Guru Arjan Dev ji History In Hindi | गुरु अर्जन देव जी का इतिहास

गुरु अर्जन देव जी का इतिहास Guru Arjan Dev ji History In Hindi : गुरु अर्जन देव जी सिक्खों के पांचवे गुरु थे. ये सिख समुदाय के ऐसे पहले गुरु बने जिनके पिताजी को भी गुरुपद प्राप्त हुआ था. अर्जुन देव जी के पिताजी रामदास जी चौथे सिक्ख गुरु थे, इनके इंतकाल के बाद अर्जुनदेव जी अगले गुरु बने थे. स्वभाव से बेहद सरल व सौम्य गुरूजी सभी धर्मों का आदर करते थे वे बड़े विद्वान् तथा धर्म की राह पर अडीग थे, अपने धर्म की रक्षा की खातिर उन्होंने शहीदी पाई. आज के लेख में हम History Of Guru Arjan Dev ji को विस्तार से जानेगे.

गुरु अर्जन देव जी का इतिहास Guru Arjan Dev ji History In Hindi

गुरु अर्जन देव जी का इतिहास Guru Arjan Dev ji History In Hind
पूरा नामगुरु अर्जन देव
जन्म15 अप्रैल सन् 1563
जन्म भूमिअमृतसर
मृत्यु30 मई, 1606 ई
शहीदी स्थानलाहौर
परिजनगुरु रामदास और भानी जी
पत्नीगंगा जी
संतानगुरु हरगोविंद सिंह

Guru Arjan Dev ji History

भाद्रपद शुदि एकम (आश्विन 20) संवत 1638 को गुरूजी का जन्म रामदासजी व माता भानी के घर अमृतसर शहर में हुआ था. मानवीय आदर्शों को उच्च स्थान देने वाले गुरु की सहृदयता, कर्तव्यनिष्ठता को देखते हुए इन्हें 1581 में पांचवें गुरु की उपाधि दी गई.

माता गंगा से इनका विवाह 1589 में हुआ था. इनके एक पुत्र हुआ जिनका नाम गुरु हरगोबिन्द था जो अगले सिख गुरु भी बने. मदासपुर शहर तथा अमृतसर सरोवर बनाकर कई जनहित के कार्य किया. शेख महोमद मीर शाह लाहौर के रहने वाले सूफी फकीर थे. अर्जुन देव जी ने इनके हाथों से स्वर्ण मन्दिर की नीव रखी. Guru Arjan Dev ji History In Hindi

अर्जुन देव जी ने 30 रागों में 2,218 शबदों को कहा तथा सिक्खों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब को पुनः लिखवाकर अपनी साखी को भी उनमें जोड़ा. जब गुरूजी गुरु ग्रंथ साहिब का सम्पदान करवा रहे थे तो कुछ लोगों ने यह अपवाह फैलाई कि इसमें इस्लाम विरोधी कई बातें जोड़ी गई हैं.

यह शिकायत सम्राट अकबर के पास पहुची तो उन्होंने स्वयं अध्ययन करने के बाद पाया कि संसार को मानवता की राह दिखाने वाले पवित्र ग्रंथ में इस तरह की कोई बात नहीं हैं. उन्होंने गुरूजी को मिली तकलीफ की क्षमा मांगते हुए 50 मोहरे भेट की.

गुरु अर्जन देव जी की शहादत का कारण

मुगलों के अधार्मिक कार्यों की प्रवृति के रूप में प्रतिकार के लिए हिन्दू धर्म की शस्त्र सेना के रूप में सिख धर्म का उदय हुआ था. पांचवे गुरु अर्जुन देव जी के समय मुगल सम्राट अकबर था जो अपने पूर्ववर्ती शासकों की तुलना में कम कट्टरपंथी था.

मगर अकबर के देहांत के बाद उसका बेटा जहाँगीर शासक बनता है, पूरे हिंदुस्तान पर शासन करने की उसकी महत्वकांक्षा में एक रोड़ा बाबा अर्जुन देव थे. सिखों और हिन्दुओं में इनकी गहरी लोकप्रियता थी. धार्मिक और राजनैतिक कारणों से जहाँगीर अर्जुन देव जी के जीवन को समाप्त करना चाहता था.

गुरु अर्जुन देव जी की शहीदी के दो कारण उनके घर के भेदी थे. पहला था चंद, जो अपनी बेटी का विवाह गुरूजी से करना चाहता था मगर गुरूजी द्वारा स्पष्ट मना कर दिए जाने पर वह उनकी हत्या करने की ठान चुका था.

अर्जुन देव जी की हत्या को चाहने वाला दूसरा व्यक्ति उनका बड़ा भाई पृथ्वी चंद था. उसका मानना था कि अर्जुन देव जी के कारण वह गुरु गद्दी हासिल नहीं कर सका था.

चंदू और पृथ्वीचंद जहाँगीर के मोहरे बनकर अर्जुन देव जी के प्रति जहाँगीर में नफरत भरते रहे. जहाँगीर कट्टर मुस्लिम था उसे पहले से गुरूजी द्वारा किये जा रहे धार्मिक और सामाजिक कार्य पसंद नहीं थे. दोनों की दुश्मनी का एक कारण खुसरो भी था. शहजादा खुसरो जहाँगीर का बागी बेटा था जिसे अर्जुन देव जी ने शरण दी थी.

इस पर जहाँगीर ने अर्जुन देव जी पर 2 लाख रूपये का जुर्माना लगा दिया अथवा शाही दंड भुगतने का फरमान दे दिया. अर्जुन देव जी को यह प्रस्ताव भी दिया गया, अगर वे सिख ग्रथों में मुहम्मद साहब की स्तुति लिखे तो उनका यह दंड माफ़ कर दिया जाएगा, मगर पांचवे गुरु ने मुगल की एक बात न मानी.

गुरु अर्जन देव जयंती (Guru Arjan Dev Jayanti in Hindi)

गुरु अर्जन देव जयंती 16 जून को हर वर्ष सिख समुदाय के अनुयायी बड़ी धूमधाम से मनाते हैं. इस अवसर पर गुरुद्वारों में कई धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता हैं तथा नियत समय पर गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ भी किया जाता हैं.जयंती के मौके पर कई शहरों अमृतसर, तरनतारन, भैणी, सरहाली, खडूर साहिब, गोइंदवाल, करतारपुर के गुरुद्वारों में सामूहिक लंगरों का आयोजन होता हैं तथा अर्जुन देव की शिक्षाएं व साखी बांची जाती हैं.

गुरु अर्जन देव का उपदेश साखी, शिक्षाएं (quotes,Teachings of Guru Arjan Dev Ji in Hindi)

  • प्रत्येक सिख को सवेरे उठने के बाद वाहेगुरु मंत्र का उच्चारण कर बाणी अवश्य पढ़नी चाहिए.
  • अपने हाथ से की कमाई से गुजारा करना तथा असहाय लोगों की मदद करना.
  • अहं भाव से सदा दूर रहना.

अर्जुन देव जी की शहीदी (Sri Guru Arjan Dev Ji Death Story)

जैसा कि ऊपर बताया गया हैं अकबर अर्जुन सिंह की बड़ी इज्जत करता था. मगर उसका बेटा जब जहांगीर दिल्ली का शासक बना तो व अकबर की नीतियों के बिलकुल अलग था. घोर कट्टरता की विचारधारा के चलते उनका पहला निशाना अर्जुन सिंह ही बने, अपने बेटे खुसरों की मदद से उसने गुरूजी को लाहौर की जेल में बंद कराया.

जब गुरूजी कैद में थे तो उन्हें अपना धर्म परिवर्तित कर इस्लाम अपनाने के लिए जोर लगाया, मगर वे नहीं माने तो उन्हे कठिन यातनाएं दी जाने लगी. गर्म रेत पर लिटाकर उन्हें पीटा जाता तो कभी उबलते जल में पूरे दिन रखा जाता तो कभी तवे पर गर्म रेत पर बिठा कर उनके सर पर गर्म रेत डाली जाती पांच दिनों की घोर यातनाओं के बाद 30 मई 1606 उन्हें रावी नदी के किनारे गुरूजी ने अपनी देह त्याग दी.

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