जैन धर्म का इतिहास नियम शिक्षा संस्थापक | Jainism History Rule Teachings And Founders In Hindi

जैन धर्म का इतिहास नियम शिक्षा संस्थापक Jainism History Rule Teachings And Founders In Hindi: जैन साहित्य के अनुसार जैन धर्म का प्रारम्भ बहुत प्राचीन काल में हुआ था. जैन दार्शनिक परम्परा वैदिक परम्परा के ही समकालीन एक आदोंलन माना जाता है. जैन धर्म के विकास में तीर्थकरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. ऐसा माना जाता है महावीर स्वामी के पहले 23 तीर्थकर हुए थे. पहले तीर्थकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे तथा 23 वें पिर्थ्कर पार्श्वनाथ थे. 24 वें तीर्थकर महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के समीप कुंडग्राम में, क्षत्रिय कुल में 599 ईसा पूर्व में हुआ था.

जैन धर्म का इतिहास नियम शिक्षा संस्थापक

जैन धर्म का इतिहास नियम शिक्षा संस्थापक Jainism History Rule Education And Founders In Hindi

महावीर स्वामी का परिचय (Introduction to Mahavir Swami)

इनके पिता का नाम सिद्धार्थ था और माता का नाम त्रिशला था. त्रिशला लाच्छ्वी गणराज्य के राजा चेटक की बहिन थी. महावीर स्वामी का बचपन का नाम वर्धमान था. वर्धमान को प्रारम्भ से ही क्षत्रियोचित शिक्षा दी गई थी.

किन्तु वर्धमान का मन संसार में नही लगता था. उनके मन में विरक्ति के भाव पैदा हो गये थे. इसलिए 30 वर्ष की उम्रः में,उनके माता पिता के निधन के बाद उन्होंने सत्यज्ञान की खोज करने के लिए अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से आज्ञा लेकर घर छोड़ दिया और तपस्या करने लगे.

इस तपस्या में उन्हें घोर संकट सहन करने पड़े. बिना वस्त्र तथा महीनों तक बिना खाए पिए रहे. अंत में, 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद उन्हें एक कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई. कैवल्य ज्ञान प्राप्त हो जाने पर महावीर स्वामी को जिन, निग्रन्थ तथा महावीर आदि नामों से पुकारा जाने लगा.

कैवल्य ज्ञान हो जाने पर महावीर स्वामी ने जनता को जीवन का सही मार्ग दिखाने का कार्य प्रारम्भ किया. उनके विचारों का जनता में प्रचार करने के लिए स्थान स्थान पर घुमने लगे, उनके इस कार्य से मगध, काशी तथा कौशल आदि राज्यों में उनके विचारों का प्रचार हुआ.

उनकी सत्य वाणी से प्रभावित होकर कई लोग उनके अनुयायी बनने लगे. धीरे धीरे उनके अनुयायियों की संख्या काफी हो गई. अंत में इसी प्रकार अपने विचारों का प्रचार करते हुए पावापुरी बिहार में 527 ई.पू. 72 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी का निर्वाण हुआ. अपने ज्ञान दीप को हमेशा जलाए रखने हेतु चौदह हजार शिष्य छोड़ गये.

जैन धर्म के त्रिरत्न क्या है

जैन शब्द जिन से बना है इसका शाब्दिक अर्थ होता है विजेता. संसार की मोह माया व इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर मोक्ष ही इस धर्म का एकमात्र उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करने के लिए महावीर स्वामी ने तीन उपाय बताये थे. जो आगे चलकर त्रिरत्न कहलाएं, जैन धर्म का दार्शनिक चिन्तन यही से प्रारम्भ होता है.

  1. सम्यक ज्ञान– इसका अर्थ पूर्ण और सच्चा ज्ञान होता है. महावीर स्वामी ने बताया था कि सच्चे और पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के लिए मनुष्यों को तीर्थकरों के उपदेशों का अध्ययन और अनुसरण करना चाहिए.
  2. सम्यक धर्म– इसका अर्थ है तीर्थकरों में पूरी आस्था रखना. सच्चे ज्ञान को जीवन में उतरने के लिए प्रत्येक मनुष्य को तीर्थकरों में पूर्ण आस्था और विश्वास रखना चाहिए.
  3. सम्यक चरित्र– इसका अर्थ है मनुष्य अपनी इन्द्रियों को वंश में रखकर सत्य ज्ञान को प्राप्त कर सकता है.अतः उसे इन्द्रियों पर संयम रखना चाहिए.

जैन धर्म के नियम (Rules of Jainism)

मोक्ष प्राप्ति के इन तीनों साधनों का पालन करने के लिए जैन धर्म ने गृहस्थ लोगों के लिए पांच मुख्य नियम (महाव्रत) बताए थे जो निम्नलिखित है.

  •  अहिंसा– अहिंसा महावीर स्वामी और जैन धर्म के सिद्धांतों का मूल मन्त्र है. अहिंसा का अर्थ प्राणी मात्र के प्रति दया समानता और उपकार की भावना है. मन वचन तथा कर्म से किसी के प्रति अहित की भावना नही रखना वास्तविक अहिंसा है. जैन धर्म में अहिंसा की सूक्ष्म से सूक्ष्म व्याख्या की गई है.
  • सत्य– अहिंसा के साथ सत्य वचन पर महावीर स्वामी ने बहुत जोर दिया, क्योकि सत्य भाषण के अहिंसा का पालन नही हो सकता. अतः महावीर ने कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक परिस्थति में सत्य बोलना चाहिए.
  • अस्तेय– अस्तय का अर्थ चोरी नही करना है. महावीर ने चोरी को अनैतिक कार्य बताया तथा इस दुर्गुण से हमेशा दूर रहने की शिक्षा दी.
  • अपरिग्रह- अपरिग्रह का अर्थ है संग्रह नही करना होता है. महावीर के अनुसार जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का संग्रह नही करता है, वह संसार के मायाजाल से दूर रहता है अर्थात अपने पास उतना ही रखों जितने की आवश्यकता है, शेष सभी को वांछित लोगों में बाट दो.
  • ब्रह्राचर्य– इन चार बातों का पालन तब तक नही हो सकता, जब तक कि मनुष्य विषय वासनाओं से दूर नही रहता. इसलिए महावीर ने जैन धर्म के 23 वें तीर्थकर पार्श्वनाथ के चारों उपायों में ब्रह्राचर्य को पांचवा उपाय जोड़कर उन्हें त्रिरत्नों की प्राप्ति का साधन बताया.

nc का इतिहास (History of Jainism)

महावीर कहते थे कि संसार के दुःख सुख का कारण मनुष्य का अन्तकरण है. यदि उपर बतलाए गये उपायों का मनुष्य पालन करे तो वह आत्मा पर विजय प्राप्त कर सकता है. आत्मा पर विजय प्राप्त करने से ही संसार की मोह माया से मनुष्य छुटकारा पा सकता है.

जैन धर्म की शिक्षाएं (Teach & Education of Jainism)

तपस्या और उपासना-महावीर स्वामी ने आत्मा को वंश में करने तथा उपर्युक्त पांच नियमों का पालन करने के प्रयत्न में तपस्या और उपवास पर सबसे अधिक बल दिया.

उन्होंने दो प्रकार की तपस्या बताई एक बाह्य तथा दूसरी आंतरिक. तपस्या में नम्रता, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान आदि सम्मलित है.

बाह्य तपस्या करने से व्यक्ति में अच्छे विचारों का विकास होता है. महावीर ने तपस्या का सबसे सरल साधन उपवास बताया है. इससे आत्मा और शरीर की शुद्धी होती है और मनुष्य को मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त होता है.

महावीर आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे उनके अनुसार प्रकृति में परिवर्तन हो सकते है किन्तु आत्मा अजर अमर है. और सदा एक सी बनी रहती है.

मनुष्य के कर्मों का कारण पैदा होने वाली सांसारिक वासना के बंधनों से आत्मा का बार बार आवागमन होता रहता है. और जन्म मरण का चक्र चलता रहता है.

इसलिए महावीर स्वामी का कथन था कि यदि वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली जाएं तो कर्मों के बंधन से मुक्त हो सकते है और जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिल सकेगी.

महावीर स्वामी की इस विचारधारा से अनुमान लगा सकते है कि जैन धर्म की आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म और कर्मवाद में विश्वास रखता है. महावीर की ये सभी शिक्षाएं बड़ी सरल एवं सीधी थी.

साथ ही इन बातों का उपदेश महावीर ने उस युग की जनता की भाषा अर्ध मागधी में किया. महावीर ने जातिवाद व छुआछुत का विरोध किया तथा नारी को पूरा सम्मान दिया. महावीर ने तत्कालीन हिंसा, कट्टरता व सामाजिक कुरीतियों का जमकर विरोध किया.

जैन धर्म निवृतिमूलक हैं इसके अनुसार संसारिक जीवन में सुख नही है अतः संसार का परित्याग कर कठोर तपस्या द्वारा मोक्ष प्राप्त करना चाहिए. मनुष्य के सारे सुख दुखों का कारण उसके कर्म ही है.

कर्म ही पुनर्जन्म का कारण है उसे कर्मों के फल को भोगे बिना जन्म मरण के चक्र से छुटकारा नही मिलता है. जैन मतानुसार यह स्रष्टि जीव और अजीव से निर्मित है. जीव चेतन है अजीव अचेतन है. जीव और अजीव कर्म में बंधे रहते है. कर्म के बंधन को तोड़ना ही मोक्ष है.

जैन धर्म में स्याद्वाद जैन धर्म में स्याद्वाद या अनेकान्तवाद, सहिष्णुता व समन्वय का मूल मन्त्र है. महावीर ने कहा था कि किसी बात को एक पक्ष से मत देखो.

उस पर एक ही तरह के विचार मत करों. तुम जो कहते हो वह सत्य हो सकता है. किन्तु दूसरे जो कहते है वह भी सत्य हो सकता है. आज संसार में जो द्वंद और तनाव है.

वह दूसरों के द्रष्टिकोण को न समझने का कारण ही है. अतः इस सिद्धांत से विचार समन्वय संभव है. जैन धर्म के अनुसार आत्मा अजर अमर है.

जीव ही आत्मा है कण कण में जीवात्मा का निवास है. इस प्रकार जैन धर्म का दार्शनिक चिन्तन मूलतः आत्म कल्याण की ओर प्रवृत होने की प्रेरणा देता है.

जैन धर्म के त्रिरत्न (three jewels of jainism in hindi)

जैन धर्म के त्रिरत्न को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. त्रिरत्न एक संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका हिंदी में शाब्दिक अर्थ होता है तीन रत्न. महावीर के समय का जैन साहित्य पालि में लिखा गया,

जिसमें त्रिरत्न को ति रत्न कहा जाता था. इन तीन रत्नों में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को शामिल किया गया है जिसक अर्थ व व्याख्या इस प्रकार है.

पापों से बचकर निर्वाण प्राप्ति के लिए मनुष्य को तीन रत्नों (त्रिरत्न) का पालन करना चाहिए, ये तीन जैन धर्म के रत्न माने गये हैं.

  • सम्यक दर्शन– तीर्थकरों और सिद्दांतों में विश्वास करना ही सम्यक दर्शन है और इससे जुड़ी सत्य की अनुभूति का सही दृष्टिकोण मिलता है.
  • सम्यक ज्ञान- सम्यक ज्ञान धार्मिक सिद्धांतों को पूर्णतः सही रूप में समझने को मिलता है.
  • सम्यक आचरण– इसका अर्थ है उन दुष्कर्मों से मुक्ति जो हानिकारक हो, और ऐसे सत्कर्म करना जो कल्याणकारी हो.

जैन दर्शन के क्षेत्र में धर्म ने स्यादवाद को प्रतिपादित किया, जो प्राचीन भारतीय दार्शनिक व्यवस्था की एक अमूल्य निधि मानी जा सकती है.

इसके अनुसार प्रत्येक पदार्थ का स्वरूप या सत्ता सापेक्षिक है. कभी हम उसे प्रत्यक्ष रूप से वर्णित या अनुभव कर सकते है, पर हम कभी उन्हें व्यक्त नही कर सकते है. इस सिद्धांत के कारण जैन धर्म में तार्किकता का विकास हुआ.

जैन धर्मग्रंथ (jainism holy book name)

जैनों ने अपने धर्मोपदेश के लिए आम लोगों की बोलचाल की प्राकृत भाषा को अपनाया. जैन धर्मग्रथों की रचना मुख्यतया अर्धमागधी भाषा में हुई.

प्राकृत भाषा से कई क्षेत्रीय भाषाएँ विकसित हुई, इनमें उल्लेखनीय है- शौरसेनी जिसमें मराठी, गुजराती, राजस्थानी और कन्नड़ भाषाएँ निकली है.

इन ग्रंथों से महावीर की जीवनी एवं जैन धर्म के उपदेशों के साथ साथ तत्कालीन राजनितिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का भी ज्ञान होता है. महावीर के दिए मौलिक सिद्धांत १४ प्राचीन ग्रंथों में है. बाद में इन्हें १२ अंग व १२ उपभागों में विभाजित कर दिया गया.

जैन धर्म ग्रंथों-jain dharma books में परिशिष्ट पर्व, आचारांग सुत्त, कल्प सुत, भगवती सुत्त, उवासगदसाओ सुत्त, भद्रबाहुचरित्र, त्रिषष्टिशलाका, पुरूषचरित आदि महत्वपूर्ण है. जैन ग्रंथों का संकलन गुजरात (वल्लभी) में ईसा की छठी शताब्दी में हुआ.

जैन धर्म का विभाजन (history of jainism in hindi)

जैन ग्रन्थ परिशिष्ट पर्वन के अनुसार मगध में १२ वर्षों तक लम्बा अकाल पड़ा. अतः बहुत से जैन भद्रबाहु के नेतृत्व में श्रवणबेलगोला चले गये.

शेष जैन स्थूलभद्र के नेतृत्व में मगध में ही रुक गये. अकाल समाप्त होने के बाद जब भद्रबाहु व उनके समर्थक मगध लौटे तो स्थानीय लोगो से उनका मतभेद हो गया.

उन्होंने पाया कि स्थानीय लोगों ने जैन धर्म का पालन नही किया. इस मतभेद को दूर करने के लिए पाटलीपुत्र में एक परिषद का आयोजन किया गया, जिसका दक्षिणी जैनों ने बहिष्कार किया.

तब से दक्षिणी जैन दिगम्बर कहलाएं एवं मगध के जैन श्वेताम्बर. श्वेताम्बर पन्थ को मानने वाले श्वेत वस्त्र धारण करते है. दिगम्बर पंथ को मानने वाले वस्त्रों का परित्याग करते है.

जैन धर्म के पतन के कारण (Causes for The Decline of Jainism in India)

  • क्लिष्ट धर्म का आचरण धारण किया जाना
  • अहिंसा पर अत्यधिक बल
  • आत्मपीड़न, कठोर व्रत एवं तपस्या पर अत्यधिक बलउचित राज्याश्रय का अभाव
  • जाति व्यवस्था के दर्शन को बनाए रखना
  • ब्राह्मण धर्म से पुर्णतः पृथक न कर सका.
  • बौद्ध धर्म का विस्तार
  • हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान

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