जैन तीर्थ ऋषभदेव केसरियाजी के मंदिर का इतिहास Kesariyaji Temple History In Hindi

Kesariyaji Temple History In Hindi जैन तीर्थ ऋषभदेव केसरियाजी के मंदिर का इतिहास: उदयपुर अहमदाबाद नेशनल हाइवे से 40 किमी दूर केसरियाजी मंदिर Kesariyaji Temple हैं. इसे केसरिया जी, आदिनाथ जी, धूलेव जी, तथा काला जी आदि नामों से भी जाना जाता हैं. शीतलाष्टमी के दिन यहाँ जैन तीर्थ ऋषभदेव जी का मेला भी भरता हैं. इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना रहा है. Kesariyaji Temple History में आपकों इस ऐतिहासिक मंदिर से जुड़ी कुछ बाते बताते हैं.

केसरियाजी के मंदिर का इतिहास Kesariyaji Temple History In Hindi

जैन तीर्थ ऋषभदेव केसरियाजी के मंदिर का इतिहास Kesariyaji Temple History In Hindi

अन्य नाम केसरियाजी, कालिया बाबा, ऋषभदेव
स्थान धुलेव, उदयपुर
नजदीकी शहर उदयपुर (40 किमी)
धर्म जैन व हिन्दू
मंदिर निर्माण 1676 वि. सं
मान्यता जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ
रेलवे स्टेशन ऋषभदेव 11 किलोमीटर, एयरपोर्ट उदयपुर

राजस्थान के उदयपुर शहर से मात्र 40 किमी की दूरी पर एक धूलेव गाँव है जिनमें प्रथम जैन मुनि ऋषभदेव जी मुख्य मंदिर हैं. अरावली पर्वतमाला के कन्दराओं के मध्य बसा यह मंदिर कोयल नदी के तट पर बना हुआ हैं. यह जैन धर्म के अनुयायीयों का सबसे पावन मंदिर व तीर्थ समझा जाता हैं.

केसरियाजी के इस मंदिर में न केवल जैन समुदाय के लोग आते हैं बल्कि राज्य में बड़ी संख्या में रहने वाले हिन्दू वैष्णव तथा विशेष कर मीणा समुदाय के लोग भी पूजा करते हैं.

प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ‘आदिनाथ’ या ‘ऋषभदेव की इस मंदिर की प्रतिमा काले रंग की हैं इसलिए इन्हें स्थानीय भाषा में कालिया जी भी कहते हैं. मूर्ति पर अत्यधिक मात्रा में सिंदूर चढाएं जाने के कारण इन्हें केसरिया जी भी कहा जाता हैं.

ऋषभदेव मन्दिर उदयपुर का इतिहास

धूलेव का यह केसरिया जी का मंदिर का प्रथम द्वार नक्कारखाने के रूप में है, चारो ओर परिक्रमा के लिए इस मुख्य दरवाजे से प्रवेश होता हैं.

दूसरे द्वार के पास ही एक विशाल काले प्रस्तर का हाथी बना हुआ हैं इसके पास हवनकुंड बना हुआ हैं. इस कुंड में नवरात्रि के अवसर पर हवन किया जाता हैं.

उंचाई पर बने केसरिया जी के मंदिर तक पहुचने के लिए सीढियाँ बनी हुई हैं. द्वारों पर शिव तथा ब्रह्मा जी की मूर्ति खड़ी हैं यही गज की सवारी करते हुए मरूदेवी की मूर्ति भी हैं.

मंदिर के पास ही एक चबूतरा भी बना हुआ है जिन्हें भागवतगीता का चबूतरा कहते हैं जहाँ हार चार माह में गीता पाठ किया जाता हैं. यहाँ के मंडप 9 स्तम्भ के होने के कारण उन्हें 9 चौकी भी कहा जाता हैं.

मंदिर में कुछ प्राचीन शिलालेख भी मिलते हैं जिनके अनुसार विक्रम संवत 1676 में इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था. मंदिर के गर्भगृह में ऋषभदेव जी की प्रतिमा के पास ही इंद्र देव की पत्थर की मूर्ति बनी हुई हैं.

यहाँ पर तीर्थंकरों की 22 तथा देवकुलिकाओं की 54 मूतियाँ बनी हुई है जिनमें 62 हस्तलिखित लेख खुदे हुए हैं. तीर्थंकर ऋषभदेव के 16 स्वपनों को जैन धर्म में मान्यता दी गई हैं जिनमें से श्वेताम्बर 14 को तथा दिगम्बर 16 को मान्यता देते हैं.

मुस्लिम आक्रान्ताओं से मन्दिरों के विध्वंस को बचाने के लिए जैन मंदिर निर्माता मुस्लिम धर्म के कुछ पवित्र चिन्हों को बनवा देते थे जिसके चलते आक्रमणकारी उसे ध्वस्त नहीं करते थे.

केसरियाजी के धुलेव मंदिर में इस तरह की 10 ताखें छोटी छोटी खुदी हुई हैं. जिन्हें इस्लाम मजहब से जोड़कर देखा जाता हैं.

केसरियाजी मंदिर वैसे तो जैन मंदिर हैं मगर यह हिन्दुओं तथा जैनियों का पवित्र स्थान हैं. कई मान्यताएं तथा परम्पराएं दोनों मतों की समानताएं तथा एक दूसरे के सहयोग को दर्शाती हैं.

मंदिर में विष्णु के जन्माष्टमी, जलझूलनी आदि उत्सव हर साल मनाए जाते हैं. यहाँ विष्णु जी की परम्परानुसार पूजा होती हैं.

केसरिया जी मंदिर की अनोखी परम्परा

आपकों यह जानकर आश्चर्य होगा कि केसरियाजी के इस जैन मंदिर के मूल द्वार पर एक घड़ी बनी हुई हैं जो लगभग 1500 साल पुरानी हैं

मंदिर के समस्त क्रियाकलाप पूजा पाठ आदि इस घड़ी के समय के मुताबिक़ ही सम्पन्न करवाएं जाते हैं. यहाँ समय गणना की बेहद प्राचीन परम्परा प्रचलित हैं.

जिसमें लकड़ी के बक्से में ताम्बे के बड़े भगोने में पानी भरा जाता हैं उसमें ताम्बे का कटोरा रखा जाता हैं जिसमें एक छेद होता है तथा यह नियत 24 मिनट में कटोरा भर जाता हैं उसी समय पहरेदार एक घंटी बजाकर समय होने का संकेत करता हैं.

भारतीय काल गणना से यह काफी भिन्न हैं इसमें एक घड़ी को 24 मिनट का रखा जाता हैं सामान्य समय से 45 मिनट का अंतर रहता हैं. 8 घड़ी का एक पहर तथा चार पहर का एक दिन होता हैं.

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