शीतला अष्टमी व्रत कथा महत्व स्टोरी Sheetala Ashtami 2022 Ki Vrat Katha

शीतला अष्टमी व्रत कथा महत्व स्टोरी Sheetala Ashtami 2022 Ki Vrat Katha : सभी पाठकों को शीतला अष्टमी 2022 पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं. शीतला माँ हिन्दू धर्म की एक प्राचीन देवी हैं, जिनका बहुत बड़ा महत्व रहा हैं. स्कन्द पुराण में माता शीतला के बारें में विस्तृत विवरण मिलता हैं. इन्हें चेचक की देवी भी कहा जाता हैं. इनका वाहन गधा है तथा ठंडे भोजन का इन्हें भोग लगाया जाता हैं. माताजी का सबसे बड़ा मंदिर तथा मेला चाकसू जयपुर में भरता हैं. हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण किये हुए शीतला माता को दर्शाया जाता हैं. मान्यता है कि शीतलासप्तमी तथा अष्टमी तिथि को व्रत रखकर व्रत कथा का पाठ करने से देवी प्रसन्न हो जाती हैं.

Sheetala Ashtami Ki Vrat Katha शीतला अष्टमी 2022 व्रत कथा महत्व

शीतला अष्टमी व्रत कथा महत्व स्टोरी Sheetala Ashtami 2022 Ki Vrat Katha

शीतला अष्टमी की कथा माँ शीतला से जुड़ी हुई एक पौराणिक कथा है. एक समय की बात हैं जब माताजी ने पृथ्वी लोक भ्रमण का निश्चय किया. उन्हें विचार आया कि मेरे कितने भक्त मेरी पूजा अर्चना करते है तथा कितने लोग इस भूलोक पर है जो मुझे मानते हैं तथा मेरा मंदिर बनाते हैं.

बताया जाता हैं कि शीतला माता ने राजस्थान के एक डूंगरी नामक गाँव में कदम रखा, तो उन्होंने पाया कि उस गाँव में उसका एक भी मंदिर नहीं है और ना ही कोई व्यक्ति उसकी पूजा करता हैं.

विचारों के इसी उड़दबुन में वह एक संकरी गली से गुजर रही थी, तभी ऊपर रहने वाले किसी मकान वाले ने गर्म चावलों का पानी देवी पर उड़ेल दिया.

शरीर पर गर्म जल गिरने से पूरा बदल असहाय कष्ट पाने के साथ ही शरीर से फफोले निकलने लगे. तथा पूरे शरीर में जलन होने लगी.

वह दर्द के मारे चिल्लाकर मदद की गुहार लगाने लगी, मुझे किसी ने गर्म जल से जला दिया मेरी मदद करों शरीर जल रहा हैं मुझे बचाओं, मगर कोई भी गाँव वाला माताजी की मदद के लिए आगे नहीं आया.

तभी उनकी यह आवाज एक बूढी कुम्हारिन के कानों में पड़ी जो घर के बाहर बैठी थी. वह तुरंत माताजी के पास गई और उन्हें ठंडी छाँव में बिठाकर बोली मैया थोड़ा साहस रखो,

घर में ठंडा पानी रखा हैं मैं आप पर डालती हूँ आपका दर्द कम हो जाएगा. शीतला पर ठंडा जल डालने के बाद वह उनके लिए घर में बनी राबड़ी व दही को लाकर उन्हें दिया.

राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली, तब उस कुम्हारिन ने कहाँ माँ आपके बाल बहुत बिखर गये हैं लाओ में चोटी बना देती हूँ.

जब वह शीतला माता के बाल को संवार रही थी तो उसकी नजर सर के बालों के बीच बनी एक आंख पर नजर पड़ी तो वह घबरा उठी तब भागने लगी. इस पर शीतला माता कहने लगी, बेटी डरो मत मैं को प्रेतात्मा नहीं हूँ मैं शीतला माता हूँ.

मैं देव लोक से धरती पर यह जानने आई थी कि यहाँ कितने लोग मुझे मानते हैं तथा उनके दुःख दर्द क्या हैं. यह कहने के बाद उन्होंने अपने दैवीय रूप उस कुम्हारिन को दिखाया.

जब कुम्हारन ने सच्चाई जानी तो वह बिलख बिलख कर रोने लगी उसके पश्चाताप का कारण यह था कि उसके घर देवी स्वयं आई मगर घर में ना कोई आसन न चौकी हैं व उन्हें कहाँ बिठाएं.

शीतलामाता भक्तिन के चिंता के विषय को समझ गई तो उन्होंने कहा आप चिंता ना करे, वह कुम्हार के गंधे पर सवार हुई तथा एक हाथ में झाड़ू तथा दूसरे हाथ में डलिया लेकर कुम्हार के घर की दरिद्रता को साफ़ कर फेक दिया और उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर बोली आपके जो कुछ चाहिए आप मांगिए.

कुम्हारन ने माँ से निवेदन करते हुए कहा माँ मेरी इच्छा है कि आप डूंगरी गाँव में बसकर आपने जिस तरह मेरे घर से दरिद्रता को हटाया इस प्रकार जो भक्त होली के सात दिन बाद सप्तमी को जो आपकी पूर्ण भक्ति भाव से पूजा करे तथा ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन कराए आप उनका सुहाग बनाए रखना,

उन्हें संतान देना तथा पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी हानि का सामना ना करना पड़े.

इस पर माता शीतला ने तथाअस्तु कहा और उन्हें सभी वर देने की बात कही. साथ ही उन्होंने उस कुम्हारन की सेवा से प्रसन्न होकर कहा बेटी मेरी पूजा का एकाधिकार ब्राह्मण को होगा.

तब से माँ शीतला शील कि डुंगरी पर बसने लगी तथा देश भर में उनका यह मुख्य मंदिर हैं. शीतला सप्तमी तथा अष्टमी के दिन यहाँ विशाल मेला भरता हैं.

Who Is Sheetla Mata In Hindi : कौन है शीतला माता मंदिर फोटो 2022 मेला

गूलर, घोल, गुठली और रोगों की देवी के रूप में शीतला माता की पूजा भारत के कोने कोने में की जाती हैं. इसे आदिशक्ति पार्वती तथा देवी दुर्गा का रूप माना जाता हैं

जिसका वाहन गधा तथा इनके अस्त्र शस्त्र झाड़ू, पंखा, पानी से भरा घड़ा फोटों में दिखाया जाता हैं. चाकसू में माता शीतला का बड़ा एवं मुख्य मंदिर हैं शीतला सप्तमी तथा शीतला अष्टमी को दूर दूर से भक्त जन माँ के दरबार में हाजरी लगाने आते हैं.

(1). चेचक रोग की देवी के रूप में शीतला माता का पूजन किया जाता हैं शरीर पर फोड़े फुंसियाँ अथवा माता रोग हो जाने पर आज भी माता का पूजन होता हैं.

(2). शीतला माता के फोटो में उन्हें चार हाथों वाली दिखाया गया जिनमें प्रत्येक हाथ में झाड़ू, कलश, नीम के पत्ते तथा सूप को दिखाया गया हैं. इनका अपना अलग अलग अलग महत्व हैं. बताते है कि चेचक पर ठंडे पानी झाड़ू से उन्हें फोड़ना, छाले पके नहीं इसके लिए नीम तथा सूप अथवा गधे की लीद से रोगी को दर्द से राहत मिलती हैं.

(3). चैत्र मास की कृष्ण अष्टमी का दिन माँ शीतला का माना जाता हैं जिन्हें हम शीतला अष्टमी के रूप में भी मनाते हैं.

(4). दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के रोगों से देवी छुटकारा दिलाती हैं साथ ही इन्हें स्वच्छता की देवी भी कहा जाता हैं.

(5). शीतला अष्टमी मनाने के साथ यह मान्यता जुड़ी है कि इस दिन एक दिन पहले का बना ठंडा भोजन खाया जाता है तथा इसे ही माँ को भोग में दिया जाता हैं इससे शीतला माँ प्रसन्न हो जाती हैं.

(6). माता शीतला का मंत्र यह है जिसका पूजा के समय उच्चारण करना चाहिए.

” वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।। ”

What Is Story Of Sheetla Mata In Hindi

एक कहानी कहती है कि देवी दुर्गा ने छोटी कात्यायनी के रूप में अवतार लिया है – ऋषि कात्यायन की बेटी – दुनिया की सभी अभिमानी बुराई राक्षसी ताकतों को नष्ट करने के लिए, दुर्गा के रूप में अपने वास्तविक रूप में, उन्होंने कई राक्षसों को मार डाला जो कालकेय द्वारा भेजे गए थे ।

ज्वरसुर नामक राक्षस, बुखार के दानव , ने कात्यायनी के बचपन के दोस्तों, जैसे कि हैजा , पेचिश जैसे असाध्य रोगों को फैलाना शुरू कर दिया था, खसरा, चेचक आदि कात्यायनी ने अपने कुछ दोस्तों की बीमारियों को ठीक किया।

दुनिया को सभी बुखार और बीमारियों से राहत देने के लिए कात्यायनी ने शीतला देवी का रूप धारण किया। उसके चार हाथों में से प्रत्येक में एक छोटा झाड़ू, जीतने वाला पंखा, ठंडा पानी का जार और एक पीने का कप था।

अपनी शक्ति से, उसने बच्चों की सभी बीमारियों को ठीक कर दिया। तब कात्यायनी अपने दोस्त, बटुक से अनुरोध करती है कि वह बाहर जाए और राक्षस जवासुर का सामना करे।

युवा बटुक और राक्षस जवासुर के बीच युद्ध हुआ। जटासुर बटुक को हराने में सफल होता है। फिर, बटुक, मृत पड़ा, जादुई रूप से धूल में फीका हो गया। ज्वारसूर हैरान था कि बटुक गायब हो गया था और सोच रहा था कि वह कहां गया था, यह महसूस करते हुए नहीं कि बटुक के पास वास्तव में एक भयानक पुरुष आकृति का रूप था,

जिसमें तीन आंखें और चार भुजाओं में युद्ध-कुल्हाड़ी, तलवार, त्रिशूल और राक्षस का सिर था।कपाल की माला – बटुक के लिए भगवान शिव के भयंकर रूप, भैरव का रूप धारण किया था । भैरव ने जवासुर को फटकार लगाई और उसे बताया कि वह देवी दुर्गा (कात्यायनी के रूप में अवतार) का सेवक है।

एक लंबी चर्चा चली लेकिन फिर लड़ाई में बदल गई। ज्वरासुर ने अपनी शक्तियों से कई राक्षसों का निर्माण किया लेकिन भैरव उन सभी को नष्ट करने में कामयाब रहे। अंत में, भैरव ने जवासुर के साथ कुश्ती की और उसे अपने त्रिशूल से मार दिया।

Sheetla Mata Mantra In Hindi शीतला अष्टमी माता पूजा मंत्र विधि

 भारतीय पंचाग के अनुसार होलिका दहन के ठीक सात अथवा आठ दिन बाद शीतला अष्टमी का व्रत मनाया जाता हैं. गंध, अक्षत, जल चढ़ाकर इस साल 25 मार्च को देश भर में शीतलाष्टमी का व्रत किया जाना हैं.

शीतलासप्तमी 25 तारीख को हैं कई लोग चैत्र सप्तमी को तथा कुछ अष्टमी को मुख्य पर्व मनाते हैं. हम अपने सभी पाठकों को शीतला सप्तमी 2022 की शुभकामनाएं देते हैं. आज हम आपकों sheetla mata mantra आपकों बता रहे हैं.

माँ दुर्गा के रूप में पृथ्वी लोक पर अवतरित शीतला माता को रोग, शोक, अभाव व दरिद्रता से घर-परिवार को बचाने वाली देवी के रूप में पूजा जाता हैं.

अष्टमी के दिन महिलाएं सिलाई, सिर धोना सहित कई सारे कार्य को नहीं करती हैं. इस दिन भक्त जन एक दिन पूर्व बने खाने को खाया जाता है तथा उन्हें माता को चढाया जाता हैं जिन्हें बसोड़ा कहा जाता हैं. सुखी, स्वस्थ व समृद्ध घर-परिवार की कामना में भक्त शीतला माँ की पूजा करते हैं.

शीतला अष्टमी मंत्र अर्थ के साथ

मंत्रों से माता की पूजा गंध, अक्षत, फूल, वस्त्र, भोजन आदि चढ़ाकर यहाँ बताएं गये दो मन्त्रों का जाप करे तो उनकी समस्त मनोकामना पूरी होती हैं. यहाँ से आप शीतला माता व्रत जाने अर्थ के साथ.

वन्दे हं शीतलां देवी रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम्।।

अर्थ– मतलब है दिगम्बरा, गर्दभ वाहन पर विराजित, शूप, झाड़ू और नीम के पत्तों से सजी-संवरी और हाथों में जल कलश धारण करने वाली माता को प्रणाम हैं.

नमामि शीतलादेवी रासभस्था दिगम्बरा
मार्जनी कलशोपेता शुर्पालंकृत मस्तका

Sheetalaashtami Essay In Hindi शीतलाअष्टमी पर निबंध भाषण कविता शायरी

सभी पाठकों को शीतला सप्तमी और अष्टमी 2022 की हार्दिक बधाई. इस साल शीतलाअष्टमी का व्रत 25 मार्च को पड़ रहा हैं. इनकी तिथियों तथा मनाने का तरीका देशभर में अलग अलग होने के उपारांत भी यह कई सारी समानताएं लिए हुए हैं.

माताजी शीतला देवी का यह व्रत एक त्योहार के रूप में देश के कोने कोने में मनाया जाता हैं. कई स्थानों पर माघ शुक्ल की षष्ठी को, कोई वैशाख कृष्ण पक्ष की अष्टमी को तो कोई चैत्र के कृष्ण पक्ष की सप्तमी या अष्टमी के दिन शीतलाष्टमी व्रत रखा जाता हैं. सभी कष्टों का निवारण करने वाली तथा पापों से छुटकारा दिलाने वाली शीतला मैया की भक्तजन पूर्ण श्रद्धा भाव से आराधना करते हैं.

इसे बासोड़ा पर्व भी कहा जाता हैं उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में इसे चैत्र कृष्ण सप्तमी अथवा अष्टमी तिथि को मनाते हैं, बासोड़ा का अर्थ होता हैं ठंडा या बासी खाना.

अन्य हिन्दू पर्वों त्योहारों तथा व्रतों से शीतलाअष्टमी का पर्व पूर्णतया भिन्न माना जाता हैं. इस दिन माताजी को मानने वाले किसी भक्त का चूल्हा नहीं जलता हैं. वह एक दिन पहले बने बासी भोजन का माँ को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में उदरपूर्ति करते हैं.

शीतला देवी को चेचक की देवी के रूप में भी पूजा जाता हैं मगर माता अथवा चेचक के रोगी को इस दिन व्रत नहीं रखना चाहिए. कई गाँवों में शीतला माता के मंदिर हैं जो आमतौर पर वटवृक्ष के नीचे ही बनाए जाते हैं. माताजी का मुख्य मंदिर चाकसू जयपुर में हैं इसके अतिरिक्त गुरुग्राम में भी इनका प्रसिद्ध धाम हैं.

शीतलाअष्टमी की भौर में वट के वृक्ष के नीचे माताजी की पूजा होती हैं प्रतीक चिहन के रूप में गोबर के गर्दभ बनाए जाते है जो उनकी सवारी हैं. ऐसी मान्यता है कि जो भक्त अपने शुद्ध अंतःकरण से शीतलाजी की पूजा कर व्रत रखते हैं. माँ उनके समस्त कष्टों का हरण कर उन्हें धन धान्य सम्पन्न बना देती हैं.

शीतला अष्टमी का महत्व

भारत में सदियों से शीतला माता का उत्सव मनाया जाता रहा हैं. स्कन्द पुराण में इनके माहात्म्यं का वर्णन मिलता हैं. शीतला माता की तस्वीर में उन्हें गर्दभ वाहन पर सवार हाथों में हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण किये हुए दिखाया जाता हैं.

यह चेचक के रोग के इलाज के प्रतीक समझे जाते हैं. जिनमें सूप से रोगी को हवा, झाड़ू से छाले फोड़े जाते है तथा नीम उन घावों को सड़ने नहीं देता हैं. इसके अलावा कलश का जल रोगी को आराम दिलाता है गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग समाप्त हो जाते हैं.

शीतला माता / बासोड़ा की कहानी Sheetla Mata & Basoda Vrat Story In Hindi

यह त्योहार होली के 7 या 8 दिन बाद अर्थात चैत्र कृष्णा पक्ष में प्रथम सोमवार या वृहस्पति को मनाया जाता हैं. इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती हैं.

शीतला माता / बासोड़ा की कहानी: बासोड़ा के एक दिन पहले गुड़, चीनी का मीठा भात आदि बनाना चाहिए. मोंठ बाजरा भिगोकर तथा रसोई की दीवाल धोकर हाथ सहित पाँचों अंगुली घी में डुबोकर एक छापा लगाना चाहिए. रोली, चावल चढ़ाकर शीतला माता के गीत गाना चाहिए.

बासोड़ा के दिन प्रातः एक थाली में रोटी, भात, दही, चीनी, जल का गिलाश, रोली, चावल, मूंग की दाल का छिलका, हल्दी, धूपबत्ती एक गूलरी की माला जो होली के दिन मालाएं मचाई थीं उनमें से मोंठ, बाजरा आदि सामान रख लेना चाहिए.

इस सामान को घर के सभी प्राणियों को छुआकर शीतला माता पर भेज देना चाहिए. यदि किसी घर के सब व्यक्ति शीतला माँ की पूजा करने जाते हों तो स्त्रियाँ शीतला माता के गीत गाती जावें.

यदि किसी के यहाँ कुंडारा भरता हो तो वे एक बड़ा कुंदारा और 10 छोटे कुंडारे मंगा लेवे. एक कुंडारा में रबड़ी, एक में भात, एक में रसगुल्ला, एक में बाजरा, एक में हल्दी पीसकर रख देवें और एक में इच्छानुसार पैसे रख लेवें. फिर सब कुंडारे बड़े कुंडारे में रख लेवें उनकी हल्दी से पूजा कर लेवें. फिर सबके हल्दी से टीका काढ़ लेवें.

इसके बाद एक फूल माला सब क्न्डारे और समस्त पूजा सामग्री आदि शीतला माता पर ले जाकर चढ़ा देवें. कुंडारा का पूजन करके के बाद कहानी सुन लेवें.

कथा- एक गाँव में एक बुढियां रहती थी. वह बासेड़े के दिन शीतला माता की पूजा करती और ठंडी रोटी खाती थी. उसके गाँव में और कोई भी शीतला माता को नहीं पूजता था.

एक दिन उस गाँव में आग लग गई जिसमें केवल बुढियां की झौपड़ी को छोड़कर सबकी झौपड़ीयां जल गई. इससे सब लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ.

तब वे सब लोग उस बुढियां के पास आए और इसका कारण पूछने लगे. तब बुढियां बोली कि मैं तो बोसेड़े के दिन ठंडी रोटी खाती थी और शीतला माता की पूजा करती थी.

तुम लोग यह काम नहीं करते थे. इससे तुम्हारी झौपड़ीयां जल गई और मेरी झौपड़ी बच गई. तभी से पूरे गाँव में बासेड़े के दिन शीतला माता की पूजा होने लगी और सब ठंडी रोटी खाने लगे. हे शीतला माता जैसे तूने उस बुढ़िया की रक्षा की वैसे सबकी रक्षा करना.

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