सैंधव समाज का इतिहास – history of Indus Valley Civilization society in hindi

सैंधव समाज का इतिहास history of Indus Valley Civilization society in Hindi: नमस्कार दोस्तों आज हम सिन्धु घाटी सभ्यता के सैन्धव समाज के इतिहास, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जीवन तथा धर्म के बारे में विस्तार से इस निबंध भाषण में हम विस्तार से जानेगे.

history of Indus Valley Civilization society in hindi

history of Indus Valley Civilization society in hindi

विद्वानों के अनुसार सैन्धव समाज चार वर्गों में विभाजित था विद्वान्, यौद्धा, व्यवसायी तथा श्रमिक वर्ग. उस समय संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित रही होगी. सैंधव समाज मातरसत्तात्मक था. समाज में स्त्रियों को सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त था. स्त्रियों में पर्दा प्रथा नहीं थी.

सैन्धव निवासी शाकाहारी तथा मासाहारी दोनों ही थे. ये लोग गेहूं, जौ, चावल, खजूर, घी, दूध, फलों के अतिरिक्त मांस मच्छली तथा अण्डों का सेवन करते थे. ये लोग सूती तथा ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे. हड़प्पा के स्त्री तथा पुरुष दोनों ही आभूषण पहनने के शौकीन थे. स्त्री तथा पुरुष दोनों ही कंगन, हार, भुजबंद, अंगूठी, कड़े आदि के आभूषण पहनते थे.

स्त्रियों को लम्बे बाल रखने, चोटियाँ रखने और मांग निकालने का शौक था. वे दर्पण, कंघी, काजल, सिंदूर, इत्र, पाउडर, लिपस्टिक आदि का प्रयोग करती थी. शिकार करना, शतरंज खेलना, संगीत नृत्य में भाग लेना, जुआ खेलना, पशु पक्षियों की लड़ाईयां आदि सैन्धव निवासियों के मनोरंजन के साधन थे.

अनेक प्रकार के खिलौने बच्चों के मनोरंजन के साधन थे. सैन्धव निवासियों के घरों में मिट्टी और धातु के बने हुए घड़ों, कलशों, कटोरों, तश्तरियों आदि का प्रयोग किया जाता था. ये लोग सुई, कैंची, चटाइयों कुर्सियों, पलंगों, चारपाईयों, चाकू, छुरी, कुल्हाड़ी, तकली, मछली पकड़ने के काँटे आदि का भी प्रयोग करते थे.

हड़प्पा निवासी शिलाजीत, नीम की पत्तियों आदि का औषधि के रूप में प्रयोग करते थे. सैन्धव निवासी अपने शवों का संस्कार तीन प्रकार से किया करते थे. पूर्ण समाधि- शव को जमीन में गाड़ दिया जाता था. आंशिक समाधि- शव को पशु पक्षियों के खाने के लिए छोड़ जाता था. और शव के बचे हुए भागों को जमीन में गाड़ दिया जाता था. दाह कर्म- इसमें शव को जला दिया जाता था.

सैन्धव समाज के निर्माता (Creator of Indus Valley Civilization society)

सैन्धव समाज के निर्माता- हड़प्पा सभ्यता के निवासियों के विषय में प्रमुख विद्वानों के मत निम्नलिखित हैं.

  • द्रविड़ जॉन मार्शल, फादर हेरास आदि विद्वानों के अनुसार सैन्धव सभ्यता के निर्माता द्रविड़ थे. उनका कहना है कि खुदाई के प्रान्त नर कंकाल में भूमध्यसागरीय नस्ल की प्रधानता हैं. अतः इस सभ्यता के निर्माण का श्रेय द्रविड़ों को हैं.
  • सुमेरियन प्रो गार्डन चाइल्ड हाल आदि विद्वानों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता के निर्माता सुमेरियन लोग थे. यदपि सुमेरियन लो गों का सिन्धु परदेश से व्यापारिक सम्बन्ध था, परन्तु ऐसा कोई आधार नहीं जिससे वे सैन्धव सभ्यता निर्माता कहे जा सके.
  • आर्य– लक्ष्मण स्वरूप, रामचन्द्रन, शंकरानन्द, दीक्षितार, मुसालकर आदि विद्वानों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता के निर्माता आर्य थे. अथवा आर्यों ने भी इनके विकास में योगदान दिया था. पुसालकर के अनुसार आर्य और अनार्य सभ्यताओं के मिश्रण का प्रतिनिधित्व करते हैं. परन्तु डॉ विमलचन्द्र पाण्डेय, जॉन मार्शल आदि विद्वान् आर्यों को हड़प्पा सभ्यता का निर्माता नहीं मानते. जॉन मार्शल आदि विद्वानों ने आर्यों को हड़प्पा सभ्यता का निर्माता नहीं मानते. जॉन मार्शल के अनुसार सैन्धव सभ्यता तथा वैदिक सभ्यता एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं.
  • मिश्रित जातियाँ – कर्नल स्यूल, डॉ गुहा आदि विद्वानों का मत है कि हड़प्पा सभ्यता के निर्माता मिश्रित जातियों के लोग थे. इन विद्वानों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी. अतः आजीविका की तलाश में यहाँ अनेक प्रजातियों के लोग आकर बस गये थे. मानवशास्त्रवेत्ताओं ने हड़प्पा सभ्यता का विकास करने वाले लोगों को चार नस्लों में बताया हैं. आदि ऑस्ट्रेलियाई, भूमध्यसागरीय, मंगोल, अल्पाइन.
  • डॉ विमल चन्द्र पाण्डेय के अनुसार भूमध्यसागरीय जाति सिन्धु देश के सबसे बहुसंख्या थी. हड़प्पा सभ्यता के विकास में कदाचित इसी जाति ने सबसे अधिक योग दिया था. अस्थि पंजरों तथा मूर्तियों के सिरों के भग्नावशेष से भी ज्ञात होता है कि सैन्धव लोग मिश्रित जातियों के थे. फिर भी यह प्रश्न विवादास्पद बना हुआ हैं कि हड़प्पा सभ्यता के निर्माता कौन थे.

सैन्धव सभ्यता की धार्मिक स्थिति & जीवन (Religious status and life of Sandhav civilization)

सिन्धु घाटी की खुदाई में प्राप्त मूर्तियों, मुद्राओं, ताबीजों आदि से हमें सिन्धु धर्म अथवा सिन्धु सभ्यता के धार्मिक जीवन के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती हैं.

मातृदेवी की उपासना– हड़प्पा की खुदाई में मातृदेवी की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं. मिट्टी के पात्रों, मुहरों तथा ताबीजों पर भी अनेक मातृदेवी के अनेक चित्र मिले हैं. इससे ज्ञात होता है कि सिन्धु निवासी मातृदेवी की पूजा करते थे. मातृदेवी की पूजा इस धारणा पर आधारित थी कि सृष्टि का प्रारम्भ नारी शक्ति से हुआ था. एक मूर्ति में एक नारी के गर्भ से वृक्ष निकलता हुआ दिखाया गया हैं. यह वानस्पतिक जगत की सृष्टिकारिणी देवी का प्रतीक है. नारी की कुछ ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं. जो शिशु को स्तनपान करा रही हैं. यह इस बात का प्रतीक है कि मातृदेवी सम्पूर्ण मानव लोक ही पोषिका पालिका जननी थी. नारी की कुछ मूर्तियाँ धुएँ के रंग में रंगी हैं. इससे प्रतीत होता है कि मातृदेवी की उपासना के लिए धूप आदि जलाई जाती थी.

शिव की उपासना– सिन्धु प्रदेश की खुदाई में एक मुहर मिली है जिस पर एक देवता की मूर्ति अंकित हैं. यह देव पुरुष योगासन में बैठा हैं. इस देवता के तीन मुख और दो सींग हैं. इसके सिर पर त्रिशूल के समान कोई वस्तु हैं. हाथी, चीते, भैंसे, गैंडे, हिरण आदि पशु इस देव से घिरे हुए हैं. इस मूर्ति में शिव के तीन लक्षण पाए जाते हैं. त्रिमुख रूप, पशुपति रूप तथा योगेश्वर रूप. सर जॉन मार्शल के अनुसार यह मूर्ति शिव की हैं. इससे ज्ञात होता कि सैन्धव लोग शिव के उपासक थे.

लिंग पूजा– हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में काफी संख्या में लिंग मिले हैं. ये लिंग साधारण लाल पत्थर अथवा नीले सैंडस्टोन, चीनी मिट्टी अथवा सीपी के बने हुए हैं. छोटे छोटे आकार से लेकर चार फीट की ऊंचाई तक के लिंग मिले हैं. शिव के प्रतीक होने के कारण ये लिंग पवित्र समझे जाते थे. तथा उनकी पूजा की जाती थी. बड़े लिंग विशेष स्थानों पर स्थापित करके पूजे जाते थे तथा छोटे लिंगों की लोग अपने घरों में पूजा करते थे.

योनी पूजा– हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में बहुत से छल्ले मिले है जो पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीपी के बने हैं. ये आधा इंच से लेकर चार इंच तक बड़े हैं. अधिकांश विद्वान् इन छल्लों को योनियाँ मानते हैं. उनका मत हैं कि सिन्धु निवासी लिंग पूजा के साथ साथ योनी पूजा भी करते थे, लिंग योनि की पूजा करके सम्भवतः सिन्धु निवासी ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति की उपासना करते थे.

पशु पूजा– सिन्धु निवासी पशुओं की भी पूजा करते थे. सिन्धु घाटी से प्राप्त मुहरों पर बैल, भैंस तथा भैंसे के चित्र मिले है. इससे प्रतीत होता है कि सिन्धु निवासी इन पशुओं की पूजा करते थे. सम्भवतः सिन्धु निवासी पशु पक्षियों में दैवी शक्ति का अंश मानते थे. कुछ मुहरों पर हाथी, बाघ, भेड़, बकरी, घड़ियाल, हिरण तोता, मोर आदि पशुओं के चित्र अंकित हैं. सिन्धु निवासी सम्भवतः इन पशुओं को अपना देवता मानकर पूजा करते थे. सिन्धु निवासी नाग की भी पूजा करते थे. एक मुहर पर नाग की पूजा करते हुए एक व्यक्ति का चित्र मिला है. इससे प्रतीत होता है कि सिन्धु निवासी नाग की भी पूजा करते थे.

वृक्ष पूजा– सिन्धु निवासी वृक्षों की भी पूजा करते थे. मुहरों पर पीपल के वृक्ष के चित्र पर्याप्त संख्या में अंकित मिले हैं. इसलिए ऐसा अनुमान हैं कि सिन्धु निवासी पीपल के वृक्ष को सबसे अधिक पवित्र मानते थे. तथा उनकी पूजा करते थे. सिन्धु घाटी के लोगों का विश्वास था कि पीपल के वृक्ष में उनका मुख्य देवता विश्वास करता था. वृक्ष पूजा दो रूपों में प्रचलित थी. वृक्ष की उसके प्राकृतिक रूप में पूजा तथा वृक्ष को किसी देवता के प्रतीक के रूप में पूजा. सिन्धु निवासी पीपल के अतिरिक्त तुलसी, बबूल, नीम, खजूर आदि वृक्षों की भी पूजा करते थे.

अग्निवेदिकाएं- कालीबंगा, लोथल, बनावली, रखिगढ़ी आदि की खुदाई से हमें अनेक अग्निवेदिकाएं मिली हैं. कुछ अग्निवेदियों में राख एवं कोयले के अवशेष मिले हैं. इसके साथ ही मिट्टी के पिंड तथा मिट्टी के बने स्तम्भ भी मिले हैं. सभवतः इस सामग्री का उपयोग किसी धार्मिक या याज्ञिक अनुष्ठान में किया जाता था. इस प्रकार सैन्धव लोग अग्नि की पूजा करते थे.

जल पूजा– सिन्धु निवासियों को पवित्र स्नान तथा जल पूजा में गहरा विश्वास था. सैन्धव लोग शुभ मुहूर्तों एवं विशेष पर्वों पर सामूहिक स्नान करना एक पवित्र कर्तव्य मानते थे.

प्रतीक पूजा– सिन्धु घाटी की खुदाई में कुछ स्थानों पर सींग, स्तम्भ, चक्र तथा स्वास्तिक के चित्र मिले हैं. सम्भवतः इनका कुछ धार्मिक महत्व था. विद्वानों का अनुमान है कि ये किसी देवी देवता के प्रतीक होंगे तथा उनकी पूजा होगी. हिन्दू धर्म में आज भी स्वास्तिक का चिह्न पवित्र तथा शुभ माना जाता हैं. अतः सिन्धु निवासी भी इसे पवित्र चिह्न मानते थे. मुहरों पर चक्र की तरह बने कुछ आकारों से अनुमान लगाया जाता है कि सिन्धु निवासी सूर्य की पूजा करते थे.

मूर्तिपूजा– सिन्धु प्रदेश में अनेक देवी देवताओं की मूर्तियाँ मिली हैं. इससे प्रतीत होता है कि सिन्धु निवासी मूर्ति पूजा में विश्वास करते थे. सिन्धु निवासी साकार उपासना करते थे. उनके समाज में मूर्तिपूजा प्रचलित थी.

उपासिकाएँ एवं देवदासियाँ– सिन्धु प्रदेश में अनेक नारियों की मूर्तियाँ मिली हैं. हड़प्पा की एक मूर्ति में एक नारी सिर पर खाद्य सामग्री से भरा कोई पात्र रखे हुए हैं. जॉन मार्शल के अनुसार ये मूर्तियाँ मन्दिरों की उपासिकाएँ की हैं. मोहनजोदड़ो में एक नर्तकी की मूर्ति मिली हैं. कुछ विद्वानों का मत है कि यह देवदासी की मूर्ति हैं.

पूजा विधि– सिन्धु निवासी पूजा में धुप दीप अग्नि आदि का प्रयोग करते थे. सिन्धु निवासी अपने देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए संगीत नृत्य का भी प्रयोग करते थे. सिन्धु प्रदेश में पशु बलि प्रचलित थी. देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशुबलि दी जाती थी.

जादू टोने में विश्वास– खुदाई में प्राप्त बहुत से ताबीजों के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु निवासी भूत प्रेत आदि में विश्वास करते थे और उनके प्रकोप से बचने के लिए ताबीजों का प्रयोग करते थे.

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