीं दिख़ता फुर्तीबाज।

पके् धान के खेतो मे ज़ब
दिख़ता चुहिया का परिवार
उपर से नीचें आ ज़ाता
पलक झ़पकते गोतामार

यह भी भारत कें सैनिक़-सा
सदा दिख़ता हैं जाबाज

बाज़ की अन्तिम उड़ान कविता

तितलियाँ उड़ रही थीं ।

पूरी रात चली आँधी और असमय बारिश से ठंडी पड़ी ज़मीन पर
हल्की हवा में झूमती घासें अपनी धुन में मगन थीं ।

उनसे सिर्फ़ दो फ़ुट ऊपर पीली सफ़ेद तितलियाँ
हवा के साथ ऊपर-नीचे होते भुओं से
खेलती हुई नाचती हुई उड़ रही थीं ।

ऊपर हाई टेंशन तारों की सनसनाहट थी
लेकिन माहौल में कुछ सनसनी इसके अलावा भी थी ।
पास के फुटपाथ पर एक बाज़ पड़ा था ।

सबसे पहले कौओं को ख़बर लगी ।
उन्होंने उसकी शक़्ल पहचानी या शायद गंध से ही ताड़ गए ।
बात की बात में पूरा इलाका जान गया कि कहीं कुछ गड़बड़ है ।

बाज़ को ऊपर जारी हलचलों का अंदाज़ा था
लेकिन उसके लिए यह कोई नई बात नहीं थी ।
हलचलें हमेशा उसके साथ चलती थीं
सिर्फ़ उसका ज़मीन पर होना ही वहाँ एक नई बात थी ।

थोड़ी देर में कुछ इंसान उधर से गुज़रे
फुटपाथ पर लत्ते के ढेर-सी पड़ी भूरी-सलेटी चीज़ पर उनका ध्यान गया ।
ओह, यह तो चिड़िया है, शायद कोई चील
फिर वे उसकी चोंच पर अटक गए कि यह तो कुछ और ही है ।

बाज ने उन्हें इतने क़रीब पाकर सिर उठाया ।
अपनी खूँखार नज़रों से उन्हें घूरकर देखा
और झुक गया यह सोचकर कि इससे ज़्यादा अब उससे नहीं हो पाएगा ।

पिछली रात का अंधड़ बहुत खतरनाक था
इंसानों ने बात की- यह बाज़ शायद उसी का मारा है ।

एक ने कहा, यह बड़े शिकार मारने वाली ऊँचे पहाड़ों की चिड़िया है
गौरैया पकड़ने वाला कोई छोटा-मोटा बाज़ नहीं,
जो इस इलाके में आए दिन दिख जाते हैं ।

दूसरे ने कहा, बड़ी चिड़ियों पर तो वैसे भी कजा मंडरा रही है
कहीं ऐसा तो नहीं कि यह अपनी नस्ल का अकेला जीव हो ।
तीसरा बोला, यहाँ तो थोड़ी ही देर में कौए और कुत्ते इसे चीथ डालेंगे ।
फिर वे वापस लौटे और बाज़ को उड़ाने की कोशिश करने लगे ।

घायल बाज़ को लगा कि इतनी दुर्गत एक जनम के लिए काफ़ी है ।
हिम्मत करके उसने एक-दो डग भरे
फिर हुमक कर उड़ा
हवा के साथ भुओं और तितलियों को भी अपने पंख से पछोरता हुआ ।

ज़मीन से सिर्फ दो फुट ऊपर अजीब लड़खड़ाहटों भरी
कोई दो सौ गज लंबी यह उसकी अंतिम उड़ान थी ।

इतनी ही दूर खड़ी बेतरतीब झाड़ियाँ उसकी बाट जोह रही थीं ।
अजनबी इलाके में हर ओर से घिरा अकेला पक्षी
किसी सनसनाते पत्थर की तरह झाड़ियों में गिरा
और अपनी कहानी के बेहतर अंत का इंतज़ार करने लगा ।

Hihindi पर दोस्तों आपका हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन हैं. यहाँ हम हिंदी कविता के सेक्शन में नित्य विविध अलग अलग विषयों पर हिंदी की कविताएँ प्रस्तुत करते हैं.

ये हमारी मूल रचनाएं नहीं हैं. इन कविता रचनाओं को अलग अलग स्रोतों से आप सभी पाठकों के लिए संग्रह के रूप में प्रस्तुत करते हैं.

हमें आशा हैं आज के आर्टिकल में बाज कविताओं की पंक्तियों को आप लाइक करेंगे तथा इन्हें अपने फ्रेड्स के साथ भी जरुर शेयर करेंगे.

योगेश मिश्रा की कविता ‘बाज़‘ | ‘Baaz’, a poem by Yogesh Mishra

एक बाज़ ने कब्ज़ाया है एक गाँव
जिसे बसाया था चिड़ियों ने
जिसमें रहते थे घोंसले
बिखरते थे तिनके
महकती थी ख़ुशबू
गूँजती थीं कोयलें
धीमी हवाओं में
झूमती थीं फ़सलें

बाज़ ने बदले हैं कुछ नियम
चीलों को दिए हैं नए घर
बिखेर दिए हैं माँस के लोथड़े
गँध से सड़ रही है हर गली
ख़ुशियाँ हैं गुमनाम
चीख़ है शहर की नयी पहचान
हवाओं में तैरते हैं अब सिर्फ़ ख़ंजर
झूमते खेत अब हैं बंजर

बाज़ ये कहता है
हिफ़ाज़त है इसका नाम
सीमाएँ हैं सुरक्षित
पुख़्ता है इंतज़ाम
अब कोई बाहरी
नहीं कर पाएगा परेशान
अधूरी पड़ी इमारत का
तामीरख़ाना रखा गया है नाम

बाज़ को पसंद नहीं हैं आवाज़ें
चीख़ें भी वो बस देखता है
पीठ कर के घोंसलों की तरफ़
आमीन-आमीन कहता है
बाज़ के गुट में हैं कुछ गिद्ध
शहर की आँख नोचना हैं जिनके सपने
बाज़ चिड़ियों को सिखाता है
गिद्ध भी तो हैं अपने

बाज़ ख़त्म कर देगा
शहर के रंगों को
नोच खाएगा
ख़िलाफ़त में उठते अंगों को
जब अपने घर में भी
सिर्फ़ डर होगा, क़हर होगा
आसमान में उड़ेंगें गिद्ध और चील
वो बाज़ के सपनों का शहर होगा।

मित्रों भले ही अन्य पक्षियों की भांति एक पक्षी हैं. मगर इसका साहस और बुलंद हौसलों की उड़ान मानव के लिए नित्य प्रेरणा दायी रहती हैं.

हम अपने जीवन में बाज की भाँती अपनी क्षमता यानी पंखों पर यकीन करे तो आसमान की बुलंदियों को स्पर्श कर सकते हैं. बाज की नजर और अपने शिकार को पकड़ने की कला भी विरली ही होती हैं.

पांच किलोमीटर की दूरी से ही बाज अपने शिकार पर नजरें गाड़ लेता हैं. सैकड़ों मीटर की उंचाई पर होने के उपरांत भी वह स्वयं को उतनी तीव्र से नीचे लाकर शिकार पर आक्रमण करता हैं कि उस जीव को अपनी मृत्यु के अंतिम समय तक आभास नहीं हो पाता हैं.

हम मनुष्यों को भी अपने लक्ष्य के प्रति इतने सजग एवं कर्तव्य निष्ठ बनने की आवश्यकता हैं. भले ही हम अपने प्रयास में सफल न हो, मगर हमारे प्रयास पूर्ण क्षमता से किये जाने चाहिए.

Baaz Log Kavita in hindi

बाज लोग जिनका कोई नहीं होता
और जो कोई नहीं होते
कही के नहीं होते
झुण्ड बनाकर बैठ जाते कभी कभी
बुझते आलाबों के चारो तरफ
फिर अपनी बेडौल खुरदरी अश्वस्त
हथेलिया पसार कर
वे सिर्फ आग नहीं तापते
आग को देते हैं आशीष
कि आग जिये
जहाँ भी बची वह जीती रहे
और खूब जिये

बाज लोग जिनका कोई नहीं होता
और जो कोई नहीं होते
कही के नहीं होते
झुण्ड बांध कर चलाते हैं फावड़े

और देखते देखते उनके
उबड खाबड़ पैरो तक
धरती की गहराइयों से
एकदम उमड़े आते हैं
पानी के सोते

बाज लोग सारी बजिया हार कर भी
होते है अलमस्त बाजीगर

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