भारत में हरित क्रांति, शुरुआत महत्व और सीमाएं | Green Revolution In Hindi

Green Revolution Beginning importance and limitations In Hindi /भारत में हरित क्रांति, शुरुआत महत्व और सीमाएं 

तीसरी पंचववर्षीय योजना के शुरू से चौथी योजना के बिच 1961-1969 के 8 वर्षों में भारतीय कृषि के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष रहे. यह वह अवधि थी जिसमे कृषि की नई रणनीति प्रयोग में आई. पायलट प्रोजेक्ट के रूप में 7 जिलों में गहन कृषि जिला कार्यक्रम शुरू किया गया. इसके बाद अधिक उपजाऊ किस्म के बीज प्रोग्राम को जोड़ दिया गया और इस विकास रणनीति को पुरे देश भर में विस्तार करने का लक्ष्य तय किया गया. यह रणनीति हरित क्रांति की शुरुआत थी.HARIT KRANTI

भारत में हरित क्रांति की शुरुआत (The beginning of the Green Revolution in India)

कृषि के परम्परागत तरीकों के स्थान पर रासायनिक उवर्रकों, कीटनाशक दवाईयों, उन्नत बीजों, आधुनिक कृषि उपकरण, विस्तृत सिंचाई परियोजनाओं आदि के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए 1966-67 में खरीफ की फसल के साथ ही एक नये युग की शुरुआत हुई, जिसे हरित क्रांति के नाम से जाना जाता है.

इसके जन्मदाता प्रोफ़ेसर नार्मन बोरलोक है लेकिन भारत में एम एस स्वामीनाथन को हरित क्रांति का जनक माना जाता है. इस क्रांति का मुख्य उद्देश्य देश को खाद्यान संकट से बाहर निकालकर कृषि उत्पादन में कम समय में विशेष वृद्धि कर उसे दीर्घकाल तक बनाए रखना तथा कृषि में व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाना है.

हरित क्रांति के प्रमुख तत्व (main elements of the green revolution)

  • अधिक उपज देने वाली फसलों का कार्यक्रम– यह कार्यक्रम 1970-71 में 6 फसलों पर लागू किया गया जिसमे धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार बाजरा, रांगी आते है. गेहूं की मेक्सिकन किस्मे, चावल की चीनी व कुछ भारतीय विकसित किस्में प्रयोग में ली गई है. इस कार्यक्रम में उन्नत किस्मों के साथ साथ कीटनाशक दवाइयों एवं रासायनिक उर्वरकों का भी प्रयोग किया गया. जिससे पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. हरित क्रांति में सर्वाधिक सफलता गेंहूँ के क्षेत्र में प्राप्त हुई, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार, केरल, तमिलनाडू, पश्चिम बंगाल में यह कार्यक्रम काफी सफल रहा.
  • बहुफसल कार्यक्रम– बहु फसल कार्यक्रम के अंतर्गत थोड़े समय में पक कर तैयार हो जाने वाली फसलें बोई जाती है. जिससे एक वर्ष में एक से अधिक बार एक साथ कई फसलों को बोया जा सके तथा उत्पादन को बढ़ाया जा सके.
  • लघु सिंचाई पर- हरित क्रांति की सफलता के लिए उन्नत खाद व बीज ही काफी नही थे. इसके लिए सिचाई की पर्याप्त व्यवस्था आवश्यक थी जो केवल बड़े बाँधो के द्वारा ही पूरी की जा सकती थी. अत इस कार्यक्रम के अंतर्गत नलकूप, छोटी नहरें, तालाब, कुँए, वाटर हार्वेस्टिंग तथा ट्यूबवेल द्वारा सिचाई पर जोर दिया गया.
  • रासायनिक खाद– कृषि उपज को बढ़ाने के लिए यूरिया, पोटाश जैसी रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में तीव्र वृद्धि हो गई. जिससे फसलों के उत्पादन तथा उत्पादकता को बढ़ाया जा सके.
  • उन्नत बीज- अधिक उपज एवं कृषि गुणवता को बढ़ावा देने के लिए उन्नत किस्म के बीजों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया.
  • कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा- हरित क्रांति में कृषि विकास हेतु नई तकनीक के कृषि उपकरणों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया जिससे फसल की बुवाई से लेकर कटाई तक सभी कार्य कम समय में सफलता पूर्वक किये जा सके.
  • पौध संरक्षण कार्यक्रम– इसके अंतर्गत भूमि तथा फसलों पर दवा छिडकने का कार्य प्रारम्भ किया गया. जिन वर्षों में टिड्डी दल आते है, उन वर्षों में टिड्डियों को नष्ट करने के अभियान चलाकर उन्हें भूमि पर या आकाश में ही नष्ट कर दिया जाता है. जिससे फसलों को क्षति पहुचाने से बचाया जा सके तथा उत्पादकता को बढ़ाया जा सके.
  • कृषि शिक्षा तथा शोध- कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि शिक्षा का विस्तार तथा शोध कार्यक्रम लागू किये गये.
  • भू- संरक्षण कार्यक्रम- भूसंरक्ष्ण कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया गया तथा कृषि योग्य भूमि के क्षरण को रोकने तथा बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि बनाने के लिए शोध कार्यक्रम की व्यवस्था की गई.
  • कृषि विकास हेतु विभिन्न संस्थाओं की स्थापना- कृषि विकास योजनाओं के कुशलतापूर्वक संचालन हेतु अनेक संस्थाओं की स्थापना की गई, जैसे राष्ट्रिय बीज निगम, उर्वरक निगम, नाबार्ड आदि.
  • कृषि मूल्य आयोग- कृषकों को उचित मूल्य की गारंटी देने के लिए कृषि मूल्य आयोग की स्थापना की गई.
  • फसलों का बीमा- प्राकृतिक प्रकोप से सुरक्षा हेतु कृषि फसलों के बीमें का प्रावधान किया गया है.

हरित क्रांति का महत्व (what is the importance of green revolution in india)

कृषि क्षेत्र में शुरू की गई हरित क्रांति ने अनेक महत्वपूर्ण बदलाव किये. इस क्रांति का महत्व निम्न बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है.

  1. फसलों के कुल उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि- हरित क्रांति के परिणामस्वरूप फसलों के उत्पादन तथा उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई जिससे देश खाद्यानों में आत्मनिर्भरता की स्थति बनी.
  2. खेतिहर मजदूरों के लिए रोजगार- हरित क्रांति के परिणाम स्वरूप खेतिहर मजदूरों की स्थति में सुधार आया. कृषि क्षेत्र में विस्तार तथा उत्पादन में वृद्धि से इनके रोजगारों में भी वृद्धि हुई. बहुफसल तथा व्यापारिक फसलों के उत्पादन में श्रमिकों की अधिक आवश्यकता को भूमिहीन श्रमिकों ने पूरा किया, जिससे उनकी आर्थिक दशा में सुधार हुआ.
  3. ग्रामीण निर्धनता में कमी- हरित क्रांति के कारण ग्रामीण भूमिहीन कृषकों को रोजगार मिलने तथा बहु फसली कार्यक्रमों से किसान की आय में वृद्धि से उनकी निर्धनता को कम किया.
  4. यंत्रीकरण- हरित क्रांति से यंत्रीकरण को बढ़ावा मिला जिससे परम्परागत औजारों की जगह अब आधुनिक उपकरण प्रयोग में लाये जाने लगे.
  5. उन्नत किस्मों का उत्पादन- हरित क्रांति के परिणामस्वरूप उन्नत बीज कीटनाशक तथा रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से उन्नत किस्म की फसलों का उत्पादन बढ़ा.श्रमिकों की अधिक आवश्यकता को भूमिहीन श्रमिकों ने पूरा किया, जिससे उनकी आर्थिक दशा में सुधार हुआ.
  6. व्यावसायिक दृष्टिकोण– कृषकों में परम्परावादी दृष्टिकोण के स्थान पर व्यवसायिक दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला.
  7. आधुनिकीकरण- कृषि के आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिला, जिससे किसानों की दशा में सुधार हुआ.
  8. सुविधाएं- कृषकों को उचित मूल्य, भण्डारण, साख, आदि सुविधाओं का लाभ मिलने से उनकी दशा में सुधार आया.

हरित क्रांति की सीमाएं (advantages and limitations of green revolution)

हरित क्रांति कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण क्रांति रही परन्तु इसकी कुछ कमियां तथा सीमाएं भी सामने आइ जो निम्न थी.

  • चुनिदा फसलों तक सिमित- हरित क्रांति का प्रभाव विशेषकर गेहू, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का के उत्पादन पर ही अधिक पड़ा. इसकी मुख्य सफलता तो गेहू की पैदावार में मिली. इसलिए इसे गेहूं की क्रांति भी कहा जा सकता है. इन फसलों के अलावा अन्य फसलों पर इसका प्रभाव कम रहा.
  • सिमित क्षेत्रों पर ही प्रभाव (green revolution in india essay)-हरित क्रांति का प्रभाव सिंचित क्षेत्रों में अधिक देखने को मिला. कृषि कार्यों में पिछड़े तथा असिंचित क्षेत्रों में यह क्रांति सफल सिद्ध नही हो सकी. यही कारण है कि पंजाब तथा हरियाणा जैसें सिचित राज्यों में इसका सर्वश्रेष्ट प्रभाव देखने को मिला.
  • यंत्रीकरण के दुष्परिणाम – हरित क्रांति के प्रारम्भ में खेतिहर श्रमिकों के रोजगार में बढ़ोतरी हुई किन्तु धीरे धीरे यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के कारण श्रमिकों का कार्य यंत्रो द्वारा किया जाने लगा, जिससे बेरोजगारी बढ़ी.
  • आय की असमानता में वृद्धि- हरित क्रांति का लाभ धनी तथा सम्पन्न किसानों कृषकों को अधिक मिला क्योकिं कृषि की नयी विधियों को अपनाने के लिए धन की आवश्यकता थी जो छोटे एवं गरीब किसानों के लिए संभव नही था. इस कारण धनी कृषकों ने इसका लाभ उठाकर अधिक सम्पन्नता हासिल कर ली. दूसरी ओर विभिन्न प्रदेशों के बिच आय की असमानता बढ़ी, क्योकिं जिन प्रदेशों में हरित क्रांति सफल हुई, वहां के किसान सम्पन्न हुए तथा शेष किसानों की आर्थिक दशा में कोई सुधार नही आया.
  • उर्वरकों के प्रयोग का दुष्परिणाम- हरित क्रांति में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग पर अधिक बल दिया गया. रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अधिक प्रयोग ने भूमिं को अनुपजाऊ बना दिया, जिसके साथ भूजल, पर्यावरण तथा जीवों को हानि पहुची.
  • भूजल स्तर में कमी- हरित क्रांति के परिणामस्वरूप नलकूपों, ट्यूबवेलों के माध्यम से भूजल का अत्यधिक दोहन किया जाने लगा जिससे भूजल स्तर में गिरावट आई.
  • पूंजीवादी खेती को बढ़ावा- उन्नत बीज, रासायनिक खाद, कृषि औजार आदि बहुत खर्चीले थे. जिसके कारण खेती में पूंजीवादिता को बढ़ावा मिला.
  • संस्थागत परिवर्तनों की उपेक्षा- इस क्रांति ने केवल तकनिकी परिवर्तनों पर जोर दिया गया तथा भूमि सुधारों को अनदेखा कर दिया गया.

इस प्रकार हरित क्रांति ने कृषि क्षेत्र के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया तथा तत्कालीन खाद्यान्न संकट को दूर कर देश को न केवल खाद्यान उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि कृषिगत वस्तुओं का निर्यात भी किया जाने लगा.

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