एससी एसटी एक्ट पर निबंध | Sc St Act Essay in Hindi

Sc St Act Essay in Hindi | एससी एसटी एक्ट पर निबंध: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 जिन्हें संक्षिप्त में Sc St Act भी कहा जाता हैं. आज के हिंदी निबंध में हम इस पर बात करने जा रहे हैं. एससी एसटी एक्ट क्या है, इसे क्यों बनाया गया, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, विवाद क्यों, तथा एससी एसटी एक्ट 2018 के प्रावधान क्या हैं. इस लेख को आप Speech & Essay On Sc St Act in Hindi के रूप में भी कही बोल सकते हैं.

Sc St Act Essay in Hindi | एससी एसटी एक्ट पर निबंध

एससी एसटी एक्ट पर निबंध Sc St Act Essay in Hindi

एससी एसटी एक्ट 2018 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत के कई क्षेत्रों में व्यापक प्रदर्शन किए गये थे. 2 अप्रैल को किए गये भारत बंद के बाद दलित समुदाय के लिए बने इस कानून को मोदी सरकार ने इस मानसून सत्र में फिर से बदलने का निर्णय किया हैं. 

एससी एसटी एक्ट 2018 को अब कोर्ट के फैसले से पूर्व की स्थिति में ला दिया है. जिसके कारण स्वर्ण जाति के लोगों ने इस पर कड़ा विरोध भी जताया हैं.

Sc St Act पारित हो जाने के बाद फिर से यह कानून अपने पुराने स्वरूप में आ जायेगा. आज के Sc St Act in hindi के लेख में हम इस कानून के बारे में तथा इसकों लेकर छिड़े विवाद की तह तक आपकों लेकर जाएगे.

एससी एसटी एक्ट क्या है. (What Is Sc St Act In Hindi)

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के साथ अगड़ी जाति के लोगों द्वारा किए जा रहे भेदभाव तथा निम्न सामाजिक स्तर व शोषण से बचाने के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 बनाया गया था. यह 1989 से भारत के जम्मू कश्मीर प्रान्त को छोड़कर सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में प्रभाव में हैं.

इस कानून के जरिये सदियों से पीड़ित दलित समुदाय के उत्थान उनके सुरक्षा के प्रावधानों के द्वारा इसे भारतीय समाज की मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयत्न किया गया हैं. मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 में दलितों पर जातीय आधार पर होने वाले हमलों को रोकने के लिए एक अलग न्यायिक व दंड व्यवस्था का प्रावधान किया गया हैं. जिससे उनके साथ हुए अपराध की जल्द व निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चिंत की जा सके.

एससी एसटी एक्ट की आवश्यकता (Why Need New SC ST Act In Hindi 2018)

सभी को समानता भारतीय संविधान का मूल तत्व माना गया हैं. संविधान के द्वारा भेदभाव तथा छुआछूत को पूरी तरह निषेध किया गया हैं. इसके बावजूद आज भी हमारा समाज इस मानसिकता से ग्रसित हैं. इसे रोकने के लिए आजादी के बाद से कई कानून बनाए गये. जिनमें से एक था 1955 का प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट.

मगर यह कानून दलित व पिछड़े समुदाय के साथ हो रहे दोगले व्यवहार को रोकने में समर्थ नही रहा. एससी और एसटी समुदाय के लोगों में असुरक्षा तथा भेदभाव के भाव जागृत होने लगे. भारत में दलित व पिछड़े लोगों की संख्या लगभग 20 प्रतिशत हैं. जिन्हें आजादी के 30 साल बाद भी सरकारे आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा मुहैया नही करवा पायी थी.

अतः 1989 का एससी एसटी एक्ट बनाया गया, जिसमें दमित समुदायों को अत्याचार से बचाने के लिए विभिन्न कठोर प्रावधान किये गये हैं. साथ ही समाज में जाति के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को दंडनीय करार दिया गया हैं.

एससी एसटी एक्ट में बदलाव संशोधन 2018 और इसके प्रावधान (dilution of sc st act)

अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी एसटी एक्ट 1989) में शोषित लोगो को आवश्यक लीगल मदद मुहैया करवाने तथा उन्हें समय पर न्याय दिलाने के साथ ही आर्थिक नुकसान होने की स्थिति में प्रार्थी पक्ष को आर्थिक सहायता दिलाने के प्रावधान भी किये गये हैं.

हमारी न्यायिक प्रणाली में किसी भी केस की सुनवाई तक बहुत खर्च भी आता है. इस एक्ट में यह व्यवस्था की गई है कि शोषित वर्ग के व्यक्तियों से न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होने वाले समस्त प्रकार के खर्च का जिम्मा सरकार का होगा. मामले की सुनवाई तक पीड़ित पक्ष की सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किये जायेगे.

एससी और एसटी के दुरूपयोग के बढ़ते मुकदमों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2017-18 में इस अधिनियम में संशोधन करते हुए इसे दुरूपयोग से बचाने का प्रयत्न किया हैं. जिसके बाद देश भर में दलित समुदाय का कड़ा विरोध भी देखने को मिला हैं. संसद के मानसून सत्र 2018 में भारत सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले के उल्ट Sc St Act की उसी अवस्था में ला दिया हैं, जो पूर्व स्थिति में था.

एससी एसटी एक्ट विरोध का कारण  (SC ST Act dalit protest)

सुप्रीम कोर्ट ने एक स्वतंत्र समिति की रिपोर्ट में पाया कि एससी एसटी एक्ट के 75 प्रतिशत मामले बेबुनियाद निकले है, जो व्यक्तिगत रूप से किसी को प्रताड़ित करने और कानून का दुरूपयोग करने के उदहारण हैं. तब कोर्ट ने इस एक्ट में बड़ा बदलाव करते हुए राजकीय कर्मचारियों की एक्ट के तहत गिरफ्तारी से पूर्व उनकी संस्था से अनुमति लेने का प्रावधान किया गया हैं.

कोर्ट की इस गाइडलाइन के बाद दलित समुदाय के लोगों में यह बात घर कर गई कि अब उन पर अत्याचार बढ़ेगे तथा शिकायत मिलने पर भी अपराधी पर मुकदमा दर्ज नही किया जाएगा.

एससी/एसटी एक्ट के मामले में 4 पड़ाव

उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों के साथ बढ़ते प्रताड़ना के मामलों को रोकने के लिए भारतीय संसद ने यह कानून पारित किया गया था. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय के प्रति भेदभाव और अत्याचार उनको संविधान प्रदत्त अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) तथा 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) का उल्लंघन हैं.

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति संशोधित अधिनियम 2018 में प्रारंभिक जांच, गिरफ्तारी और अग्रिम जमानत को लेकर काफी संशय की स्थिति रही, क्योंकि कानून के दुरूपयोग की सम्भवनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता हैं. पिछले वर्षों में कानून के इस चरण में किये बदलावों की प्रक्रिया इस तरह रही.

तारीखप्रावधान
20 मार्च 2018सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत मिलने पर FIR से पूर्व जांच को कहा, तुरंत गिरफ्तारी से इन्कार तथा आरोपी को अग्रिम जमानत का अधिकार
9 अगस्त 2018एफआईआर से पहले जांच आवश्यक नहीं, गिरफ्तारी का अधिकार तथा अग्रिम जमानत निरस्त.
1 अक्टूबर 2019तुरंत गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
10 फरवरी 2020FIR से पहले अफसर की मजूरी जरूरी नहीं, कुछ मामलों में अग्रिम जमानत

FAQ

प्रश्न: एससी-एसटी एक्ट की किस धारा के तहत अपराधिक मामले दर्ज किये जाते हैं.

एक्ट की धारा 3 (1)

प्रश्न: एससी एसटी एक्ट किसने बनाया?

उत्तर: भारतीय संसद ने

प्रश्न: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 कब लागू हुआ?

उत्तर: 1989 में

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