जैन धर्म का इतिहास निबंध नियम शिक्षा संस्थापक Jainism History Rule Teachings And Founders Essay In Hindi

जैन धर्म का इतिहास निबंध नियम शिक्षा संस्थापक Jainism History Rule Teachings And Founders Essay In Hindi : जैन साहित्य के अनुसार जैन धर्म का प्रारम्भ बहुत प्राचीन काल में हुआ था. जैन दार्शनिक परम्परा वैदिक परम्परा के ही समकालीन एक आदोंलन माना जाता है. जैन धर्म के विकास में तीर्थकरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. ऐसा माना जाता है महावीर स्वामी के पहले 23 तीर्थकर हुए थे. पहले तीर्थकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे तथा 23 वें पिर्थ्कर पार्श्वनाथ थे. 24 वें तीर्थकर महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के समीप कुंडग्राम में, क्षत्रिय कुल में 599 ईसा पूर्व में हुआ था.

जैन धर्म का इतिहास निबंध नियम शिक्षा संस्थापक

जैन धर्म का इतिहास निबंध नियम शिक्षा संस्थापक Jainism History Rule Teachings And Founders Essay In Hindi

महावीर स्वामी का परिचय (Introduction to Mahavir Swami)

इनके पिता का नाम सिद्धार्थ था और माता का नाम त्रिशला था. त्रिशला लाच्छ्वी गणराज्य के राजा चेटक की बहिन थी. महावीर स्वामी का बचपन का नाम वर्धमान था. वर्धमान को प्रारम्भ से ही क्षत्रियोचित शिक्षा दी गई थी.

किन्तु वर्धमान का मन संसार में नही लगता था. उनके मन में विरक्ति के भाव पैदा हो गये थे. इसलिए 30 वर्ष की उम्रः में,उनके माता पिता के निधन के बाद उन्होंने सत्यज्ञान की खोज करने के लिए अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से आज्ञा लेकर घर छोड़ दिया और तपस्या करने लगे.

इस तपस्या में उन्हें घोर संकट सहन करने पड़े. बिना वस्त्र तथा महीनों तक बिना खाए पिए रहे. अंत में, 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद उन्हें एक कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई. कैवल्य ज्ञान प्राप्त हो जाने पर महावीर स्वामी को जिन, निग्रन्थ तथा महावीर आदि नामों से पुकारा जाने लगा.

कैवल्य ज्ञान हो जाने पर महावीर स्वामी ने जनता को जीवन का सही मार्ग दिखाने का कार्य प्रारम्भ किया. उनके विचारों का जनता में प्रचार करने के लिए स्थान स्थान पर घुमने लगे, उनके इस कार्य से मगध, काशी तथा कौशल आदि राज्यों में उनके विचारों का प्रचार हुआ.

उनकी सत्य वाणी से प्रभावित होकर कई लोग उनके अनुयायी बनने लगे. धीरे धीरे उनके अनुयायियों की संख्या काफी हो गई. अंत में इसी प्रकार अपने विचारों का प्रचार करते हुए पावापुरी बिहार में 527 ई.पू. 72 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी का निर्वाण हुआ. अपने ज्ञान दीप को हमेशा जलाए रखने हेतु चौदह हजार शिष्य छोड़ गये.

जैन धर्म के त्रिरत्न क्या है

जैन शब्द जिन से बना है इसका शाब्दिक अर्थ होता है विजेता. संसार की मोह माया व इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर मोक्ष ही इस धर्म का एकमात्र उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करने के लिए महावीर स्वामी ने तीन उपाय बताये थे. जो आगे चलकर त्रिरत्न कहलाएं, जैन धर्म का दार्शनिक चिन्तन यही से प्रारम्भ होता है.

  1. सम्यक ज्ञान– इसका अर्थ पूर्ण और सच्चा ज्ञान होता है. महावीर स्वामी ने बताया था कि सच्चे और पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के लिए मनुष्यों को तीर्थकरों के उपदेशों का अध्ययन और अनुसरण करना चाहिए.
  2. सम्यक धर्म– इसका अर्थ है तीर्थकरों में पूरी आस्था रखना. सच्चे ज्ञान को जीवन में उतरने के लिए प्रत्येक मनुष्य को तीर्थकरों में पूर्ण आस्था और विश्वास रखना चाहिए.
  3. सम्यक चरित्र– इसका अर्थ है मनुष्य अपनी इन्द्रियों को वंश में रखकर सत्य ज्ञान को प्राप्त कर सकता है.अतः उसे इन्द्रियों पर संयम रखना चाहिए.

जैन धर्म के नियम (Rules of Jainism)

मोक्ष प्राप्ति के इन तीनों साधनों का पालन करने के लिए जैन धर्म ने गृहस्थ लोगों के लिए पांच मुख्य नियम (महाव्रत) बताए थे जो निम्नलिखित है.

  •  अहिंसा– अहिंसा महावीर स्वामी और जैन धर्म के सिद्धांतों का मूल मन्त्र है. अहिंसा का अर्थ प्राणी मात्र के प्रति दया समानता और उपकार की भावना है. मन वचन तथा कर्म से किसी के प्रति अहित की भावना नही रखना वास्तविक अहिंसा है. जैन धर्म में अहिंसा की सूक्ष्म से सूक्ष्म व्याख्या की गई है.
  • सत्य– अहिंसा के साथ सत्य वचन पर महावीर स्वामी ने बहुत जोर दिया, क्योकि सत्य भाषण के अहिंसा का पालन नही हो सकता. अतः महावीर ने कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक परिस्थति में सत्य बोलना चाहिए.
  • अस्तेय– अस्तय का अर्थ चोरी नही करना है. महावीर ने चोरी को अनैतिक कार्य बताया तथा इस दुर्गुण से हमेशा दूर रहने की शिक्षा दी.
  • अपरिग्रह- अपरिग्रह का अर्थ है संग्रह नही करना होता है. महावीर के अनुसार जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का संग्रह नही करता है, वह संसार के मायाजाल से दूर रहता है अर्थात अपने पास उतना ही रखों जितने की आवश्यकता है, शेष सभी को वांछित लोगों में बाट दो.
  • ब्रह्राचर्य– इन चार बातों का पालन तब तक नही हो सकता, जब तक कि मनुष्य विषय वासनाओं से दूर नही रहता. इसलिए महावीर ने जैन धर्म के 23 वें तीर्थकर पार्श्वनाथ के चारों उपायों में ब्रह्राचर्य को पांचवा उपाय जोड़कर उन्हें त्रिरत्नों की प्राप्ति का साधन बताया.

जैन धर्म का इतिहास (History of Jainism)

महावीर कहते थे कि संसार के दुःख सुख का कारण मनुष्य का अन्तकरण है. यदि उपर बतलाए गये उपायों का मनुष्य पालन करे तो वह आत्मा पर विजय प्राप्त कर सकता है. आत्मा पर विजय प्राप्त करने से ही संसार की मोह माया से मनुष्य छुटकारा पा सकता है.

जैन धर्म की शिक्षाएं (Teach & Education of Jainism)

तपस्या और उपासना-महावीर स्वामी ने आत्मा को वंश में करने तथा उपर्युक्त पांच नियमों का पालन करने के प्रयत्न में तपस्या और उपवास पर सबसे अधिक बल दिया.

उन्होंने दो प्रकार की तपस्या बताई एक बाह्य तथा दूसरी आंतरिक. तपस्या में नम्रता, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान आदि सम्मलित है.

बाह्य तपस्या करने से व्यक्ति में अच्छे विचारों का विकास होता है. महावीर ने तपस्या का सबसे सरल साधन उपवास बताया है. इससे आत्मा और शरीर की शुद्धी होती है और मनुष्य को मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त होता है.

महावीर आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे उनके अनुसार प्रकृति में परिवर्तन हो सकते है किन्तु आत्मा अजर अमर है. और सदा एक सी बनी रहती है.

मनुष्य के कर्मों का कारण पैदा होने वाली सांसारिक वासना के बंधनों से आत्मा का बार बार आवागमन होता रहता है. और जन्म मरण का चक्र चलता रहता है.

इसलिए महावीर स्वामी का कथन था कि यदि वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली जाएं तो कर्मों के बंधन से मुक्त हो सकते है और जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिल सकेगी.

महावीर स्वामी की इस विचारधारा से अनुमान लगा सकते है कि जैन धर्म की आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म और कर्मवाद में विश्वास रखता है. महावीर की ये सभी शिक्षाएं बड़ी सरल एवं सीधी थी.

साथ ही इन बातों का उपदेश महावीर ने उस युग की जनता की भाषा अर्ध मागधी में किया. महावीर ने जातिवाद व छुआछुत का विरोध किया तथा नारी को पूरा सम्मान दिया. महावीर ने तत्कालीन हिंसा, कट्टरता व सामाजिक कुरीतियों का जमकर विरोध किया.

जैन धर्म निवृतिमूलक हैं इसके अनुसार संसारिक जीवन में सुख नही है अतः संसार का परित्याग कर कठोर तपस्या द्वारा मोक्ष प्राप्त करना चाहिए. मनुष्य के सारे सुख दुखों का कारण उसके कर्म ही है.

कर्म ही पुनर्जन्म का कारण है उसे कर्मों के फल को भोगे बिना जन्म मरण के चक्र से छुटकारा नही मिलता है. जैन मतानुसार यह स्रष्टि जीव और अजीव से निर्मित है. जीव चेतन है अजीव अचेतन है. जीव और अजीव कर्म में बंधे रहते है. कर्म के बंधन को तोड़ना ही मोक्ष है.

जैन धर्म में स्याद्वाद जैन धर्म में स्याद्वाद या अनेकान्तवाद, सहिष्णुता व समन्वय का मूल मन्त्र है. महावीर ने कहा था कि किसी बात को एक पक्ष से मत देखो.

उस पर एक ही तरह के विचार मत करों. तुम जो कहते हो वह सत्य हो सकता है. किन्तु दूसरे जो कहते है वह भी सत्य हो सकता है. आज संसार में जो द्वंद और तनाव है.

वह दूसरों के द्रष्टिकोण को न समझने का कारण ही है. अतः इस सिद्धांत से विचार समन्वय संभव है. जैन धर्म के अनुसार आत्मा अजर अमर है.

जीव ही आत्मा है कण कण में जीवात्मा का निवास है. इस प्रकार जैन धर्म का दार्शनिक चिन्तन मूलतः आत्म कल्याण की ओर प्रवृत होने की प्रेरणा देता है.

जैन धर्म के त्रिरत्न (three jewels of jainism in hindi)

जैन धर्म के त्रिरत्न को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. त्रिरत्न एक संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका हिंदी में शाब्दिक अर्थ होता है तीन रत्न. महावीर के समय का जैन साहित्य पालि में लिखा गया,

जिसमें त्रिरत्न को ति रत्न कहा जाता था. इन तीन रत्नों में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को शामिल किया गया है जिसक अर्थ व व्याख्या इस प्रकार है.

पापों से बचकर निर्वाण प्राप्ति के लिए मनुष्य को तीन रत्नों (त्रिरत्न) का पालन करना चाहिए, ये तीन जैन धर्म के रत्न माने गये हैं.

  • सम्यक दर्शन– तीर्थकरों और सिद्दांतों में विश्वास करना ही सम्यक दर्शन है और इससे जुड़ी सत्य की अनुभूति का सही दृष्टिकोण मिलता है.
  • सम्यक ज्ञान- सम्यक ज्ञान धार्मिक सिद्धांतों को पूर्णतः सही रूप में समझने को मिलता है.
  • सम्यक आचरण– इसका अर्थ है उन दुष्कर्मों से मुक्ति जो हानिकारक हो, और ऐसे सत्कर्म करना जो कल्याणकारी हो.

जैन दर्शन के क्षेत्र में धर्म ने स्यादवाद को प्रतिपादित किया, जो प्राचीन भारतीय दार्शनिक व्यवस्था की एक अमूल्य निधि मानी जा सकती है.

इसके अनुसार प्रत्येक पदार्थ का स्वरूप या सत्ता सापेक्षिक है. कभी हम उसे प्रत्यक्ष रूप से वर्णित या अनुभव कर सकते है, पर हम कभी उन्हें व्यक्त नही कर सकते है. इस सिद्धांत के कारण जैन धर्म में तार्किकता का विकास हुआ.

जैन धर्मग्रंथ (jainism holy book name)

जैनों ने अपने धर्मोपदेश के लिए आम लोगों की बोलचाल की प्राकृत भाषा को अपनाया. जैन धर्मग्रथों की रचना मुख्यतया अर्धमागधी भाषा में हुई.

प्राकृत भाषा से कई क्षेत्रीय भाषाएँ विकसित हुई, इनमें उल्लेखनीय है- शौरसेनी जिसमें मराठी, गुजराती, राजस्थानी और कन्नड़ भाषाएँ निकली है.

इन ग्रंथों से महावीर की जीवनी एवं जैन धर्म के उपदेशों के साथ साथ तत्कालीन राजनितिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का भी ज्ञान होता है. महावीर के दिए मौलिक सिद्धांत १४ प्राचीन ग्रंथों में है. बाद में इन्हें १२ अंग व १२ उपभागों में विभाजित कर दिया गया.

जैन धर्म ग्रंथों-jain dharma books में परिशिष्ट पर्व, आचारांग सुत्त, कल्प सुत, भगवती सुत्त, उवासगदसाओ सुत्त, भद्रबाहुचरित्र, त्रिषष्टिशलाका, पुरूषचरित आदि महत्वपूर्ण है. जैन ग्रंथों का संकलन गुजरात (वल्लभी) में ईसा की छठी शताब्दी में हुआ.

जैन धर्म का विभाजन (history of jainism in hindi)

जैन ग्रन्थ परिशिष्ट पर्वन के अनुसार मगध में १२ वर्षों तक लम्बा अकाल पड़ा. अतः बहुत से जैन भद्रबाहु के नेतृत्व में श्रवणबेलगोला चले गये.

शेष जैन स्थूलभद्र के नेतृत्व में मगध में ही रुक गये. अकाल समाप्त होने के बाद जब भद्रबाहु व उनके समर्थक मगध लौटे तो स्थानीय लोगो से उनका मतभेद हो गया.

उन्होंने पाया कि स्थानीय लोगों ने जैन धर्म का पालन नही किया. इस मतभेद को दूर करने के लिए पाटलीपुत्र में एक परिषद का आयोजन किया गया, जिसका दक्षिणी जैनों ने बहिष्कार किया.

तब से दक्षिणी जैन दिगम्बर कहलाएं एवं मगध के जैन श्वेताम्बर. श्वेताम्बर पन्थ को मानने वाले श्वेत वस्त्र धारण करते है. दिगम्बर पंथ को मानने वाले वस्त्रों का परित्याग करते है.

जैन धर्म के पतन के कारण (Causes for The Decline of Jainism in India)

  • क्लिष्ट धर्म का आचरण धारण किया जाना
  • अहिंसा पर अत्यधिक बल
  • आत्मपीड़न, कठोर व्रत एवं तपस्या पर अत्यधिक बलउचित राज्याश्रय का अभाव
  • जाति व्यवस्था के दर्शन को बनाए रखना
  • ब्राह्मण धर्म से पुर्णतः पृथक न कर सका.
  • बौद्ध धर्म का विस्तार
  • हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान

जैन धर्म के सिद्धांत | Principles of Jainism in hindi

जैन धर्म के पाँच महाव्रत और जैन धर्म के नियम तथा जैन दर्शन के सिद्धांत माने गये है तथा जैन दर्शन के त्रिरत्न के बारे में विस्तार से जानने वाले है.

जैन धर्म का संस्थापक ऋषभदेव को माना जाता है, जो कि पहले जैन तीर्थकर अवतार या गुरू भी थे. जैन धर्म में २४ तीर्थकर हुए जिनकें नाम व उनका प्रतीक कोष्टक में दिया गया है.

ऋषभदेव (बैल)अजितनाथ (हाथी)सम्भवनाथ (घोड़ा)
अभिनंदन (बन्दर)सुमति नाथ (चकवा)पद्मनाभ (कमल)
सुपार्श्वनाथ (साथिया)चन्द्रप्रभु (चन्द्रमा)शीतलनाथ (कल्पवृक्ष)
धर्मनाथ (व्रज)सुविधिनाथ (मगर)श्रेयासथान (गैंडा)
अनंतनाथ (सेही)विमलनाथ (सूअर)वासुपूज्य (भैंसा)
कुन्थुनाथ (बकरा)शांतिनाथ (हिरण)अरनाथ (मछली)
मल्लिनाथ (मछली)मुनि सुब्रत (कछुआ)नेमिनाथ (नीलकमल)
अरिष्टनेमि (शंख)पार्श्वनाथ (सांप)महावीर (सिंह)

महावीर स्वामी जैन धर्म के २४ वें तीर्थकर थे इनको जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है. जैन तीर्थकर ऋषभदेव तथा अरिष्टनेमि का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है. सभी तीर्थकर क्षत्रिय थे तथा राजपरिवारों से थे. हालांकि वे एक दूसरे से पूर्णतया सम्बन्धित नही थे. पार्श्वनाथ और महावीर को छोड़कर २२ तीर्थकरों के बारे में अधिक जानकारी इतिहास में नही है.

पार्श्वनाथ के चार मुख्य उपदेश थे- अहिंसा (हिंसा ना करना), अमर्षा (झूठ न बोलना), अचौर्य (चोरी न करना) और अपरिग्रह (सम्पति अर्जित न करना) महावीर ने इन सभी उपदेशों को ग्रहण किया और इनमें एक और उपदेश ब्रह्मचर्य (इन्द्रिय निग्रह करना) को जोड़ा.

महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के निकट कुंडलग्राम (वज्जि संघ का गणराज्य) में ५४० ईपू में हुआ था, इनके बचपन का नाम सिद्धन तथा माता का नाम त्रिशला तथा पुत्री का नाम प्रियदर्शनी था जिसका विवाह जमालि से हुआ था.

महावीर का सम्बन्ध मगध के शासक बिम्बिसार से भी था जिन्होंने चेतक की पुत्री चेल्लना से विवाह किया था. महावीर सत्य की खोज के लिए ३० वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सन्यासी हो गये थे. महावीर ने १२ वर्ष की गहन तपस्या के बाद जम्भीग्राम के निकट रिजुपालिका नदी के तट पर एक वृक्ष के नीचे सर्वोच्च ज्ञान कैवल्य की प्राप्ति हुई. कैवल्य दारा उन्होंने सुख दुःख पर विजय प्राप्त की.

कैवल्य की प्राप्ति के पश्चात उन्हें कई नामों से जाना जाने लगा. यथा कैवलिन, जिन, निग्रथ, महावीर. अहर्त आदि. लगभग ७२ वर्ष की आयु में ४६८ ई.पू. में महावीर को राजगृह के समीप पावापुरी में निर्वाण की प्राप्ति हुई.

कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद महावीर ने अपना पहला उपदेश राजगृह में वितुलान्च्ल पर्वत पर दिया. महावीर के दामाद जामलि इसके प्रथम शिष्य बने. जैन धर्म के समर्थन में राजाओं अजातशत्रु, बिम्बिसार, उडायींन, चन्द्र्गुप्त मौर्य, लिच्छवी नरेश चेतक, कलिंग नरेश खारवेल का नाम उल्लेखनीय है. गुजरात के चालुक्य अथवा सोलंकी वंशी शासकों का काल जैन धर्म की उन्नत्ति का काल था.

महावीर ने वेदों और वैदिक कर्मकांडों को अस्वीकार कर दिया, उन्होंने संयमित जीवन का समर्थन किया जिसका अंतिम उद्देश्य कैवल्य (निर्वाण या मोक्ष) की प्राप्ति हैं. यदपि वे जाति प्रथा सिद्धांत के विरोधी नही थे. तथापि उन्होंने खान पान सम्बन्धी प्रतिबंधों का अनुमोदन नही किया.

महावीर को ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नही था. उन्होंने कहा कि यह संसार प्रकृति की रचना कारण और कार्य का परिणाम है. मनुष्य की मुक्ति ईश्वर की दया पर नही बल्कि उसके कर्मों पर निर्भर है. मनुष्य स्वयं अपनी नियति का निर्माता है. महावीर कर्म और आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास करते थे. मनुष्य वर्तमान और पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार आने वाले जन्मों में दंडित या पुरस्कृत होता है.

अच्छे या बुरे कर्मों के अनुसार आत्मा स्वयं अपने वर्तमान या भविष्य का स्रजन करती है. शरीर मृत हो जाता है लेकिन आत्मा जीवित रहती हैं. जैनियों में समानता पर अधिक जोर दिया गया. महावीर ने वर्ण व्यवस्था को स्वीकार किया फिर भी उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने कर्म के अनुसार अच्छा या बुरा हो सकता है. न कि अपने जन्म के कारण.

विश्व में दो तत्व होते है. जीव और आत्मा. जीव कार्य करता है अनुभव करता है तथा इच्छा करता है. यह दुःख भोगता है तथा मृत हो जाता है. आत्मा शाश्वत है और इसका जन्म एवं पुनर्जन्म होता है. जीव का अंतिम उद्देश्य जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाना है तथा निर्वाण की प्राप्ति होंना है.

जैन धर्म में देवताओं का अस्तित्व स्वीकार किया गया है. पर उनका स्थान जिन से नीचे रखा गया है. जैन धर्म में युद्ध और कृषि दोनों वर्जित है. क्योंकि दोनों में ही जीव हत्या होती है फलत जैन धर्मावलम्बियों में व्यापार और वाणिज्य करने वालों की संख्या अधिक हो गई हैं.

जैन धर्म की भारतीय संस्कृति को देन Jainism Contribution To Indian culture In Hindi

जैन धर्म विश्व के प्राचीन धर्मों से एक हैं. ईसा पूर्व के भारतीय धर्मों में हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्म मुख्य थे. महावीर स्वामी, ऋषभदेव समेत 24 तीर्थकर हुए आज के निबंध में हम जैन धर्म की भारतीय संस्कृति समाज को देन व योगदान के विषय में पढ़ेगे.

जैन धर्म का शाब्दिक अर्थ होता हैं जिन द्वारा प्रवर्तित धर्म हैं. अर्थात जो जिन को मानने वाले हैं उन्हें जैन कहा जाता हैं. संस्कृत की जिन धातु से जैन बना हैं जिसका अर्थ जीतना होता हैं.

इसका आशय होता है स्वयं के मन, वाणी, काय को जीतना. जैन धर्म में कर्म की प्रधानता हैं मनुष्य अपने कर्मों का ही फल पाते हैं. भारतीय संस्कृति को जैन धर्म की देन को अग्रलिखित रूप में स्पष्ट किया जा सकता हैं.

आचरण की शुद्धता का प्रसार (Accuracy of conduct)

जैन धर्म ने आचरण की शुद्धता पर बल दिया और अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, सत्य आदि पंच महाव्रतों को जीवन का आवश्यक कर्तव्य बतलाया. इससे भारतीय संस्कृति में मानवतावादी विचारधारा का प्रसार हुआ.

संघ व्यवस्था (sangh vyavastha)

जैन धर्म में गृहस्थों तथा वीतरागियों के अलग अलग संघ थे. वीतरागी श्रमण कहलाते थे. तथा गृहस्थ श्रावक श्राविका कहलाते थे. गृहस्थों का यह कर्तव्य यह था कि वे श्रमण मुनियों का आदर करें और धर्म प्रचार में उनका सहयोग करें. इस व्यवस्था ने धर्म प्रचार के लिए नई शैली को जन्म दिया.

दार्शनिक प्रभाव (Philosophical influence)

जैन आचार्यों में स्यादवाद, अनेकांतवाद, ज्ञान सिद्धांत , दस धर्म लक्षणों आदि सिद्धांतों का प्रतिपादन करके दार्शनिक क्षेत्रों में नवीन विचारों को जन्म दिया.

स्यादवाद के रूप में जैन धर्म ने भारतीय संस्कृति को एक अमूल्य दार्शनिक सिद्धांत दिया हैं. यह सिद्धांत बौद्धिक उदारता तथा सहिष्णुता का परिचायक हैं.

समानता एवं सहिष्णुता (Equality and tolerance)

जैन धर्म में श्रमण और श्रावक संघों में सभी को समान महत्व दिया गया. इससे समाज में समानता की भावना का प्रसार हुआ. जैन धर्म ने जाति प्रथा तथा ऊंच नीच के भेदभाव का विरोध किया और सामाजिक समानता पर बल दिया.

इसके परिणाम स्वरूप हिन्दू धर्म में प्रचलित जाति प्रथा के बंधन ढीले पड़ने लगे तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व में कमी आई. जैन धर्म में क्षमा, त्याग, तृष्णा मुक्ति, नम्रता आदि दस धर्मों के पालन पर महत्व दिया गया तथा संयमशील रहकर सहिष्णुता का उपदेश दिया गया.

अहिंसावादी और संयमशील Non-violent and sobering

जैन धर्म ने समाज में अहिंसा और कठोर संयम का प्रसार किया. अहिंसा परमो धर्म के वास्तविक जन्मदाता जैन ही हैं. यह सिद्धांत भारतीय समाज के लिए बड़ा लाभकारी सिद्ध हुआ.

महावीर स्वामी ने पांच महाव्रतों के रूप में सामाजिक जीवन के उच्च आदर्श समाज के सामने प्रस्तुत किये.

साहित्य सम्बन्धी देन (Literary contribution)

प्राकृत तथा अपभ्रंश साहित्य के विकास में जैन लेखकों की देन उल्लेखनीय हैं. प्राकृत भाषा में रचित उनका साहित्य अत्यंत विस्तृत हैं. उस युग की बोलचाल की भाषाओं को उन्होंने साहित्यिक रूप प्रदान किया.

जैन धर्म के मूल धार्मिक ग्रंथ 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण आदि प्राकृत भाषा में ही लिखे गये. जैन विद्वानों ने संस्कृत में भी अनेक ग्रंथों की रचना की. गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगु और कन्नड़ में भी जैन विद्वानों ने रचनाएं लिखी.

जैनियों ने संस्कृत भाषा में भी उच्च कोटि के ग्रंथ लिखे. व्याकरण, काव्य, कोश, छंद, शास्त्र तथा गणित जैसे विशिष्ट तकनीकी विषयों पर भी इसके ग्रंथों का अभाव नहीं हैं.

कला के क्षेत्र में देन (In the field of art)

जैन धर्म ने भारतीय कला के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया हैं. जैनों ने अनेक मन्दिरों, स्तूपों, मठों, गुफाओं एवं मूर्तियों का निर्माण करवाया. जैनों ने अनेक गुफाओं का निर्माण करवाया, जिनमें उद्यागिरी तथा एलोरा की गुफाएँ उल्लेखनीय हैं.

मध्यप्रदेश में खजुराहो के जैन मन्दिर, काठियावाड़ की गिरनार तथा पालिताना की पहाड़ियों पर बने जैन मन्दिर, रणकपुर तथा पारसनाथ के मन्दिर स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं.

राजस्थान में आबू पर्वत पर बने देलवाड़ा के जैन मन्दिर वास्तुकला के द्रष्टिकोण से अत्यंत उच्चकोटि के माने गये हैं. मैसूर के श्रवण बेलगोला से प्राप्त गोमतेश्वर की मूर्ति बड़ी सुंदर और प्रभाव शाली हैं.

वैदिक धर्म पर प्रभाव (Influence on Vedic religion)

जैन धर्म के प्रभाव के कारण वैदिक धर्म में पशुबलि की प्रथा समाप्त होने लगी और जाति बंधन तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व में कमी आई.

समाज सेवा की भावना (Spirit of social service)

जैनों ने अनेक औषधालयों, धर्मशालाओं, पाठशालाओं, अनाथालयों आदि का निर्माण करवाया. इससे समाज पर अच्छा प्रभाव पड़ा और लोगों में दीन दुखियों, अनाथों, असहायों आदि की सहायता करने तथा उन्हें दान देने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला.

नारी स्वतंत्रता (Female freedom)

महावीर स्वामी ने नारियों की दशा सुधारने पर भी बल दिया. उन्होंने घोषित किया कि पुरुषों की भांति स्त्रियों को भी निर्वाण प्राप्त करने का अधिकार हैं.

स्त्रियों को जैन संघ में प्रविष्ट होने का अधिकार दिया गया. इस प्रकार जैन धर्म में नारी स्वतंत्रता को बल मिला.

राजनीतिक क्षेत्र में योगदान (Contribution to the political field)

जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धांत ने भारतीय शासकों को शांतिपूर्ण नीति अपनाने एवं जनता की भलाई के लिए प्रयत्नशील रहने की प्रेरणा दी.

जैन धर्म पर निबंध Essay on Jainism in Hindi

विश्व के प्रमुख धर्मों में जैन धर्म को भी गिना जाता हैं, जिनका जन्म भारत में हुआ तथा अधिकतर अनुयायी भी भारत में ही रहते हैं. सत्य, अहिंसा, मानवता की बुनियाद पर खड़े जैन धर्म  महावीर स्वामी द्वारा स्थापित धर्म के मुख्य सिद्धांत शिक्षाएं क्या हैं विस्तार से जानेगे.

जैन धर्म के संस्थापक एवं कैवल्य ज्ञान प्राप्त महात्मा ओं को तीर्थकर माना गया हैं. जैन धर्म में २४ तीर्थकर हैं, जिनमें ऋषभदेव (प्रथम तीर्थकर व जैन धर्म के संस्थापक) पार्श्वनाथ व महावीर स्वामी मुख्य हैं.

पार्श्वनाथ: जैन धर्म के 23 वें तीर्थकर, जन्म 8 वीं सदी ई पू में, पिता अश्वसेन (काशी नरेश), माता- वामा, पत्नी प्रभावती (कुश स्थल देश की राजकुमारी) 30 वर्ष की आयु में गृह स्थान,सम्मेद शिखर पर्वत पर ज्ञान प्राप्ति,पार्श्वनाथ का प्रतीक चिह्न सर्प हैं.

चार उपदेश: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह. पार्श्वनाथ के  अनुयायियों को निग्रंथ कहा जाता था, इन्होने नारियों को अपने धर्म में प्रवेश दिया. पिता: सिद्धार्थ व माता त्रिशला थी. बचपन   का नाम- वर्द्धमान, पत्नी-यशोदा, पुत्री-अनोज्जा तथा   दामाद-जामालि.

वर्द्धमान ने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात 30 वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई नन्दीवर्धन से अनुमति लेकर सन्यास लिया. 12 वर्षों की कठोर तपस्या तथा साधना के पश्चात जम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई, तब वे केवलिन जिन और निग्रंथ कहलाये और जैन धर्म कहलाया.

जैन धर्म के प्रचार हेतु महावीर स्वामी ने पावापुरी में जैन संघ की स्थापना की. महावीर के प्रथम शिष्य उनके दामाद जामालि बने, प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की पुत्री चम्पावती थी.

30 वर्षों तक धर्म का प्रचार करने के बाद 72 वर्ष की आयु में राज गृह के समीप पावापुरी में राजा हस्तिपाल के सानिध्य में शरीर त्याग दिया, उनकी मृत्यु को जैन मत में निर्वाण कहा गया हैं. महावीर की मृत्यु के बाद केवल एक गणधर सुधर्मन जीवित बचा जो जैन संघ का उनके बाद प्रथम अध्यक्ष बना.

सिद्धांत व शिक्षाएँ (jainism major beliefs)

  • अनीश्वरवादी– जैन अनुयायी ईश्वर को नहीं मानते, उनके अनुसार सृष्टि अनादी और अनन्त हैं.
  • महावीर का आत्मा के पुनर्जन्म सिद्धांत तथा कर्म के सिद्धांत में विश्वास था.
  • त्रिरत्न- आत्मा को कर्म के बंधन से मुक्त करने के लिए त्रिरत्न आवश्यक हैं जो निम्न हैं. सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र.

पंच महाव्रत

  • अहिंसा– मन, कर्म तथा वचन से किसी के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे उसे दुःख व कष्ट हो.
  • सत्य– मनुष्य को सदैव मधुरता के साथ सत्य बोलना चाहिए.
  • अस्तेय– चोरी नहीं करना
  • ब्रह्मचर्य– भोग वासना से दूर रहकर संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करना
  • अपरिग्रह– संग्रह नहीं करना

नोट: प्रथम चार महाव्रतों  का प्रतिपादन 23  वें तिर्थकर पार्श्वनाथ  व अंतिम महाव्रत  का प्रतिपादन महावीर  भगवान ने किया. महावीर वेदों  के प्रभुत्व  को स्वीकार नहीं  करते वे व्रत उपवास व तपस्या   पर अत्यधिक बल देते थे.

स्यादवाद का सिद्धांत:   स्यादवाद ज्ञान की सापेक्षता का  सिद्धांत हैं. इस मत के अनुसार किसी वस्तु के अनेक पहलू होते हैं तथा व्यक्ति अपनी  सिमित बुद्धि द्वारा केवल कुछ  ही पहलुओं को जान सकता हैं.

अतः सभी विचार अशतः सत्य होते हैं. पूर्ण ज्ञान तो कैव्लिन के द्वारा ही संभव हैं. भगवान महावीर का प्रतीक चिह्न सिंह हैं, उन्होंने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में दिए जो जन सामान्य की भाषा थी.

सम्प्रदाय का विभाजन: महावीर स्वामी की मृत्यु के पश्चात लगभग दो शताब्दियों तक जैन अनुयायी संगठित रहे किन्तु मौर्य काल में जैन धर्म दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया.

दिगम्बर संप्रदाय- इस संप्रदाय के साधुओं के लिए सम्पति के पूर्ण बहिष्कार का प्रावधान हैं. इस संप्रदाय के साधु दिशाओं को ही वस्त्र समझकर नंगे रहते हैं. भद्रबाहु ने इनका नेतृत्व किया.

श्वेताम्बर संप्रदाय- इस संप्रदाय के साधू साध्वियां सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं जिन्हें वे अहिंसा एवं शांति का प्रतीक समझते हैं. स्थूलबाहु ने इनका नेतृत्व किया.

जैन सभाएं: प्रथम जैन सभा चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में पाटलीपुत्र में भद्रबाहु एवं स्म्मुति विजय के निरिक्षण में हुई. इसमें जैन धर्म के महत्वपूर्ण 12 अंगों का प्रणयन व धर्म का श्वेताम्बर व दिगम्बर में विभाजन.

द्वितीय जैन सभा– यह सभा छठी शताब्दी में गुजरात के वल्लभी नामक स्थान पर देवधगणी की अध्यक्षता में हुई. इनमें जैन धर्मग्रंथों को अंतिम रूप में संकलित कर लिपिबद्ध किया गया.

बीच में एक जैन सभा चौथी शताब्दी में निम्न स्थानों पर हुई थी. मथुरा अध्यक्ष एवं अध्यक्ष वल्लभी. महावीर स्वामी के 11 शिष्य थे जो गणधर या गंधर्व कहलाये थे.

जैन धार्मिक ग्रंथ आगम कहलाते हैं. मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य आचार्य भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर उनके साथ दक्षिण भारत में चले गये थे.

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