भगिनी निवेदिता का जीवन परिचय | Sister Nivedita Biography In Hindi

भगिनी निवेदिता का जीवन परिचय Sister Nivedita Biography In Hindi: भारत की भूमि और आध्यात्म ने पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित किया हैं. ऐसी ही एक कहानी आयरिश मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल की है जो भगिनी निवेदिता बन गई. सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका, शिक्षक निवेदिता का स्वामी विवेकानंद से 1895 में साक्षात्कार हुआ और उनके विचारों से इतना प्रभावित हुई कि उन्होंने सब कुछ छोडकर ब्रह्मचर्य का जीवन अपना लिया और विवेकानंद को अपना आध्यात्मिक गुरु मानकर भारत चली आई.

भगिनी निवेदिता का जीवन परिचय Sister Nivedita Biography In Hindi

भगिनी निवेदिता का जीवन परिचय  Sister Nivedita Biography In Hindi

अपने ही देश में बहुत कुछ कर गुजरनें वाली महिलाओं से हमारा इतिहास भरा पड़ा हैं, परन्तु एक विदेशी महिला ने भारत के लिए जो कार्य किया वह अनूठा हैं. भगिनी निवेदिता स्वामी विवेकानंद से प्रभावित होकर उनके आव्हान पर भारत की महिलाओं को शिक्षित करने के लिए भारत आई थी.

भगिनी निवेदिता का जन्म आयरलैंड में हुआ था, परन्तु उन्होंने भारत भूमि में अपनी मातृभूमि के दर्शन किए और भारत की बेटी बनकर स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारी भूमिका निभाई.

सिस्टर निवेदिता का पूरा नाम मार्गेट एलिजाबेथ नोबेल था. उनके पिता का नाम सेमुअल रिचमंड नोबेल व माता का नाम मैरी इसाबेला था. बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था. उनका लालन पालन नाना हमिल्टन के यहाँ हुआ था. हमिल्टन आयरलैंड के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख सूत्रधारों में से एक थे. मार्गेट की शिक्षा लंदन चर्च के आवासीय विद्यालय में हुई.

मार्गेट को शिक्षण का कार्य अच्छा लगता था. अतः वह 17 वर्ष की आयु में एक विद्यालय में पढाने लगी. वह स्वयं द्वारा विकसित पद्धति से शिक्षा दिया करती थी. धर्म में रूचि होने के कारण चर्च की गतिविधियों में भाग लेती थी तथा अधिकांश समय अध्ययन, मनन एवं सत्य की खोज में लगाती थी.

भगिनी निवेदिता के प्रेरक प्रसंग (bhagini nivedita jivani)

तभी एक घटना घटी, जो उनके जीवन को एक नया मोड़ देने वाली थी. एक सन्यासी का लंदन में आगमन हुआ नाम था स्वामी विवेकानंद. स्वामी जी शिकागों के विश्व धर्म सम्मेलन में ख्याति अर्जित कर अपने कुछ मित्रों के आग्रह पर लंदन आए थे, मार्गेट की स्वामी जी से प्रथम भेट यही हुई थी.

मार्गेट ने स्वामी जी के प्रवचन सुने, वाद विवाद, तर्क वितर्क किया और अपने आपकों पूर्ण संतुष्ट कर लेने के बाद उन्होंने स्वामी जी को अपना आदर्श चुना और विवेकानंद के आग्रह पर भारत आना तय कर लिया. भारत आकर निवेदिता बहुत प्रसन्न हुई. वे गंगा के किनारे वेलूर मठ की एक कुटिया में दों अन्य अमेरिकन महिलाओं के साथ रहने लगी जो स्वामी जी की शिष्याएं थी.

स्वामी जी ने मार्गेट को नया नाम निवेदिता दिया और आग्रह किया कि वह भगवान व भारत माता के चरणों में अपना जीवन अर्पित करे. भगिनी निवेदिता ने विवेकानंदजी के उपदेशों को जन जन तक पहुचाने का कार्य करने के साथ साथ कलकत्ता में लडकियों का एक स्कूल भी प्रारम्भ किया. वहां छोटी लडकियों को पढ़ाने लिखाने के साथ साथ मिट्टी का काम, चित्रकारी आदि का काम भी सिखाया.

भगिनी निवेदिता के कार्य एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान (Sister Nivedita’s work and contribution to the Indian freedom movement)

जब कलकता में महामारी फैली तो निवेदिता ने टोली बनाकर दिन रात भूख प्यास की चिंता किए बिना रोगियों की चिकित्सा, सेवा साफ़ सफाई आदि कार्य कर पीड़ितों की मदद की. उन्होंने अंग्रेजी समाचार पत्रों में अपील प्रसारित कर मदद मांगी व धन संग्रह भी किया. निवेदिता लेखन कला व बोलने में निपुण थी. इस क्षमता का उपयोग कर वह अपनी बात बड़े बड़े समूहों तक पहुचाने में सफल रही.

निवेदिता ने जब अंग्रेजों का भारतीयों के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार देखा तो वह पूर्ण ताकत के साथ भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई का समर्थन करने लगी. निवेदिता ने बंगाल विभाजन का विरोध किया, उन्होंने जगदीश चन्द्र बोस की उपलब्धियों को विश्व पटल पर रखा और महर्षि अरविन्द के जेल जाने के बाद उनके कर्मयोगी पत्र के लिए सम्पादन का कार्य भी किया.

उन्हें भारतीय स्त्रियाँ बहुत अधिक प्रभावित करती थी. उन्हें लज्जा, विनम्रता, स्वाभिमान, सेवाभाव, निष्ठावान, ममत्व आदि की प्रतिमूर्ति दिखाई देती थी. वह समय समय पर महिलाओं को लक्ष्मी बाई अहिल्या बाई के वीरतापूर्ण कार्यों की याद दिलाती थी. उनकी द्रष्टि जाति प्रान्त व भाषा से ऊपर थी.

भगिनी निवेदिता ने भारत को अपनाने के बाद कभी भी अनुभव नही होने दिया कि वह एक विदेशी हैं. उन्होंने भारत के लिए जो किया उसे कोई अन्य नही कर सकता था. वह भी स्वामी जी की तरह ४४ वर्ष की अल्पायु में ही नीचे उद्घृत वेद की पावन ऋचाओं का वे सदैव स्मरण करती हुई संसार से विदा हो गई.

असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्मय
मृत्योर्मा अमृतं गमय

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