जलवायु परिवर्तन पर निबंध | Essay on climate change

Essay on climate change– आज की वैश्विक परिस्थति में जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा हैं. जलवायु परिवर्तन की समस्या आज किसी देश महाद्वीप अथवा क्षेत्र तक सिमित न होकर विश्व स्तर पर विकराल रूप ले चुकी हैं. जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए आज सयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में सभी देशो को मिलकर सतत कदम उठाने की आवश्यकता हैं.

जलवायु परिवर्तन पर निबंध (Essay on climate change)

जलवायु परिवर्तन क्या हैं (What are climate change) सबसे पूर्व हमे यह जानना जरुरी हैं. आखिर यह समस्या हैं क्या. सामान्य मौसम अभिव्रतियो में किसी स्थान पर होने वाले कुछ ख़ास बदलावों को जलवायु परिवर्तन कहा जाता हैं. अचानक मौसम में परिवर्तन आ जाना,फसल के नियमित क्रम में बड़े बदलाव आना, कम संख्या में उपलब्ध वन्य जीवो और पेड़ पौधो का लुप्त हो जाना, वैश्विक तापमान में वृद्धी, हिमनद का पिघलना, और समुद्र के सतह में जल के स्तर की निरंतर वृद्धी ये जलवायु परिवर्तन के घातक संकेत हैं. इन सभी में ग्लेशियर का पिघलना सबसे बड़ी समस्या हैं, जिसके कारण समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी और अनियंत्रित बाढ़ बड़े सवेदनशील और चिंतनीय विषय हैं.

हिमनद मोनिटरिंग सर्विस के कई विगत वर्षो की रिपोर्ट्स में हर बार इनके लगातार पिघलने की भयानक रिपोर्ट मानव जीवन पर आने वाले सबसे बड़े सम्भावित खतरे की घंटी हैं.

जलवायु परिवर्तन के कारण (causes of climate change )

क्लाइमेट चेज के पीछे कोई एक मुख्य कारण नही हैं जिन्हें इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके, वैसे हमारे पर्यावरण में ग्रीन हाउस गैस के बढ़ते प्रभाव को सबसे मुख्य कारण समझा जाता हैं. सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली किरणें पृथ्वी के बाहरी वातावरण में चली जाती हैं. इस उर्जा की कुछ मात्रा में ग्रीन हाउस की गैसों द्वारा अवशोषित होकर हमारे ग्रह पर पहुच जाती हैं.जिसके कारण तापमान में अनुक्रमता बनी रहती हैं. ग्रीन हाउस गैसों में मीथेन, कार्बनडाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड आदि शामिल हैं.

हमारे पर्यावरण में वैसे तो इन ग्रीन हाउस गैसों का होना आवश्यक हैं, मगर एक संतुलन से अधिक मात्रा में होने के कारण कई समस्याओं को जन्म दे देता हैं, जिनमे तापमान में बढ़ोतरी मुख्य हैं, जिन्हें आम बोलचाल में ग्लोबल वार्मिंग भी कहा जाता हैं. आज के समय में ग्लोबल वार्मिंग जलवायु परिवर्तन का अहम रूप हैं.

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विभिन्न शोधों से यह ज्ञात हो चूका हैं,कि पृथ्वी एकमात्र ऐसा ग्रह हैं जहाँ जीवन संभव हैं. हमारे वातावरण में 78% नाइट्रोजन 21 प्रतिशत ऑक्सीजन तथा तीन प्रतिशत प्राणवायु ऑक्सीजन के अतिरिक्त शेष 1 फीसदी में शेष सभी गैस आती हैं. इस प्रकार के गैसीय संतुलन के कारण जीवन में प्रकृति साधारण व्यवहार करती हैं, जबकि किन्ही गैसों की मात्रा बढ़ जाने या घट जाने से यह संतुलन बिगड़ जाता हैं.

जिससे जीवन के लिए संकट उपस्थित हो जाता हैं. इस प्रकार की परिस्थतिया 17 वी शताब्दी में यूरोप और पश्चिमी देशो में शुरू हुई ओद्योगिक क्रांति के बाद मुख्य रूप से सामने आने लगी. दौर के आगे बढ़ने के साथ ही इक्कीसवी सदी आने तक प्राकृतिक संसाधनो के अनियमित उपयोग और स्वहित में पर्यावरण को नुकसान पहुचाने के कारण आज जलवायु का पूर्ण चक्र प्रभावित हो चूका हैं. बढे हुए प्रदूषण के कारण कई नई जानलेवा बीमारियों का जन्म भी इसी समय के दौरान हुआ.

जलवायु परिवर्तन के उपाय

जलवायु परिवर्तन, बढ़ते हुए तापमान और प्रदूषण से उत्पन्न विकट स्थतियो से निपटने के लिए 20 वी सदी के अंतिम दशकों में यूएनओ और अन्य राष्ट्रों द्वारा जलवायु परिवर्तन को लेकर कई कारगर कदम उठाए. पर्यावरण प्रदूषण और ओजोन परत में छिद्र के गंभीर विषयों के लिए 1985 में वियना सम्मेलन हुआ. इसमे लगभग सभी देशो के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और एक सामूहिक प्रयास के लिए कुछ पर्यावर्णीय नीतिया बनाई गईं. अगले तीन वर्षो तक लगभग वियना सम्मेलन में सम्मलित सभी देशों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए.

इस प्रयास के बाद कई समझौते और सम्मेलन अनेक देशों के शहरों आयोजित किये जा चुके हैं. वैश्विक जलवायु परिवर्तन की बढ़ती समस्या को ध्यान में रखकर विश्व मौसम सगठन और सयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने मिलकर ने मिलकर 1988 में इंटरगवर्नमेंट ओनं क्लाइमेट चेंज ipcc का गठन किया.यह विश्व स्तरीय संगठन जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार अंतराष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य करता हैं. विश्व मौसम सगठन WWO और सयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के आज 200 से अधिक राष्ट्र सदस्य हैं. यह वैश्विक जलवायु परिवर्तन इसके प्रभाव और अनुकूल उपायों पर वैज्ञानिक निदान प्रस्तुत करने का कार्य करता हैं.

इस सगठन के सक्रिय योगदान से जलवायु परिवर्तन में तेजी से आ रहे बदलावों और मानवीय गतिविधियों तथा आने वाले सम्भावित खतरों के उपाय खोजने में मदद मिलती हैं. यह न शोध कार्य कर आकड़े संग्रह करता हैं बल्कि जबकि जलवायु परिवर्तन को लेकिन मोनिटरिंग के साथ साथ आकलन की रिपोर्ट भी तैयार करता हैं.जो वैज्ञानिक ढंग से निकाले गये तथ्यों पर आधारित होती हैं. इस सगठन के कार्यो के महत्व को समझते हुए UNO द्वारा इसे 2007 में शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया.

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बढ़ते हुए वैश्विक तापमान तथा इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार विकसित राष्ट्रों को ग्रीन हाउस गैसों के कम उत्सजर्न के सम्बन्ध में वर्ष 1997 में जापान में सभी विकसित देशो के लिए क्योटो प्रोटोकोल तय किया गया था. वर्ष 1992 में जापान के शहर रियो डी जेनेरियो में सयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ. इस बार पहली दफा विश्व के सभी देशो पर बहुपक्षीय विधिक व्यवस्था को लेकर सहमति बनी.

इसे 1997 का क्योटो प्रोटोकोल संधि भी कहा जाता हैं, 2005 में इस संधि को सभी देशो ने लागू कर दिया. 2012 तक 5.2 फीसदी तक ग्रीन हाउस गैसों के कम उत्सर्जन का लक्ष्य रखा गया. इस संधि से आज विश्व के सभी विकसित देशो पर इन गैसों के कम मात्रा में उत्पादन का दवाब हैं. आसियान के 2007 के शिखर सम्मेलन पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, और सतत विकास से जुड़े इस कार्यक्रम में 180 से अधिक मुल्को ने भाग लिया था. इस 13 वें आसियान सम्मेलन में क्योटो प्रोटोकाल 1997 की आगे की रणनीति पर गहन विचार विमर्श किया गया था. इसके बाद 2009 में आयोजित कोम्पेहेगन सम्मेलन का मुख्य विषय जलवायु परिवर्तन ही था.

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 2017

इस वर्ष जलवायु परिवर्तन का वैश्विक सम्मेलन मोरक्को में आयोजित हुआ था. इस सम्मलेन की समाप्ति के अवसर पर सभी सदस्य राष्ट्र एक बात पर सहमत थे, कि वर्ष 2018 तक पेरिस समझौते के नियम कानून बना दिए जाएगे. साथ ही भारत ने आदर्श शहर का खाका प्रस्तुत करते हुए सभी देशो को दोहा सम्मेलन में तय के गये कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन में कमी के आकड़ो को प्राप्त करने की ओर पहल करने का सुझाव दिया. इस बार जारी जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक, 2017 फ़्रांस 66 अंक के साथ शिखर पर बना हुआ हैं. वही 59 के स्कोर के साथ इस विश्व सूची में 20 वाँ स्थान हैं, भारत विश्व के कार्बन उत्सर्जन 10 देशो में सम्मलित हैं.

वस्तुतः जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक स्तरीय समस्या हैं, जिसे निपटने के लिए विश्व समुदाय को आगे आना होगा. इसके लिए सभी देशो को भी अपने स्तर पर स्थानीय प्रयास किये जाने चाहिए. विकास और पर्यावरण एक दुसरे के पूरक हैं, जिनके साथ सामजस्य बनाकर आगे बढ़ने की आवश्यकता हैं. संतुलित और स्वच्छ वातावरण के बिना मनुष्य का जीना दूभर हो जावेगा. वैसे विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनो का उपयोग भी आवश्यक हैं. मगर पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इसका उपयोग एक सीमा तक किया जाना चाहिए.

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