नर हो न निराश करो मन को पर निबंध | Essay On Nar Ho na Nirash karo man ko In Hindi

Essay On Nar Ho na Nirash karo man ko In Hindi: महान हिंदी कवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा हैं नर हो, न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो. गुप्त की कविता की इन पंक्तियों ने उन्हें अमर बना दिया. मानव होने का मतलब साहस, कर्मठ तथा कर्मशील बने रहना हैं यदि सफलता द्वार है तो विफलता उस द्वार तक जाने वाली सीढ़ियाँ हैं मानव को निरंतर कर्म करते रहने की सीख देने वाली इस कहावत/ उक्ति पर लघु निबंध दिया गया हैं.

Essay On Nar Ho na Nirash karo man ko In Hindi

Essay On Nar Ho na Nirash karo man ko In Hindi

 

भूमिका : गुप्त की कविता में प्रयुक्त पुरुष शब्द विशेषण की तरह प्रयुक्त हुआ हैं जिसमें एक कर्मशील मानव की कल्पना की गई हैं. जो मननशील होने के साथ ही अपार साहसी भी है तथा गम्भीरता से विषयों पर मनन करता हैं. प्रकृति में मानव को सर्वश्रेष्ठ जीव माना गया हैं क्योंकि जिसके पास बुद्धि बल है जिसके कारण वह वस्तुओं को अपने नजरिये से सोचता हैं.

मानव मष्तिष्क की शक्तियों के दम पर असम्भव कार्यों को भी आसान बना देता हैं. अपने पौरुष के दम पर वह जटिल कर्म को भी अपनी लग्न से बेहद सरल बना जाता हैं. इसी पराक्रमी पौरुष के प्रतीक के रूप में नर शब्द का प्रयोग हुआ हैं. मानव निरंतर काम में लगे रहने की प्रवृत्ति के कारण मानसिक रूप से सशक्त हो जाता हैं. उसकी क्रियाशीलता उसके मन पर ही निर्भर करती हैं वही हारे मन का नर जीवन में कुछ नहीं कर सकता.

इस कविता की पहली पंक्ति नर हो न निराश करो मन को कहावत मन के जीते जीत है मन के हारे हार हैं को भी चरितार्थ करती हैं. क्योंकि मानव जीवन की द्रढ़ता या उसकी कमजोरी महज एक मनोभाव हैं जो मन पर निर्भर करती हैं. कमजोर और हारे हुए मन वाले व्यक्ति का कोई महत्व नहीं होता हैं उसका जीवन अर्थहीन हो जाता हैं वही कर्मठ साहसी एवं मन के पक्के व्यक्ति के आगे संसार झुक जाता हैं. वह अपनी मन की शक्ति से असम्भव कार्य को भी सम्भव बना देता हैं.

छोटी सी असफलता से निराश न होना : नर हो, न निराश करों मन को कविता की पंक्ति मानव मन को विद्रोही बनाने वाली है जो निरंतर मन को चुनौती पेश करती हुई कहती हैं तुम साहसी नर हो महज थोड़ी सी दुनियावी तकलीफों से हार मानकर ही बैठ गये. इस तरह हारे मन तो बुझदिल बैठते हैं जीवन में कठिन हालातों का सामना करना सीखों, तुम अपने निश्चय पर डटे रहे भले ही धरती फट जाए या आसमान टूट जाए.

तुम नर हो कायरता तुम्हारी निशानी नहीं हैं बल्कि साहस और मन हठ तुम्हारी पहचान हैं. अपने पौरुष को जगाओं इस तरह छोटी छोटी मुश्किलों से विचलित होना तुम्हारा काम नहीं हैं बल्कि डटकर इनका सामना करों. जीवन में तुम्हारी प्रेरणा वह चिड़ियाँ होनी चाहिए जो कभी भी हार नहीं मानती हैं हजार बार उसका घर उजड़ जाने पर भी वह फिर से घौसला बनाने लग जाती हैं तुम उस चींटी से सीखों जो अपने सौ बार के प्रयास में भी विफल होने के बाद अपनी अपनी धुन को नहीं छोड़ती हैं.

एक चींटी अपने से कई गुना वजन का दाना लेकर सपाट दीवार पर चढती हैं वह यह जानती हैं कि उसे आसानी से सफलता मिलने वाली नहीं हैं वह हर बार गिरती है फिर उठ खड़ी होती हैं और अंत में सफल हो जाती हैं. वह नन्हा सा जीव भी छोटी सी असफलता से निराश होकर बैठ जाने की बजाय फिर से अपने लक्ष्य को साधने के लिए परिश्रम करने लग जाती हैं फिर तुम तो नर हो तुम्हारे पास समस्त क्षमताएं हैं.

मानसिक बल का महत्व :

जब मानव कोई कार्य करता हैं तो उसके पीछे उसकी मानसिक क्षमता का सहारा होता हैं. हिंदी की एक मशहूर कहावत हैं मन के जीते जीत हैं मन के हारे हार हैं. नर जब तक अपनी मानसिक अर्थात बौद्धिक क्षमता व सामर्थ्य की पहचान न कर लेता वह अन्य प्राणियों की तरह परजीवी बना रहता हैं. वही यदि वह अपनी क्षमता को पहचान लेता हैं तो उसे कोई शक्ति परास्त नहीं कर सकती.

जीवन में जहाँ तक साहस की बात हैं सभी लोग साहसी होते हैं बस अपने साहस को जगाने और समझने की आवश्यकता होती हैं गुरु गोविंद सिंह ने अपने शिष्यों के साहस को जगाते हुए कहा था कि एक सिख एक लाख सिखों के समान हैं तब दुनिया ने सिखों के साहस का लोहा माना था. गांधीजी ने भारतीयों के साहस को जगाया तो अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा था.

मानव में मानसिक बल एक स्तर तक होता हैं हम अपने आराध्य देव अथवा भगवान के नाम के साथ उसे जोड़कर देखते हैं किसी सत्ता में आस्था हमारे मानसिक बल को और अधिक मजबूत कर देता हैं. हम उसी शक्ति को अपना सर्वेसर्वा मानकर कर्म करना प्रारम्भ करते हैं. हमें बहुत जूझना पड़ता हैं मगर कार्य में सफलता की सम्भावनाएं सर्वाधिक हो जाती हैं.

प्रकृति से प्रेरणा :

मानव प्रकृति में विद्यमान करोड़ो जीवों से इसीलिए सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि इसके पास बुद्धि तथा मानसिक बल हैं. प्रकृति या ईश्वर कठिनाई में विचलित होकर निराश हुए लोगों का साथ कभी नहीं देती बल्कि निरंतर विफलताओं के बाद भी कर्म में रत रहने वालों का सही अवसर पर सहयोग करती हैं. मानव को भी छोटे बड़े प्रकृति के जीवों से सीखना चाहिए.

प्रकृति के सिद्धांतों में संघर्ष साहस और परिश्रम का पहिया चलता रहता हैं. किसी समाज या राष्ट्र की उन्नति के लिए यह आवश्यक हैं कि उनके नागरिक साहस और परिश्रम को अपना जीवन मूल्य बनाए तभी सच्चे अर्थों में वे मानव कहलाने के हकदार होंगे. यदि हमारे पूर्वज भी जीवन की कठिनाइयों से हार मानकर यूँ ही बैठ जाते तो क्या हमारा देश आगे बढ़ पाता.

निरंतर आगे बढ़ते रहने का दूसरा नाम ही तो जीवन हैं. स्थिरता का गुण मृत्यु का हैं. जिस तरह नदी हजारों कोस की अपनी यात्रा के उपरान्त भी अपने लक्ष्य को पाने के लिए निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं हमें भी उसी प्रकार आगे बढ़ते रहना हैं नदी की यात्रा में पहाड़ चट्टाने उनकी मुशिब्ते बनकर आती रहती हैं फिर भी वह अपना रास्ता बदल लेने की बजाय पत्थरों को तोडती हुई मंजिल की ओर चल पड़ती हैं.

जब नदी अपने पूर्ण वेग में लक्ष्य की ओर गमन करती हैं तो वह किसी से सहारे की आस नहीं रखती हैं वह रास्ते में आने वाली रूकावटों को रोकने के लिए किसी का सहारा नहीं चाहती बल्कि जो भी उसकी राह का रौडा बनता हैं वह उसे अपने साथ बहा ले जाती हैं. जीवन में हमें भी समस्याओं के बच निकलने की प्रवृत्ति रखने की बजाय साहस से उसका सामना कर उसे खत्म कर आगे बढ़ने की सोच रखनी चाहिए.

जब जीवन के मुसीबत भरे पल आते है तो हथियार डालकर गहरी निराशा में डूबकर बैठने से कुछ भी अच्छा नहीं होता बल्कि हालात बद से बदतर होते चले जाते हैं. जब कबूतर के समक्ष बिल्ली या कुत्ता आता हैं तो वह अपनी आँखे यह सोचकर बंद कर लेता हैं कि ऐसा करने से वह उसे देख नहीं पाएगा. इस तरह के हथकंडे अपनाने से जीवन सच्चाई में कोई बदलाव नहीं आना हैं हमें जो सच्चाई दिखती हैं उसी रूप में लेकर सही हल की ओर सोचना चाहिए.

जीवन में परिवर्तन शीतलता

संसार में कुछ भी स्थिर नहीं हैं इस परिवर्तनशील संसार में जो आज हैं वह कल नहीं होगा. सुख दुःख जीवन यात्रा के बस क्षणिक अनुभव हैं जो जीवन नहीं हैं बल्कि उनका एक छोटा सा अंश हैं जिस तरह पेड़ की छाँव बदलती रहती है इसी तरह सुख व दुःख भी आते जाते रहते हैं. हमें हर स्थिति का आशावान रहकर सामना करना चाहिए तथा दुखों का पुरजोर तरीके से सयंम के साथ सामना करना चाहिए.

Nar Ho na Nirash karo man ko Essay In Hindi

प्रस्तावना – विधाता द्वारा रचित सृष्टि में मनुष्य की उसकी श्रेष्ठ रचना हैं. वह ज्ञानवान प्राणी होने के साथ ही असीम शक्ति का भंडार हैं. उसकी यह असीम शक्ति बुद्धि बल पर आधारित हैं. इसी आधार पर वह अपने मन में जो ठान लेता हैं. उसे पूरा करने की ताकत उसमें होती हैं. वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है. लेकिन इस स्थिति में वह कई बार परिस्थतियों से संघर्ष करते करते थक जाता हैं.

परिणामस्वरूप उसमें निराशा का भाव आ जाता है और वह सोचने लगता है कि अब लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पायेगा. लेकिन परि स्थिति के आगोश में आकर उसका इस प्रकार सोचना उचित नहीं हैं. कहा गया है नर हो न निराश करो मन को अर्थात मनुष्य को अपने मन में निराशा का भाव नहीं लाना चाहिए बल्कि उसे अपने मनोबल को उच्च बनाये रखते हुए दृढता के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए, क्योंकि जहाँ चाह है, वहां राह हैं.

कथन के समर्थन में उदाहरण  यह काव्य पंक्ति राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रेरणास्पद देशभक्ति भावना से पूरित कविता नर हो न निराश करो मन को. की शीर्षक परक पंक्ति हैं. कवि ने मनुष्य को असीम शक्ति का भंडार मानकर उसे कर्मनिष्ठ और साहसी बनने का संदेश ही नहीं दिया है बल्कि प्राणियों में श्रेष्ठ होने के नाते जीवन मार्ग में सफलता से आगे बढ़ते जाने की प्रेरणा भी दी हैं.

जो सर्वथा उचित है. कथन के समर्थन में संसार में अनेक मेहनती और साहसी मनुष्य हुए हैं, जिनकी यश चन्द्रिका आज भी विश्व में फैली हुई हैं. छत्रपति शिवाजी ने कैसे कठिन परिस्थिति में अपने साहस, परिश्रम और उत्साह से पूरित होकर हिन्दू जाति की रक्षा की हैं. विश्व का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब नेपोलियन ने अपनी सेना ने कहा कि आल्प्स पर्वत नहीं है तब आल्प्स नहीं रहा और उसकी सेना ने आनन फानन में आल्प्स पर्वत पार किया.

इतना ही नहीं, वह कहा करता था असम्भव शब्द मूर्खों के शब्दकोश में होता हैं. रमजे मैकडानल्ड जो एक गरीब मजदूर था, अपने उत्साह और लग्न के बल पर ही इंग्लैंड का प्रधानमंत्री बना. अब्राहम लिंकन जैसा लकड़हारा चन्द्रगुप्त मौर्य जैसा दासी पुत्र अपने मनोत्साह के बल पर ही शासक बने. महात्मा गांधी ने अपने मनोबल के सहारे अहिंसा को अपनाकर अंग्रेजों की दासता से भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करवाया.

उत्साह का संचार – मनुष्य तो नर है, नर श्रेष्ठता का प्रतीक है. जो आगे बढ़ता है. उसे ही संघर्ष करने पड़ते हैं. फिर जीवन तो संघर्ष ही हैं. अतः जीवन के लिए आवश्यक भी हैं. इसीलिए कवि जगदीश गुप्त ने जीवन संघर्ष को ही सच बताते हुए कहा हैं.

सच है महज संघर्ष ही
संघर्ष से हटकर जिए तो क्या जिए, हम या कि तुम
जो नत हुआ वह मृत हुआ, जो व्रत से झुरकर कुसुम

कवयित्री महादेवी वर्मा ने भी कष्टों से टकराने की प्रेरणा देते हुए कहा हैं.

टकराएगा कहीं आज यदि उद्धत लहरों से
कौन ज्वार फिर तुझे पार तक पहुंचाएगा.

अतः नर होने के नाते हमें अपने मन में कभी भी निराशा की भावना नहीं लानी चाहिए. हमेशा उत्साह और साहस के बल पर आगे बढ़ते रहना चाहिए तभी हम अपने लक्ष्य को सफलता से प्राप्त कर सकते हैं. विपत्तियों का आना स्वाभाविक हैं. हमें उनके बीच से गुजरना है और उनसे लहरों की तरह टकराते हुए अपने गन्तव्य तक पहुंचना हैं. आशावादी दृष्टिकोण रखने से सभी कार्य सिद्ध होते हैं. कवि बच्चन की ये काव्य पंक्तियाँ इसी कथन की द्योतक हैं.

लघु जीवन लेकर आए हैं प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अंदर मधु के घट हैं प्याले हैं.

उपसंहार- संक्षेप में कहा जा सकता है कि मनुष्य को जीवन में निराश नहीं होना चाहिए. परिस्थतियों से संघर्ष करते हुए हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए. मन की दृढता ही सफलता ही साधक होती है. कितना बड़ा ही तूफान क्यों न आ जाए. मनुष्य को साहसी नाविक की तरह हमेशा जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहिए, इसी बढ़ने में सम्मान है, जीवन है इसलिए कवि गुप्त ने कहा हैं.

बनता बस उद्यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो न निराश करो मन को.

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