जहाँ सुमति तहँ संपति नाना पर निबंध | Jahan sumati tahan sampati nana essay in hindi

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना पर निबंध | Jahan sumati tahan sampati nana essay in hindi:- वैचारिक एवं बौद्धिक शक्ति के कारण इन्सान सभी जीवों से अलग है. इनकी बौद्धिक कुशाग्रता का अर्थ अपने विचारों में शुभता एवं मंगलकामना भी हैं. यदि उनके विचार औरों के बारे में अच्छे है तो वह देवों के समान श्रेष्ठ इन्सान है. तथा इस तरह की सद्बुद्धि को अपने साथ रखने वाला व्यक्ति जीवन में असीम सफलताएं अर्जित करता हैं. तुलसीदास जी ने इसके बारे में कहा है कि जहाँ सुमति, तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति, तहां विपत्ति निदाना, आज हम आपकों इस दोहे का अर्थ निबंध व jahan sumati tahan sampati nana story in hindi के बारे में बता रहे हैं.

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इस दोहे का अर्थ (जहाँ सुमति तहँ संपति नाना meaning in hindi) इस प्रकार है- सुमति सम्पन्न व्यक्ति में सत्यता, ईमानदारी, करुणा, धार्मिकता, प्रेमभाव, आस्तिकता और विश्वास जैसे सद्गुणों का जन्म होता है. तथा वह व्यक्ति अन्य इंसानों में भी सम्मान का पात्र बन जाता हैं. उसके व्यवहार एवं आचरण के आगे सभी को झुकना पड़ता हैं.

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना का अर्थ

जिस व्यक्ति में सुमति है उसमें प्यार एवं स्नेह की धारा अनवरत रूप से प्रवाहित होती रहती हैं. साथ ही उसमें आत्मविश्वास, श्रद्धा व आस्था जैसे मानवीय गुणों का विकास होता हैं. वह निरंतर अपने कार्यों में सफलता अर्जित करता रहता हैं. इस तरह का व्यक्ति स्वहित को एक तरफ रखकर लोकहित तथा लोक भलाई के कर्म करता है ऐसे इन्सान में दूरदर्शिता के गुणों का भंडार होता है इसलिए इस तरह के व्यक्ति भविष्य में घटित घटना को पूर्व में ही पता कर अंजाम के लिए तैयारी कर लेते हैं. सुमति सम्पन्न व्यक्ति में संतोष एवं तृप्ति के भावों की प्रधानता रहती हैं.

इस तरह के व्यक्ति का चरित्र सरिता की भांति होता है जो अपनी सीमा एवं मर्यादा में चलते हुए लोगों के कल्याण का कार्य करते हैं. मर्यादा एवं संयम की सीमा उनमें तभी विद्यमान हो सकती है जब वह उंच नीच, अच्छा बुरा, अपना पराया आदि अनुचित बातों पर ध्यान न दे. जिस प्रकार एक सरिता अपनी मर्यादा को तोड़कर लोगों के जन जीवन को अस्त व्यस्त कर बाढ़ का कारण बनती हैं. ठीक इसी प्रकार एक बुद्धिहीन व्यक्ति पूरे समाज का अहित करता हैं.

तथा समाज के विनाश का कारण बनता हैं. जिस तरह बाढ़ के दवाब को कम करने के लिए उसके पानी को विभिन्न धाराओं में बहाया जाता है उसी प्रकार व्यक्ति को समाज हित के विभिन्न कार्यों की ओर आकृष्ट कर देने मे ही भलाई हैं. चूँकि इन्सान में बौद्धिकता का गुण है इस कारण उसके पास विश्लेषणात्मक शक्ति का अथाह भंडार है जिसके चलते वह एक से अनेक करने के स्वभाव को परिणित करता है तथा यही से मानव की बौद्धिकता पाप की हेतु बनना आरम्भ हो जाती हैं.

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व्यक्ति में बौद्धिकता एवं विश्लेषणात्मक शक्ति की उपस्थिति में वह तथ्यों का वैज्ञानिक विशलेषण करने लगता है जिसके चलते उसमें स्वार्थ एवं आत्मकेन्द्रण की भावना जाग उठती हैं. तथा अपने निजी लाभ के लिए कई बार किसी व्यक्ति को नुक्सान पहुचाकर अपना फायदा लेना तथा कोई बड़ा पाप कर भी बैठता हैं. इस तरह से मानव की बौद्धिकता एक तरफ से उन्हें रचनात्मकता की ओर ले जाती है वही दूसरी ओर इसे विनाश की प्रेरणा भी देती हैं.

यही कारण है कि कहा जाता है मनुष्यता या मानवता बौद्धिकता में न होकर इन्सान के व्यवहार में होती हैं. तथा व्यवहार में बौद्धिकता का आगमन भी तभी हो पाएगा जब उसमें सुमति हो, सद्विवेक हो और सद्बुद्धि तथा सद्विवेक का दूसरा नाम ही सुमति हैं. इस तरह एक सुमति सम्पन्न व्यक्ति को कई अमूल्य निधियां हासिल होती हैं.

समाजीकरण एवं शिक्षा दो ऐसे स्तम्भ है जो व्यक्ति में सुमति जगाने में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं इससे ही इन्सान में विवेक सम्मत व्यक्तित्व का विकास होता हैं. एक तरफ जहाँ शिक्षा व्यक्ति को शालीनता एवं विनम्रता का पाठ पढ़ाती है उन्हें जीवन में स्वावलम्बी उचित अनुचित का भेद करवाती है तथा सही गलत को रोकने का सामर्थ्य प्रदान करती हैं. शिक्षा के हथियार के द्वारा ही विद्यार्थियों में अच्छे चरित्र के गुणों का निर्माण कर देश व समाज सेवा के लिए प्रेरित किया जा सकता हैं.

शिक्षा ही छात्र में समाज के अन्य लोगों के प्रति उनमें सदविचारों को जन्म देती है. तथा सुमति सम्पन्न व्यक्ति न सिर्फ अपनी प्रगति व विकास करता हैं राष्ट्र को भी प्रगति की राह पर ले जाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं. जब देश के हर नागरिक में सुमति होगी तो वह औरों के प्रति इर्ष्या, भेदभाव, साम्प्रदायिकता, अंध क्षेत्रीयता जैसी छोटी छोटी बातों को भूल जाएगा.

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