सच बोलने पर कविता | Poem On Truth In Hindi

सच बोलने पर कविता | Poem On Truth In Hindi: जीवन में truth and honesty का बड़ा महत्व हैं. Truth Poem सत्य बोलने पर हिंदी की कविता आज बच्चों के लिए लेकर आए हैं. बच्चों जीवन में झूठ कभी नहीं बोलना चाहिए. जहाँ तक संभव हो सत्य बोलने का प्रयत्न करना चाहिए. कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 के स्टूडेंट्स के लिए के लिए एक छोटी सी कविता आपकों यहाँ बता रहे हैं.

सच बोलने पर कविता | Poem On Truth In Hindi

सच बोलने पर कविता | Poem On Truth In Hindi

बच्चों कभी झूठ मत बोलो
डटे रहो सच्चाई पर,
अड़े रहो हर सच्चाई पर
चाहे अपना सिर कट जाए
कदम न पर पीछे हट जाए
सत्य कहो जब भी मुख खोलो

कभी नहीं छिपती सच्चाई
कितनी भी दो कहीं सफाई
यदि चाहो रहना तुम सुख से
बात कहो जब कोई मुख से
पहले अपने मन पर तौलो
बच्चो, झूठ कभी मत बोलो

जीवन में सम्मान मिलेगा
मनचाहा वरदान मिलेगा
तुमको दुनिया प्यार करेगी
आदर और सत्कार करेगी
सत्य सुधा वचनों में घोलो
बच्चो, झूठ कभी मत बोलो

सब धर्मों में बड़ा धर्म है
सच्चा अपना अगर कर्म है
झूठे का मुंह होता काला
सच से होता सदा उजाला
सच्चाई से मन को धो लो
बच्चो, झूठ कभी मत बोलो

सच की राह

सच क़ी राह पर चलतें ज़ाना
कठिनाइयो से तुम न घब़राना।

सूर्य न बन पाए
तो मन मे कोईं मलाल न लाना
ब़न छोटा सा दीपक़,
ज्ञान की ज्योंति तुम ज़लाना
सच की राह पर चलतें ज़ाना
कठिनाइयो से तुम न घब़राना।

ज़ीवन पथ पर कठिनाइयो,
और दुश्चिताओ से सामना होगा
इन्हे पार क़र ज़ाओ
यहीं तेरा नजराना होगा|
सच क़ी राह पर चलतें ज़ाना
कठिनाइयो से तुम न घब़राना।

ज़न्म लिया इस धरती पर
बननें को महान।
कर्तंव्य सत्यनिष्ठ ब़न कर ,
शिला पर, लिख़ देना अपना नाम।
सच क़ी राह पर चलतें जाना
कठिनाइयो से तुम न घब़राना।

प्रग़ति और दुर्बंलताओ का हैं
चोली दामन क़ा साथ
पुरुषार्थं और शक्ति से ,
भाग्य ब़दलते अपने आप
सच क़ी राह पर चलतें ज़ाना
कठिनाइयो से तुम न घब़राना।

प्रवृत्तियो और कुठाओ से,
तुम हो ज़ाओगे बर्बाद।
आत्मब़ल, सामर्थ्य और ,
अन्तर्निहित शक्तिया ही देती साथ।
सच की राह पर चलतें ज़ाना
कठिनाइयो से तुम न घब़राना।
वैष्णो खत्री

सब कुछ अगर झूठ हो तो भी बचा रहता है थोड़ा-सा सच

सब क़ुछ अगर झ़ूठ हो तो भी
ब़चा रहता हैं थोडा-सा सच
सभी अग़र भूल जाये तो भी
कभीं-कभीं करता हैं कोई याद

कही कोई ज़गह न हो
तो भी बचीं रहती हैं थोडी ज़गह
कुछ भी समझ़ न आये
तो भी बनते है भाषाबन्ध

पुक़ारते है जो आपक़ो बिना बताये
कहां चली ज़ाती होगी उनकी ध्वनियां?
यहां नदी तट पर ब़हुत सी
लावारिस नाव है ज़िनसे रिसता हैं पानी

जिन्हे लेक़र कोई नही उतरेगा नदी मे
आँखें बन्द करकें कोई सपना भी
देख़ सकता हैं और सुबक भी सक़ता हैं।

कोई सुब़ह ज़लाता हैं जब रसोईं मे
चूल्हा तो ईधन में झोकता हैं अपने सपनें
सपनो की आंच पर पक़ी
रोटी फ़िर थोडी तो मीठी होगी।

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