सरस्वती नदी का इतिहास | History Of Saraswati River In Hindi

History Of Saraswati River In Hindi-(Saraswati Nadi) सरस्वती नदी का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. इस वेद में इस प्राचीन भारतीय नदी के बारे में नदीतमे (नदियों में श्रेष्ट), अम्बितमे व देवितमे (माताओं देवियों में श्रेष्ट) मानी गई सरस्वती नदी का उद्गम भारतीय पुरातत्व परिषद के अनुसार हिमालय पर्वतमाला की शिवालिका श्रेणी के रूपण हिमनद से बताया गया है. हालांकि वर्तमान में सरस्वती नदी लुप्त नदियों में गिनी जाती है, इसके बारे में अधिक पुरातात्विक जानकारियां उपलब्ध नही है.

सरस्वती नदी
Saraswati River History Of In Hindi

प्राचीन सरस्वती नदी का इतिहास | History Of Saraswati River In Hindi

यह नदी रूपण से आदिबद्री तक पहुच कर जल धारा का रूप ले लेती थी. द्रष्द्वती व हिरण्यवती जैसी सहायक धाराओं का जल लेकर वर्तमानकालीन सतलज व यमुना मार्ग के मध्य भाग में बहने वाली वेद पुराणकालीन सरस्वती नदी के प्रवाह मार्ग कालान्तर में भूगर्भिक हलचलों रवन उत्थानों के स्वरूप पश्चिम में खिचकते हुए अततः जलापूर्ति में कमी आने से सतह पर सूखते गये और यह नदी धीरे धीरे विलुप्त (अन्तः सलिला) हो गई.

इसरों द्वारा किये गये शोध से पता चला है कि कुरु क्षेत्र का ब्रह्मा सरोवर, पेहवा आदि में विद्यमान अर्द्ध चन्द्राकार झीलें तथा पंजाब, हरियाणा व उत्तर पश्चिमी राजस्थान से होकर पाकिस्तान तक घग्घर हकरा नारा के रूप में द्रश्यमान प्रवाह मार्ग उक्त सरस्वती नदी की धरातलीय भूमिगत उपस्थति के प्रमाण है.

इस विलुप्त अतः सलिला के प्रवाह मार्ग में विद्यमान जीवनदायी जल का पर्याप्त दोहन कर समीपवर्ती क्षेत्रों का समुचित विकास किया जा सकता है.

आरंभिक पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर हड़प्पा सभ्यता को सिन्धु घाटी सभ्यता का नाम दिया गया. किन्तु सिन्धु तट पर प्राप्त प्राचीन बस्तियों (265) से कई गुना प्राचीन बस्तियों (2600) वैदिक सरस्वती नदी के तट पर पाये जाने से इसे सिन्धु सरस्वती सभ्यता के नाम से मान्य किया जाने लगा है.

सरस्वती नदी का उद्गम स्थल तथा विलुप्त होने के कारण (Saraswati river origin and due to extinction)

प्राचीन भारतीय ग्रन्थ महाभारत के अनुसार विलुप्त सरस्वती नदी का उद्गम स्थल वर्तमान हरियाणा प्रदेश के यमुनानगर के आदिबद्री नामक स्थान को माना जाता है, इस पवित्र नदी का यह उद्गम स्थल होने के कारण आज यह एक तीर्थस्थल के रूप में अपनी मान्यता रखता है. आज भी हरियाणा के आदिबद्री की शिवालिक पहाडियों में एक छोटे आकार में जल धारा बहती है, जो कुछ दुरी पर चलकर समाप्त हो जाती है, इसलिए ऐसा भी माना जाता है, कि सरस्वती नदी वर्तमान में पाताल में बहती है.

हरियाणा के कुरुक्षेत्र मैदान में बड़े सरोवर बने हुए है, जब सरस्वती नदी अपने इस प्रवाह मार्ग से चला करती थी, तब ये सरोवर जल से भर जाया करते थे, तथा जल की कमी के समय इसी जल का उपयोग किया जाता है. इतिहासकारों द्वारा इस संबंध में किये गये शोधों से इस बात की पुष्टि होती है, कि सरस्वती का उद्गम उतरांचल के हिमनंद ग्लेशियर से हुआ करता था. यही से जल धारा नीचे बहकर नदी का रूप धारण करती थी, इस ग्लेशियर को सरस्वती ग्लेशियर भी कहा जाता है.

इस नदी में समय समय पर प्रवाह तन्त्र में बदलाव हुए थे, एक समय यह चम्बल की सहायक नदी हुआ करती थी. उस समय यह अपना जल यमुना के साथ भी सांझा किया करती थी. प्रयाग में गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदी का संगम माना जाता है, असल में ये नदियाँ यहाँ कभी नही मिलती थी.

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