तुलसीदास का जीवन परिचय एवं दोहे | Biography Of Tulsidas In Hindi

Biography Of Tulsidas In Hindi: हिंदी भक्ति काव्य धारा के सूर्य के समान ख्याति प्राप्त भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास जी सगुण भक्ति धारा के स्तम्भ कवि थे. इनके तेज से मध्यकाल में हिन्दू समाज फैली निराशा की भावना को ईश्वर भक्ति से जोड़कर पीड़ित जनमानस में आशा की किरण पैदा की. तुलसीदास जी की जीवनी और वर्ष के बारे में अन्य प्रमुख कवियों की तरह कोई स्पष्ट राय नही हैं. भले ही आज ये जीवित नही हैं, बल्कि इनकी मुख्य रचना रामचरितमानस आज भी प्रत्येक हिन्दू के लिए आदर्श ग्रन्थ का स्थान ले चूका हैं. कवितावली एवं विनयपत्रिका वर्णित कुछ लाइनों में इस बात का संकेत मिलता हैं. कि तुलसीदास जी ब्राह्मण कुल के थे. तुलसीदास का जीवन परिचय एवं दोहे में तुलसी का संक्षिप्त जीवनी दी गई हैं.

तुलसीदास का जीवन परिचय (tulsidas ka jeevan parichay in hindi )


तुलसीदास बायोग्राफी (Biography Of Tulsidas In Hindi)


तुलसीदास का जीवन परिचय एवं दोहे | Biography Of Tulsidas In Hindi
पूरा नाम- गोस्वामी तुलसीदास
जन्म- 1511
जन्म स्थान-कासगंज (एटा) 
उत्तर प्रदेश/राजापुर जिला बाँदा
रचनाएं- श्रीरामचरितमानस, रामललानहछू, 
जानकी-मंगल, दोहावली, गीतावली
जाति/कुल - ब्राह्मण
विवाह- रत्नावली के साथ (1583) में
आराध्य - भगवान् श्रीराम
मृत्यु-1623

हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ट महाकवि तुलसीदासजी सगुण काव्यधारा में राम के उपासक थे. गोस्वामी तुलसीदास का जन्म सवत 1554 विक्रमी संवत (1497) उत्तरप्रदेश के बांदा जिले के राजापुर में हुआ था. इनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था. बाल्यावस्था में ही माता-पिता का देहांत हो जाने के कारण तुलसीदास जी का लालन-पोषण गुरु नरहरिदास जी ने ही किया.

बाबा नरहरिदास को तुलसीदास का गुरु अन्तः साक्ष्य के आधार पर माना जाता हैं. तुलसीदास भगवान श्रीराम के प्रति सर्वस्व समर्पण कर काव्य रचना करते थे. उनकी भक्ति भावना का मूल उत्स लोक संग्रह एवं लोक मंगल की भावना हैं. तुलसीदास में समन्वय की चेष्टा और अद्भुत शक्ति थी, सनातन हिन्दू धर्म के भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के पारस्परिक विद्वेष को कम करने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किया.

तुलसीदास जी ने रामभक्ति से प्रेरित होकर अपने रामकथा ग्रंथों में राम तथा उनके भक्तों का जो चित्रण प्रस्तुत किया हैं. वह मानवता के सर्वोच्च आदर्शों को स्थापित करता हैं. इस संबंध में रामचरितमानस अद्वितीय रचना हैं. तुलसीदास ने प्रबंध और मुक्तक दोनों प्रकार के काव्य अवधि एवं ब्रजभाषा में स्वभाविक रूप से सर्जित कर काव्य रचना में सिद्धह्स्त्ता को प्रत्यक्ष किया हैं. तुलसी का सम्पूर्ण काव्य उन्हें भारत वर्ष का लोक नायक प्रतिष्ठित कर आधुनिक युग की प्रत्येक समस्या का समाधान उपलब्ध करवाता हैं.

भगवान् श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति ने रामचरितमानस जैसे दिव्य ग्रन्थ की रचना कवि द्वारा करवाई. रामचरितमानस के अतिरिक्त तुलसीदास जी की अन्य रचनाओं में विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, जानकी मंगल, और बरवै रामायण हैं.

इनकी भक्ति की सबसे प्रधान विशेषता उनकी सर्वागपूर्णता हैं, उनमे धर्म और ज्ञान का सुंदर समन्वय हैं. इनके आराध्य राम परमब्रह्मा होते हुए गृहस्थ थे. तुलसीदास जी ने परिवारिक सम्बन्धो के आदर्श चरित्र को हमारे सामने प्रस्तुत किया हैं. तुलसीदास जी की इन्ही विशेषताओ के कारण कहा गया हैं, कि

कविता कर तुलसी न लसै |
कविता लसि पा तुलसी की कला ||

Books Written By Tulsidas (तुलसीदास जी की रचनाएँ)

महाकवि तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरितमानस विश्व के सर्वश्रेष्ट 100 ग्रंथो में 46 वें स्थान पर हैं, भारत में रामायण और महाभारत के बाद सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं. राम के जीवन पर आधारित रचनाओं के कारण तुलसीदास जी को रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता हैं. तुलसीदास की निम्न पुस्तके हैं.

  • रामचरितमानस (1631-1633)
  • हनुमानबाहुक ( भगवान् हनुमान जी के जीवन पर)
  • गीतावली (भगवान् राम पर आधारित गीत)
  • कवितावली (अधूरी रचना)
  • दोहावली (दोहों की श्रखला)
  • रामाज्ञा प्रश्न (ज्योतिष शास्त्रीय पद्धति का ग्रंथ)
  • पार्वती-मंगल (पूर्ण प्रमाणित)
  • हनुमान चालीसा
  • वैराग्य-संदीपनी
  • बरवै रामायण
  • राम शलाका
  • संकट मोचन
  • करखा रामायण
  • रोला रामायण
  • झूलना
  • छप्पय रामायण
  • कवित्त रामायण
  • कलिधर्माधर्म निरूपण

तुलसीदास के दोहे (tulsidas dohe in hindi )

पुर तें निकसी रघुबीर वधू, धरि धीर दए मगमें डग द्वे |
झलकीं भरी भाळनीं जल की, पुट सूख गए मधुराधंर

लनो अब केतिक, पर्नकुटी करि हौ कित हवैं।
तिय की लखी आतुरता पीयखियां अति चारू चलीं जल च्वै।

नामु राम कल पतरू कली कलियाणन नीवसु |
जे सिंमरत भयो भाग ते तुलसी तुलसीदास ||

सुचिव वैद ग़रु तिन्ही जों प्रिय बोलही भय आस |
राज धरम तन तीनी कर होइ बेगिहीं नाश ||

जल को गये गये हैं लक्खन हैं लरिका,परखो, पिय छांह घरिक हवे ताढ़े
पोछि पसेउ क्यारी करों, अरु पायं प्खारियो भुभिरी डाढ़े ||
तुलसी रघुबीर प्रिया स्म्र जानि कै बैठी विलव लौ कंटक काढ़े |
जानकी नाह को नेह लख्यौ, पुलको तन, वारि विलोचन वाढ़े ||

ठाहे हैं द्रुम डार गहे घनु कांधे धरे, कर सायक लै |
विक्टी भकुटी बडरी अंखिया, अनमोल कपोलन की छवि हैं |
तुलसी असि मूर्ति आनि हिए जड़ डरिहौ प्रान निछावरि कै |
स्त्रम-सीकर साँवरी देह लसै मनो रासि महातम तारकमै ||

बनिता बनी स्यामल गौर के बिच, विलोकहू री सखी ! मोहिसी हवौ |
मन जोग न, कोमल, क्यों चलिहै? चनकुचात मही पदपंकज छ्वै ||
तुलसी सुनि ग्रामवधु विथकी तन औ चले लौचन च्वे |
सब भांति मनोहर मोहन रूप, अनूप हैं भूप के बालक द्वै ||

तुलसीदास जी की राम कथा चौपाई सोरठा व दोहा

चौपाई-
बरबस राम समन्त्रू पठाएं, सुरसुरी तीर आपु तब आए,
मागी नांव न केवटु आना, कहई तुम्हार मरमु मैं जाना
चरण कमल रज कहू सब कहई, मानुष करनी मूरी कछु अहई,
छुअत सिला भई नारि सुहाई, पाहन तें न काठ कठिनाई
तरनिउ मुनि घरिनि होई जाई, बाट परई मोरि नाव उड़ाई
एहिं प्रतिपालउ सबु परिवारु, नहीं जानऊ कटु अउर कबारू,
जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू, मोहि पद पदुम पखारन कहहू

अर्थ-रामचरितमानस से ली गई इस चौपाई में सुंदर प्रसंग के माध्यम से तुलसीदास ने केवट का श्रीराम के प्रति अगाध विश्वास तथा श्री राम का भक्त के प्रति अनन्य प्रेम उद्घाटित किया हैं. आजीविका के एकमात्र साधन नाव को बचाने के बहाने से चरण धोने का सौभाग्य प्राप्त करना केवट की भक्ति और दृढता का परिचय कराते हैं.

छंद-
पद कमल धोई चढ़ाई नाव न नाथ उतराई चहौं
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साँची कहौं
बरु तीर मारहु लखनु पे जब लगि न पाय पखारिहों
तब लागि न तुलसीदास नाथ कृपालु पारु उतारिहों

सोरठा- सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे
बिहसे करूनाएन चितई जानकी लखन तन.

चौपाई- कृपासिन्धु बोले मुसुकाई, सोई करू जेहि तव नाव न जाई
बेगि आनु जल पाय पखारू, होत बिलंबु उतारहि पारु
जासु नाम सुमिरत एक बारा, उतरही नर भवसिंधु अपारा.
सोई कृपालु केवटहि निहोरा, जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा
पद नख निरखि देवसरी हरषि, सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी
केवट राम रजायसु पावा, पानि कठवता भरी लेई आवा
अति आनन्द उमगि अनुराधा, चरण सरोज पखारन लागा
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं, एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहिं

दोहा- पद पखारि जलु पान करि, आपु सहित परिवार
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेई पार

वहीँ श्रीराम का केवट को इच्छा के अनुरूप चरण पखारन कर नाव उतारने को कहना, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की विनम्रता का उद्घोष करता हैं. इस सम्पूर्ण प्रसंग के माध्यम से तुलसीदास जी श्रीराम के सर्व जन के प्रति सह्रदयता और संवेदनशीलता को प्रमाणित करते हैं. तुलसी के इस प्रसंग से विविध छन्दों का प्रयोग एवं उद्धरण ज्ञात होते हैं.

चौपाई- उतरि ठाढ़ भये सुरसुरि रेता, सीय राम गुह लखन समेता
केवट उतरि दंडवत कीन्हा प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा
पिय हिय की सिय जाननिहारि, मुनि मुदरी मन मुदित उतारी
कहेऊ कृपाल लेहि उतराई, केवट चरण गहे अकुलाई
नाथ आजू मैं काह न पावा, मिटे दोष दुःख दारिद दावा
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी, आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरि,
अब कुछ नाथ नाथ न चाहीअ मोरें, दीनदयाल अनुग्रह तोरें
फिरती बार मोहि जो देबा, सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा

दोहा- बहुत किन्ही प्रभु, लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेई
विदा कीन्ह करूनायतन, भगति बिमल बरु देई.

तुलसीदास जी की मृत्यु (Goswami Tulsidas Death )

अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में तुलसीदासजी जी काशी आकर बस गये. कहा जाता हैं उस समय एक रात कलियुग उनके नजदीक आया और इन्हें कष्ट पहुचाने लगा. इस पर तुलसी ने हनुमान जी का ध्यान किया तभी उनकी विनती पर बजरंग बली स्वय प्रकट हुए और इस दुःख के निवारण के लिए प्रार्थना के पद को रचने को कहा. उसी समय गोस्वामी ने अपनी आखिरी किताब विनयपत्रिका भगवत के चरणों में धर दी.

पुरुषोतम श्रीराम जी ने विनयपुस्तिका पर अपने दस्तखत किये और गोस्वामी तुलसीदास जी को निर्भय बना दिया. आखिर 1680 को काशी में ही तुलसीदास जी ने देह त्याग दी. श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की तृतीया के दिन को तुलसीदास जयंती के रूप में प्रतिवर्ष उन्हें चाहने वाले करोड़ो लोग इस दिन ऐसे महान भक्त कवि को याद करते हैं.

तुलसी जयंती 2018 (Tulsidas In Hindi)

तुलसीदास जी को जन-जन का कवि कहा जाता हैं, लोगों की किवदन्ती हैं, कि जब इनका जन्म हुआ तो साधारण बच्चों की तरह ये रोये नही थे. साथ ही जन्म के समय ही उनके मुह में पुरे बतीस दांत थे. कुछ लोग इन्हे महर्षि वाल्मीकि के अवतार थे. क्युकि वाल्मीकि भी भगवान् राम के अनन्य भक्त थे. तुलसीदास को अपने जीवन में राम के बारे में लिखने की प्रेरणा राम जी और हनुमान जी के साक्षात दर्शन के बाद मिली. हर वर्ष श्रावण मास के सातवे दिन तुलसीदास जयंती मनाई जाती हैं. वर्ष 2018 में तुलसी जयंती की तिथि 17 अगस्त हैं.

अवधि भाषा में राम के प्रति दास्य भाव से काव्य की रचना करने वाले तुलसीदास जी को सबसे अधिक ख्याति रामचरितमानस ग्रन्थ से मिली, इनके अतिरिक्त 12 अन्य पुस्तको को प्रमाणित माना जाता हैं. जो आज भी उपलब्ध हैं. तुलसी जयंती पर हम सभी ऐसे महान भक्त कवि को शत शत नमन करते हैं.

Leave a Reply