भारतीय संविधान पर निबंध हिंदी में | Essay on Indian Constitution in Hindi

प्रिय साथियो आपका स्वागत है Essay on Indian Constitution in Hindi में  हम आपके साथ भारतीय संविधान पर निबंध हिंदी में साझा कर रहे हैं. कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8,9,10 तक के बच्चों को भारत का संविधान पर सरल निबंध सरल भाषा  में लिखे गये  हिन्दी निबंध  को परीक्षा के लिहाज से याद कर लिख सकते हैं.

Essay on Indian Constitution in Hindi

भारतीय संविधान पर निबंध Essay on Indian Constitution in Hindi

किसी समाज के लिए बुनियादी नियमों का समूह उपलब्ध कराकर समाज में तालमेल बिठाने, समाज में शक्ति के मूल वितरण को स्पष्ट कर सरकार का निर्माण करने, सरकार की शक्तियों पर सीमाएं लगाने तथा नागरिकों को मूल अधिकार एवं मौलिक स्वतन्त्रता प्रदान करने,

सरकार को वह सामर्थ्य प्रदान करने जिससे वह कुछ सकारात्मक लोक कल्याणकारी कदम उठा सके एवं राष्ट्र की बुनियादी पहचान के लिए संविधान की अत्यंत आवश्यकता हैं. संविधान अपने कामों से समाज की इन आवश्यकताओं की पूर्ति करता हैं.

संविधान का अर्थ– संविधान वह दस्तावेज या दस्तावेजों का पुंज हैं जो यह बताता हैं कि राज्य का गठन कैसे होगा और वह किन सिद्धांतों का पालन करेगा. भारत का संविधान जहाँ एक लिखित संविधान हैं वहीँ इंग्लैंड का संविधान दस्तावेजों एवं निर्णयों की एक लम्बी श्रंखला के रूप में हैं. जिसे सामूहिक रूप से संविधान कहा जाता हैं.

संविधान की आवश्यकता व कार्य

संविधान तालमेल बिठाता हैं- संविधान का पहला काम यह हैं कि वह बुनियादी नियमों का एक ऐसा संमूह उपलब्ध कराए जिससे समाज के सदस्यों में एक न्यूनतम समन्वय और विश्वास बना रहे.

किसी भी समूह  को  सार्वजनिक रूप से मान्यता प्राप्त कुछ बुनियादी नियमों की आवश्यकता होती हैं. जिसे समूह के   सदस्य जानते हो, ताकि आपस में एक न्यूनतम समन्वय बना रहे, लेकिन ये नियम केवल पता ही नहीं होने चाहिए वरन उन्हें लागू भी किया जाना चाहिए.

इसलिए जब इन नियमों को न्यायालय द्वारा लागू किया जाता हैं,   इससे सभी को विश्वास हो जाता  हैं  कि और लोग भी इन नियमों का पालन करेंगे. क्योंकि ऐसा न करने पर उन्हें दंड दिया जाएगा. संविधान ऐसे नियमों को न केवल उपलब्ध कराता हैं बल्कि उन्हें न्यायालय द्वारा लागू भी करवाता हैं.

निर्णय लेने की शक्ति का निर्धारण– संविधान का दूसरा काम यह स्पष्ट करना हैं कि  समाज में  निर्णय लेने की  शक्ति  किसके पास होगी संविधान यह भी तय करता हैं कि सरकार कैसे निर्मित होगी संविधान कुछ ऐसे बुनियादी सिद्धांतों का समूह हैं जिसके आधार पर राज्य का निर्माण और शासन का निर्माण होता हैं.

वह समाज में शक्ति के मूल वितरण को स्पष्ट करता हैं तथा यह तय करता हैं कि कानून कौन बनाएगा, राजा या एक दल विशेष या जनता या जनता के प्रतिनिधि. यदि यह काम जन प्रतिनिधियों द्वारा करना हैं तो संविधान यह भी तय करता हैं कि उन प्रतिनिधियों का चयन कैसे होगा और कुल कितने प्रतिनिधि होंगे. इस प्रकार संविधान सरकार का निर्माण करने वाली संस्था हैं.

सरकार की शक्तियों पर सीमाएं– संविधान का तीसरा काम यह हैं कि वह सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किये जाने वाले कानूनों की कोई सीमा तय करे. ये सीमाएं इस रूप में मौलिक होती हैं कि सरकार कभी उनका उल्लंघन नहीं कर सकती हैं.

संविधान सरकार की शक्तियों को कई प्रकार से सिमित करता हैं यथा

  • वह नागरिकों के मूल अधिकारों को स्पष्ट कर देता है ताकि कोई भी सरकार उनका उल्लंघन न कर सके.
  • वह नागरिकों को मनमाने ढंग से बिना किसी कारण गिरफ्तार करने के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता हैं.
  • वह नागरिकों को कुछ मौलिक स्वतंत्रताए प्रदान कर देता हैं जैसे भाषण की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता आदि.

व्यवहार में इन अधिकारों व स्वतंत्रताओं को राष्ट्रीय आपातकाल में सीमित किया जा सकता हैं और संविधान उन परिस्थतियों का भी उल्लेख करता हैं, जिनमें अधिकारों को वापिस लिया जा सकता हैं.

समाज की आकांक्षाएं और लक्ष्य– संविधान का चौथा काम यह हैं कि वह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करे जीससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए उचित परिस्थतियों का निर्माण कर सके.

आधुनिक संविधान निर्णय लेने की शक्ति के वितरण और सरकार की शक्ति पर प्रतिबन्ध लगाने के काम के साथ साथ एक ऐसा सक्षम ढांचा भी प्रदान करते हैं जिससे सरकार कुछ सकारत्मक कार्य कर सके और समाज की आकांक्षाएं और उसके लक्ष्य को अभिव्यक्ति दे सके.

उदहारण के लिए भारत के संविधान में मौलिक अधिकार और राज्य की नीति निर्देशक तत्व ऐसे ही प्रावधान हैं.

राष्ट्र की बुनियादी पहचान– संविधान किसी समाज की बुनियादी पहचान होती हैं अर्थात इसके माध्यम से किसी समाज की एक सामूहिक इकाई के रूप में पहचान होती हैं. संविधान द्वारा कोई समाज  कुछ बुनियादी नियमों और सिद्धांतों पर   सहमत होकर अपनी मूलभूत राजनीतिक पहचान बनाता हैं.

संविधान आधिकारिक बंधन लगाकर यह तय कर देता हैं कि कोई क्या कर सकता हैं और क्या नहीं. इस तरह संविधान उस समाज को नैतिक पहचान भी देता हैं. अधिकतर संविधान कुछ मूलभूत अधिकारों की रक्षा करते हैं. और ऐसी सरकारे संभव बनाते हैं जो किसी न किसी रूप में लोकतांत्रिक होती हैं.

लेकिन राष्ट्रीय पहचान की अवधारणा अलग अलग संविधानों में अलग अलग होती हैं. जहाँ जर्मनी के संविधान ने जर्मन नस्ल को नागरिकता की अभिव्यक्ति दी हैं. वहां भारतीय संविधान ने जातीयता या नस्ल को नागरिकता के आधार के रूप में मान्यता नहीं दी हैं. विभिन्न राष्ट्रों में देश की केंद्रीय सरकार और विभिन्न क्षेत्रों के बीच सम्बन्धों को लेकर विभिन्न अवधारणाए होती हैं यह सम्बन्ध उस देश की राष्ट्रीय पहचान बनाते हैं.

भारतीय संविधान कैसे बना

औपचारिक रूप से एक संविधान सभा को बनाया गया जिसे अविभाजित भारत ने कैबिनेट मिशन की योजना के अनुसार भारत में निर्वाचित किया गया था. इसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई और फिर 14 अगस्त 1947 को विभाजित भारत की संविधान सभा के रूप में इसकी बैठक पुनः हुई.

विभाजन के बाद संविधान सभा के वास्तविक सदस्यों की संख्या घटकर 299 रह गई. इनमें से 26 नवम्बर 1949 को कुल 284 सदस्य उपस्थित थे. इन्होने ही संविधान को अंतिम रूप से पारित व इस पर हस्ताक्षर किये. इस प्रकार संविधान सभा ने 9 दिसम्बर 1946 से संविधान निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जिसे 26 नवम्बर 1949 को पूर्ण किया.

भारतीय संविधान सभा का स्वरूप

भारत की संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार 1935 में स्थापित प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से हुआ, जिसमें 292 सदस्य ब्रिटिश प्रान्तों से और 93 सीटें देशी रियासतों से आवंटित होनी थी.

प्रत्येक प्रांत की सीटों को तीन प्रमुख समुदायों मुसलमान, सिक्ख और सामान्य सीटों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में बाँट दिया गया. इस प्रकार हमारी संविधान सभा के सदस्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गये थे. पर उसे अधिकाधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने के प्रयास किये गये.

सभी धर्म के सदस्यों को तथा अनुसूचित वर्ग के सदस्यों को उसमें स्थान दिया गया. संविधान सभा में यदपि 82 प्रतिशत सीटें कांग्रेस दल से सम्बद्ध थी, लेकिन कांग्रेस दल स्वयं विविधताओं से भरा हुआ था.

संविधान सभा के कामकाज की शैली

संविधान सभा के सदस्यों ने पुरे देश के हित को ध्यान में रखकर विचार विमर्श किया. सदस्यों में हुए मतभेद वैध सैद्धांतिक आधारों पर होते थे. संविधान सभा में लगभग उन सभी विषयों पर गहन चर्चा हुई जो आधुनिक राज्य की बुनियाद हैं.

संविधान सभा में केवल एक सार्वभौमिक मताधिकार के अधिकार का प्रावधान बिना किसी वाद विवाद के ही पारित हुआ.

संविधान सभा की कार्यविधि

संविधान सभा की सामान्य कार्यविधि में भी सार्वजनिक विवेक का महत्व स्पष्ट दिखाई देता था. विभिन्न मुद्दों के लिए संविधान सभा की आठ कमेटियां थी. प्रायः पं नेहरु, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और डॉ अम्बेडकर इन कमेटियों को अध्यक्षता किया करते थे.

जिनके विचार हर बात पर एक दूसरे के समान नहीं थे. फिर भी सबने एक साथ मिलकर काम किया. प्रत्येक कमेटी ने संविधान के कुछ कुछ प्रावधानों का प्रारूप तैयार किया जिन पर बाद में पूरी संविधान सभा में चर्चा की गई. प्रायः प्रयास यह किया गया कि निर्णय आम राय से हो, लेकिन कुछ प्रावधानों पर निर्णय मत विभाजन करके भी लिए गये.

राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत

संविधान सभा केवल उन सिद्धांतों को मूर्त रूप और आकार दे रही थी जो उसने राष्ट्रीय आंदोलन से विरासत में प्राप्त किये थे. इस सिद्धांतों का सारांश नेहरु द्वारा 1946 में प्रस्तुत उद्देश्य प्रस्ताव में मिलता हैं. प्रस्ताव के आधार पर संविधान में समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और सम्प्रभुता को संस्थागत स्वरूप दिया गया था.

संस्थागत व्यवस्थाएं

संविधान को प्रभावी बनाने का तीसरा कारक यह हैं कि सरकार की सभी संस्थाओं को संतुलित ढंग से व्यवस्थित किया जाये. मूल सिद्धांत यह रखा गया कि सरकार लोकतांत्रिक रहे और जन कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हो, संविधान सभा ने शासन के तीनों अंगों के बीच समुचित संतुलन स्थापित करने के लिए बहुत विचार मंथन किया, संविधान सभा ने संसदीय शासन व्यवस्था और संघात्मक व्यवस्थाओं को स्वीकार किया.

शासकीय संस्थाओं की संतुलित व्यवस्था स्थापित करने में हमारे संविधान निर्माताओं ने दूसरे देशों के प्रयोग एव अनुभवों को सीखने में कोई संकोच नहीं किया. अतः उन्होंने विभिन्न देशों से अनेक प्रावधानों को लिया, संवैधानिक परम्पराओं को ग्रहण किया तथा उन्हें भारत की समस्याओं और परिस्थतियों के अनुकूल ढालकर अपना लिया.

भारतीय संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव

संविधान सभा के समक्ष 13 दिसम्बर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरु ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया. 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा ने यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया.

उद्देश्य प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु– उद्देश्य प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं.

  • भारत एक स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य हैं.
  • भारत ब्रिटेन के अधिकार में आने वाले भारतीय क्षेत्रों, देशी रियासतों और देशी रियासतों के बाहर के ऐसे क्षेत्र जो हमारे संघ का अंग बनना चाहते हैं, का संघ होगा.
  • संघ की इकाइयां स्वायत्त होगी और उन सभी शक्तियों का प्रयोग और कार्यों का सम्पादन करेगी जो संघीय सरकार को नहीं दी गयी हैं.
  • सम्प्रभु और स्वतंत्र भारत तथा इसके संविधान की समस्त शक्तियों और सत्ता का स्रोत जनता हैं.
  • भारत के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक न्याय, कानून के समक्ष समानता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा कानून और सार्वजनिक नैतिकता की सीमाओं में रहते हुए भाषण, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगठन और कार्य करने की मौलिक स्वतंत्रता की गारंटी व सुरक्षा दी जाएगी.
  • अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्र, दलित व अन्य पिछड़े वर्गों को समुचित सुरक्षा दी जाएगी.
  • गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता तथा थल, जल और आकाश में इसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा सभ्य राष्ट्रों के कानून और न्याय के अनुसार की जाएगी.
  • विश्व शांति एवं मानव कल्याण के विकास के लिए देश स्वेच्छापूर्वक और पूर्ण योगदान करेगा.

इस प्रकार उद्देश्य प्रस्ताव में संविधान की सभी आकांक्षाओं और मूल्यों को समाहित किया गया था. इसी प्रस्ताव के आधार पर हमारे संविधान में समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सम्प्रभुता और एक सर्वजनीन पहचान जैसी बुनियादी प्रतिबद्धताओं को संस्था गत स्वरूप दिया गया.

विभिन्न देशों से लिए गये प्रावधान

शासकीय संस्थाओं की सर्वाधिक संतुलित व्यवस्था स्थापित करने में भारत के संविधान निर्माताओं ने दूसरे देशों के प्रयोगों और अनुभवों से कुछ सीखने में संकोच नहीं किया. उन्होंने अन्य संवैधानिक परम्पराओं से कुछ ग्रहण करने से भी परहेज नहीं किया. साथ ही उन्होंने ऐसे बौद्धिक तर्क या ऐतिहासिक उदाहरण की अनदेखी नहीं की जो उनके कार्य को सम्पन्न करने के लिए जरुरी थी. अतः उन्होंने विभिन्न देशों से निम्नलिखित प्रावधानों को ग्रहण किया.

ब्रिटिश संविधान से लिए गये प्रावधान– भारतीय संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश संविधान से निम्नलिखित प्रावधान लिए.

  • सर्वाधिक मत के आधार पर चुनाव में जीत का फैसला
  • सरकार का संसदीय स्वरूप
  • कानून के शासन का विचार
  • विधायिका में अध्यक्ष का पद व उसकी भूमिका
  • कानून निर्माण की विधि

अमेरिका के संविधान से लिए गये प्रावधान– भारतीय संविधान निर्माताओं ने अमेरिका के संविधान से निम्नलिखित प्रावधान लिए.

  • मौलिक अधिकारों की सूची
  • न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति और न्यायपालिका की स्वतंत्रता

कनाडा के संविधान से लिए गये प्रावधान– कनाडा के संविधान से ये प्रावधान ग्रहण किये गये.

  • एक अर्द्ध संघात्मक सरकार का स्वरूप
  • अवशिष्ट शक्तियों का सिद्धांत

अन्य संविधानों से ग्रहण किये गये प्रावधान– भारतीय संविधान निर्माताओं ने अन्य संविधानों से भी निम्न प्रावधान ग्रहण किये.

  • आयरलैण्ड के संविधान से उन्होंने राज्य के नीति निर्देशक तत्व के प्रावधानों को ग्रहण किया.
  • फ्रांस के संविधान से उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व के सिद्धांत को ग्रहण किया.

लेकिन इन प्रावधानों को लेना कोई नकलची मानसिकता का परिणाम नहीं था. बल्कि उन्होंने प्रत्येक प्रावधान को इस कसौटी पर कसा कि वह भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप हैं.

इस प्रकार एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने इन प्रावधानों को ग्रहण किया तथा भारत की समस्याओं को ग्रहण किया और उन्हें अपना बना लिया. इसलिए यह कहना गलत है कि यह संविधान उधार का था.

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