पारसी धर्म के संस्थापक इतिहास और पूजा स्थल | Parsi Religion Founder History and Place of Worship in Hindi

Parsi Religion Founder History and Place of Worship in Hindi पारसी धर्म का जन्म फारस (ईरान) में हुआ था. वहां के निवासियों का धर्म प्रकृति की पूजा पर आधारित था. पारसी धर्म के मुख्य देवता सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी आदि थे. परन्तु सूर्य को सबसे बड़ा देवता माना जाता था.

पारसी धर्म के संस्थापक इतिहास और पूजा स्थल | Parsi Religion Founder History and Place of Worship in Hindi

  • इतिहास

फारस का यह प्राकृतिक धर्म कालांतर में धर्म श्रवौन के रूप में स्वीकार किया गया. इस धर्म के संस्थापक जरथुष्ट्र थे. यही श्रवौन धर्म बाद में पारसी धर्म बना. जरथुष्ट्र का जन्म पश्चिमी ईरान के अजरबेजान प्रान्त में हुआ था. उनके पिता का नाम पोमशष्पा और माता का नाम दुरोधा था.

वे आरम्भ से ही विचारशील थे. तीस वर्ष की आयु में सबलाना पर्वत पर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई, अधिकाँश विद्वान जरथुष्ट्र का काल 600 ई.पू. मानते है.

जरथुष्ट्र द्वारा स्थापित दार्शनिक चिन्तन के अनुसार शरीर नाशवान है. तथा आत्मा अमर है. परन्तु मनुष्य को अपने कर्म के अनुसार सत्य व असत्य का पालन करने से स्वर्ग तथा नरक की प्राप्ति होती है. इन विचारों से पारसी दर्शन तथा वैदिक दर्शन के समान ही दिखाई देते है.

पारसी दर्शन के अनुसार संसार दैवी और दानवी शक्तियों का प्र्त्क अहुरमजदा है. यह महान देवता है, जिसने पृथ्वी, मनुष्य व स्वर्ग की रचना की. अहुरमजदा शक्ति कहती है कि ”ऐ मनुष्यों बुरी बात न सोचो सद्मार्ग न छोड़ो तथा पाप न करों.

  • Hindi Essay on Parsi Dharm

    दानवीय शक्तियों का प्रतीक अहरिमन है. अहरिमन शक्ति मनुष्यों को शैतान बनाकर नरक की ओर ले जाती है. इन दोनों शक्तियों में संघर्ष चलता रहता है. किन्तु अंतिम विजय अहुरमजदा की होती है. जरथुष्ट्र का धर्म पलायनवादी नही है. उसका मत है कि संसार में रहते हुए सद्कर्म करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है.

    पारसी धर्म के अनुसार शरीर के दो भाग है. 1. शारीरिक तथा 2. अध्यात्मिक. मरने के बाद शरीर तो नष्ट हो जाता है किन्तु आध्यात्मिक भाग जीवित रहता है. पारसी धर्म दर्शन के अनुसार वायु, जल, अग्नि और पृथ्वी से मिलकर बना है. पारसी धर्म का पवित्र ग्रन्थ अवेस्ता-ए-जेद है जिसमे इस धर्म के संस्थापक जरथुष्ट्र की शिक्षाएँ संकलित है.

    कालान्तर में ईरान पर बाहरी आक्रमण होने से पारसियों की बहुत बड़ी संख्या भारत में आ बसी. मुंबई में स्थित पारसी मन्दिर वास्तुकला की दृष्टि से आज भी अत्यंत प्रसिद्ध है. इस प्रकार हम देखते है कि संसार के विभिन्न देशों में अलग अलग धर्म तथा दर्शनों ने जन्म लिया.

 

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