तात्या टोपे का इतिहास | Tatya Tope History in Hindi

तात्या टोपे का इतिहास | Tatya Tope History in Hindi : वतन की खातिर कुबार्नी देने की भारत में अटल परम्परा रही हैं, सदियों तक अंग्रेजों के साथ चली देश के क्रांतिकारियों की जंग में हजारो वीरों को अपना बलिदान देना पड़ा था उन्ही में से एक थे तात्या टोपे. 1857 में अंग्रेजों से पहली आजादी की जंग लड़ने वाले वीरों में झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, तात्या और नाना साहब का नाम अवश्य ही लिया जाता हैं. Tatya Tope शहीद दिवस पर हम आपकों उनके जीवन परिचय इतिहास, जीवनी परिवार के बारें में संक्षिप्त बायोग्राफी उपलब्ध करवा रहे हैं.

तात्या टोपे का इतिहास | Tatya Tope History in Hindi

तात्या टोपे का इतिहास | Tatya Tope History in Hindi
पूरा नामरामचंद्र पांडुरंग येवलकर
उपनामतात्या टोपे
जन्म1814
स्थानयेवला गाँव (नासिक)
माता-पितापिता पांडुरंग त्रयम्बक और माता रुक्मिणी बाई
मृत्यु18 अप्रैल 1859

Details About Tatya Tope

short story about Tatya Tope Biography in Hindi : तात्या टोपे का जन्म सन 1814 में हुआ था, उनका पूरा नाम रघुनाथ राव पांडु यवलेकर था. सन 1818 में पेशवाई सूर्य अस्त हो चुका था. अंग्रेजों द्वारा पेशवा बाजीराव को आठ लाख रूपये पेंशन देकर कानपुर के निकट बिठूर भेज दिया था.

उस समय बालक रघुनाथ की अवस्था मात्र चार वर्ष की थी. पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब के साथ ही इनका लालन पोषण हुआ. नाना साहब के बाल सखा होने के कारण दोनों में अटूट प्रेम था, यही कारण था कि क्रांति के समय भी तात्या टोपे पेशवा के दाहिने हाथ बने रहे.

जून 1858 से लेकर 1859 तक टोपे अंग्रेजों के विरुद्ध पूरी शक्ति से लड़ते रहे, कभी उनके पास तोपें होती तो कभी एक बंदूक भी नहीं राहत. सेना के नाम पर मुट्ठी भर साथी ही रह जाते.

ग्वालियर की पराजय के बाद तात्या टोपे उबड़ खाबड़ भूभागों में अंग्रेजी सेना का सामना करते रहे. बिना युद्ध सामग्री के बिना किसी विश्राम के अपनी सेना सहित एक स्थान से दुसरे स्थान पर अंग्रेजी सेना को छकाते हुए तात्या टोपे घूमते रहे.

सीकर के युद्ध के बाद तात्या का भाग्य सूर्य अस्त हो गया. राव साहब और फिरोजशाह उनका साथ छोड़ गये. निरुपाय होकर उन्होंने तीन चार साथियो के साथ नरवर राज्य में पारोंण के जंगल में अपने मित्र मानसिंह के पास जाकर चरण ली.

7 अप्रैल 1859 को तात्या टोपे राजा मानसिंह के विश्वासघात के कारण मेजर मीड द्वारा गिरफ्तार कर लिए गये. उस समय उनके पास एक घोडा, एक खुखरी और सम्पति के नाम पर ११८ मुहरें थी. बंदी अवस्था में तात्या टोपे को सीप्री लाया गया. वहां उन पर एक सैनिक अदालत में मुकदमा चलाया गया और उन्हें प्राणदंड दिया गया.

18 अप्रैल 1859 की शाम 5 बजे तात्या को फांसी के तख्ते पर लाया गया, वहां अपने आप ही फांसी के तख्ते पर चढ़ गये और अपने ही हाथों फांसी का फंदा गले में डाल दिया और भारत माता का यह रणबांकुरा फांसी के फंदे पर झूल गया.

कैसे पड़ा तात्या टोपे नाम 

बड़े हो जाने पर अपने मुंशी का काम करने के लिए पेशवा ने तात्या टोपे को अपने यहां पर रख लिया और मुंशी का पद पाने के बाद तात्या ने ईमानदारी से अपना काम करते हुए राज्य के एक भ्रष्टाचारी व्यक्ति को पकड़ा, जिस पर पेशवा ने खुश होकर के एक तात्या टोपे को सम्मान के तौर पर प्रदान की और यही टोपी प्राप्त हो जाने के बाद इनका नाम तात्या हो गया, जिसके बाद लोगों ने उनके मूल नाम की जगह पर उन्हें टोपे कहने लगे। ऐसा भी कहा जाता है कि पेशवा ने जो टोपी दी थी, उसमें बहुत सारे हीरे भी लगे हुए थे।

तात्या और रानी लक्ष्मी बाई 

जब अंग्रेजों ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के गोद लिए हुए पुत्र को उनकी संपत्ति का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया तब इस बात से तात्या काफी ज्यादा गुस्सा हुए थे और उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने का डिसीजन लिया।

बता दे कि साल 1857 के अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोह में लक्ष्मीबाई ने भी काफी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था और यही वजह है कि अंग्रेजी हुकूमत विद्रोह से संबंधित हर व्यक्ति की आवाज को खामोश करना चाहती थी।

इसी के परिणाम स्वरूप ब्रिटिश सेना ने झांसी पर आक्रमण कर दिया और जब ब्रिटिश सेना के आक्रमण की जानकारी तात्या को हुई तो, उन्होंने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए अपनी सेना को साथ लिया और झांसी की तरफ चले गए और किसी प्रकार से लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों के शिकंजे से बचा लिया।

इस लड़ाई में सफलता हासिल करने के बाद तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई कालपी की तरफ चली गई और वहां पर उन्होंने एक नई रणनीति के तहत अंग्रेजो से लड़ने के लिए जयाजीराव सिंधिया के साथ हाथ मिला लिया, जिसके बाद इन लोगों ने मिलकर के ग्वालियर के किले पर अपना अधिकार जमा लिया।

तात्या को फांसी देने की कहानी

ऐसा भी कहा जाता है कि जब पाड़ौन के जंगलों में तात्या विश्राम कर रहे थे तभी ब्रिटिश सेना वहां पर अचानक से आ पहुंची और उन्होंने टोपे को गिरफ्तार कर लिया, जिसके बाद इनके ऊपर मुकदमा चलाया गया और दोषी पाए जाने पर इन्हें फांसी की सजा सुना दी गई। इस प्रकार 1859 में 18 अप्रैल के दिन तात्या को अंग्रेजी हुकूमत के आदेश पर फांसी पर चढ़ा दिया गया।

तात्या टोपे के जीवन पर बने नाटक और फिल्में 

ज़ी टीवी चैनल पर झांसी की रानी नाम का एक कार्यक्रम आता था जिसमें टोपे की भूमिका भी दिखाई गई थी। इस सीरियल में टोपे की भूमिका अभिनेता अमित पचौरी ने निभाई थी।

इसके अलावा कंगना रनौत के द्वारा अभिनीत मणिकर्णिका फिल्म में भी अभिनेता अतुल कुलकर्णी ने तात्या की भूमिका अदा की थी। बता दे कि इस फिल्म का पूरा नाम मणिकर्णिका झांसी की रानी है, जो रिलीज हो चुकी है जिसे आप यूट्यूब या फिर कहीं पर भी देख सकते हैं।

भारत सरकार द्वारा दिया गया सम्मान

हमारी भारतीय गवर्नमेंट के द्वारा भी टोपे ने जो संघर्ष किया था, उसे याद रखा गया है और इसीलिए तात्या को सम्मान देने के लिए भारतीय गवर्नमेंट के द्वारा तात्या टोपे के नाम पर एक डाक टिकट भी जारी किया गया था जिसके ऊपर तात्या टोपे की फोटो छापी गई थी।

इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि तात्या टोपे मेमोरियल पार्क भी मध्यप्रदेश में बनाया गया है जहां पर इनकी एक मूर्ति भी स्थापित की गई है ताकि पार्क में घूमने आने वाले लोगों को इस बात की जानकारी हो सके कि कैसे टोपे ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान की थी।

FAQ: 

Q: तात्या का जन्म कहां हुआ था?

ANS: महाराष्ट्र के पटोदा जिले में

Q: तात्या का जन्म कब हुआ था?

ANS: 1814

Q: तात्या टोपे की मौत कहां हुई थी?

ANS: मध्य प्रदेश राज्य के शिवपुरी जिले में

Q: तात्या कौन थे 

ANS: भारत के स्वतंत्रता सेनानी

Q: तात्या का असली नाम क्या था?

ANS: रामचंद्र पांडुरंग येवलकर 

Q: तात्या का धर्म क्या था?

ANS: हिंदू

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